Chambalkichugli.com

STOCK MARKET TODAY: बाजार में दमदार वापसी, सेंसेक्स 395 अंक उछला, निफ्टी 23,200 के ऊपर बंद; मिडकैप-स्मॉलकैप में जोरदार खरीदारी

STOCK MARKET TODAY:नई दिल्ली । घरेलू शेयर बाजार ने मंगलवार को उतार-चढ़ाव भरे कारोबारी सत्र के बावजूद मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया। शुरुआती तेजी के बाद बाजार में कुछ समय के लिए दबाव देखने को मिला, लेकिन दिन के दूसरे हिस्से में खरीदारी लौटने से प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ बंद हुए। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ने सकारात्मक रुख दिखाया, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में निवेशकों की रुचि अधिक मजबूत दिखाई दी। कारोबार की शुरुआत उत्साहजनक माहौल में हुई थी। शुरुआती घंटों में प्रमुख सूचकांक हरे निशान में कारोबार कर रहे थे, लेकिन बाद में मुनाफावसूली और चुनिंदा शेयरों में बिकवाली के कारण बाजार की रफ्तार धीमी पड़ गई। दोपहर तक बाजार पर दबाव इतना बढ़ गया कि प्रमुख सूचकांक लाल निशान तक पहुंच गए। हालांकि इसके बाद निवेशकों ने फिर से खरीदारी शुरू की, जिससे बाजार में रिकवरी आई और दिन का समापन मजबूती के साथ हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स करीब 395 अंकों की बढ़त के साथ 73,918 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 50 भी 119 अंकों की मजबूती के साथ 23,242 के स्तर पर पहुंच गया। दोनों प्रमुख सूचकांकों ने लगभग आधा प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की, जो बाजार में सकारात्मक धारणा को दर्शाता है। Vivo X Fold6 की लाइव फोटो लीक, OnePlus ला रहा नए बजट फोन; पढ़ें दिनभर की बड़ी गैजेट्स खबरें इस कारोबारी सत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों का प्रदर्शन रहा। बेंचमार्क सूचकांकों की तुलना में छोटे और मझोले शेयरों में कहीं अधिक तेजी देखने को मिली। इससे संकेत मिला कि निवेशकों का भरोसा व्यापक बाजार में बढ़ा है और वे बड़े शेयरों के साथ-साथ उभरती कंपनियों में भी निवेश के अवसर तलाश रहे हैं। बाजार में बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र ने सबसे अहम भूमिका निभाई। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जोरदार खरीदारी देखने को मिली, जिसके कारण संबंधित सूचकांक में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज हुई। निजी बैंकिंग शेयरों में भी सकारात्मक रुझान बना रहा। वित्तीय सेवाओं से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की सक्रियता ने पूरे बाजार की दिशा को मजबूत बनाए रखने में योगदान दिया। पर्यटन, रक्षा, ऑटोमोबाइल और पूंजी बाजार से जुड़े क्षेत्रों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। इन क्षेत्रों में आई तेजी ने बाजार के व्यापक दायरे को समर्थन दिया। उपभोक्ता उत्पाद, फार्मा, धातु और अवसंरचना क्षेत्र के शेयरों में भी सकारात्मक कारोबार दर्ज किया गया, जिससे बाजार की मजबूती को अतिरिक्त आधार मिला। महिला टी20 वर्ल्ड कप में इन बल्लेबाजों का रहा दबदबा: टॉप-5 रन स्कोरर्स में कोई भारतीय नहीं, हरमनप्रीत टॉप-10 में हालांकि सभी सेक्टर एक जैसी गति से नहीं बढ़े। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कुछ कमजोरी देखने को मिली और चुनिंदा आईटी शेयरों पर दबाव बना रहा। इसके अलावा ऊर्जा क्षेत्र की कुछ प्रमुख कंपनियों में गिरावट दर्ज की गई, जिससे बाजार की बढ़त कुछ हद तक सीमित रही। फिर भी अधिकांश क्षेत्रों में खरीदारी का माहौल बने रहने से कुल मिलाकर बाजार सकारात्मक दिशा में बंद हुआ। व्यक्तिगत शेयरों की बात करें तो विमानन, वित्तीय सेवाओं, ऑटोमोबाइल, बैंकिंग और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों ने प्रमुख बढ़त हासिल की। दूसरी ओर ऊर्जा, आभूषण, बिजली और तकनीकी क्षेत्र की कुछ कंपनियों में गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद व्यापक खरीदारी के चलते बाजार का समग्र रुख मजबूत बना रहा। विश्लेषकों का मानना है कि बाजार में आई यह रिकवरी निवेशकों के बेहतर विश्वास और व्यापक हिस्सेदारी का संकेत है। यदि आने वाले सत्रों में यही रुझान जारी रहता है तो बाजार को आगे भी समर्थन मिल सकता है। फिलहाल मंगलवार का कारोबार इस बात का संकेत देता है कि निवेशकों की नजर अब केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं है, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप वर्ग में भी अवसर तलाशे जा रहे हैं।

RTO Reforms Digitization: डिजिटल परिवहन सेवाओं की ओर बड़ा कदम, ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर वाहन ट्रांसफर तक ऑनलाइन व्यवस्था की तैयारी

RTO Reforms Digitization: नई दिल्ली । देशभर के करोड़ों वाहन चालकों को राहत देने की दिशा में केंद्र सरकार एक महत्वपूर्ण बदलाव पर विचार कर रही है। प्रस्तावित योजना के तहत ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता अवधि को मौजूदा व्यवस्था की तुलना में काफी बढ़ाया जा सकता है। यदि इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है, तो बड़ी संख्या में लोगों को बार-बार लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके साथ ही परिवहन सेवाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और डिजिटल बनाने की दिशा में भी व्यापक सुधारों की तैयारी चल रही है। सड़क परिवहन और राजमार्ग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार सरकार ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता अवधि को वर्तमान 20 वर्षों से बढ़ाकर वाहन चालक की 50 वर्ष की आयु तक करने की संभावना पर विचार कर रही है। फिलहाल यह प्रस्ताव प्रारंभिक चर्चा के चरण में है और इस संबंध में अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है। हालांकि, प्रस्ताव को लेकर परिवहन क्षेत्र और आम वाहन चालकों के बीच व्यापक रुचि दिखाई दे रही है। STOCK MARKET TODAY: बाजार में दमदार वापसी, सेंसेक्स 395 अंक उछला, निफ्टी 23,200 के ऊपर बंद; मिडकैप-स्मॉलकैप में जोरदार खरीदारी वर्तमान व्यवस्था के तहत ड्राइविंग लाइसेंस निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद नवीनीकरण कराना आवश्यक होता है। कई मामलों में लाइसेंस धारकों को अतिरिक्त दस्तावेजों के साथ मेडिकल प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में समय और संसाधनों की खपत होती है तथा लोगों को क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। प्रस्तावित बदलाव का उद्देश्य इस प्रशासनिक बोझ को कम करना और नागरिकों को अधिक सुविधाजनक व्यवस्था उपलब्ध कराना है। सरकार का मानना है कि यदि लाइसेंस की वैधता अवधि बढ़ाई जाती है तो इससे न केवल लोगों का समय बचेगा, बल्कि परिवहन विभागों पर भी कार्यभार कम होगा। डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ यह कदम प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और सरकारी प्रक्रियाओं को अधिक नागरिक-अनुकूल बनाने में सहायक हो सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इससे अधिक सुविधा मिलने की संभावना है। बैंक नहीं बताएंगे ये ट्रिक्स! होम लोन की लागत कम करने के 7 असरदार उपाय.. लाइसेंस नियमों में संभावित बदलाव के साथ-साथ परिवहन मंत्रालय अन्य सेवाओं को भी पूरी तरह ऑनलाइन करने की दिशा में कार्य कर रहा है। वाहन स्वामित्व हस्तांतरण, परमिट नवीनीकरण और विभिन्न प्रकार की अनुमतियों से जुड़ी प्रक्रियाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की तैयारी की जा रही है। इससे कागजी कार्यवाही में कमी आएगी और लोगों को कार्यालयों में लंबी प्रतीक्षा से राहत मिल सकेगी। नई व्यवस्था लागू होने पर विभिन्न सेवाओं से संबंधित शुल्क भी डिजिटल माध्यमों से जमा किए जा सकेंगे। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और प्रक्रियाओं की निगरानी अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगी। सरकार का उद्देश्य परिवहन क्षेत्र में तकनीक आधारित प्रशासन को बढ़ावा देना है ताकि नागरिकों को तेज, सरल और भरोसेमंद सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें। महिला टी20 वर्ल्ड कप में इन बल्लेबाजों का रहा दबदबा: टॉप-5 रन स्कोरर्स में कोई भारतीय नहीं, हरमनप्रीत टॉप-10 में सड़क सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भी एक नई प्रणाली पर विचार किया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों के रिकॉर्ड में नेगेटिव पॉइंट्स दर्ज किए जा सकते हैं। यदि किसी चालक के खिलाफ बार-बार उल्लंघन के मामले सामने आते हैं, तो उसके ड्राइविंग लाइसेंस पर कार्रवाई की जा सकती है। गंभीर या लगातार नियम तोड़ने की स्थिति में लाइसेंस को अस्थायी रूप से निलंबित अथवा रद्द करने का प्रावधान भी शामिल किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक सरलीकरण और सड़क सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की यह पहल परिवहन क्षेत्र में व्यापक सुधारों का आधार बन सकती है। यदि प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं, तो इससे नागरिकों को सुविधा मिलने के साथ-साथ जिम्मेदार ड्राइविंग संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा और देश की परिवहन व्यवस्था अधिक आधुनिक एवं प्रभावी रूप में विकसित हो सकेगी।

IRCTC ELECTRONIC COOKING: 17 लाख यात्रियों के भोजन पर नहीं पड़ेगा असर, LPG कमी के बीच IRCTC ने अपनाया इलेक्ट्रिक कुकिंग मॉडल

IRCTC ELECTRONIC COOKING: नई दिल्ली । देश में एलपीजी आपूर्ति पर बढ़ते दबाव का असर अब रेलवे की खानपान सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। स्थिति को देखते हुए भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) ने यात्रियों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। गैस आधारित कुकिंग पर निर्भरता कम करते हुए अब ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर बड़े स्तर पर बिजली से संचालित इंडक्शन कुकिंग सिस्टम को अपनाया जा रहा है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, एलपीजी सिलेंडरों की उपलब्धता प्रभावित होने के कारण भोजन तैयार करने की पारंपरिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में यात्रियों को मिलने वाली कैटरिंग सेवाओं में किसी प्रकार की रुकावट न आए, इसके लिए वैकल्पिक कुकिंग मॉडल लागू किया गया है। इस नई व्यवस्था के तहत खाना गैस की बजाय इंडक्शन स्टोव और अन्य विद्युत उपकरणों की मदद से तैयार किया जा रहा है। DATIYA CONGRESS PROTEST: गैस महंगी होने पर कांग्रेस का चुलाह प्रदर्शन, 29 रूपए बढ़ने पर लोगों ने जताया विरोध! भारतीय रेलवे प्रतिदिन लाखों यात्रियों को भोजन उपलब्ध कराता है। देशभर में संचालित बड़ी संख्या में ट्रेनों में खानपान सेवाएं दी जाती हैं और प्रतिदिन लगभग 17 लाख यात्रियों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। इतने बड़े स्तर की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए निरंतर ईंधन आपूर्ति आवश्यक होती है। एलपीजी संकट के बीच रेलवे ने समय रहते वैकल्पिक उपायों को लागू कर परिचालन पर असर पड़ने से बचाने की कोशिश की है। रेलवे प्रशासन ने बताया कि एलएचबी पैंट्री कारों में पहले से मौजूद आधुनिक सुरक्षा सुविधाओं और बेहतर विद्युत प्रणाली को देखते हुए वहां इंडक्शन आधारित खाना पकाने की अनुमति दी गई है। राजधानी, शताब्दी, दुरंतो और वंदे भारत जैसी प्रमुख ट्रेनों में उपयोग किए जाने वाले एलएचबी कोच इस तकनीक के लिए उपयुक्त माने जा रहे हैं। इसके कारण चलती ट्रेनों में भी सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से भोजन तैयार किया जा सकेगा। भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को मिलेगा सहारा, सन फार्मा की मेगा डील में SBI की एंट्री के संकेत केवल ट्रेनों तक ही नहीं, बल्कि प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर भी बिजली आधारित कुकिंग व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। विभिन्न स्टेशन परिसरों में स्थापित फूड प्लाजा, रिफ्रेशमेंट रूम और जन आहार केंद्रों को इंडक्शन कुकर तथा माइक्रोवेव जैसे उपकरणों का अधिक उपयोग करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे भोजन उत्पादन क्षमता बनाए रखने के साथ-साथ गैस पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। रेलवे से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि यदि यह व्यवस्था सफल रहती है तो भविष्य में रेलवे की बड़ी भोजन उत्पादन प्रणाली स्थायी रूप से इलेक्ट्रिक कुकिंग मॉडल की ओर बढ़ सकती है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार, आने वाले समय में लगभग 60 प्रतिशत भोजन तैयारी बिजली आधारित तकनीक पर स्थानांतरित की जा सकती है। इससे ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण होगा और ईंधन आपूर्ति संबंधी जोखिम भी कम होंगे। हादसे ने छीना एक हाथ, हौसले ने दिलाए तीन पैरालंपिक पदक: देवेंद्र झाझरिया की प्रेरक कहानी रेलवे की कैटरिंग व्यवस्था के लिए देशभर में संचालित क्लस्टर किचन, बेस किचन और अन्य भोजन उत्पादन केंद्रों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान परिस्थितियों में आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ने के कारण रेलवे ने प्रमुख तेल विपणन कंपनियों के साथ समन्वय भी मजबूत किया है ताकि आवश्यक गैस सिलेंडरों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इंडक्शन आधारित कुकिंग न केवल आपूर्ति संकट के समय उपयोगी विकल्प साबित हो सकती है, बल्कि यह ऊर्जा दक्षता, सुरक्षा और परिचालन स्थिरता के लिहाज से भी लाभकारी है। रेलवे द्वारा उठाया गया यह कदम भविष्य की चुनौतियों के बीच सार्वजनिक सेवाओं को निर्बाध बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

बैंक नहीं बताएंगे ये ट्रिक्स! होम लोन की लागत कम करने के 7 असरदार उपाय..

नई दिल्ली ।  अपना घर खरीदना हर व्यक्ति का सपना होता है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाली ईएमआई और भारी ब्याज इस सपने की लागत बढ़ा देते हैं। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार कुछ स्मार्ट कदम उठाकर होम लोन की कुल लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 1. मजबूत रखें क्रेडिट स्कोरहोम लोन की ब्याज दर तय करने में क्रेडिट स्कोर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि आपका क्रेडिट स्कोर 750 या उससे अधिक है, तो बैंक आमतौर पर बेहतर ब्याज दर की पेशकश करते हैं। इससे पूरे लोन काल में बड़ी बचत हो सकती है। 2. कम अवधि वाला लोन चुनेंलंबी अवधि के लोन में मासिक ईएमआई कम होती है, लेकिन कुल ब्याज भुगतान काफी बढ़ जाता है। यदि आपकी आय अनुमति देती है, तो कम अवधि का लोन चुनना अधिक फायदेमंद हो सकता है। 3. समय-समय पर प्रीपेमेंट करेंबोनस, इंसेंटिव या अन्य बचत मिलने पर लोन का आंशिक भुगतान (प्रीपेमेंट) करने से मूलधन तेजी से घटता है। इससे भविष्य में लगने वाला ब्याज कम हो जाता है और लोन जल्दी समाप्त होता है। 4. हर साल बढ़ाएं EMIआय बढ़ने के साथ यदि ईएमआई में 5 से 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाए, तो लोन की अवधि कई साल कम हो सकती है। इससे कुल ब्याज भुगतान में भी बड़ी कमी आती है। 5. बैलेंस ट्रांसफर का विकल्प देखेंयदि किसी दूसरे बैंक या वित्तीय संस्था में कम ब्याज दर उपलब्ध है, तो होम लोन बैलेंस ट्रांसफर पर विचार किया जा सकता है। हालांकि ट्रांसफर शुल्क और अन्य लागतों का आकलन पहले कर लेना चाहिए। 6. अधिक डाउन पेमेंट करेंघर खरीदते समय जितना अधिक डाउन पेमेंट करेंगे, उतनी कम राशि उधार लेनी पड़ेगी। इससे ब्याज का बोझ स्वतः कम हो जाएगा। 7. ब्याज दर रीसेट की जानकारी रखेंफ्लोटिंग रेट होम लोन लेने वालों को समय-समय पर अपने बैंक से ब्याज दर की समीक्षा करानी चाहिए। बाजार में दरें घटने पर बैंक रीसेट सुविधा के जरिए लोन की ब्याज दर कम कर सकते हैं। ध्यान देने वाली बात:होम लोन में सबसे अधिक बचत का असर आमतौर पर शुरुआती वर्षों में प्रीपेमेंट और ईएमआई बढ़ाने से होता है, क्योंकि उस समय आपकी किश्त का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में जाता है। सही योजना बनाकर लाखों रुपये की बचत संभव है और लोन कई वर्ष पहले खत्म किया जा सकता है।

भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को मिलेगा सहारा, सन फार्मा की मेगा डील में SBI की एंट्री के संकेत

नई दिल्ली । भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े विदेशी अधिग्रहण सौदों में शामिल एक महत्वपूर्ण डील में देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक अहम भूमिका निभा सकता है। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) अमेरिकी हेल्थकेयर कंपनी के अधिग्रहण के लिए सन फार्मा को करीब 1 अरब डॉलर तक की फंडिंग उपलब्ध कराने पर विचार कर रहा है। यदि बैंक के निदेशक मंडल से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तो यह भारतीय बैंकिंग क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहण बाजार दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम साबित हो सकता है। यह प्रस्ताव ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजारों में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर अधिग्रहण और विस्तार योजनाओं पर काम कर रही हैं। फार्मास्यूटिकल क्षेत्र की अग्रणी कंपनी सन फार्मा ने अप्रैल में अमेरिका स्थित हेल्थकेयर कंपनी ऑर्गेनॉन एंड कंपनी के अधिग्रहण की घोषणा की थी। लगभग 12 अरब डॉलर मूल्य का यह सौदा भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में किए गए सबसे बड़े अधिग्रहणों में गिना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, SBI की ओर से प्रस्तावित 1 अरब डॉलर की फंडिंग फिलहाल बैंक के बोर्ड के समक्ष विचाराधीन है। अंतिम निर्णय बोर्ड की मंजूरी के बाद ही लिया जाएगा। यदि प्रस्ताव स्वीकृत होता है, तो SBI उन प्रमुख वित्तीय संस्थानों में शामिल हो जाएगा जो इस बहु-अरब डॉलर सौदे के लिए ऋण उपलब्ध करा रहे हैं। इस डील की विशेषता केवल इसका आकार नहीं है, बल्कि इसमें भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की बदलती भूमिका भी दिखाई देती है। लंबे समय तक भारतीय बैंकों की विदेशी अधिग्रहण सौदों में भागीदारी सीमित रही थी। इसके पीछे नियामकीय प्रतिबंध और जोखिम प्रबंधन से जुड़ी चिंताएं प्रमुख कारण थीं। परिणामस्वरूप भारतीय कंपनियां ऐसे बड़े सौदों के लिए प्रायः विदेशी बैंकों, निवेश फंडों और पूंजी बाजारों पर निर्भर रहती थीं। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में नियमों में किए गए बदलावों के बाद परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। केंद्रीय बैंक ने घरेलू बैंकों को कॉरपोरेट अधिग्रहणों के लिए वित्तपोषण की अनुमति दी है। इसके बाद भारतीय बैंक बड़े अंतरराष्ट्रीय सौदों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को अतिरिक्त वित्तीय समर्थन प्रदान कर सकता है। प्रस्तावित फंडिंग व्यवस्था में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय बैंक पहले से शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें वैश्विक वित्तीय क्षेत्र की प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं, जो इस अधिग्रहण के लिए ऋण संरचना तैयार कर रही हैं। ऐसे में SBI की संभावित भागीदारी न केवल इस डील की वित्तीय मजबूती बढ़ाएगी, बल्कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की वैश्विक उपस्थिति को भी मजबूत करेगी। हाल के वर्षों में भारतीय कंपनियों ने तकनीक, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्रों में कई बड़े विदेशी अधिग्रहण किए हैं। इन सौदों का उद्देश्य नए बाजारों तक पहुंच, उन्नत तकनीक हासिल करना और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत करना रहा है। अब घरेलू बैंकों की बढ़ती भागीदारी से ऐसी डील्स के लिए वित्त जुटाना और अधिक आसान हो सकता है। इस दिशा में SBI पहले ही अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर काम कर रहा है। बैंक ने जापान के प्रमुख वित्तीय समूह MUFG के साथ सहयोग बढ़ाने की पहल की है, जिसका उद्देश्य विलय और अधिग्रहण से जुड़े अवसरों का आकलन करना है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय बैंक अब केवल पारंपरिक ऋणदाता की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वैश्विक कॉरपोरेट वित्तपोषण के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराना चाहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सौदा सफलतापूर्वक पूरा होता है, तो भविष्य में भारतीय कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय विस्तार अभियानों में घरेलू बैंकों की भागीदारी और बढ़ सकती है। साथ ही यह भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ते आत्मविश्वास का भी संकेत माना जाएगा।

पश्चिम एशिया तनाव के बावजूद भारत पर भरोसा बरकरार, फिच ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 6.4% जीडीपी वृद्धि अनुमान कायम रखा 2.

नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर का अनुमान 6.4 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। एजेंसी का मानना है कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती और घरेलू मांग देश की विकास यात्रा को आगे बढ़ाती रहेगी। फिच की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और तेल कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव का असर दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बना हुआ है। एजेंसी का कहना है कि घरेलू खपत, निवेश गतिविधियां और आर्थिक सुधारों का प्रभाव विकास दर को सहारा देता रहेगा। रिपोर्ट में घरेलू मांग को भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बताया गया है। उपभोक्ता खर्च और निवेश गतिविधियों में निरंतर वृद्धि से आर्थिक गति बनी रहने की संभावना व्यक्त की गई है। इसके अलावा आयात में वास्तविक कमी के कारण शुद्ध बाहरी मांग का भी विकास दर में सकारात्मक योगदान रहने का अनुमान जताया गया है। फिच का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का प्रभाव स्थायी नहीं रहेगा। एजेंसी के अनुसार, यदि वैश्विक हालात सामान्य होते हैं तो वित्त वर्ष 2027-28 में भारतीय अर्थव्यवस्था और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ सकती है। इसी आधार पर अगले वित्त वर्ष के लिए 6.7 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान व्यक्त किया गया है। इसके बाद आर्थिक विकास दर के धीरे-धीरे संतुलित स्तर पर लौटने की संभावना जताई गई है। रिपोर्ट में तेल कीमतों को प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल किया गया है। फिच के मुख्य अर्थशास्त्री ब्रायन कूल्टन के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकती है। हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बढ़ते निवेश और डिजिटल सेवाओं पर बढ़ता खर्च कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को सहारा प्रदान कर रहा है। भारत जैसे देशों को भी इससे लाभ मिलने की उम्मीद है। महंगाई के मोर्चे पर एजेंसी ने सतर्क दृष्टिकोण अपनाया है। फिच का अनुमान है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति आने वाले महीनों में बढ़ सकती है। वर्ष 2026 के अंत तक महंगाई दर 5.3 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसके पीछे ऊर्जा लागत में वृद्धि और सांख्यिकीय आधार प्रभाव को प्रमुख कारण माना गया है। रिपोर्ट में मौसम संबंधी जोखिमों का भी उल्लेख किया गया है। सामान्य से कम मानसून या अत्यधिक गर्मी जैसी परिस्थितियां खाद्य उत्पादन और आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे महंगाई दर पर अतिरिक्त असर पड़ने की आशंका रहेगी। भारतीय मुद्रा को लेकर एजेंसी का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत स्थिर है। फिच का मानना है कि वर्ष के शेष समय में रुपये में बड़े स्तर पर गिरावट की संभावना नहीं है। हालांकि वैश्विक परिस्थितियों के कारण सीमित उतार-चढ़ाव संभव है, लेकिन व्यापक अस्थिरता की आशंका फिलहाल कम दिखाई देती है। गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने भी हाल ही में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.6 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान व्यक्त किया है। केंद्रीय बैंक ने भी वैश्विक आपूर्ति शृंखला में संभावित व्यवधान, वित्तीय बाजारों की अस्थिरता और मौसम संबंधी चुनौतियों को प्रमुख जोखिम बताया है। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ता निवेश, डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे पर निरंतर खर्च भारत की आर्थिक वृद्धि को आने वाले वर्षों में भी समर्थन देते रहेंगे। वैश्विक चुनौतियों के बीच फिच का ताजा अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और स्थिरता पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास को दर्शाता है।

विकसित भारत 2047 की दिशा में अहम कदम, कोयला एक्सचेंज व्यवस्था से मजबूत होगी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक पारदर्शिता

नई दिल्ली । देश के ऊर्जा क्षेत्र में संरचनात्मक सुधारों को गति देते हुए केंद्र सरकार ने कोयला एक्सचेंज नियम, 2026 को अधिसूचित कर दिया है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य कोयला व्यापार को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और बाजार आधारित बनाना है। सरकार का मानना है कि यह कदम न केवल कोयला आपूर्ति प्रणाली को आधुनिक बनाएगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। नए नियमों के तहत देश में कोयला एक्सचेंज स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। हाल ही में लागू किए गए खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2025 के माध्यम से खनिज एक्सचेंज की अवधारणा को कानूनी आधार प्रदान किया गया है। इसके बाद केंद्र सरकार को कोयले और उसके प्रसंस्कृत उत्पादों सहित विभिन्न खनिजों के संगठित और पारदर्शी व्यापार को बढ़ावा देने का अधिकार प्राप्त हुआ है। सरकार ने कोयला एक्सचेंजों के पंजीकरण और विनियमन की जिम्मेदारी कोयला नियंत्रक संगठन को सौंपी है। यह संस्था एक्सचेंज स्थापित करने की इच्छुक पात्र संस्थाओं को अनुमति प्रदान करेगी तथा उनके संचालन की निगरानी भी करेगी। अधिकृत संस्थाओं को व्यापार संचालन से जुड़े नियम और उपनियम तैयार करने तथा कोयला कारोबार को सुचारु बनाने का अधिकार होगा। इन पंजीकरणों की वैधता 25 वर्षों तक रहेगी, जिससे दीर्घकालिक निवेश और स्थिरता को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था देश में कोयला विपणन के मौजूदा ढांचे में बड़ा बदलाव ला सकती है। अभी तक कोयला व्यापार मुख्य रूप से सीमित और पारंपरिक बिक्री मॉडल पर आधारित रहा है, जहां उत्पादक और खरीदारों के बीच अवसर अपेक्षाकृत सीमित रहते हैं। नई एक्सचेंज प्रणाली के लागू होने के बाद व्यापार का स्वरूप अधिक खुला और प्रतिस्पर्धी होगा, जिससे अनेक विक्रेता और अनेक खरीदार एक साझा मंच पर कारोबार कर सकेंगे। इस मॉडल का सबसे बड़ा लाभ पारदर्शी मूल्य निर्धारण के रूप में सामने आएगा। बाजार आधारित कीमतों से खरीदारों और उत्पादकों दोनों को वास्तविक मांग और आपूर्ति के आधार पर बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलेगी। इससे कोयला क्षेत्र में दक्षता बढ़ेगी और संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो सकेगा। साथ ही, व्यापारिक प्रक्रियाओं में स्पष्टता आने से विवादों और असमानताओं में भी कमी आने की संभावना है। नई व्यवस्था से वाणिज्यिक और कैप्टिव खनन कंपनियों को भी व्यापक बाजार उपलब्ध होगा। वे अपने उत्पादों को अधिक संख्या में संभावित खरीदारों तक पहुंचा सकेंगे। सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला कंपनियों के लिए भी यह मंच कारोबार बढ़ाने और बाजार हिस्सेदारी मजबूत करने का अवसर प्रदान करेगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सेवा गुणवत्ता और आपूर्ति तंत्र में सुधार की संभावनाएं भी मजबूत होंगी। सरकार का मानना है कि कोयला एक्सचेंज नियम, 2026 व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने, निवेश आकर्षित करने और ऊर्जा क्षेत्र में आधुनिक ढांचा विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अधिक प्रतिस्पर्धी और व्यवस्थित कोयला बाजार से उद्योगों को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही ऊर्जा क्षेत्र की दीर्घकालिक आवश्यकताओं को पूरा करने, आर्थिक विकास को गति देने और आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था के निर्माण में भी इस सुधार की महत्वपूर्ण भूमिका रहने की उम्मीद है।

वैश्विक सीफूड बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी, अगले पांच वर्षों में निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का रोडमैप

नई दिल्ली । भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात क्षेत्र ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है और अब देश इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की तैयारी में जुट गया है। केंद्र सरकार ने अगले पांच वर्षों में समुद्री उत्पादों के निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में निर्यात क्षमता बढ़ाने, वैश्विक बाजारों तक पहुंच मजबूत करने और मूल्य संवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय समुद्री उत्पाद निर्यात कार्यशाला के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात पिछले दस वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत बढ़ा है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में वैश्विक सीफूड व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब चार प्रतिशत है, जिसे आने वाले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार, उद्योग, निर्यातक और किसानों के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-कुक जैसे वैल्यू एडेड उत्पादों के उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देना समय की मांग है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है। इसके साथ ही हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों से खुले नए बाजारों का लाभ उठाने की रणनीति पर भी बल दिया गया। मत्स्य पालन क्षेत्र के आंकड़े भी इस विकास यात्रा को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। देश में मछली उत्पादन वर्ष 2012-13 के लगभग 95.8 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में करीब 198 लाख टन तक पहुंच चुका है। उत्पादन में यह वृद्धि न केवल घरेलू मांग को पूरा करने में सहायक रही है बल्कि निर्यात क्षमता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात लगभग 8.46 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। समुद्री निर्यात में फ्रोजन झींगा अब भी सबसे प्रमुख उत्पाद बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग लगातार बनी हुई है, जिससे भारत को विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिल रही है। सरकार इस क्षेत्र में ट्रेसबिलिटी, गुणवत्ता नियंत्रण और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से निवेश और सहायता उपलब्ध करा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात वृद्धि के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। कोल्ड चेन नेटवर्क, आधुनिक लॉजिस्टिक्स, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, रोग प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन मानकों का पालन जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक सुधार आवश्यक हैं। इसी उद्देश्य से कार्यशाला में उद्योग प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों, स्टार्टअप्स और किसानों ने विभिन्न चुनौतियों और संभावित समाधानों पर विस्तार से चर्चा की। समुद्री उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने में परिवहन और एयर कार्गो अवसंरचना की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उच्च मूल्य वाले उत्पादों को तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और आधुनिक कार्गो सुविधाओं के विस्तार पर काम किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि बेहतर बुनियादी ढांचा, तकनीकी नवाचार और टिकाऊ मत्स्य पालन पद्धतियां भारत को वैश्विक सीफूड व्यापार में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकती हैं। आने वाले वर्षों में यदि उत्पादन, प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण और बाजार विस्तार की योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, तो भारत न केवल अपने निर्यात लक्ष्य को हासिल कर सकता है बल्कि वैश्विक समुद्री उत्पाद व्यापार में एक प्रमुख शक्ति के रूप में भी उभर सकता है।

शेयर बाजार में लौटी रौनक, बैंकिंग और वित्तीय शेयरों के सहारे सेंसेक्स-निफ्टी हरे निशान में बंद

नई दिल्ली । लगातार दो सत्रों तक दबाव में रहने के बाद भारतीय शेयर बाजार ने मंगलवार को शानदार वापसी की। कारोबार के अंत में BSE Sensex 394.50 अंक यानी 0.54 प्रतिशत की बढ़त के साथ 73,918.76 पर बंद हुआ, जबकि Nifty 50 119.10 अंक यानी 0.52 प्रतिशत मजबूत होकर 23,424.10 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार में तेजी की अगुवाई बैंकिंग सेक्टर ने की। Nifty Bank 2.09 प्रतिशत की मजबूती के साथ बंद हुआ। इसके अलावा डिफेंस, रियल्टी, फाइनेंशियल सर्विसेज, ऑटो, मैन्युफैक्चरिंग, एफएमसीजी और सर्विसेज सेक्टर के शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली। वहीं आईटी और मीडिया इंडेक्स दबाव में रहे। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी निवेशकों का उत्साह देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1.35 प्रतिशत की बढ़त के साथ 60,715.45 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 1.69 प्रतिशत उछलकर 18,063.60 के स्तर पर पहुंच गया। सेंसेक्स के प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में State Bank of India, ICICI Bank, Axis Bank, Bajaj Finance, Maruti Suzuki, Asian Paints और Adani Ports and Special Economic Zone शामिल रहे। दूसरी ओर Infosys, Tech Mahindra, HCL Technologies, NTPC और Power Grid Corporation of India के शेयरों में कमजोरी रही। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार हालिया गिरावट के बाद निवेशकों ने चुनिंदा सेक्टरों में खरीदारी की। साथ ही ईरान-इजरायल तनाव में कमी और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भी निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ। हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली और ऊंची बॉन्ड यील्ड अभी भी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिका के महंगाई आंकड़ों, Federal Reserve System की मौद्रिक नीति और वैश्विक लिक्विडिटी संकेतों पर रहेगी। मंगलवार को बाजार की शुरुआत भी सकारात्मक रही थी और शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स तथा निफ्टी में करीब आधा प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई थी, जो पूरे सत्र के दौरान कायम रही।

जीईएम ने बदली सरकारी खरीद की तस्वीर, 10 साल में 400 करोड़ से 5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा कारोबार: सीईओ मिहिर कुमार

नई दिल्ली । सरकारी खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता, दक्षता और समावेशिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) आज देश की सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल पहलों में से एक बन चुका है। पिछले एक दशक में इस प्लेटफॉर्म ने सरकारी खरीद की पारंपरिक व्यवस्था को बदलते हुए कारोबार, प्रतिस्पर्धा और उद्यमिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किए हैं। जीईएम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मिहिर कुमार के अनुसार, जिस प्लेटफॉर्म का कारोबार शुरुआती वर्ष में केवल 400 से 422 करोड़ रुपये के आसपास था, वह आज बढ़कर 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर तक पहुंच चुका है। जीईएम की स्थापना वर्ष 2016 में सरकारी खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के उद्देश्य से की गई थी। इसके माध्यम से विक्रेताओं का पंजीकरण, उत्पाद सूचीकरण, निविदा प्रक्रिया, ऑर्डर प्रबंधन, आपूर्ति और भुगतान जैसी सभी प्रक्रियाएं पूरी तरह डिजिटल माध्यम से संचालित की जाती हैं। इससे सरकारी विभागों और आपूर्तिकर्ताओं दोनों के लिए प्रक्रियाएं अधिक सरल और तेज हुई हैं। प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक सूक्ष्म और लघु उद्यमों की बढ़ती भागीदारी रही है। सरकारी नीति के अनुसार सार्वजनिक खरीद का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा एमएसई क्षेत्र से किया जाना चाहिए, लेकिन जीईएम पर यह हिस्सा लगभग 45 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इससे हजारों छोटे कारोबारियों और उद्यमियों को सीधे सरकारी बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिला है। जीईएम के माध्यम से केवल कारोबार का विस्तार ही नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न सामाजिक और आर्थिक वर्गों की भागीदारी भी बढ़ी है। महिला उद्यमियों ने इस मंच का व्यापक लाभ उठाया है। शुरुआती वर्षों में जहां महिला स्वामित्व वाले उद्यमों से होने वाला कारोबार सीमित स्तर पर था, वहीं अब यह कई हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इससे महिला उद्यमिता को नई गति मिली है और सरकारी खरीद प्रक्रिया में उनकी भागीदारी मजबूत हुई है। स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को भी जीईएम से बड़ा लाभ मिला है। एक दशक पहले जहां बहुत कम स्टार्टअप इस प्लेटफॉर्म से जुड़े थे, वहीं अब हजारों स्टार्टअप्स सरकारी खरीद प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं। इनके माध्यम से होने वाला कारोबार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। इससे नवाचार आधारित कंपनियों को सरकारी संस्थानों तक अपनी सेवाएं और उत्पाद पहुंचाने का अवसर प्राप्त हुआ है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से जुड़े उद्यमों की भागीदारी में भी महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार की समावेशी विकास नीति के अनुरूप जीईएम ने उन वर्गों को भी बाजार उपलब्ध कराया है जिन्हें पहले सरकारी खरीद प्रणाली में अपेक्षाकृत कम अवसर मिलते थे। इससे आर्थिक सशक्तिकरण और उद्यमिता को बढ़ावा मिला है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी जीईएम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों के लिए बड़ी मात्रा में वैक्सीन, सिरिंज, चिकित्सा उपकरण और अन्य आवश्यक सामग्री की खरीद इसी मंच के माध्यम से की गई। इसके अलावा रेलवे, शिक्षा, प्रशासन और अन्य सरकारी क्षेत्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी प्लेटफॉर्म की भूमिका लगातार बढ़ती गई है। तकनीकी दृष्टि से भी जीईएम लगातार विकसित हुआ है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण, डिजिटल मॉनिटरिंग, ऑनलाइन नीलामी और डेटा आधारित निर्णय प्रक्रिया ने खरीद व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया है। इससे मानव हस्तक्षेप में कमी आई है और खरीद प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीईएम ने केवल सरकारी खरीद को डिजिटल नहीं बनाया, बल्कि कारोबार करने में आसानी को भी नई मजबूती प्रदान की है। ऑनलाइन पंजीकरण, पारदर्शी बोली प्रणाली और डिजिटल अनुबंध प्रबंधन ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए सरकारी बाजार तक पहुंच को सरल बनाया है। विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में यह मंच अब देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक खरीद प्रणाली का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभर रहा है।