Chambalkichugli.com

पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी गिरावट के संकेत! जुलाई के बाद कच्चे तेल में आ सकती है तेज नरमी

नई दिल्ली। पिछले करीब 100 दिनों से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर लगातार चर्चा बनी हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इससे तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। इसी बीच ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नया अनुमान जारी किया है, जिसमें आने वाले महीनों में कीमतों में बदलाव के संकेत दिए गए हैं। फिच का अनुमान क्या कहता है?फिच के मुताबिक वर्ष 2026 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 87 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। एजेंसी का अनुमान है कि मई से जुलाई के बीच कच्चा तेल 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बना रह सकता है। हालांकि जुलाई के बाद कीमतों में गिरावट की संभावना जताई गई है। अनुमान के अनुसार अगस्त से कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकता है, जबकि सितंबर के बाद यह स्तर 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकता है। होर्मुज स्ट्रेट खुलने पर क्या होगा असर?फिच के अनुसार यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिति सामान्य होती है और समुद्री मार्ग दोबारा खुलता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट देखने को मिल सकती है। ऐसे में अगस्त और सितंबर से वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ने और कीमतों में नरमी आने की संभावना है। आपूर्ति और मांग का संतुलन बनेगा अहम कारणरेटिंग एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा कीमतों में तेजी उत्पादन में कमी के कारण नहीं, बल्कि सप्लाई बाधित होने की वजह से आई है। तेल भंडार और उत्पादन क्षमता को स्थायी नुकसान नहीं हुआ है। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया है कि ओपेक और ओपेक प्लस देशों द्वारा उत्पादन बढ़ाने के फैसले के बाद बाजार में तेल की उपलब्धता और बढ़ सकती है, जिससे ओवरसप्लाई की स्थिति बन सकती है।रेटिंग एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा कीमतों में तेजी उत्पादन में कमी के कारण नहीं, बल्कि सप्लाई बाधित होने की वजह से आई है। तेल भंडार और उत्पादन क्षमता को स्थायी नुकसान नहीं हुआ है। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया है कि ओपेक और ओपेक प्लस देशों द्वारा उत्पादन बढ़ाने के फैसले के बाद बाजार में तेल की उपलब्धता और बढ़ सकती है, जिससे ओवरसप्लाई की स्थिति बन सकती है। होर्मुज बना सबसे बड़ा कारकस्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है, जहां से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल का परिवहन होता है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब पांचवां हिस्सा है। मौजूदा तनाव के कारण इस मार्ग पर बाधा बनी हुई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति सामान्य होती है तो आने वाले महीनों में वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लौट सकती है और 2026 के अंत तक कीमतों में और गिरावट देखी जा सकती है।

बैंक खाते में बड़ी रकम डालते ही आ सकता है IT नोटिस…. जानिए क्या है नियम

नई दिल्ली। बैंक खाते (Bank Accounts) में बड़ी नकद रकम जमा होते ही आयकर विभाग (Income Tax Department) की नजर उस पर पड़ सकती है। खासकर नोटबंदी (Demonetization) के बाद से नकद जमा, कैश बिक्री और कारोबार की नकदी को लेकर जांच का दायरा बढ़ा है। आयकर अपीलीय अधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal) यानी आईटीएटी के हालिया फैसलों ने एक बात साफ कर दी है…सिर्फ बैंक में कैश जमा होना अपराध नहीं है। सवाल यह है कि उस कैश का स्रोत क्या है और क्या करदाता उसे साबित कर सकता है। क्या है पूरा मामला? हालिया मामलों में आयकर विभाग ने नोटबंदी के दौरान जमा बड़ी नकद रकम को अघोषित आय मानकर टैक्स की मांग की। एक मामले में स्क्रैप कारोबारी के खाते में 1.28 करोड़ नकद जमा हुए थे। विभाग ने इसे शक के दायरे में मानते हुए भारी टैक्स मांग बनाई। करदाता ने कहा, यह रकम उसके स्क्रैप कारोबार की बिक्री से जुड़ी थी। पिछले वर्षों में भी इसी तरह के कारोबार और नकद बिक्री को विभाग स्वीकार कर चुका था। आईटीएटी ने करदाता को राहत देते हुए कहा, अगर कारोबार का पुराना रिकॉर्ड, बहीखाते और बिक्री का पैटर्न नकद जमा को समर्थन देते हैं, तो केवल बैंक में पैसा जमा होने से उसे अघोषित आय नहीं कहा जा सकता। फिर दूसरे मामले में करदाता क्यों हारादिल्ली आईटीएटी के एक अन्य मामले में 1.34 करोड़ की नकद जमा को लेकर करदाता को राहत नहीं मिली। करदाता ने इसे नकद बिक्री बताया, लेकिन जांच में खरीद-बिक्री के दावों, दस्तावेजों और लेनदेन में गंभीर विसंगतियां मिलीं। खरीद लेनदेन वास्तविक नहीं लगे और बिक्री की कहानी बहीखातों से मजबूत तरीके से साबित नहीं हो पाई। आईटीएटी ने माना, कारोबार की कहानी कागजों पर बनाई गई लगे और खरीद बिक्री का आधार भरोसेमंद न हो, तो नकद जमा अघोषित आय मानी जाएगी। आईटीएटी का संदेश क्या है?– दोनों फैसलों का सार है कि आयकर विभाग सिर्फ रकम नहीं, बल्कि उसकी कहानी देखता है। बैंक में जमा नकद आपकी आय, कारोबार, पुराने रिकॉर्ड, खरीद-बिक्री बिल, स्टॉक रजिस्टर और कैश बुक से मेल खाती है, तो उसे समझाया जा सकता है। – अगर रिटर्न में कम आय दिखाई गई हो, कारोबार का रिकॉर्ड कमजोर हो और अचानक खाते में लाखों या करोड़ों रुपये नकद जमा हो जाएं, तो नोटिस आने और टैक्स मांग बनने की आशंका बढ़ जाती है।– अगर नकद जमा अघोषित आय मानी गई, तो आयकर कानून की धारा 69ए और 115बीबीई के तहत टैक्स बहुत भारी पड़ सकता है। ये दस्तावेज जरूरी नकद बिक्री या कारोबार से आई रकम साबित करने के लिए करदाता के पास खरीद-बिक्री बिल, स्टॉक रजिस्टर, कैश बुक, बैंक स्टेटमेंट, जीएसटी रिटर्न, आयकर रिटर्न, पुराने वर्षों का टर्नओवर और ग्राहक सप्लायर रिकॉर्ड होना चाहिए। अगर कारोबारी कहता है कि नकद जमा बिक्री से आया है, तो उसे दिखाना होगा कि उसके पास इतना स्टॉक था, बिक्री वास्तव में हुई थी और रकम बहीखातों में सही तरीके से दर्ज थी।

शेयर बाजार में आज रहना होगा सतर्क! ग्लोबल दबाव के बीच उतार-चढ़ाव की आशंका, निवेशकों की नजर निफ्टी-सेंसेक्स पर

नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए आज का कारोबारी सत्र उतार-चढ़ाव भरा रहने की संभावना है। सोमवार को बाजार में आई बड़ी गिरावट के बाद निवेशकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सेंसेक्स और निफ्टी संभल पाएंगे या फिर दबाव और बढ़ेगा। वैश्विक संकेत फिलहाल बाजार के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं। एशियाई बाजारों में कमजोरी, अमेरिका के बाजारों में बिकवाली, मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार में जोरदार गिरावट देखने को मिली थी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों महत्वपूर्ण स्तरों से नीचे फिसल गए थे। बाजार पूंजीकरण में भी भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की संपत्ति में लाखों करोड़ रुपये की कमी आई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर अभी भी बना हुआ है। आज के कारोबार में सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों का रह सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी भारत जैसे आयातक देशों के लिए चिंता का विषय है। इससे महंगाई और कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका सीधा असर शेयर बाजार की धारणा पर पड़ता है। हालांकि बाजार के लिए कुछ सकारात्मक संकेत भी मौजूद हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदम और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की लगातार खरीदारी बाजार को समर्थन दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत घरेलू निवेश प्रवाह बाजार में बड़ी गिरावट को सीमित कर सकता है। तकनीकी दृष्टि से देखें तो निफ्टी के लिए 23,000 का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि यह स्तर बना रहता है तो बाजार में रिकवरी देखने को मिल सकती है। वहीं इसके नीचे फिसलने पर बिकवाली का दबाव और बढ़ सकता है। निवेशकों को फिलहाल जल्दबाजी में बड़े दांव लगाने से बचने और गुणवत्ता वाले शेयरों पर नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है। बैंकिंग, एफएमसीजी और चुनिंदा डिफेंस शेयरों में निवेशकों की रुचि बनी रह सकती है, जबकि आईटी और निर्यात आधारित सेक्टर वैश्विक दबाव के कारण कमजोर रह सकते हैं। कुल मिलाकर आज का दिन बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण रह सकता है, लेकिन चुनिंदा सेक्टरों में अवसर भी मौजूद रहेंगे। ऐसे में निवेशकों को सतर्क रणनीति के साथ बाजार में कदम रखने की जरूरत होगी।

भारतीय स्टेट बैंक ने वित्तीय प्रदर्शन का दिया बड़ा संकेत, केंद्र सरकार को मिला 8,813 करोड़ रुपये का डिविडेंड चेक

नई दिल्ली । देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को 8,813 करोड़ रुपये का डिविडेंड सौंपा है। यह भुगतान बैंक के मजबूत वित्तीय प्रदर्शन और देश की बैंकिंग प्रणाली में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। एसबीआई के चेयरमैन सी. एस. शेट्टी ने यह डिविडेंड चेक केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सौंपा। इस संबंध में जानकारी वित्त मंत्री कार्यालय द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से साझा की गई, जिसमें बताया गया कि यह लाभांश केंद्र सरकार के लिए गैर-कर राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। डिविडेंड का यह भुगतान ऐसे समय में हुआ है जब बैंकिंग क्षेत्र लगातार डिजिटल बदलाव, क्रेडिट ग्रोथ और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के चलते मजबूत प्रदर्शन कर रहा है। एसबीआई की यह उपलब्धि न केवल बैंक की वित्तीय स्थिति को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश की आर्थिक मजबूती में अहम योगदान दे रहे हैं। एसबीआई देश का सबसे बड़ा बैंक होने के साथ-साथ सरकार की वित्तीय नीतियों और आर्थिक विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में भी प्रमुख भूमिका निभाता है। बैंक की ओर से दिया गया यह डिविडेंड केंद्र सरकार के बजट प्रबंधन और राजस्व संतुलन में सहायक माना जाता है। बैंक के चेयरमैन सी. एस. शेट्टी के नेतृत्व में एसबीआई ने हाल के वर्षों में कई क्षेत्रों में सुधार और विस्तार किया है। बैंकिंग सेवाओं का डिजिटलीकरण, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना और ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में कर्ज वितरण को मजबूत करना इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान सी. एस. शेट्टी ने कहा था कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की आर्थिक नींव मजबूत बनी हुई है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति को संतुलित बताते हुए कहा था कि ब्याज दरों में स्थिरता आर्थिक विकास को समर्थन देने में मदद करती है। उन्होंने यह भी कहा था कि निवेशकों को केवल अल्पकालिक बाजार उतार-चढ़ाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि भारत की दीर्घकालिक विकास कहानी पर भरोसा रखना चाहिए। उनके अनुसार, बैंकिंग सुधार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और बुनियादी ढांचे का विस्तार भारत की आर्थिक प्रगति के मुख्य स्तंभ हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एसबीआई का यह डिविडेंड भुगतान बैंकिंग क्षेत्र की स्थिरता और लाभप्रदता का संकेत है। यह भी दर्शाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सरकारी खजाने को मजबूत करने में लगातार योगदान दे रहे हैं। वित्तीय वर्ष के इस प्रदर्शन को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में भी बैंक अपनी वृद्धि की गति बनाए रखेगा और देश की आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देता रहेगा।

डिजिटल यूजर्स के लिए बड़ी राहत, BSNL का 399 रुपये वाला फाइबर प्लान पहले साल में भारी फायदे के साथ उपलब्ध

नई दिल्ली । सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) ने अपने ब्रॉडबैंड यूजर्स के लिए एक नया और किफायती ऑफर पेश किया है, जो खासतौर पर डिजिटल कनेक्टिविटी को सस्ता और आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। BSNL के ‘Spark’ पोर्टफोलियो के तहत लॉन्च किया गया यह फाइबर-टू-द-होम (FTTH) प्लान शुरुआती 12 महीनों के लिए केवल 399 रुपये प्रति माह की दर पर उपलब्ध है। कंपनी का दावा है कि इस प्लान में हाई-स्पीड इंटरनेट और पर्याप्त डेटा के साथ उपयोगकर्ताओं को बेहतर अनुभव मिलेगा। इस नए प्लान के तहत ग्राहकों को 50 Mbps तक की इंटरनेट स्पीड दी जा रही है, जो घरेलू और प्रोफेशनल दोनों तरह के उपयोग के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। साथ ही इसमें कुल 3300 GB हाई-स्पीड डेटा उपलब्ध कराया जा रहा है, जो सामान्य ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ताओं के लिए काफी बड़ी मात्रा है। डेटा लिमिट खत्म होने के बाद इंटरनेट स्पीड 4 Mbps तक सीमित हो जाती है, जिससे बेसिक कनेक्टिविटी जारी रहती है। BSNL ने इस प्लान में अनलिमिटेड वॉइस कॉलिंग की सुविधा भी शामिल की है, जिससे यूजर्स किसी भी नेटवर्क पर बिना अतिरिक्त शुल्क के कॉल कर सकते हैं। इसके साथ ही कंपनी अपने ग्राहकों को BSNL Secure Pro जैसी डिजिटल सुरक्षा सेवाएं भी उपलब्ध करा रही है, जिससे ऑनलाइन उपयोग को और सुरक्षित बनाने पर जोर दिया गया है। यह पैकेज खासतौर पर उन उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जो घर से काम करते हैं, ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीमिंग का उपयोग करते हैं। हालांकि यह ऑफर शुरुआती एक साल तक ही 399 रुपये प्रति माह की दर पर उपलब्ध है। 12 महीने पूरे होने के बाद, यानी 13वें महीने से इस प्लान की कीमत बढ़कर 499 रुपये प्रति माह हो जाएगी। इसके बावजूद शुरुआती अवधि में यह प्लान बाजार में मौजूद कई निजी कंपनियों के मुकाबले अधिक किफायती विकल्प माना जा रहा है। कनेक्शन बुक करने के लिए कंपनी ने डिजिटल माध्यमों को भी आसान बनाया है। ग्राहक BSNL की WhatsApp सेवा के जरिए 1800 4444 नंबर पर ‘Hi’ संदेश भेजकर कनेक्शन के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह प्रक्रिया नए उपभोक्ताओं के लिए सरल और तेज मानी जा रही है। डिजिटल इंडिया अभियान और बढ़ती इंटरनेट जरूरतों के बीच BSNL का यह कदम ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में किफायती इंटरनेट उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्लान से ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ सकती है और डिजिटल सेवाओं की पहुंच और व्यापक हो सकती है। कुल मिलाकर यह नया BSNL Spark FTTH प्लान उन उपभोक्ताओं के लिए आकर्षक विकल्प बनकर सामने आया है, जो कम कीमत में अधिक डेटा, स्थिर स्पीड और अनलिमिटेड कॉलिंग जैसी सुविधाओं की तलाश में हैं।

ऑटो उद्योग की बड़ी चिंता: विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से घट रहा DVA, कंपनियों ने PLI नियमों में संशोधन का सुझाव दिया

नई दिल्ली । वाहन क्षेत्र की उत्पादन-से-जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत मिलने वाले लाभ पर विदेशी मुद्रा विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव का असर पड़ने लगा है। इसी को देखते हुए देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों ने केंद्र सरकार से घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition-DVA) की गणना के लिए एक निश्चित विनिमय दर लागू करने की मांग की है। उद्योग का कहना है कि रुपये में आई हालिया कमजोरी के कारण कई मॉडलों का स्थानीयकरण स्तर वास्तविक स्थिति से कम दिखाई दे रहा है, जिससे वे प्रोत्साहन योजना की पात्रता के दायरे से बाहर हो सकते हैं। 25,938 करोड़ रुपये की ऑटो पीएलआई योजना का उद्देश्य देश में उन्नत ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट निर्माण को बढ़ावा देना है। योजना के तहत किसी पात्र वाहन मॉडल में आयातित पुर्जों और सामग्रियों की हिस्सेदारी निर्धारित सीमा के भीतर रहनी चाहिए। इसके लिए घरेलू मूल्य संवर्धन का एक न्यूनतम स्तर अनिवार्य किया गया है, ताकि स्थानीय विनिर्माण और सप्लाई चेन को प्रोत्साहन मिल सके। उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, DVA की गणना वाहन की एक्स-फैक्ट्री कीमत और उसमें इस्तेमाल आयातित सामग्री की लागत के आधार पर की जाती है। चूंकि आयातित पुर्जों की कीमत विदेशी मुद्राओं में तय होती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने पर उनकी लागत स्वतः बढ़ जाती है। इससे कागजों पर आयातित हिस्सेदारी अधिक और घरेलू मूल्य संवर्धन कम दिखाई देने लगता है, जबकि वास्तविक उत्पादन प्रक्रिया और स्थानीयकरण स्तर में कोई बदलाव नहीं होता। हाल ही में भारी उद्योग मंत्रालय और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) के साथ हुई बैठक में वाहन उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उनका तर्क था कि विनिमय दरों में बदलाव एक बाहरी आर्थिक कारक है, जिस पर वाहन निर्माताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में केवल मुद्रा विनिमय के प्रभाव के कारण कंपनियों की पात्रता प्रभावित होना उचित नहीं माना जा सकता। उद्योग का कहना है कि बीते एक वर्ष के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इससे आयातित पुर्जों की लागत बढ़ गई है और कई मॉडलों के DVA प्रतिशत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कंपनियों का मानना है कि यदि DVA की गणना के लिए एक पूर्व-निर्धारित या स्थिर विनिमय दर को आधार बनाया जाए, तो स्थानीयकरण का वास्तविक स्तर अधिक सटीक रूप से सामने आएगा और योजना का उद्देश्य भी बेहतर तरीके से पूरा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटो उद्योग में वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण योगदान है। कई अत्याधुनिक कंपोनेंट अभी भी विदेशों से आयात किए जाते हैं। ऐसे में मुद्रा विनिमय दरों में तेज बदलाव कंपनियों की लागत संरचना और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इस कारण उद्योग लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग करता रहा है जो विनिमय दरों के अस्थायी उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हो। ऑटो पीएलआई योजना के तहत पात्रता और लाभ निर्धारण में ARAI की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संस्था विभिन्न वाहन मॉडलों के स्थानीयकरण स्तर और अन्य तकनीकी मानकों का सत्यापन करती है। अब उद्योग की मांग पर सरकार और संबंधित एजेंसियां किस प्रकार विचार करती हैं, इस पर वाहन निर्माताओं की नजर बनी हुई है। यदि इस संबंध में कोई नीति संशोधन किया जाता है, तो इससे कई कंपनियों को राहत मिल सकती है और योजना के तहत निवेश तथा उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

Sebi की सख्त कार्रवाई के बाद Rajesh Exports पर संकट गहराया, PLI योजना से बाहर होने की आशंका से शेयरों में भारी बिकवाली

नई दिल्ली । राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में लगातार गिरावट का दौर जारी है और निवेशकों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन कंपनी का शेयर पांच प्रतिशत के लोअर सर्किट के साथ बंद हुआ। पिछले तीन सत्रों के दौरान शेयर में करीब 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार में बढ़ती बेचैनी की मुख्य वजह कंपनी को एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी स्टोरेज से जुड़ी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआई योजना से बाहर किए जाने की आशंका है। सूत्रों के अनुसार, भारी उद्योग मंत्रालय कंपनी की पात्रता की समीक्षा कर रहा है। मंत्रालय के स्तर पर इस बात पर विचार किया जा रहा है कि क्या राजेश एक्सपोर्ट्स को योजना के लाभार्थियों की सूची में बनाए रखा जाए या नहीं। यदि कंपनी को योजना से बाहर किया जाता है, तो इसका असर उसके बैटरी कारोबार और भविष्य की विस्तार योजनाओं पर पड़ सकता है। यही कारण है कि निवेशक इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए हैं। कंपनी से जुड़ी चिंताएं उस समय और बढ़ गईं जब बाजार नियामक ने हाल ही में एक अंतरिम आदेश जारी किया। नियामकीय कार्रवाई में कंपनी पर वित्तीय आंकड़ों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ सहायक कंपनियों के माध्यम से कई वर्षों के दौरान राजस्व को वास्तविक स्थिति से अधिक दिखाया गया। इसके अलावा संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन में पारदर्शिता की कमी और आवश्यक खुलासों से जुड़े मुद्दों की भी जांच की जा रही है। मामले का संबंध कंपनी के लिथियम-आयन बैटरी कारोबार से जुड़ी इकाइयों से भी जोड़ा जा रहा है। यही कारण है कि बैटरी निर्माण क्षेत्र में कंपनी की भूमिका और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं के लिए उसकी पात्रता को लेकर नए सवाल खड़े हुए हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आती हैं तो इसका प्रभाव केवल शेयर प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी की कारोबारी साख पर भी असर पड़ सकता है। नियामकीय कार्रवाई के तहत कंपनी के चेयरमैन और प्रमोटर के खिलाफ भी प्रतिबंधात्मक कदम उठाए गए हैं। उन्हें अगले आदेश तक कंपनी के शेयरों में खरीद-बिक्री करने से रोका गया है। साथ ही कंपनी के खातों की दोबारा फॉरेंसिक जांच कराने का निर्देश भी दिया गया है। इस फैसले ने निवेशकों के बीच अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। हालांकि कंपनी ने सभी आरोपों को खारिज किया है। प्रबंधन का कहना है कि वह जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। कंपनी का तर्क है कि केवल राजस्व बढ़ाकर दिखाने से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता, विशेष रूप से तब जब उससे लाभप्रदता में कोई अतिरिक्त फायदा न हो। कंपनी ने भरोसा जताया है कि जांच पूरी होने के बाद वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल बाजार की नजर दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर टिकी हुई है। पहला, नियामकीय जांच की आगे की दिशा और उसके निष्कर्ष क्या रहते हैं। दूसरा, भारी उद्योग मंत्रालय पीएलआई योजना में कंपनी की पात्रता को लेकर क्या निर्णय लेता है। इन दोनों मामलों का असर आने वाले समय में कंपनी के शेयर मूल्य, निवेशकों के विश्वास और बैटरी कारोबार की संभावनाओं पर पड़ सकता है। शेयर बाजार में मौजूदा उतार-चढ़ाव यह संकेत दे रहा है कि निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। जब तक जांच और सरकारी समीक्षा प्रक्रिया पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक कंपनी के शेयरों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

बाइक, कार, ट्रैक्टर और EV की बढ़ती मांग से ऑटो सेक्टर में उछाल, मई में रिटेल बिक्री 9.55 फीसदी बढ़ी

नई दिल्ली । देश के ऑटोमोबाइल बाजार ने मई 2026 में नई ऊंचाई हासिल करते हुए रिटेल बिक्री का रिकॉर्ड बनाया है। महंगाई, ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव और भीषण गर्मी जैसी चुनौतियों के बावजूद वाहन खरीदारी की मजबूत मांग देखने को मिली। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ग्राहकों की सक्रिय भागीदारी ने ऑटो सेक्टर को मजबूती प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप कुल रिटेल बिक्री 25 लाख यूनिट के आंकड़े को पार कर गई। ऑटो डीलर नेटवर्क से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में देशभर में कुल 25.31 लाख से अधिक वाहनों की रिटेल बिक्री दर्ज की गई। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 9.55 फीसदी अधिक रही। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ता मांग में निरंतर सुधार, विवाह सीजन का प्रभाव और बेहतर वित्तपोषण विकल्पों ने बिक्री को गति दी है। मई का महीना आमतौर पर ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए अपेक्षाकृत धीमा माना जाता है, लेकिन इस बार स्थिति अलग रही। दोपहिया वाहनों, यात्री वाहनों, तीन-पहिया वाहनों और ट्रैक्टरों की बिक्री में उल्लेखनीय मजबूती देखने को मिली। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने और कृषि क्षेत्र से जुड़ी सकारात्मक उम्मीदों ने वाहन खरीदारी को प्रोत्साहन दिया। दोपहिया वाहन खंड ने बिक्री में सबसे बड़ा योगदान दिया। मई के दौरान 18 लाख से अधिक बाइक और स्कूटरों की बिक्री हुई। विशेषज्ञों के अनुसार, कम ईंधन खर्च वाले वाहनों और इलेक्ट्रिक विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता ने इस श्रेणी को मजबूत आधार दिया। ईंधन की बढ़ती लागत के बीच उपभोक्ता अब अधिक किफायती और टिकाऊ विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। यात्री वाहन श्रेणी में भी शानदार प्रदर्शन देखने को मिला। कारों और एसयूवी की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। नए मॉडल लॉन्च, बेहतर फीचर्स और इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति बढ़ती रुचि ने ग्राहकों को आकर्षित किया। उद्योग जगत का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आय और उपभोक्ताओं का भरोसा इस वृद्धि के पीछे प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में भी लगातार तेजी बनी हुई है। खासकर इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ग्राहकों की ओर से ईंधन बचाने वाले और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों के प्रति बढ़ती रुचि स्पष्ट दिखाई दे रही है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी भारतीय ऑटो बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। कॉमर्शियल वाहन और तीन-पहिया वाहन खंड में भी सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई। माल ढुलाई, छोटे व्यवसायों और शहरी परिवहन गतिविधियों में बढ़ोतरी का असर इन श्रेणियों की बिक्री पर दिखाई दिया। वहीं ट्रैक्टरों की मांग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत दिया है, जो आगामी कृषि सीजन के प्रति किसानों के सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। उद्योग से जुड़े डीलरों का मानना है कि जून में भी मांग बनी रह सकती है। मानसून की प्रगति, ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी प्रवाह और खरीफ सीजन की तैयारियां बाजार को अतिरिक्त समर्थन दे सकती हैं। हालांकि गर्मी, ईंधन कीमतों में संभावित बदलाव और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े लागत दबाव अभी भी चुनौतियां बने हुए हैं। ऑटो उद्योग के जानकारों का कहना है कि मई के आंकड़े भारतीय बाजार की मजबूत उपभोक्ता क्षमता को दर्शाते हैं। यदि मानसून सामान्य रहता है और आर्थिक गतिविधियां इसी तरह जारी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में भी ऑटोमोबाइल क्षेत्र की विकास गति बरकरार रहने की संभावना है।

PVC कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद पाइप कंपनियों के अच्छे दिन लौटने के संकेत, बड़ी कंपनियों को मिल सकता है सबसे ज्यादा फायदा

नई दिल्ली । पिछले कुछ वर्षों से कच्चे माल की कीमतों में अस्थिरता, कमजोर मांग और परियोजनाओं में सुस्ती जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा प्लास्टिक पाइप उद्योग अब धीरे-धीरे सुधार की राह पर लौटता दिखाई दे रहा है। उद्योग से जुड़े संकेतकों और कंपनियों के हालिया प्रदर्शन ने यह उम्मीद जगाई है कि वित्त वर्ष 2027 इस क्षेत्र के लिए बेहतर अवसर लेकर आ सकता है। विशेष रूप से संगठित और बड़ी कंपनियों के लिए विकास की संभावनाएं अधिक मजबूत मानी जा रही हैं। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार वित्त वर्ष 2026 की अंतिम तिमाही में पाइप सेक्टर ने उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया। पीवीसी की कीमतों में आई तेजी के कारण बाजार में खरीदारी बढ़ी और डीलरों ने भविष्य में संभावित मूल्य वृद्धि को देखते हुए पहले से स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया। इसका सीधा लाभ पाइप निर्माताओं को मिला और उनकी बिक्री तथा मुनाफे में सुधार देखने को मिला। हालांकि आने वाले वित्त वर्ष की शुरुआत पूरी तरह आसान नहीं मानी जा रही है। पीवीसी की कीमतों में बाद में आई तेज गिरावट से कुछ कंपनियों को शुरुआती दबाव का सामना करना पड़ सकता है। जिन कंपनियों ने ऊंची कीमतों पर कच्चा माल खरीदा था, उन्हें मूल्य समायोजन के कारण अल्पकालिक चुनौतियां झेलनी पड़ सकती हैं। इसके बावजूद बाजार की दीर्घकालिक तस्वीर पहले की तुलना में अधिक सकारात्मक नजर आ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि उद्योग में अब धीरे-धीरे संगठित कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ रही है। छोटी कंपनियां लगातार बदलती लागत और पूंजी संबंधी चुनौतियों से जूझ रही हैं, जबकि बड़ी कंपनियों के पास मजबूत ब्रांड, व्यापक वितरण नेटवर्क और वित्तीय मजबूती मौजूद है। यही कारण है कि ग्राहक और डीलर दोनों बड़े ब्रांडों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। उद्योग में एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। अब ग्राहक केवल कम कीमत वाले उत्पादों पर निर्भर नहीं रह रहे, बल्कि बेहतर गुणवत्ता और विशेष उपयोग वाले पाइपों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। सीपीवीसी पाइप, गैस पाइपिंग सिस्टम और औद्योगिक उपयोग के लिए बनाए जाने वाले विशेष उत्पादों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है। इससे कंपनियों को बेहतर मार्जिन और अधिक लाभ कमाने का अवसर मिल रहा है। सरकारी स्तर पर चल रही कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं भी इस क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत दे रही हैं। जल आपूर्ति नेटवर्क, गैस वितरण व्यवस्था, सीवेज सिस्टम और शहरी आधारभूत ढांचे के विकास से पाइप उद्योग को निरंतर मांग मिलने की संभावना है। इसके अलावा आवास निर्माण और भवन मरम्मत गतिविधियों में बढ़ोतरी भी इस क्षेत्र को मजबूती प्रदान कर सकती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में प्रमुख संगठित कंपनियां दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज कर सकती हैं। आवास, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रीमियम उत्पादों की मांग इस विकास को गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है। यही वजह है कि निवेशकों की रुचि एक बार फिर पाइप उद्योग की प्रमुख कंपनियों की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। बाजार विश्लेषकों ने विशेष रूप से एस्ट्रल, सुप्रीम इंडस्ट्रीज और प्रिंस पाइप्स जैसी कंपनियों को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया है। इन कंपनियों की मजबूत बाजार उपस्थिति, विविध उत्पाद पोर्टफोलियो और वितरण नेटवर्क को भविष्य की वृद्धि का प्रमुख आधार माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मांग में सुधार का मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर प्रदान कर सकता है। कुल मिलाकर, कई चुनौतियों से गुजरने के बाद पाइप उद्योग में स्थिरता और विकास के संकेत उभर रहे हैं। बाजार की बदलती परिस्थितियों और बढ़ती मांग के बीच बड़ी कंपनियां इस संभावित उछाल का सबसे अधिक लाभ उठाने की स्थिति में दिखाई दे रही हैं।

Wipro में 6% से ज्यादा गिरावट, रिकॉर्ड डेट गुजरते ही बढ़ी बिकवाली; अब निवेशकों की नजर अगले बड़े कदम पर

नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को आईटी सेक्टर के शेयरों पर दबाव देखने को मिला, जिसमें विप्रो के शेयर सबसे अधिक चर्चा में रहे। कंपनी का शेयर शुरुआती कारोबार के दौरान छह प्रतिशत से अधिक टूट गया और अपने 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे केवल सेक्टर से जुड़ी चुनौतियां ही नहीं, बल्कि हाल ही में समाप्त हुई बायबैक रिकॉर्ड डेट भी एक महत्वपूर्ण कारण है। विप्रो ने कुछ समय पहले 15,000 करोड़ रुपये के बड़े बायबैक कार्यक्रम की घोषणा की थी। कंपनी ने 250 रुपये प्रति शेयर के भाव पर शेयर वापस खरीदने की योजना बनाई है, जो मौजूदा बाजार मूल्य से काफी अधिक है। इसी कारण रिकॉर्ड डेट से पहले निवेशकों में उत्साह देखा गया था। हालांकि रिकॉर्ड डेट गुजरने के बाद कई निवेशकों ने मुनाफावसूली का रास्ता चुना, जिससे शेयर पर बिकवाली का दबाव बढ़ गया। विश्लेषकों के अनुसार बायबैक से जुड़े शेयरों में अक्सर ऐसा रुझान देखने को मिलता है। रिकॉर्ड डेट तक पात्रता सुनिश्चित करने के लिए निवेशक शेयर खरीदते हैं, जबकि रिकॉर्ड डेट निकलने के बाद कुछ निवेशक अपने निवेश से बाहर निकलने लगते हैं। विप्रो के शेयर में भी इसी प्रकार की तकनीकी कमजोरी देखने को मिली है। हालांकि कंपनी के शेयर पर दबाव का कारण केवल बायबैक नहीं है। वैश्विक आईटी उद्योग इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। अमेरिकी बाजारों में हालिया गिरावट और टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयरों में बिकवाली ने भारतीय आईटी कंपनियों पर भी असर डाला है। चूंकि भारतीय आईटी कंपनियों का बड़ा कारोबार अमेरिका से आता है, इसलिए वहां के आर्थिक संकेतकों और निवेश माहौल का सीधा प्रभाव इन कंपनियों के प्रदर्शन पर पड़ता है। बाजार में चिंता का एक बड़ा कारण अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता भी है। मजबूत आर्थिक आंकड़ों के बाद निवेशकों को आशंका है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक नीति बनाए रख सकता है। इसका असर वैश्विक निवेश प्रवाह और तकनीकी कंपनियों के मूल्यांकन पर पड़ रहा है। इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता प्रभाव भी आईटी उद्योग के लिए नई चुनौती और अवसर दोनों बनकर उभरा है। दुनिया भर की कंपनियां अब पारंपरिक आईटी सेवाओं के साथ-साथ एआई आधारित समाधानों पर तेजी से निवेश कर रही हैं। ऐसे में निवेशकों की अपेक्षा है कि बड़ी आईटी कंपनियां बदलते तकनीकी परिदृश्य के अनुरूप अपने कारोबार मॉडल को तेजी से विकसित करें। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में केवल पारंपरिक आउटसोर्सिंग सेवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों को नई तकनीकों, ऑटोमेशन और एआई आधारित सेवाओं के जरिए राजस्व वृद्धि के नए स्रोत तैयार करने होंगे। इसी वजह से निवेशक उन कंपनियों पर अधिक भरोसा जता रहे हैं जो तकनीकी बदलावों को तेजी से अपनाने में सक्षम दिखाई दे रही हैं। विप्रो के लिए फिलहाल स्थिति मिश्रित बनी हुई है। एक ओर बायबैक का आकर्षण निवेशकों की रुचि बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर आईटी सेक्टर की सुस्त वृद्धि और वैश्विक अनिश्चितताएं शेयर पर दबाव बना रही हैं। बाजार की नजर अब कंपनी की आगामी रणनीति, बायबैक प्रक्रिया के अगले चरण और एआई आधारित विकास योजनाओं पर टिकी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, लेकिन निवेशकों के लिए कंपनी की दीर्घकालिक रणनीति और तकनीकी बदलावों के प्रति उसकी तैयारी सबसे महत्वपूर्ण कारक साबित होगी। इसी आधार पर भविष्य में शेयर की दिशा तय होने की संभावना है।