कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आचार्य प्रशांत बोले: जलवायु संकट की जड़ मानव मन की अधूरी समझ

नई दिल्ली, 31 मई। दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने शुक्रवार को यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र में कहा कि मानवता के सामने खड़े सबसे बड़े संकट, विशेषकर जलवायु परिवर्तन, केवल तकनीकी समाधान या नीतिगत हस्तक्षेपों से नहीं सुलझाए जा सकते। उनके अनुसार इन समस्याओं की वास्तविक जड़ मनुष्य के आंतरिक जीवन और उसकी अनियंत्रित इच्छाओं में निहित है। ऐतिहासिक कैम्ब्रिज यूनियन में आयोजित इस फायर-साइड चैट में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षाविद् और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में आचार्य प्रशांत ने आधुनिक सभ्यता के विकास, उपभोगवाद, जलवायु संकट और आंतरिक शिक्षा की आवश्यकता पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मानवता ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन मनुष्य के भीतर की समझ और आत्मबोध को विकसित करने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। उनके अनुसार बाहरी विकास और आंतरिक अपरिपक्वता का यही असंतुलन आज वैश्विक संकटों का कारण बन रहा है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि शिक्षा संस्थान लोगों को कौशल और ज्ञान तो प्रदान करते हैं, लेकिन जीवन के मूलभूत प्रश्नों—जैसे इच्छा, अहंकार, संतोष और आत्मपहचान—पर गंभीर चिंतन को शायद ही कभी स्थान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक स्वयं समस्या नहीं हैं, बल्कि समस्या उस मानसिकता में है जो उनका उपयोग करती है। जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि केवल तकनीकी दक्षता बढ़ाने से उपभोग कम नहीं होता। इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि नई तकनीकों ने संसाधनों की खपत को और बढ़ाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उपभोग को संचालित करने वाली मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को नहीं समझा गया, तो कोई भी तकनीकी समाधान स्थायी परिणाम नहीं दे पाएगा। संवाद के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु संकट का समाधान किसी अतिरिक्त प्रयास में नहीं, बल्कि अनावश्यक गतिविधियों और अत्यधिक उपभोग को रोकने में निहित है। उनके अनुसार मानवता को लगातार अधिक करने की बजाय यह समझने की आवश्यकता है कि क्या करना बंद किया जाना चाहिए। पूर्व और पश्चिम के बीच संवाद तथा विभिन्न विचारधाराओं के बीच सेतु निर्माण के प्रश्न पर उन्होंने आंतरिक ईमानदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने उपनिषदों में वर्णित ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक सभ्यता ने बाहरी ज्ञान में तो उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन आंतरिक बोध की उपेक्षा की है। अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चा करते हुए आचार्य प्रशांत ने बताया कि तकनीक और प्रबंधन की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि समाज की अधिकांश समस्याओं की जड़ मानवीय चेतना और आंतरिकता से जुड़ी हुई है। इसी समझ ने उन्हें अध्यात्म और आत्मबोध के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा संचालित अध्ययन कार्यक्रमों में छात्र उपनिषदों, भगवद्गीता, बौद्ध दर्शन और अन्य वैश्विक ज्ञान परंपराओं के माध्यम से जीवन और मनुष्य की प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। कार्यक्रम के अंत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि विज्ञान, अर्थशास्त्र, व्यापार और चिकित्सा जैसे सभी क्षेत्र अंततः मानव कल्याण के लिए हैं, लेकिन जब तक निर्णय लेने वाले मनुष्य की चेतना और समझ विकसित नहीं होगी, तब तक व्यवस्थाएँ अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगी। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान, लालच और अनियंत्रित इच्छाओं से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है।
IIP का नया ढांचा: 2022-23 आधार वर्ष से औद्योगिक आंकड़ों को मिलेगी नई दिशा

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय देश की अर्थव्यवस्था का आकलन करने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण संकेतकों की समीक्षा कर रहा है। उसने राष्ट्रीय लेखा और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए नई श्रृंखला मुहैया करा दी हैं। अगले सप्ताह वह औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के लिए नई श्रृंखला जारी करने वाला है। ये महत्त्वपूर्ण बदलाव हैं क्योंकि नए सूचकांक अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों को दर्शाते हैं। आईआईपी के आधार वर्ष को 2011-12 से हटाकर 2022-23 किया जा रहा है। पिछले एक दशक में देश में औद्योगिक गतिविधियां बहुत अधिक बदली हैं और नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, डिजिटल तकनीक और अहम खनिजों के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है।मंत्रालय के मुताबिक नई श्रृंखला में दुर्लभ खनिज, लघु खनिज, गैस और बिजली आपूर्ति, गंदे जल और कचरे का प्रबंधन आदि शामिल हैं। केरोसिन, सिलाई मशीन,फ्लूरोसेंट ट्यूब्स आदि को इससे बाहर कर दिया गया है। कुल वस्तुओं की संख्या 407 से बढ़ाकर 463 कर दी गई है। विनिर्माण में ही संख्या 405 से बढ़कर 455 कर दी गई है। 64 वस्तु समूह हटाए गए हैं और 120 नए शामिल कर दिए गए हैं। बढ़ी हुई बास्केट सूचकांक को नीति निर्माताओं, कारोबारों और निवेशकों के लिए अधिक प्रासांगिक बनाएगी। इस कवायद के लिए गठित तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) ने औद्योगिक मापन को आधुनिक बनाने का प्रयास भी किया। इसमें पद्धतियों में सुधार और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएं शामिल की गईं। उन्नत अर्थव्यवस्थाएं तेजी से ऐसी गतिशील औद्योगिक मापन प्रणालियों का उपयोग कर रही हैं, जिनमें भार और उत्पादन के पैटर्न लगातार अपडेट होते रहते हैं।टीएसी की रिपोर्ट में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) तथा संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी प्रभाग की औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, 2010 से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सिफारिशों का उल्लेख किया गया है जो कठोर तयशुदा आधार प्रणालियों के बजाय श्रृंखला से जुड़े सूचकांकों का समर्थन करती हैं। ऐसी प्रणालियों में प्रतिस्थापन पर पक्षपात कम होता है और औद्योगिक भार को पुराना नहीं होने पाता, विशेषकर तब जब पुराने उद्योगों का पतन होता है और नए उद्योग तेजी से उभरते हैं। फिर भी इस बड़े बदलाव ने कुछ खामियों को उजागर किया है। भारत की सांख्यिकीय प्रणाली अब भी विलंबित सर्वेक्षणों, राज्यों से असमान सूचना, पुरानी प्रशासनिक प्रणालियों और कमजोर डिजिटल डेटा प्रणालियों पर निर्भर हैं। विनिर्माण का बड़ा हिस्सा अब भी असंगठित क्षेत्र में है, जहां उत्पादन छोटे पैमाने पर तथा अनौपचारिक होता है और जिसकी निगरानी करना कठिन होता है। हालांकि टीएसी ने असंगठित क्षेत्र के लिए सूचकांक बनाने की दूरदर्शी सिफारिश की है लेकिन देखना होगा कि यह लागू कैसे किया जाए। इसके अलावा मशीनरी और उपकरणों की मरम्मत तथा स्थापना जैसी गतिविधियां अब भी कठिन हैं क्योंकि वे मुख्यतः सेवा उन्मुख हैं और विश्वसनीय मापदंड विकसित करने की आवश्यकता होती है जो फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं। इसी तरह दुर्लभ पृथ्वी खनिजों का समावेश उभरती प्रौद्योगिकियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में भारत की महत्त्वाकांक्षाओं को दर्शाता है। यद्यपि भारत के पास विश्व के तीसरे सबसे बड़े दुर्लभ पृथ्वी खनिज भंडार हैं, लेकिन देश में प्रसंस्करण क्षमता अब भी सीमित है। मूल्य अपस्फीतक मूल्य-आधारित उत्पादन आंकड़ों को मात्रा आधारित उत्पादन अनुमान में बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इस संदर्भ में उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) की अनुपस्थिति एक बड़ी कमी बनी हुई है। यही वजह है कि संशोधित आईआईपी श्रृंखला को अधिक आधुनिक औद्योगिक मापन प्रणाली की ओर बढ़ना माना जा सकता है। हमारी फौरी प्राथमिकता डेटा की गुणवत्ता में सुधार करना, डिजिटल रिपोर्टिंग प्रणालियों को मजबूत करना, अपस्फीतकों को परिष्कृत करना और असंगठित तथा खंडित क्षेत्रों को पकड़ने के लिए बेहतर तरीकों का विकास करना होना चाहिए। निरंतर संस्थागत सुधारों और पद्धतिगत सुधारों के साथ आईआईपी भारत के औद्योगिक और आर्थिक परिवर्तन का अधिक भरोसेमंद संकेतक बन सकता है।
देश के बड़े जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से गिर रहा है, और अधिकांश नदी घाटियाँ गंभीर जल संकट की स्थिति के करीब पहुँचती जा रही हैं।

भीषण गर्मी और लू की वजह से पूरे भारत में जल आपूर्ति की समस्या तेजी से बढ़ रही है। उत्तर भारत के कई शहरों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना हुआ है और रात में भी तापमान लगातार ऊंचा रहने से पानी तथा बिजली की मांग बढ़ रही है। सुपर अल नीनो के कारण बारिश में व्यवधान की आशंका से समस्या और गंभीर हो सकती है। केंद्रीय जल आयोग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जिन 166 जलाशयों पर नजर रखी जा रही है, उनमें 30 अप्रैल को मौजूद 71.08 अरब घन मीटर पानी 14 मई तक घटकर 63.23 अरब घन मीटर ही रह गया है। यानी सिर्फ दो हफ्तों में लगभग 8 अरब घन मीटर की गिरावट आई है। तेरह प्रमुख जलाशयों में जल स्तर अपने सामान्य भंडारण स्तर के आधे से भी कम रह गया है। यह समस्या तब आ रही है, जब भारत में पानी का बहुत अधिक इस्तेमाल करने वाले क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ी हैं। इनमें एथनॉल मिश्रण, डेटा सेंटर, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का ढांचा और विनिर्माण शामिल हैं। इनमें से कई निवेश पानी के संकट वाले क्षेत्रों में हो रहे हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक बार-बार सूखे और भूजल स्तर में गिरावट की समस्या से जूझते रहे हैं मगर गन्ने की खेती और एथनॉल उत्पादन बढ़ता जा रहा है, जबकि गन्ने की खेती में पानी की सबसे ज्यादा खपत होती है। इसी तरह अक्सर शहरी जल संकट से जूझने वाले महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक डेटा सेंटर के बड़े अड्डे बनते जा रहे हैं। हाइपरस्केल डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। मुद्दा यह नहीं है कि इन क्षेत्रों का विस्तार होना चाहिए या नहीं, मुद्दा यह है कि औद्योगिक और ऊर्जा नीतियां जल विज्ञान संबंधी हकीकत के मुताबिक हैं या नहीं। औद्योगिक स्थलों के चयन, शहरी नियोजन और कृषि प्रोत्साहन में जल की उपलब्धता प्रमुख मानदंड होना चाहिए। इस व्यापक संकट के परिणाम भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के बाड़मेर जिले में एक लिफ्ट नहर के बंद होने से कई गांव इकलौते हैंडपंप पर निर्भर हो गए हैं। दिल्ली में यमुना में पानी कम होने और प्रदूषण बढ़ने से जल शोधन क्षमता कम हो गई है, जबकि गर्मियों के महीनों में पानी की मांग बढ़ जाती है, इसलिए शहर को पड़ोसी राज्यों से मदद मांगनी पड़ रही है। वर्ष 2024 के बेंगलूरु जल संकट ने यह दिखाया कि भूजल भंडार कम होने, झीलों पर अतिक्रमण होने और वर्षा जल संचयन नियमों का ठीक से पालन न होने पर शहरी जल व्यवस्था कितनी तेजी से चरमरा सकती है। यह संकट अब केवल वर्षा की कमी तक सीमित नहीं है। तापमान बढ़ने से ज्यादा पानी भाप बनकर उड़ रहा है और भूजल स्तर गिरता जा रहा है। भारत लगभग 251 अरब घन मीटर सालाना भूजल दोहन पहले से करता आ रहा है, जो विश्व में कुल दोहन का लगभग एक चौथाई है। 1950 में यहां हर व्यक्ति के लिए लगभग 5,000 घन मीटर पानी उपलब्ध था, जो 2021 में घटकर 1,486 घन मीटर रह गई है, जिसमें और भी कमी आने का अनुमान है। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद के शोध से पता चलता है कि भारत के 15 प्रमुख नदी बेसिनों में से 11 गंभीर जल संकट के कगार पर हैं। जल की कमी और संकट के व्यापक आर्थिक परिणाम भी हो सकते हैं। खाद्य उत्पादन पर इसका असर पड़ा तो महंगाई तेजी से बढ़ सकती है, जिसके व्यापक नीतिगत प्रभाव हो सकते हैं। दुर्भाग्यवश स्थानीय निकाय पेयजल संबंधी आपात स्थितियों से निपटने के लिए ठीक से तैयार नहीं हैं। तेजी से शहरीकरण होने के बाद भी अधिकतर शहरों में अभी व्यापक जल सुरक्षा योजनाएं नहीं हैं। नगरपालिकाएं भूजल दोहन, आपात स्थितियों के दौरान टैंकरों द्वारा आपूर्ति और संकट में अस्थायी प्रतिक्रियाओं पर ज्यादा निर्भर हैं। संपादकीय
क्या आम आदमी विकास से बाहर छूट रहा है?

-ललित गर्गस्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण के जिन आधार स्तंभों की कल्पना की गई थी, उनमें शिक्षा और चिकित्सा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। यह माना गया था कि यदि देश के नागरिक शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक होंगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा, सामाजिक असमानताएं कम होंगी और राष्ट्र विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। शिक्षा को व्यक्ति निर्माण और चिकित्सा को जीवन रक्षा का माध्यम माना गया था। लेकिन स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद स्थिति चिंताजनक प्रश्न खड़े करती है कि क्या ये दोनों क्षेत्र अपने मूल उद्देश्य से भटककर व्यवसाय और बाजार के अधीन नहीं हो गए हैं? आज शिक्षा और चिकित्सा दोनों क्षेत्रों में जो विसंगतियां दिखाई देती हैं, वे केवल व्यवस्थागत संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट का रूप ले चुकी हैं। एक ओर शिक्षा व्यवस्था परीक्षा, अंकों और प्रतिस्पर्धा की आर्थिक मशीन बन गई है, वहीं दूसरी ओर चिकित्सा सेवा लाभ-हानि के गणित में उलझती दिखाई देती है। इन दोनों क्षेत्रों की बढ़ती व्यावसायिकता ने आम आदमी को सबसे अधिक प्रभावित किया है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं था। शिक्षा अब डिग्री, नौकरी और प्रतिस्पर्धा तक सीमित होती दिखाई देती है। शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं का सबसे भयावह चेहरा कोटा, सीकर और अन्य कोचिंग एवं शिक्षा केंद्रों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के रूप में सामने आया है। कोटा, जो कभी देश की शैक्षणिक आकांक्षाओं का केंद्र माना जाता था, अब विद्यार्थियों पर बढ़ते मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय के कारण आत्महत्या की घटनाओं से लगातार चर्चा में रहा है। कोटा, सीकर तथा अन्य कोचिंग नगरों में पिछले वर्षों में अनेक विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर किया है। राजस्थान के सीकर में नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की आत्महत्या की घटना इसी विडंबना का उदाहरण है। परीक्षा रद्द होने से उत्पन्न अनिश्चितता और मानसिक तनाव ने एक संभावनाशील जीवन समाप्त कर दिया। यह घटना अकेली नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। औसतन हर 36 मिनट में एक विद्यार्थी जीवन समाप्त कर रहा है। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है।शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं का सबसे भयावह चेहरा कोटा, सीकर और अन्य कोचिंग एवं शिक्षा केंद्रों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के रूप में सामने आया है। कोटा, जो कभी देश की शैक्षणिक आकांक्षाओं का केंद्र माना जाता था, अब विद्यार्थियों पर बढ़ते मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय के कारण आत्महत्या की घटनाओं से लगातार चर्चा में रहा है। कोटा, सीकर तथा अन्य कोचिंग नगरों में पिछले वर्षों में अनेक विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर किया है। राजस्थान के सीकर में नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की आत्महत्या की घटना इसी विडंबना का उदाहरण है। परीक्षा रद्द होने से उत्पन्न अनिश्चितता और मानसिक तनाव ने एक संभावनाशील जीवन समाप्त कर दिया। यह घटना अकेली नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। औसतन हर 36 मिनट में एक विद्यार्थी जीवन समाप्त कर रहा है। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। दूसरी ओर नीट, नेट, प्रतियोगी भर्ती परीक्षाओं तथा अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों में विवाद और अनिश्चितता की स्थितियों ने विद्यार्थियों में गहरा असंतोष और अविश्वास पैदा किया है। वर्षों की तैयारी करने वाले छात्र जब परीक्षा प्रणाली को ही अविश्वसनीय पाते हैं तो उनमें निराशा और मानसिक तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। आज परीक्षा प्रणाली अविश्वसनीय होती जा रही है। प्रश्नपत्र लीक होना, परीक्षाओं का रद्द होना, मूल्यांकन विवाद, शोध कार्यों में साहित्यिक चोरी, पीएचडी प्रक्रियाओं का औपचारिक बन जाना और कोचिंग संस्कृति का बढ़ना शिक्षा के बाजारीकरण की तस्वीर प्रस्तुत करता है। शिक्षा अब ज्ञान से अधिक निवेश और प्रतिफल का विषय बनती जा रही है। धीरे-धीरे शिक्षा सेवा से व्यवसाय में बदलती गई। बड़े निजी विद्यालय, कोचिंग संस्थान और विश्वविद्यालय आज करोड़ों के उद्योग बन चुके हैं। डॉक्टर और इंजीनियर बनाने के सपनों का ऐसा व्यापार खड़ा हुआ जिसमें अभिभावक आर्थिक रूप से टूटने लगे। आज एक सामान्य परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जीवन भर की बचत खर्च करने को विवश है। विद्यालयों की ऊंची फीस, निजी कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उच्च शिक्षा की महंगी व्यवस्था ने शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है। इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। चिकित्सा को कभी सेवा का क्षेत्र माना जाता था, लेकिन आज निजी चिकित्सालयों की बढ़ती संख्या और उनकी व्यावसायिक प्रवृत्ति ने आम नागरिक को संकट में डाल दिया है। इलाज इतना महंगा हो गया है कि अनेक परिवार बीमारी के कारण आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। निजी अस्पतालों में उपचार, जांच, आईसीयू, दवाओं का खर्च और नकली दवाओं में जीवन समाप्त होने की घटनाएं लगातार बढ़ी है। अनेक मामलों में अनावश्यक परीक्षण, अत्यधिक शुल्क और व्यावसायिक दृष्टिकोण की शिकायतें सामने आती रहती हैं। चिकित्सा सेवा का उद्देश्य रोगी को राहत देना था, लेकिन कई स्थानों पर वह लाभ कमाने की प्रणाली में बदलती दिखाई देती है। जगह-जगह खुले निजी अस्पताल और शिक्षण संस्थान एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा में उतर आए हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा गुणवत्ता की अपेक्षा लाभ कमाने की अधिक दिखाई देती है। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा और चिकित्सा दोनों ही सामान्य नागरिक की आर्थिक क्षमता से बाहर जाने लगी हैं। इन परिस्थितियों का एक सामाजिक दुष्परिणाम भी सामने आया है। आर्थिक दबाव, भविष्य की अनिश्चितता, शिक्षा का तनाव, महंगी चिकित्सा और रोजगार संकट के कारण अवसाद, मानसिक तनाव और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। युवा पीढ़ी उपलब्धियों के दबाव में टूट रही है, जबकि परिवार आर्थिक बोझ से जूझ रहे हैं। शिक्षा मंत्रालय को अधिक सशक्त, उत्तरदायी और कठोर भूमिका निभाते हुए परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, तकनीक आधारित और सुरक्षित बनाना होगा। इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र में देशभर में स्थापित हुए नए एम्स संस्थानों एवं उच्च चिकित्सा केंद्रों का लाभ वास्तव में आम नागरिक तक सरल, सस्ती और सुलभ व्यवस्था के रूप में
सात्विकता में ही मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता

-सुरेश गोयल धूप वाला भारतीय संस्कृति सदैव उच्च जीवन मूल्यों, नैतिक आदर्शों और आध्यात्मिक चेतना पर आधारित रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवन को केवल भौतिक सुखों तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे आत्मिक उन्नति और मानव कल्याण का माध्यम बताया। यही कारण है कि भारतीय जीवन पद्धति में “सात्विकता” को विशेष महत्व दिया गया। आज आधुनिकता और पाश्चात्य प्रभाव के कारण मनुष्य का जीवन भले ही सुविधासंपन्न हो गया हो, किंतु मानसिक शांति, संतोष और आत्मिक सुख उससे दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में सात्विक जीवन शैली ही मनुष्य को वास्तविक श्रेष्ठता प्रदान कर सकती है। सात्विकता का अर्थ केवल भोजन की शुद्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के आहार, विचार और व्यवहार की पवित्रता से जुड़ी हुई है। सात्विक व्यक्ति सत्य, संतोष, विनम्रता, करुणा और परोपकार जैसे गुणों को अपने जीवन में अपनाता है। उसके भीतर ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट और दिखावे के लिए कोई स्थान नहीं होता। वह स्वयं के साथ-साथ समाज के कल्याण की भावना रखता है। सात्विक जीवन का सबसे प्रमुख आधार शुद्ध और सादा आहार है। भारतीय आयुर्वेद में कहा गया है कि जैसा अन्न होता है, वैसा ही मन बनता है। इसलिए सात्विक भोजन ऐसा माना गया है जो प्रकृति से प्राप्त, ताजा, शाकाहारी और सुपाच्य हो। मौसमी फल, हरी सब्जियां, अंकुरित अनाज, दूध, दही और मेवे शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ मन को भी शांत और निर्मल बनाते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक मसालेदार, तामसिक और बासी भोजन मनुष्य में आलस्य, क्रोध और असंयम को बढ़ाता है। आज अनेक बीमारियों का मुख्य कारण भी असंतुलित खानपान ही बन चुका है। यदि मनुष्य सात्विक आहार अपनाए तो उसका शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रह सकता है। सात्विकता का दूसरा महत्वपूर्ण आधार सत्य और अहिंसा है। हमारे धर्मग्रंथों में सत्य को ही परम धर्म बताया गया है। सत्य बोलने वाला व्यक्ति आत्मविश्वास और सम्मान प्राप्त करता है। इसी प्रकार अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और वाणी से भी किसी को कष्ट न पहुंचाना है। मधुर वाणी, विनम्र व्यवहार और सभी जीवों के प्रति दया का भाव सात्विक जीवन की पहचान हैं। आज समाज में बढ़ती कटुता, तनाव और विवादों का एक बड़ा कारण सहनशीलता और संवेदनशीलता की कमी है। यदि मनुष्य सात्विक गुणों को अपनाए तो परिवार और समाज दोनों में सौहार्द का वातावरण बन सकता है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ तालमेल को भी सात्विक जीवन का आवश्यक अंग माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त में उठना, योग-प्राणायाम करना, नियमित दिनचर्या अपनाना और प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीना मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाता है। आधुनिक जीवन शैली में देर रात तक जागना, कृत्रिम साधनों पर निर्भरता और भागदौड़ भरा जीवन मनुष्य को तनाव और अवसाद की ओर ले जा रहा है। इसके विपरीत सात्विक जीवन प्रकृति से जुड़कर मन और शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है। सात्विकता का सबसे बड़ा गुण संतोष है। आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं और दिखावे की दौड़ में इतना उलझ गया है कि उसके जीवन से शांति समाप्त होती जा रही है। अधिक पाने की लालसा ने उसे असंतुष्ट और तनावग्रस्त बना दिया है। जबकि सात्विक जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक सुख बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुष्टि और मानसिक शांति में है। संतोषी व्यक्ति कम साधनों में भी प्रसन्न रहता है और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या नहीं करता।सात्विकता का सबसे बड़ा गुण संतोष है। आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं और दिखावे की दौड़ में इतना उलझ गया है कि उसके जीवन से शांति समाप्त होती जा रही है। अधिक पाने की लालसा ने उसे असंतुष्ट और तनावग्रस्त बना दिया है। जबकि सात्विक जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक सुख बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुष्टि और मानसिक शांति में है। संतोषी व्यक्ति कम साधनों में भी प्रसन्न रहता है और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या नहीं करता। वास्तव में सात्विकता केवल एक जीवन शैली नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है। यह मनुष्य को संयम, सदाचार और आत्मिक शांति की ओर ले जाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अंधाधुंध पाश्चात्य जीवन शैली की नकल करने के बजाय अपनी भारतीय संस्कृति के सात्विक मूल्यों को अपनाएं। जब मनुष्य का आहार शुद्ध, विचार सकारात्मक और व्यवहार विनम्र होगा, तभी समाज में शांति, प्रेम और मानवता का विस्तार संभव हो सकेगा। निस्संदेह सात्विकता में ही मनुष्य जीवन की वास्तविक श्रेष्ठता निहित है।
प्रखर राष्ट्रवाद में ओझल सावरकर का भाषाई योगदान

-प्रो. एस.के.सिंहदुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पर किसी व्यक्ति का जब एक विशेष पक्ष लोकप्रियता के शिखर पर होता है तो उसकी छाया में व्यक्ति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषतायें ओझल हो जाती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की पहचान वैश्विक स्तर पर एक महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् के रूप में है, किंतु इन उपलब्धियों की छाया में उनकी एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता पेंटिंग (चित्रकला) की प्रतिभा दबकर रह गई एवं उसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हो पायी। वस्तुत: इसी तरह प्रखर क्रांतिकारी रणनीतिकार एवं कालापानी की कठोर यातनायें सहने वाले स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की क्रांतिकारी छवि एवं उनके व्यापक संघर्षों की छाया में उनका महत्वपूर्ण ‘भाषाशुद्धि आन्दोलन’ जन-मानस में उतनी ख्याति नहीं पा सका, जिसका कि वह आन्दोलन हकदार था। उन्होंने देवनागरी लिपि को आधुनिक मुद्रण एवं टंकण के अनुरूप बनाने हेतु अनेक व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किये। इतना ही नहीं, इसके अलावा इतिहास लेखन के माध्यम से औपनिवेशिक दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए भारतीय इतिहास की तार्किक एवं गौरवपूर्ण पुनर्व्याख्या प्रस्तुत की। सावरकर के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व के प्रभाव में उनका गंभीर अकादमिक एवं बौद्विक योगदान प्रायः ओझल ही रहा। एतिहासिक दृष्टि एवं तथ्यों के आधार पर देखें तो मुगलकाल में फारसी-अरबी का प्रभुत्व तथा औपनिवेशक काल में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत को भाषाई स्तर पर भारी चुनौतियों और उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज की ‘राजभाषा नीति’ और 20वीं शताब्दी में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा चलाए गए ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिनके माध्यम से भाषाई अतिक्रमण की चुनौतियों का प्रतिकार किया गया। सावरकर की 1926 में प्रकाशित पुस्तक ‘भाषाशुद्वि’ उनके आंदोलन की वैचारिक आधारशिला बनी। यह केवल व्याकरण संबंधी पुस्तक नहीं बल्कि सावरकर जी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। अत्यधिक विदेशी शब्दों के प्रयोग को वे बौद्विक गुलामी का प्रतीक मानते थे। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने मराठी में घर कर गये उर्दू, अरबी एवं फारसी के शब्दों के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और प्राकृतिक मूल के शब्दों के प्रयोग का आव्हान किया। वस्तुत: उनका मानना था कि भारतीय भाषाओं को अधिक सामथ्र्यवान तथा मौलिक बनाने के लिये उन्हें अपनी मूल जड़ संस्कृत से जुड़ना होगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाषाशुद्वि का लक्ष्य किसी का अंधा विरोध नहीं बल्कि शब्दों का विवेकपूर्ण चयन करना है। उन्होंने कहा कि अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ शब्द अपनाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए, लेकिन जहां देशी शब्द उपलब्ध हों वहां विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। सावरकर जी ने न केवल पूर्णतः नवीन शब्दों का निर्माण किया बल्कि उन्होंने भाषा में पहले से मौजूद शब्दों को पुनर्जीवित तथा पुनः परिभाषित भी किया। उन्होंने मेयर के लिये ‘महापौर’, टेलीग्राम के लिये ‘तार’, लाउडस्पीकर के लिये ‘ध्वनिवर्धक’, कॉलेज के लिये ‘महाविद्यालय’, कॉलम के लिये ‘स्तम्भ’, स्पेशल इश्यू के लिए ‘विशेषांक’ और प्रोफेसर के लिये ‘प्राध्यापक’ जैसे शब्दों का सृजन किया। इसके अतिरिक्त भाषाशुद्वि के लिहाज से सावरकर जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उन शब्दों को पुनःस्थापित करना माना जाना चाहिये जो व्यवहार से लुप्त हो चुके थे। उन्होंने बहुत से संस्कृत और मराठी शब्दों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रचारित एवं प्रतिस्थापित किया। उदाहरण के लिये उन्होंने स्कूल के लिये ‘शाला’, गवर्नेन्स के लिये ‘शासन’, हेडमास्टर के लिये ‘मुख्याध्यापक’ जैसे पहले से मौजूद शब्दों को आधुनिक संस्थागत प्रयोग में लाने का आव्हान किया। उनका मानना था कि भाषाशुद्वि का अर्थ केवल नये शब्दों का निर्माण करना ही नहीं, बल्कि पहले से मौजूद शब्दों को पुनःस्थापित करना और भाषा की खोई हुई जीवंतता को पुनः प्राप्त करना भी है। विश्रामगृह, प्रशिक्षण, संसद, न्यायालय, जनपद, आरक्षण, विशेषाधिकार, अभियंता, अनुमोदन, प्रतिवेदन, परिषद, राजदूत, दिनांक, दिग्दर्शक जैसे शब्दों को पुनः प्रतिस्थापित करने का श्रेय सावरकर जी को ही जाता है। उन्होंने सैद्धांतिक पक्ष से अधिक व्यवहारिक क्रियान्वयन पर बल दिया तथा अपने भाषणों, ग्रन्थों में उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया। अत: आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा में शिक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा पर विशेष बल दे रही है, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित किया जा सके। इन परिस्थितियों में सावरकर जी का ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ और भी महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक हो जाता है। वर्तमान समय में इसे नये संदर्भ में देखा जाना चाहिये। आज जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम ज्ञान का सृजन अपनी भाषाओं में करें। हमें केवल अनुवाद पर निर्भर नहीं रहना चाहिये। इसके लिये शिक्षण संस्थानो में ‘भाषा नियोजन’ को एक स्वतंत्र अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया जाना आवश्यक है। सावरकर जी के अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि वैचारिक स्वायत्तता, सांस्कृतिक स्वावलंबन, स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान का प्रतीक भी होती है। स्वदेशी शब्दावली के पुनरूत्थान में सावरकर जी का अद्वितीय योगदान है। उनका दर्शन एवं साहित्यक कृतियां आज भी भारतीय बौद्विक और अकादमिक जगत के लिये एक महत्वपूर्ण आधार हैं। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और भाषाई योगदान उन्हें एक महान विचारक और शिक्षाविद के रूप में स्थापित करता है। उनके द्वारा गढ़े गये प्रशासनिक, तकनीकी एवं संसदीय शब्द आज भी हमारी लोकतांत्रिक और अकादमिक शब्दावली में जीवंत हैं। (लेखक जीवाजी विश्वविद्यालय में वाणिज्य एवं व्यवसाय अध्ययनशाला विभागाध्यक्ष हैं)
बकरीद (ईद-उल-अज़हा): त्याग, आस्था और इंसानियत का सबसे पवित्र पर्व

ईद-उल-अज़हा जिसे भारत में आमतौर पर बकरीद या बक्रीद कहा जाता है, इस्लाम धर्म का एक अत्यंत पवित्र और भावनात्मक पर्व है। यह त्योहार हर साल दुनिया भर में करोड़ों लोगों द्वारा गहरी आस्था, श्रद्धा और समर्पण के साथ मनाया जाता है। बकरीद केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि यह त्याग, भरोसे और इंसानियत का संदेश देने वाला पर्व है। बकरीद का इतिहास पैगंबर हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की उस महान परीक्षा से जुड़ा है, जिसमें अल्लाह ने उनकी आस्था की परीक्षा ली थी। मान्यता के अनुसार, उन्हें अपने सबसे प्रिय पुत्र को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का आदेश दिया गया था। हज़रत इब्राहिम ने बिना किसी हिचकिचाहट के अल्लाह के आदेश को स्वीकार किया और अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए। उनकी इस अटूट आस्था और समर्पण को देखकर अल्लाह ने उनके पुत्र की जगह एक दुम्बा (भेड़) को कुर्बानी के लिए भेज दिया। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में बकरीद मनाई जाती है। इस पर्व का असली उद्देश्य केवल कुर्बानी देना नहीं है, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों, लालच और अहंकार की कुर्बानी देना भी है। बकरीद हमें यह सिखाती है कि सच्चा धर्म वही है जिसमें त्याग, सेवा और इंसानियत हो। इस दिन लोग सुबह विशेष नमाज अदा करते हैं, जिसे ईद की नमाज कहा जाता है, और उसके बाद कुर्बानी की रस्म निभाई जाती है। कुर्बानी के बाद मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है, जिसमें एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए रखा जाता है और तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए उपयोग किया जाता है। यह परंपरा समाज में समानता और भाईचारे को मजबूत बनाती है। बकरीद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि इंसान को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के लिए जीना चाहिए। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि असली खुशी केवल पाने में नहीं, बल्कि बांटने में है। आज के समय में जब समाज में दूरी और असमानता बढ़ रही है, बकरीद का संदेश और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि विश्वास और समर्पण से हर कठिन परीक्षा को पार किया जा सकता है। हज़रत इब्राहिम की कहानी आज भी हर इंसान को यह प्रेरणा देती है कि सच्चा ईमान वही है जिसमें बिना शर्त समर्पण हो। अंत में बकरीद केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानियत, करुणा और एकता का जीवंत संदेश है, जो हमें एक बेहतर समाज और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। -बकरीद (ईद-उल-अज़हा)
पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि: आधुनिक भारत के शिल्पकार को नमन

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि हर साल 27 मई को पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। इस दिन भारत उन्हें याद करता है, जिन्होंने आज़ाद भारत की नींव मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी। नेहरू जी का निधन 27 मई 1964 को हुआ था, लेकिन उनके विचार, उनकी नीतियाँ और उनका आधुनिक भारत का सपना आज भी लोगों के बीच जीवित है। नेहरू जी को बच्चों से बेहद लगाव था, इसलिए उन्हें “चाचा नेहरू” के नाम से भी जाना जाता है। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर स्कूलों, संस्थानों और राजनीतिक संगठनों में उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। लोग उन्हें फूल अर्पित कर उनके योगदान को याद करते हैं और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते हैं। नेहरू जी का मानना था कि भारत का भविष्य शिक्षा, विज्ञान और तकनीक पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने देश में बड़े-बड़े उद्योगों, आईआईटी और वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की दिशा में काम किया। उनके नेतृत्व में भारत ने लोकतंत्र को मजबूत किया और एक आधुनिक राष्ट्र बनने की ओर कदम बढ़ाए। आज भी नेहरू जी की नीतियों और सोच का असर भारतीय राजनीति और विकास मॉडल में देखा जा सकता है। उनके द्वारा दिया गया धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों का संदेश भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। पुण्यतिथि के इस अवसर पर देश उन्हें केवल याद ही नहीं करता, बल्कि उनके दिखाए रास्ते पर चलने का संकल्प भी लेता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहेगा। नेहरू जी ने कहा था कि “भविष्य उन्हीं का है जो अपने सपनों की सुंदरता पर विश्वास करते हैं।” यही विचार आज भी हर भारतीय को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। -पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि
अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य कार्रवाई दिवस: महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों की वैश्विक आवाज

अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य कार्रवाई दिवस (International Day of Action for Women’s Health) हर साल महिलाओं के स्वास्थ्य, उनके अधिकारों और सुरक्षित चिकित्सा सेवाओं के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है। यह दिन दुनिया को याद दिलाता है कि महिलाओं का स्वास्थ्य केवल एक व्यक्तिगत मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक विकास का अहम आधार है। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, सुरक्षित मातृत्व सेवाएं और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अधिकार दिलाना है। यह दिवस इस बात पर जोर देता है कि हर महिला को समान और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए। कई देशों में आज भी महिलाएं जरूरी चिकित्सा सुविधाओं से वंचित हैं, जिससे मातृ मृत्यु दर और स्वास्थ्य असमानता जैसी समस्याएं सामने आती हैं। इसी कारण यह दिन नीति-निर्माताओं, सरकारों और समाज को महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करता है। महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार के लिए आंकड़ों और सांख्यिकी (Statistics) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यह जानना जरूरी है कि कितनी महिलाएं सुरक्षित प्रसव सुविधाओं से वंचित हैं, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं में कितना अंतर है और महिलाओं को समय पर इलाज मिल पा रहा है या नहीं। सही डेटा के बिना कोई भी स्वास्थ्य नीति प्रभावी तरीके से नहीं बनाई जा सकती। इसलिए यह दिन “डेटा आधारित स्वास्थ्य सुधार” की जरूरत पर भी जोर देता है। आज भी दुनिया के कई हिस्सों में महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। इनमें सुरक्षित प्रसव सुविधाओं की कमी, प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, जागरूकता की कमी और सामाजिक बाधाएं प्रमुख हैं। कई जगह महिलाओं को अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता भी नहीं मिलती, जो उनकी स्थिति को और कमजोर बनाता है। यह दिन वैश्विक स्तर पर कई संगठनों की भूमिका को भी उजागर करता है, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) और विभिन्न गैर-सरकारी संगठन। ये संस्थाएं महिलाओं के लिए स्वास्थ्य कैंप, जागरूकता कार्यक्रम और सुरक्षित मातृत्व योजनाएं चलाकर उनकी स्थिति सुधारने का प्रयास करती हैं। अगर महिलाओं के स्वास्थ्य पर सही ध्यान दिया जाए और ठोस नीतियां लागू हों, तो मातृ मृत्यु दर में भारी कमी लाई जा सकती है और हर महिला को बेहतर जीवन मिल सकता है। यही कारण है कि यह दिन सिर्फ एक जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि एक वैश्विक आंदोलन है, जो समानता और अधिकारों की दिशा में काम करता है। अंत में यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि स्वस्थ महिला ही एक स्वस्थ परिवार और मजबूत समाज की नींव होती है। इसलिए महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। -अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य कार्रवाई दिवस
26 मई: जॉर्जिया का Independence Day – इतिहास, जश्न और महत्व

26 मई को जॉर्जिया (देश) अपना राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस मनाता है, जो 1918 में रूसी साम्राज्य से आजादी की घोषणा की याद में होता है। यह दिन देश की पहचान, लोकतंत्र और सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय पर्व माना जाता है।26 मई 1918 को जॉर्जिया की नेशनल काउंसिल ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ जॉर्जिया की स्थापना की घोषणा की थी। यह घटना रूसी साम्राज्य के पतन और 1917 की रूसी क्रांति के बाद हुई राजनीतिक उथल-पुथल का नतीजा थी।उस समय जॉर्जिया लंबे समय से बाहरी शासन के प्रभाव में था, और यह घोषणा देश के लिए एक नए लोकतांत्रिक युग की शुरुआत थी। स्वतंत्रता कैसे मिली?प्रथम विश्व युद्ध के बाद रूस कमजोर हो गयाजॉर्जियाई राष्ट्रीय आंदोलन मजबूत हुआ26 मई 1918 को स्वतंत्र राज्य की घोषणा हुईराजधानी तब भी त्बिलिसी (Tbilisi) थी हालांकि यह स्वतंत्रता लंबे समय तक टिक नहीं पाई और 1921 में सोवियत संघ ने जॉर्जिया पर कब्जा कर लिया, लेकिन 1991 में देश ने फिर से स्वतंत्रता हासिल की। जॉर्जिया में कैसे मनाया जाता है यह दिन?यह देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उत्सव होता है, जिसे पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। प्रमुख आयोजन🇬🇪 राष्ट्रीय ध्वज फहराना सैन्य परेड राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के भाषण आतिशबाजी (Fireworks) संगीत कार्यक्रम और सांस्कृतिक शो प्रदर्शनी और लोक कार्यक्रमराजधानी त्बिलिसी के Rustaveli Avenue और Freedom Square पर सबसे बड़े कार्यक्रम होते हैं। आधुनिक जॉर्जिया में महत्वआज यह दिन सिर्फ ऐतिहासिक नहीं बल्कि:राष्ट्रीय एकता का प्रतीक हैलोकतंत्र और स्वतंत्रता का संदेश देता हैयूरोप से जुड़ाव और पहचान का हिस्सा हैयुवाओं के लिए गर्व का अवसर है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वजॉर्जिया का यह दिन वैश्विक मंच पर भी मनाया जाता हैविदेशों में रहने वाले जॉर्जियाई समुदाय भी इसे उत्सव की तरह मनाते हैंकई देशों के प्रतिनिधि भी आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं26 मई को जॉर्जिया का नेशनल डे भी कहा जाता है1918 की यह घटना देश के आधुनिक लोकतंत्र की नींव मानी जाती हैयह यूरोप के सबसे पुराने लोकतांत्रिक आंदोलनों में से एक से जुड़ा है 26 मई का दिन जॉर्जिया के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, संघर्ष और राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। यह दिन याद दिलाता है कि आज का आधुनिक जॉर्जिया कई ऐतिहासिक संघर्षों और बदलावों के बाद बना है। -जॉर्जिया (देश) राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस