‘आप Gen-Z नहीं हैं', HC के तीखे सवालों के बाद सौरव-आशुतोष ने वापस ली याचिका
CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका वापस ले ली। सुनवाई में जज ने दोनों की उम्र, बॉन्ड की शर्तों और अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने पर सवाल उठाए।

Saurav Das Ashutosh Ranka Case: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाईकोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली है। दोनों नेताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाने के आदेश को चुनौती दी थी। बुधवार को जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ में सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों की उम्र, शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड और जमानत की प्रक्रिया को लेकर सवाल किए। सौरव दास की उम्र 27 साल और आशुतोष रांका की उम्र 31 साल बताए जाने पर जज ने टिप्पणी की, “ये Gen Z नहीं हैं।” अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि इस दौरान मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी गई।
सौरव-आशुतोष की उम्र पूछने पर जज ने की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं की उम्र पूछी। उनके वकील ने बताया कि सौरव दास 27 साल और आशुतोष रांका 31 साल के हैं। इस पर जज ने कहा कि वे Gen Z नहीं हैं। इसके बाद अदालत ने मिलेनियल्स और Gen Z की उम्र के वर्गीकरण को लेकर भी सवाल किया।
अदालत ने दोनों नेताओं के संगठन, उनकी गतिविधियों और प्रदर्शन के उद्देश्य को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि शांतिभंग की आशंका से जुड़े मामलों में प्रदर्शनकारियों की पहचान, उनकी मंशा और उनकी गतिविधियों को समझना महत्वपूर्ण हो सकता है।
बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन पर अदालत ने उठाए सवाल
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि दोनों नेताओं ने 11 अक्टूबर को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरा था। आरोप है कि इसके बाद उन्होंने उसकी शर्तों का उल्लंघन किया। अदालत ने बॉन्ड की शर्तें तोड़ने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में जमानत देने वाले व्यक्ति की राशि जब्त करने और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत ने यह संभावना भी जताई कि अधिकारियों ने दोबारा नोटिस देकर याचिकाकर्ताओं के प्रति कुछ नरमी बरती हो। हाईकोर्ट ने यह सवाल भी किया कि यदि कोई व्यक्ति दूसरी बार बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो क्या अधिकारियों को उससे अधिक सख्त शर्तों वाला बॉन्ड भरवाने का अधिकार नहीं है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन जब किसी मामले में शांति भंग होने की आशंका पर विचार किया जा रहा हो, तब परिस्थितियों का आकलन भी जरूरी है। कोर्ट ने प्रदर्शन के उद्देश्य और उसमें शामिल लोगों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी का लक्ष्य सत्ता में बदलाव लाना है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसके लिए चुनाव भी एक माध्यम हैं। अदालत ने वकील को यह भी आगाह किया कि बहस को ऐसे मुद्दों की ओर ले जाने से बचना चाहिए, जिनका अंतिम परिणाम याचिकाकर्ताओं के पक्ष में न हो। सुनवाई के दौरान जज ने टिप्पणी की कि अदालत को ऐसी बहस में उलझाया जा रहा है, जिसका नतीजा आखिरकार याचिकाकर्ताओं के पक्ष में नहीं भी जा सकता।
अनुच्छेद 226 के तहत याचिका क्यों दाखिल की?
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट में याचिका क्यों दायर की गई। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने बताया कि दोनों नेताओं को जमानत के लिए जमानती पेश करने को कहा गया था। इस पर अदालत ने पूछा कि जमानत के लिए पेश किए गए जमानती को खारिज करने के आदेश को चुनौती देने का विकल्प उपलब्ध होने पर सीधे अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने की जरूरत क्यों पड़ी।
अदालत ने दोनों नेताओं के वकील को याचिका वापस लेकर आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया। इसके बाद वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका वापस लेने की अनुमति देने का अर्थ मामले के गुण-दोष पर कोई निष्कर्ष निकालना नहीं है।
SEM कोर्ट में पेश किए जाएंगे दोनों नेता
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस ने दोनों नेताओं की हिरासत बढ़ाने की मांग करते हुए भी आवेदन दिया है। दिल्ली पुलिस की ओर से बताया गया कि न्यायिक हिरासत की अवधि पूरी होने के बाद दोनों को अदालत में पेश किया जाएगा और जमानत की प्रक्रिया के लिए जमानती पेश करने को कहा गया था। दोनों नेताओं को दोपहर दो बजे मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत में पेश किए जाने की जानकारी दी गई।
13 अक्टूबर को जंतर-मंतर से हुई थी गिरफ्तारी
सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े प्रतिबंधों के कथित उल्लंघन के बाद 13 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले दोनों को शांति बनाए रखने की शर्त पर बॉन्ड भरने के बाद राहत मिली थी।
14 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया था। इसके बाद 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी गई। इसी आदेश को दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
CJP ने आरोप लगाया था कि दोनों नेताओं की रिहाई में देरी हो रही है। याचिका में हिरासत बढ़ाने के आदेश को अवैध और मनमाना बताते हुए रद्द करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी थी कि आवश्यक जमानतदार पेश किए जाने के बावजूद उन्हें हिरासत में रखा गया।
नेहा बोरा की याचिका पर भी सुनवाई
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ के समक्ष एक अन्य मामले में नेहा बोरा की याचिका भी सूचीबद्ध थी। यह याचिका SEM कोर्ट के उस आदेश से संबंधित थी, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10 हजार रुपये का बॉन्ड और जमानतदार पेश करने को कहा गया था।
वहीं, सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका वापस लिए जाने के बाद अब उनके मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई संबंधित अदालत में उपलब्ध प्रक्रिया के अनुसार होगी।






