नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?

नई दिल्ली। नेपाल में हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद United States की सक्रियता तेजी से बढ़ती दिख रही है। अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार दौरे और कूटनीतिक संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। खासकर चीन और भारत के बीच स्थित नेपाल अब बड़ी भू-रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका की अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पब्लिक डिप्लोमेसी सराह बी. रोजर्स के नेपाल दौरे की तैयारी ने इस गतिविधि को और तेज कर दिया है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी काठमांडू का दौरा कर चुके हैं। इस बढ़ती कूटनीतिक हलचल को लेकर China ने भी सतर्क रुख अपनाया है और अपनी रणनीतिक निगरानी बढ़ा दी है। विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में बढ़ती अमेरिकी रुचि का एक कारण क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा रणनीति हो सकता है। वहीं चीन का फोकस तिब्बती मुद्दों और अपने क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा पर है। इसी वजह से नेपाल में दोनों देशों की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। नेपाल सरकार फिलहाल सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यह देश अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम केंद्र बन सकता है।
Dollar vs Yuan: चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत से अमेरिका चिंतित, युआन के बढ़ते असर पर ट्रंप प्रशासन को चेतावनी

Dollar vs Yuan: नई दिल्ली। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की बादशाहत को अब चीन की करेंसी युआन से चुनौती मिलती दिखाई दे रही है। चीन लगातार अपने वित्तीय प्रभाव को बढ़ाने और डॉलर के विकल्प के तौर पर युआन को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जिसे लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ गई है। इसी बीच अमेरिकी सीनेटरों के एक द्विदलीय समूह ने सीनेट में प्रस्ताव पेश कर ट्रंप प्रशासन को चेतावनी दी है कि चीन समानांतर वैश्विक वित्तीय ढांचा खड़ा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी सांसदों ने जताई चिंता रिपब्लिकन सीनेटर टेड बड और डेमोक्रेट सीनेटर जीन शाहीन द्वारा पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि अमेरिकी डॉलर का वैश्विक रिजर्व करेंसी बने रहना अमेरिका की आर्थिक ताकत और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। सीनेटरों ने चेतावनी दी कि चीन युआन के जरिए ऐसा वित्तीय नेटवर्क तैयार कर रहा है, जो भविष्य में अमेरिका और उसके सहयोगियों के प्रभाव को कमजोर कर सकता है। डॉलर की हिस्सेदारी में गिरावट प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 1999 में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी करीब 71% थी, जो 2025 की तीसरी तिमाही तक घटकर 56.82% रह गई है। हालांकि युआन की हिस्सेदारी अभी भी सीमित है, लेकिन चीन लगातार उसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान प्रणाली में आगे बढ़ा रहा है। धुरंधर 3’ की आहट से बढ़ी हलचल, स्पाई यूनिवर्स को लेकर बड़ा सरप्राइज संभव.. चीन कैसे बढ़ा रहा है युआन का असर? अमेरिकी सांसदों ने कहा कि चीन अपनी Belt and Road Initiative (BRI) के जरिए विकासशील देशों में भारी निवेश कर आर्थिक निर्भरता बढ़ा रहा है। 2013 से अब तक चीन इस परियोजना के तहत दुनिया भर में 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश कर चुका है। इसके अलावा चीन का Cross-Border Interbank Payment System (CIPS) भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसे SWIFT सिस्टम के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक 1700 से ज्यादा बैंक अब इस नेटवर्क से जुड़ चुके हैं। अमेरिका को किस बात का डर? अमेरिकी सांसदों का मानना है कि यदि भविष्य में ताइवान या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कोई बड़ा संकट पैदा होता है, तो चीन का वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क पश्चिमी देशों की आर्थिक पकड़ को कमजोर कर सकता है। इसी वजह से अमेरिका अब अपने सहयोगी देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने और विकासशील देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति पर जोर दे रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में डॉलर और युआन के बीच आर्थिक प्रभाव की यह प्रतिस्पर्धा वैश्विक व्यापार, निवेश और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बड़ा असर डाल सकती है।
अमेरिका भारत पर फिर से टैरिफ लगाने की तैयारी में, 16 ट्रेडिंग पार्टनर्स की सेक्शन 301 जांच शुरू

नई दिल्ली। अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन ने भारत और चीन सहित 16 प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर्स के खिलाफ नई जांच शुरू कर दी है। यह कार्रवाई ‘सेक्शन 301’ के तहत की जा रही है, जो अमेरिकी ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 का हिस्सा है और अमेरिका को उन देशों पर एकतरफा टैरिफ या प्रतिबंध लगाने की शक्ति देती है, जो अमेरिकी कंपनियों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नुकसान पहुंचा रहे हों। इस कदम के पीछे पिछली घटनाओं का संदर्भ है। फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को अवैध करार दिया था। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने 150 दिनों के लिए 10% का अस्थायी टैरिफ लागू किया। अब नई जांच के माध्यम से प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि टैरिफ का दबाव जारी रहे और ट्रेडिंग पार्टनर्स को बातचीत की मेज पर लाया जा सके। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने बताया कि यह जांच भारत, चीन, यूरोपीय संघ (EU), जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे पर केंद्रित है। अगर जांच में इन देशों की नीतियां अनुचित व्यापार व्यवहार के तहत पाई गईं, तो उन पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है। जांच का मुख्य फोकस उन देशों पर है, जो जरूरत से अधिक उत्पादन कर अमेरिकी बाजार में सस्ते दाम पर माल बेचते हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी देश में जूतों की फैक्ट्री सालाना 100 जूते बना सकती है, लेकिन घरेलू मांग केवल 20 जूते की है, तो शेष 80 जूते सस्ते दाम पर अमेरिका में भेज दिए जाते हैं। अमेरिका इसे मार्केट डंपिंग और अनुचित व्यापार व्यवहार मानता है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है। 2024 में भारत का अमेरिका के साथ गुड्स ट्रेड सरप्लस 58,216 मिलियन डॉलर था, जो 2025 में घटकर 45,801 मिलियन डॉलर रह गया। इस कमी के बावजूद भारत इस जांच की सूची में शामिल है। यदि भारत की नीतियां ‘अनुचित’ पाई गईं, तो भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ या प्रतिबंध लग सकते हैं। इसके अलावा, अमेरिका फोर्स्ड लेबर पर भी अलग जांच कर रहा है। इसका उद्देश्य है बंधुआ मजदूरी से बने सामानों के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना। पहले ही उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सोलर पैनल और अन्य सामानों पर कार्रवाई की जा चुकी है। अब यह कार्रवाई अन्य देशों पर भी लागू हो सकती है। जांच की टाइमलाइन भी निर्धारित कर दी गई है। 15 अप्रैल तक आम जनता और कंपनियों से सुझाव मांगे गए हैं, इसके बाद 5 मई के आसपास सार्वजनिक सुनवाई होगी। लक्ष्य है कि जुलाई में अस्थायी टैरिफ खत्म होने से पहले नए टैरिफ प्रस्ताव और जांच के नतीजे तैयार हो जाएं। जेमिसन ग्रीर ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रम्प टैरिफ लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार को बचाना है। साथ ही ट्रेडिंग पार्टनर्स को चेतावनी दी गई है कि वे मौजूदा व्यापार समझौतों का पालन करें, अन्यथा भारी टैक्स या प्रतिबंध झेलना पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इस जांच का असर टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और कृषि उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा। व्यवसायियों, निर्यातकों और आयातकों को अमेरिकी पॉलिसी पर लगातार नजर रखनी होगी, क्योंकि जुलाई के बाद अमेरिकी बाजार में कीमतों और टैरिफ में बड़े बदलाव संभव हैं। यह कदम व्यापार के वैश्विक परिदृश्य में भारत और अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है। यदि व्यापारिक नीतियों में सुधार नहीं हुआ, तो अमेरिकी टैरिफ की मार व्यापार घाटे और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर गहरा असर डाल सकती है।
अमेरिका ने ट्रेड डील पर ऐसे बदला रुख, अजीत डोभाल ने दिया था रूबियो को सख्त संदेश : रिपोर्ट

नई दिल्ली। भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर हाल ही में सामने आए दावों पर नई रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी सरकार ने वाशिंगटन को साफ संकेत दिया कि वह ट्रंप प्रशासन के दौरान किसी जल्दबाजी में समझौता नहीं करेगी और जरूरत पड़ी तो इंतजार भी कर सकती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो को स्पष्ट संदेश दिया: “बुली करने की नीति बंद करें।” इसके बाद अमेरिका ने अपनी स्थिति पर फिर से विचार किया और अधिक सौहार्दपूर्ण रुख अपनाया। अजीत डोभाल की रणनीतिसितंबर 2025 में हुई अहम बैठक में डोभाल और रुबियो आमने-सामने थे। इस दौरान भारत ने साफ कर दिया कि वह अमेरिकी दबाव में समझौता नहीं करेगा। उस समय अमेरिकी उत्पादों पर 50% तक की ऊंची टैरिफ दरें लागू की गई थीं। डोभाल ने रुबियो से कहा कि भारत ट्रंप या उनके सहयोगियों के दबाव में नहीं आएगा और पूरे राष्ट्रपति कार्यकाल तक डील पर जल्दबाजी नहीं करेगा।बैठक के बाद अमेरिका ने अपने रुख में नरमी दिखाई। राष्ट्रपति ट्रंप ने सितंबर में पीएम मोदी को जन्मदिन पर फोन कर बधाई दी, जिसे भारतीय रणनीति का असर माना गया। ट्रंप टीम ने मोदी पर लगाए आरोपट्रंप और उनके सहयोगियों ने मोदी पर कड़े आरोप लगाए। विशेष रूप से पीटर नवारो ने भारत को पाकिस्तान युद्ध और रूस-यूक्रेन विवाद में झूठे दावे करने का आरोप लगाया। नवारो ने मोदी की संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों पर भी सवाल उठाए। भारत ने ट्रंप के दावों को ठुकरायामई 2025 में भारत-पाक युद्ध के दौरान हुई सीजफायर को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत किया, लेकिन भारत ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हुए। ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म पर भारत-अमेरिका ट्रेड डील पूरी होने की घोषणा कर दी, लेकिन मोदी सरकार ने सार्वजनिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि डील पर फरवरी 2025 से चर्चा जारी थी और अब इसे अंतिम रूप दिया गया। ट्रंप की एकतरफा घोषणा और विपक्षी सवालट्रंप की बिना औपचारिक प्रक्रिया के घोषणा से भारत में विपक्ष और विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। डील के विवरण सार्वजनिक नहीं होने के कारण आलोचना की जा रही है। हालांकि अजीत डोभाल की रणनीति ने स्पष्ट किया कि भारत ने कोई ऐसी शर्त स्वीकार नहीं की जो देशहित के खिलाफ हो। पूरे कार्यकाल तक इंतजार का मतलबट्रंप का राष्ट्रपति कार्यकाल जनवरी 2025 से शुरू हुआ। भारत की रणनीति के मुताबिक, बिना शर्त डील के लिए इंतजार करना पड़ता तो यह समझौता 2029 तक स्थगित रह सकता था।