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कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक बिकवाली से शेयर बाजार दबाव में, खुलते ही सेंसेक्स-निफ्टी लुढ़के

नई दिल्ली । सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में कमजोर शुरुआत देखने को मिली। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं, वेस्ट एशिया में गहराते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई, जिसका असर घरेलू बाजारों पर भी साफ दिखाई दिया। सोमवार सुबह कारोबार शुरू होते ही प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दबाव में आ गए और शुरुआती सत्र में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। वेस्ट एशिया में जारी तनाव ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिसके चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए तेल कीमतों में वृद्धि आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसका असर महंगाई, व्यापार घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर पड़ सकता है। कारोबार की शुरुआत में बीएसई सेंसेक्स में तेज गिरावट दर्ज की गई और यह सैकड़ों अंकों की कमजोरी के साथ नीचे फिसल गया। इसी तरह एनएसई निफ्टी भी शुरुआती सत्र में दबाव में दिखाई दिया। बाजार में व्यापक बिकवाली के चलते निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया और कई प्रमुख कंपनियों के शेयर लाल निशान में कारोबार करते नजर आए। सेंसेक्स की प्रमुख कंपनियों में ऑटोमोबाइल, आईटी, एविएशन और वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी कई बड़ी कंपनियों के शेयरों पर दबाव देखने को मिला। निवेशकों की बिकवाली के कारण इन क्षेत्रों में कमजोरी दर्ज की गई। दूसरी ओर कुछ चुनिंदा बैंकिंग और फार्मा शेयरों ने बाजार को सीमित समर्थन देने का प्रयास किया, लेकिन व्यापक गिरावट के सामने यह समर्थन पर्याप्त नहीं रहा। भारतीय बाजार पर वैश्विक संकेतों का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में भी कमजोरी का माहौल बना रहा। जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और हांगकांग के बाजार गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। इससे यह संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी बनाकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। अमेरिकी बाजारों में पिछले कारोबारी सत्र के दौरान आई कमजोरी का असर भी भारतीय बाजार पर पड़ा। वैश्विक निवेशक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के बाजारों में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हाल के कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों की ओर से लगातार बिकवाली देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी पूंजी का सुरक्षित बाजारों की ओर जाना उभरते बाजारों पर दबाव बढ़ा सकता है। आर्थिक जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में बाजार की चाल काफी हद तक वेस्ट एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगी। यदि वैश्विक तनाव में कमी आती है तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है, लेकिन फिलहाल निवेशकों को सतर्कता बरतने और दीर्घकालिक दृष्टिकोण बनाए रखने की सलाह दी जा रही है। भारतीय शेयर बाजार ने पिछले कुछ समय में मजबूत प्रदर्शन किया है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां निवेशकों के लिए नई चुनौतियां लेकर आई हैं। ऐसे में बाजार प्रतिभागियों की नजर अब अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और आर्थिक संकेतकों पर टिकी हुई है, जो आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

ATM कैश की कमी पर शिकायत, बैंकिंग सेवाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल

नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम नेटवर्क को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। देशभर में लगभग 65,000 एटीएम वाले इस नेटवर्क में कैश की कमी को लेकर ATM इंडस्ट्री बॉडी CATMi ने भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक को शिकायत भेजी है। संगठन का आरोप है कि कैश सप्लाई में प्राथमिकता बड़े शहरों को दी जा रही है, जिससे छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में एटीएम खाली पड़े हैं। ₹100 करोड़ मुआवजे की मांगATM ऑपरेटरों के संगठन CATMi का कहना है कि कैश की अनुपलब्धता के कारण हजारों एटीएम बंद हो गए हैं, जिससे उन्हें भारी नुकसान हो रहा है। संगठन ने बैंकिंग सिस्टम से करीब ₹100 करोड़ मुआवजे की मांग भी की है। उनका कहना है कि हर खाली एटीएम का मतलब एक खोया हुआ ट्रांजैक्शन है, जिससे इंटरचेंज और ऑपरेशन फीस का सीधा नुकसान होता है। छोटे शहरों में सबसे ज्यादा असररिपोर्ट के अनुसार समस्या मुख्य रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में देखने को मिल रही है। कई जगहों पर एटीएम में कैश रिफिल समय पर नहीं हो रहा, जिससे लोग घंटों तक परेशान हो रहे हैं। उद्योग के अनुसार, दिसंबर 2025 के बाद से कई राज्यों में बैंक शाखाओं और करेंसी चेस्ट से कैश उपलब्धता में भी दिक्कत बढ़ी है। बढ़ती लागत और घटता ट्रांजैक्शन बना संकट की वजहATM ऑपरेटरों के सामने एक और बड़ी चुनौती ऑपरेशनल कॉस्ट में बढ़ोतरी है। मजदूरी और ईंधन की कीमतें बढ़ने से खर्च 60% तक बढ़ गया है। वहीं दूसरी ओर कैश निकासी में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2023 में जहां मासिक ट्रांजैक्शन 57 करोड़ थे, वहीं सितंबर 2025 तक यह घटकर 43.95 करोड़ रह गए। ग्रामीण क्षेत्रों में घटते ATMदेश में ATM की संख्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल ATM संख्या घटकर लगभग 2.51 लाख रह गई, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 2.53 लाख से अधिक था। सबसे ज्यादा गिरावट ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में दर्ज की गई है। आम लोगों पर क्या असर होगा?अगर कैश सप्लाई की समस्या जल्द हल नहीं हुई, तो छोटे शहरों और गांवों में लोगों को नकदी निकालने में और दिक्कत हो सकती है। हालांकि डिजिटल पेमेंट का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन भारत में अब भी बड़ी आबादी रोजमर्रा के लेनदेन के लिए कैश पर निर्भर है। ऐसे में ATM संकट सीधे आम जनता की जेब और सुविधा दोनों को प्रभावित कर सकता है।

शेयर बाजार आज: 8 जून को उतार-चढ़ाव के बीच रह सकती है बाजार की चाल, निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों पर

नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार के लिए 8 जून 2026 का कारोबारी दिन उतार-चढ़ाव भरा रहने की संभावना है। घरेलू और वैश्विक दोनों मोर्चों से मिल रहे संकेत निवेशकों को सतर्क रहने का संदेश दे रहे हैं। पिछले सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन सेंसेक्स और निफ्टी दबाव में बंद हुए थे, जबकि बाजार की दिशा को लेकर निवेशकों के बीच अनिश्चितता बनी हुई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सोमवार को कारोबार की शुरुआत कमजोर रह सकती है। GIFT Nifty में गिरावट के संकेत मिले हैं, जिससे शुरुआती कारोबार में बिकवाली का दबाव देखने को मिल सकता है। वैश्विक बाजारों में कमजोरी और विदेशी निवेशकों की सतर्कता भी घरेलू बाजार की चाल को प्रभावित कर सकती है। पिछले सप्ताह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति के बाद बाजार में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को स्थिर रखा, लेकिन महंगाई और आर्थिक विकास को लेकर दिए गए संकेतों ने निवेशकों को सोचने पर मजबूर किया। इसके चलते कई सेक्टरों में मुनाफावसूली देखने को मिली और प्रमुख सूचकांक दबाव में बंद हुए। तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार निफ्टी के लिए 23,200 का स्तर महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है, जबकि 23,700 से 23,900 के बीच मजबूत प्रतिरोध क्षेत्र देखा जा रहा है। यदि बाजार इन स्तरों के ऊपर टिकता है तो रिकवरी की संभावना बन सकती है, जबकि नीचे फिसलने पर दबाव और बढ़ सकता है। सेक्टरवार नजर डालें तो बैंकिंग शेयरों में अपेक्षाकृत मजबूती देखने को मिल सकती है। RBI के फैसले के बाद बैंकिंग सेक्टर को समर्थन मिला है। वहीं आईटी शेयरों पर वैश्विक संकेतों का असर बना रह सकता है। निवेशकों की नजर वित्तीय, बैंकिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों पर अधिक रहने की संभावना है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी। हाल के दिनों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार पर दबाव बनाया है, हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की खरीदारी ने गिरावट को सीमित रखने में मदद की है। विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को जल्दबाजी में बड़े फैसले लेने से बचना चाहिए। बाजार में फिलहाल चुनिंदा शेयरों और सेक्टरों में अवसर मौजूद हैं, लेकिन अस्थिरता के दौर में जोखिम प्रबंधन और संतुलित निवेश रणनीति अपनाना अधिक महत्वपूर्ण होगा। आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक आंकड़े, विदेशी निवेश प्रवाह और भू-राजनीतिक घटनाक्रम बाजार की दिशा तय कर सकते हैं। कुल मिलाकर 8 जून का कारोबारी दिन सावधानी और अवसर दोनों लेकर आ सकता है। निवेशकों को बाजार खुलने के बाद शुरुआती रुझानों पर नजर रखते हुए सोच-समझकर निवेश निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है।

अदाणी पावर और एईएसएल में निवेश के लिए बुलिश संकेत, क्षमता विस्तार और मजबूत पीपीए की वजह

अहमदाबाद । ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने अदाणी ग्रुप की तीन प्रमुख कंपनियों – अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, अदाणी पावर लिमिटेड और अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड – पर बुलिश रुख अपनाया है। जेफरीज का कहना है कि इन कंपनियों में क्षमता में तेज विस्तार, मजबूत क्रियान्वयन और बढ़ती मांग की वजह से निवेश के लिए आकर्षक अवसर मौजूद हैं। अदाणी ग्रीन एनर्जी को जेफरीज ने “बाय” रेटिंग के साथ 1,435 रुपये का टारगेट प्राइस दिया है। ब्रोकरेज फर्म के अनुसार कंपनी वित्त वर्ष 2026 में 19.3 गीगावाट रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता से वित्त वर्ष 2030 तक 50 गीगावाट तक पहुंचने का लक्ष्य रखती है। इसमें 5 गीगावाट की पंप स्टोरेज परियोजना और बैटरी स्टोरेज सिस्टम में 10 गीगावाट से अधिक की वृद्धि शामिल है। गुजरात के खावड़ा में 30 गीगावाट रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता का निर्माण चल रहा है, जो ग्रोथ का प्रमुख ड्राइवर है। अदाणी पावर पर जेफरीज ने अपनी “बाय” रेटिंग बनाए रखते हुए 255 रुपये का टारगेट प्राइस निर्धारित किया है। कंपनी वित्त वर्ष 2032 तक अपनी क्षमता 42 गीगावॉट तक बढ़ाने की योजना रखती है। इसके अलावा दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौतों (PPA) की मजबूत पाइपलाइन से आय में सुधार की संभावना है। वर्तमान में आगामी क्षमता का लगभग 56 प्रतिशत पीपीए पहले से ही सुनिश्चित किया जा चुका है। अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (एईएसएल) के लिए जेफरीज ने 1,665 रुपये के टारगेट प्राइस के साथ “बाय” रेटिंग बरकरार रखी है। एईएसएल भारत की एकमात्र सूचीबद्ध प्योर प्ले ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी है। कंपनी वर्तमान में 718 अरब रुपये के ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स क्रियान्वित कर रही है और स्मार्ट मीटरिंग व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2026 तक 11 मिलियन से अधिक मीटर स्थापित किए जा चुके हैं। जेफरीज का अनुमान है कि मध्यम अवधि में एबिटा और कर के बाद मुनाफे में मजबूत दोहरे अंकों की वृद्धि होगी। यह क्रियान्वयन की गति, डेटा सेंटर, वाणिज्यिक और औद्योगिक ऊर्जा समाधानों में बढ़ते अवसरों और स्मार्ट मीटरिंग के व्यापक विस्तार से प्रेरित होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अदाणी ग्रुप की ये कंपनियां भारत में बढ़ती ऊर्जा मांग और ट्रांसमिशन इन्फ्रास्ट्रक्चर में तेजी से बढ़ते निवेश का लाभ उठा रही हैं। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि ग्रुप की लंबी अवधि की रणनीति और क्षमता विस्तार योजनाएं उनके पोर्टफोलियो के लिए आकर्षक साबित हो सकती हैं।

केंद्रीय मंत्री की स्वीकृति: पंजाब विश्वविद्यालय में आधुनिक एथलेटिक ट्रैक और ग्रामीण खेल केंद्रों का विकास

नई दिल्ली । केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने पंजाब विश्वविद्यालय में ओलंपिक स्तर के सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक के निर्माण को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह निर्णय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) द्वारा केंद्रीय मंत्री को प्रस्तुत किए गए विस्तृत सुझावों के बाद आया है। प्रस्ताव में देशभर में खेल संस्कृति के विकास और युवा प्रतिभाओं को सशक्त बनाने के लिए कई पहलुओं पर जोर दिया गया। इस प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री को प्रत्येक राज्य में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की स्थापना, राष्ट्रीय स्तर पर खेल उत्कृष्टता केंद्र और मल्टी-स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स विकसित करने के सुझाव भी प्रस्तुत किए। इसके अलावा, ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में खेल प्रतिभाओं की खोज और उन्हें उचित प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के उपायों पर भी चर्चा हुई। विशेष रूप से, ABVP ने 2036 ओलंपिक की तैयारियों के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसमें खिलाड़ियों के लिए स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा, स्पोर्ट्स सामग्री बैंक, राष्ट्रीय डिजिटल एथलीट पोर्टल और ‘माई भारत’ वालंटियर्स के मानदेय में वृद्धि जैसी सिफारिशें शामिल थीं। इन सभी सुझावों को केंद्रीय मंत्री ने गंभीरता से लिया और कई मामलों में सरकार द्वारा शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन दिया। पंजाब विश्वविद्यालय में ओलंपिक मानक के सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक की स्थापना इस चर्चा की प्रमुख उपलब्धि मानी जा रही है। निर्माण कार्य की प्रक्रिया को अगले दो से तीन महीनों में तेज़ गति से आगे बढ़ाने की जानकारी दी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह ट्रैक न केवल छात्रों और एथलीटों के प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाएगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए भारत की तैयारी को भी मजबूत करेगा। सरकारी अधिकारियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में ‘स्पोर्ट्स सामग्री बैंक’ स्थापित करने की योजना की भी सराहना की। यह पहल खिलाड़ियों को आवश्यक खेल उपकरण और संसाधन प्रदान करने में मदद करेगी। मंत्रालय ने बताया कि इस दिशा में जल्द ही सकारात्मक कदम उठाए जाएंगे। ABVP का मानना है कि भारत की युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी संपत्ति है और इसे खेल के माध्यम से सशक्त बनाने से न केवल खेल क्षेत्र में बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास में भी योगदान मिलेगा। आधुनिक खेल अवसंरचना, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण कोचिंग और खिलाड़ियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से भारत वैश्विक खेल महाशक्ति बनने की ओर तेजी से बढ़ सकता है। छात्र संगठन ने सरकार के सकारात्मक आश्वासनों का स्वागत किया और कहा कि शीघ्र और प्रभावी निर्णयों से देश में खेल संस्कृति को नई गति मिलेगी। इसके साथ ही यह पहल युवाओं और खिलाड़ियों के सर्वांगीण विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की परियोजनाएं भविष्य में देश की अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनाने में निर्णायक साबित होंगी। पंजाब विश्वविद्यालय में इस उच्च स्तरीय ट्रैक के निर्माण से राज्य और देश दोनों में खेल प्रतिभाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के अवसर मिलेंगे। इस परियोजना से न केवल छात्रों और एथलीटों का विकास होगा बल्कि खेल क्षेत्र में निवेश और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

अमेरिका-ईरान तनाव, एआई शेयरों की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतें तय करेंगी भारतीय बाजार की दिशा: निवेशक सतर्क

नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला सप्ताह महत्वपूर्ण संकेत लेकर आ सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क कर दिया है। मध्य पूर्व में अमेरिका के ठिकानों पर ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया और इजरायल की लेबनान में बमबारी की खबरें बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। निवेशक इन geopolitical घटनाओं पर नजर रखकर जोखिम और अवसर का मूल्यांकन करेंगे। कच्चे तेल की कीमतें भी बाजार के मूड पर सीधे असर डाल रही हैं। ब्रेंट क्रूड वर्तमान में 93 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ऊर्जा और इनर्जी सेक्टर से जुड़े शेयरों की चाल को प्रभावित कर सकता है। उच्च तेल मूल्य न केवल ए너지 कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करता है, बल्कि आर्थिक महंगाई को भी बढ़ा सकता है। अमेरिका में एआई से जुड़े शेयरों की गिरावट ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी टेक्नोलॉजी इंडेक्स नैस्डैक में शुक्रवार को 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। विशेष रूप से एनवीडिया, माइक्रोन टेक्नोलॉजी और मार्वल टेक्नोलॉजी जैसी एआई थीम वाले शेयरों में लगभग 17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस प्रवृत्ति से भारतीय निवेशक भी प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि कई एआई और टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयर वैश्विक निवेश प्रवाह से जुड़े हैं। भारत में निवेशकों की निगाह 12 जून को जारी होने वाले खुदरा महंगाई आंकड़ों पर भी रहेगी। महंगाई के आंकड़े समग्र आर्थिक स्थिति और केंद्रीय बैंक की नीतियों पर असर डालते हैं। यदि महंगाई दर उम्मीद से अधिक होती है, तो इससे ब्याज दरों में संभावित बदलाव और निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है। बीते सप्ताह भारतीय शेयर बाजार नुकसान के साथ बंद हुआ। निफ्टी 181.05 अंक या 0.77 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 23,366.70 पर रहा। सेंसेक्स 532.40 अंक या 0.71 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,243.34 पर बंद हुआ। हालांकि, कुछ सेक्टरों ने बेहतर प्रदर्शन किया। मीडिया और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स शेयरों में तेजी रही। निफ्टी मीडिया 6.69 प्रतिशत, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 1.49 प्रतिशत और निफ्टी पीएसयू बैंक 1.26 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए। वहीं, निफ्टी एफएमसीजी, निफ्टी कमोडिटीज, निफ्टी इन्फ्रा, निफ्टी रियल्टी, निफ्टी मेटल, निफ्टी पीएसई और निफ्टी एनर्जी सेक्टरों में कमजोरी देखने को मिली। क्रमशः 1.30 से 2.19 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज हुई। यह संकेत है कि निवेशकों ने जोखिम वाले और साइकिलिक सेक्टरों से परहेज किया और सुरक्षित या अधिक स्थिर क्षेत्रों की ओर रुख किया। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सप्ताह में बाजार की दिशा कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की कीमत, एआई शेयरों की चाल और महंगाई के आंकड़े मिलकर निवेशकों की रणनीति और बाजार की उतार-चढ़ाव की सीमा तय करेंगे। इस अवधि में निवेशक सतर्क रहकर बाजार की हर छोटी-सी प्रतिक्रिया का अध्ययन करेंगे। कुल मिलाकर, अगले सप्ताह भारतीय इक्विटी बाजार में सतर्कता और रणनीति की आवश्यकता होगी। निवेशक वैश्विक और घरेलू आर्थिक संकेतकों के आधार पर अपने निवेश निर्णय लेंगे। सुरक्षित सेक्टरों और स्थिर प्रदर्शन वाले शेयरों में निवेश को प्राथमिकता मिल सकती है, जबकि जोखिम वाले क्षेत्र अस्थिर रह सकते हैं।

डेटा आधारित वित्तीय शासन को मिलेगा नया आधार, राज्य वित्त आयोगों के लिए केंद्र जारी करेगा अहम रिपोर्ट

नई दिल्ली । देश में वित्तीय विकेंद्रीकरण को अधिक मजबूत, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में केंद्र सरकार एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। स्थानीय निकायों की वित्तीय व्यवस्था को बेहतर आधार देने और राज्य वित्त आयोगों की कार्यक्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार की गई एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सोमवार को जारी की जाएगी। इस रिपोर्ट को स्थानीय शासन व्यवस्था में सुधार और साक्ष्य आधारित वित्तीय निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है। रिपोर्ट का विमोचन मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा किया जाएगा। इस अवसर पर पंचायती राज मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, सार्वजनिक वित्त विशेषज्ञ और नीति निर्माण से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम के दौरान डेटा आधारित नीतिनिर्माण, वित्तीय प्रबंधन और स्थानीय शासन में तकनीकी एवं सांख्यिकीय ढांचे की भूमिका पर भी चर्चा होने की संभावना है। केंद्र सरकार का मानना है कि मजबूत लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण केवल वित्तीय संसाधनों के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है। इसके लिए स्थानीय निकायों के पास विश्वसनीय, अद्यतन और व्यापक आंकड़ों की उपलब्धता भी आवश्यक है। इसी सोच के साथ तैयार की गई रिपोर्ट राज्य वित्त आयोगों के लिए डेटा संग्रहण और उपयोग की एक व्यवस्थित रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जिससे उनकी सिफारिशें अधिक सटीक और प्रभावी बन सकें। रिपोर्ट में विभिन्न विभागों और संस्थाओं के बीच डेटा साझा करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके साथ ही आंकड़ों के मानकीकरण, विभिन्न डिजिटल प्रणालियों के बीच समन्वय बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर वित्तीय विश्लेषण की क्षमता विकसित करने से जुड़े सुझाव भी शामिल किए गए हैं। माना जा रहा है कि इन उपायों से आयोगों को निर्णय लेने के लिए अधिक भरोसेमंद और उपयोगी जानकारी उपलब्ध होगी। राज्य वित्त आयोग संविधान के तहत गठित महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं हैं, जिनकी भूमिका पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन करने तथा संसाधनों के वितरण संबंधी सिफारिशें तैयार करने की होती है। ग्रामीण और शहरी विकास योजनाओं के प्रभावी संचालन में इन आयोगों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इनके सुझावों के आधार पर स्थानीय प्रशासन को वित्तीय संसाधनों का बेहतर आवंटन सुनिश्चित किया जाता है। पंचायती राज मंत्रालय के अनुसार राज्य वित्त आयोगों को अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए राजस्व, व्यय, जनसंख्या, आधारभूत संरचना, सेवा वितरण और परिसंपत्ति प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से जुड़े विस्तृत आंकड़ों की आवश्यकता होती है। हालांकि कई राज्यों में विभिन्न विभागों से समय पर डेटा प्राप्त करने में कठिनाइयां सामने आती रही हैं, जिसके कारण आयोगों की सिफारिशों की गुणवत्ता और समयबद्धता प्रभावित होती है। इन्हीं चुनौतियों को दूर करने के उद्देश्य से विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया था। समिति ने विभिन्न राज्यों के अनुभवों और मौजूदा डेटा प्रणालियों का अध्ययन करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में ऐसे व्यावहारिक उपाय सुझाए गए हैं जिनसे डेटा प्रबंधन प्रक्रिया को अधिक सक्षम और उपयोगी बनाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट की सिफारिशें लागू होने के बाद राज्य वित्त आयोगों को बेहतर डेटा उपलब्ध होगा, जिससे स्थानीय निकायों के लिए अधिक सटीक वित्तीय सुझाव तैयार किए जा सकेंगे। इससे विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सुधार आएगा और वित्तीय संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही देश में वित्तीय विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को भी नई मजबूती मिलेगी।

एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की वैश्विक दौड़ तेज, गूगल और स्पेसएक्स के बीच 30 अरब डॉलर का रणनीतिक समझौता

नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवाओं की मांग में लगातार हो रही वृद्धि के बीच तकनीकी क्षेत्र में एक बड़ा रणनीतिक समझौता सामने आया है। गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट ने अपनी एआई क्षमताओं को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से स्पेसएक्स के साथ बहु-अरब डॉलर का दीर्घकालिक करार किया है। इस समझौते के तहत गूगल को विशाल कंप्यूटिंग संसाधनों तक पहुंच मिलेगी, जिससे कंपनी अपने उन्नत एआई प्लेटफॉर्म और क्लाउड सेवाओं का विस्तार कर सकेगी। समझौते के अनुसार, अक्टूबर 2026 से जून 2029 तक गूगल हर महीने निर्धारित भुगतान के बदले उच्च क्षमता वाली कंप्यूटिंग सुविधाओं का उपयोग करेगा। पूरे अनुबंध की अनुमानित कीमत लगभग 30 अरब डॉलर आंकी गई है। यह करार मौजूदा समय में एआई क्षेत्र में हो रहे बड़े निवेशों में से एक माना जा रहा है और इससे तकनीकी कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी स्पष्ट होती है। इस व्यवस्था के तहत गूगल को लगभग 1,10,000 एनवीडिया जीपीयू के साथ-साथ सीपीयू, मेमोरी और अन्य आवश्यक हार्डवेयर संसाधनों तक पहुंच प्राप्त होगी। इन संसाधनों का उपयोग विशेष रूप से बड़े भाषा मॉडल, जनरेटिव एआई एप्लिकेशन, क्लाउड प्लेटफॉर्म और एंटरप्राइज एआई समाधानों के विकास एवं संचालन में किया जाएगा। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी कंप्यूटिंग क्षमता गूगल की एआई सेवाओं को नई गति प्रदान कर सकती है। उच्च प्रदर्शन वाले एनवीडिया एच200 चिप्स के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि उपलब्ध कराई जाने वाली कंप्यूटिंग शक्ति 100 मेगावाट से अधिक हो सकती है। यह क्षमता आधुनिक एआई मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्तमान समय में एआई उद्योग की सबसे बड़ी चुनौतियों में पर्याप्त कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता शामिल है, जिसके कारण बड़ी तकनीकी कंपनियां लगातार नए डेटा सेंटर और हार्डवेयर संसाधनों में निवेश कर रही हैं। समझौते में प्रदर्शन और समयसीमा से जुड़े स्पष्ट प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। यदि निर्धारित समय तक आवश्यक एनवीडिया चिप्स और संबंधित संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो गूगल को अनुबंध समाप्त करने का अधिकार प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों को पूर्व सूचना देकर समझौते से बाहर निकलने का विकल्प भी दिया गया है। इससे अनुबंध में लचीलापन और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। गूगल का मानना है कि उसके एआई उत्पादों, एजेंट आधारित प्लेटफॉर्म और जेमिनी एंटरप्राइज सेवाओं की मांग अपेक्षा से अधिक तेजी से बढ़ रही है। इसी कारण अतिरिक्त कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता महसूस की गई। कंपनी के क्लाउड कारोबार में भी तेजी देखी जा रही है, जहां लंबी अवधि के अनुबंधों का मूल्य लगातार बढ़ रहा है। यह संकेत देता है कि कॉरपोरेट और एंटरप्राइज ग्राहक बड़े पैमाने पर एआई आधारित समाधानों को अपना रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता केवल दो कंपनियों के बीच व्यावसायिक सहयोग नहीं बल्कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की वैश्विक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण संकेत है। बड़े डेटा सेंटर, उन्नत प्रोसेसर और विशाल कंप्यूटिंग नेटवर्क भविष्य की तकनीकी बढ़त तय करेंगे। ऐसे में यह करार आने वाले वर्षों में एआई उद्योग की दिशा और निवेश प्रवृत्तियों को प्रभावित कर सकता है।

वित्त वर्ष 2027 में विकास की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेत, जीडीपी वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान; महंगाई और तेल कीमतें बढ़ाएंगी दबाव

नई दिल्ली । वित्त वर्ष 2026 में अपेक्षा से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन दर्ज करने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था अगले वित्त वर्ष में नई चुनौतियों का सामना कर सकती है। ताजा आर्थिक आकलनों के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह दर वैश्विक स्तर पर अब भी मजबूत मानी जाएगी, लेकिन पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले इसमें कुछ नरमी देखने को मिल सकती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर उभरती परिस्थितियां विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं। वित्त वर्ष 2026 में अर्थव्यवस्था को कई सकारात्मक कारकों का लाभ मिला। घरेलू खपत को प्रोत्साहन देने वाले उपाय, अपेक्षाकृत कम महंगाई, अनुकूल मौसम की स्थिति, ब्याज दरों में राहत और वैश्विक आर्थिक स्थिरता ने विकास को मजबूत आधार प्रदान किया। इन कारणों से आर्थिक गतिविधियों में तेजी बनी रही और वृद्धि दर अनुमान से बेहतर स्तर तक पहुंच गई। हालांकि आगामी वित्त वर्ष के लिए तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में तेज उछाल से भारत जैसे आयात आधारित देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऊर्जा लागत बढ़ने का असर परिवहन, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों पर पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। इसके साथ ही मानसून को लेकर भी आशंकाएं बनी हुई हैं। मौसम संबंधी पूर्वानुमानों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। यदि वर्षा अपेक्षा से कमजोर रहती है तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कृषि क्षेत्र में किसी भी प्रकार की कमजोरी का असर ग्रामीण आय, उपभोग और खाद्य आपूर्ति पर पड़ता है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। महंगाई भी आने वाले समय में एक प्रमुख चुनौती बन सकती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में मुद्रास्फीति का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रह सकता है। खाद्य पदार्थों, ऊर्जा और परिवहन लागत में संभावित वृद्धि से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने की स्थिति में घरेलू खपत की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, जो आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है। वैश्विक परिस्थितियां भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा मांग पर पड़ सकता है। यदि वैश्विक बाजारों में सुस्ती बनी रहती है तो भारतीय निर्यात क्षेत्र को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे औद्योगिक उत्पादन और निवेश गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना रहेगी। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियादी ढांचे, बढ़ते निवेश, डिजिटल विस्तार और घरेलू मांग की वजह से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बनी रहेगी। निजी उपभोग अब भी आर्थिक वृद्धि का प्रमुख आधार बना हुआ है और हालिया आंकड़े संकेत देते हैं कि उपभोक्ता मांग में मजबूती बरकरार है। यही कारण है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल माना जा रहा है। आने वाले महीनों में तेल कीमतों, मानसून की प्रगति, महंगाई के रुझान और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर विशेष नजर रहेगी। यही कारक तय करेंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था अनुमानित वृद्धि दर हासिल कर पाती है या विकास की गति में और बदलाव देखने को मिलता है।

वैश्विक संकटों के बीच आर्थिक मोर्चे पर सक्रिय सरकार, पीएम मोदी ने सलाहकार परिषद संग बनाई नई रणनीति

नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और आर्थिक चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक में देश की आर्थिक प्रगति को गति देने, विकास दर को स्थिर बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से उत्पन्न संभावित चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने की रणनीतियों पर व्यापक चर्चा की गई। आर्थिक विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के साथ हुए इस विचार-विमर्श का केंद्र भारत की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती और विकास की निरंतरता सुनिश्चित करना रहा। बैठक ऐसे समय में आयोजित हुई जब दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं कमजोर मांग, आपूर्ति शृंखला में बाधाओं, क्षेत्रीय संघर्षों और बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। इन परिस्थितियों के बावजूद भारत लगातार मजबूत आर्थिक प्रदर्शन दर्ज कर रहा है और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति बनाए हुए है। इसी पृष्ठभूमि में बैठक के दौरान आर्थिक गतिविधियों को और अधिक प्रोत्साहित करने के उपायों पर विशेष जोर दिया गया। चर्चा के दौरान व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक नीतिगत कदमों की समीक्षा की गई। विशेषज्ञों ने विकास दर को मजबूत बनाए रखने, निवेश आकर्षित करने और उत्पादक क्षेत्रों को प्रोत्साहन देने से जुड़े विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किए। प्रधानमंत्री ने भी बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। बैठक में शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी और नागरिक केंद्रित बनाने के प्रयासों पर भी चर्चा हुई। लोगों के दैनिक जीवन को सरल बनाने और कारोबार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने से जुड़े सुधारों की समीक्षा की गई। अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं को आसान बनाने, प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी विचार किया गया। सरकार का मानना है कि बेहतर कारोबारी माहौल आर्थिक गतिविधियों को गति देने और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विचार-विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभावों को लेकर रहा। विशेषज्ञों ने ऊर्जा बाजारों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले असर का आकलन प्रस्तुत किया। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए क्षेत्रीय अस्थिरता का असर ऊर्जा कीमतों और व्यापारिक लागतों पर पड़ सकता है। इसी कारण सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। कृषि, निर्माण और सेवा क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन ने आर्थिक वृद्धि को समर्थन दिया है। हाल के आर्थिक संकेतक भी यह दर्शाते हैं कि घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रही हैं। विशेषज्ञों ने माना कि संरचनात्मक सुधारों और बुनियादी ढांचे में निवेश के कारण भारत की विकास संभावनाएं अन्य कई देशों की तुलना में अधिक सकारात्मक बनी हुई हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों का समूह है, जो सरकार को आर्थिक और विकास संबंधी विषयों पर स्वतंत्र सुझाव प्रदान करता है। बैठक में भविष्य की विकास प्राथमिकताओं, वैश्विक आर्थिक रुझानों और बदलती चुनौतियों के अनुरूप नीतिगत तैयारियों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आयोजित यह बैठक इस बात का संकेत है कि सरकार आर्थिक स्थिरता, विकास और निवेश को लेकर सतर्क दृष्टिकोण अपनाए हुए है। आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतिगत निर्णयों के माध्यम से भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा।