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Youth Power : चुनौतियों के बीच युवाओं ने पेश की अनुशासन, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण की नई मिसाल

Youth Power : भारत के युवा अनुशासन, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण की नई मिसाल पेश कर रहे हैं। चुनौतियों के बीच भी वे देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

By Sakshi
25 Jul 2026
Youth Power : चुनौतियों के बीच युवाओं ने पेश की अनुशासन, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण की नई मिसाल
CJP Protest

लेखक@ सुमित गर्ग। हम बचपन से यह सुनते आए हैं कि जब-जब यह देश किसी संकट के दौर से गुज़रा है, तब-तब इसके युवाओं ने आगे बढ़कर उसकी रक्षा की है। इतिहास साक्षी है कि भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा शक्ति रही है - वह शक्ति जो विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होती, बल्कि उन्हीं परिस्थितियों से सीखकर और अधिक सशक्त होकर उभरती है। जिस राष्ट्र का युवा जागरूक हो, बुद्धिमान हो और विवेकशील हो, उस राष्ट्र को आगे बढ़ने से संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती। यह केवल एक आदर्शवादी कथन नहीं, बल्कि एक ऐसा शाश्वत सत्य है जिसे हमने हाल के महीनों में एक बार फिर अपनी आँखों के सामने घटित होते देखा है।

हाल ही में जब तथाकथित "कॉकरोच आंदोलन" जैसे एक संगठित और विदेशी प्रायोजन से पोषित आंदोलन ने देश के सामने एक बड़ा भ्रम और संकट खड़ा करने का प्रयास किया, तब यह आशंका स्वाभाविक थी कि इसका सर्वाधिक प्रभाव देश की युवा पीढ़ी पर ही पड़ेगा — क्योंकि युवा ही किसी भी समाज का सबसे संवेदनशील और सबसे मुखर वर्ग होता है। परंतु परिणाम इसके ठीक विपरीत रहा। मुट्ठी भर लोगों द्वारा फैलाए गए इस भ्रम-जाल में देश के करोड़ों-करोड़ युवा न तो उलझे, न भटके। वे न तो भ्रमित हुए, न ही विचलित। वे अपने अध्ययन, अपने कर्तव्य और अपने राष्ट्र-निर्माण के संकल्प में जुटे रहे, मानो कह रहे हों कि सच्ची देशभक्ति शोर मचाने में नहीं, बल्कि मौन साधना और निरंतर परिश्रम में निहित है।

इतना ही नहीं, युवाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी सामने आया जिसने न केवल स्वयं को इस दुष्प्रचार से बचाया, बल्कि आगे बढ़कर, अपनी-अपनी क्षमता और माध्यम के अनुसार, इस तथाकथित आंदोलन की वास्तविकता को देश के सामने बेनकाब भी किया। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर, लेखों के माध्यम से, तर्कों और तथ्यों के सहारे इन युवाओं ने यह सिद्ध किया कि आज का भारतीय युवा न तो भोला है और न ही सहज बहकाया जा सकने वाला। वह प्रश्न पूछना जानता है, वह सत्य और असत्य में भेद करना जानता है, और सबसे महत्वपूर्ण — वह अपने राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भली-भांति समझता है।

इसी दौर में करोड़ों युवा अपनी पढ़ाई, अपनी परीक्षाओं और अपने भविष्य-निर्माण में तल्लीन रहे। उन्होंने न केवल स्वयं को इस भ्रामक वातावरण से दूर रखा, बल्कि अपने परिणामों को और बेहतर बनाकर पूरे राष्ट्र के सामने एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया। इसकी सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक परिणीति हमें उन विद्यार्थियों के परिणाम-उत्सव में देखने को मिली, जिनके हाथों में पोस्टर थे और जिन पर लिखा था — "करियर धरने से नहीं, पढ़ने से बनता है।" यह एक पंक्ति नहीं, यह इस पूरी पीढ़ी की मानसिकता का सार-संक्षेप है। यह पंक्ति बताती है कि आज का युवा भावनात्मक उभार में बहकर अपने भविष्य को दांव पर नहीं लगाता, बल्कि धैर्य, अनुशासन और परिश्रम को ही अपनी सफलता का सच्चा मार्ग मानता है।

वर्ष 2026 की नीट परीक्षा से जुड़ा प्रसंग भी इस संदर्भ में अत्यंत उल्लेखनीय है। जब प्रश्नपत्र लीक होने की गंभीर अनियमितताओं के चलते परीक्षा को रद्द कर पुनः आयोजित करना पड़ा, तो लाखों विद्यार्थियों के लिए यह निर्णय आघात जैसा प्रतीत हो सकता था। परंतु इसी वर्ष की नीट परीक्षा के एक टॉपर ने जो भाव व्यक्त किया, वह अत्यंत सारगर्भित है। उन्होंने कहा कि जब पहली बार परीक्षा निरस्त हुई, तो उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं ईश्वर ने उन्हें अपने अंकों को और सुधारने का एक और अवसर प्रदान किया हो। यह दृष्टिकोण किसी सामान्य विद्यार्थी का नहीं, बल्कि एक परिपक्व, सकारात्मक और आत्मविश्वास से भरी हुई सोच का परिचायक है — ऐसी सोच जो विपत्ति में भी अवसर खोजना जानती है।

और यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। बीते एक-डेढ़ महीने में ही भारत के युवाओं ने देश को ऐसी कई उपलब्धियाँ दी हैं, जो इस विश्वास को और सुदृढ़ करती हैं। इसी 18 जुलाई को हैदराबाद की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने भारत के पहले निजी क्षेत्र द्वारा विकसित रॉकेट "विक्रम-1" का सफल प्रक्षेपण कर उसके पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया — यह उपलब्धि इसलिए और भी गौरवशाली है क्योंकि इसके पीछे की पूरी तकनीकी टीम की औसत आयु मात्र अट्ठाईस वर्ष है। यही नहीं, इसी दौरान भारतीय युवा टीमों ने अंतर्राष्ट्रीय भौतिकी ओलंपियाड में पाँच स्वर्ण पदक और अंतर्राष्ट्रीय रसायन विज्ञान ओलंपियाड में चार स्वर्ण पदक जीतकर विश्व में प्रथम स्थान हासिल किया। रक्षा उत्पादन, स्वदेशी युद्धपोतों, हाइड्रोजन ट्रेन और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में हो रही प्रगति के पीछे भी यही युवा ऊर्जा काम कर रही है। यह सूची लंबी है, परंतु संदेश एक ही है — भारत का युवा केवल संकट में स्थिर नहीं रहता, वह राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भागीदार भी है।

आज जब समाज के एक वर्ग द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि युवा पीढ़ी सोशल मीडिया की नकारात्मकता में भटक चुकी है, तब यह सारा घटनाक्रम - चाहे वह भ्रामक आंदोलनों के बीच बनी रही एकाग्रता हो, या विज्ञान और अंतरिक्ष में लहराया गया परचम - उस आरोप को निर्णायक रूप से खारिज करता है। यह पीढ़ी उसी अर्जुन की भांति है जिसने चारों ओर के कोलाहल के बीच भी अपने लक्ष्य - पक्षी की आँख - से दृष्टि नहीं हटाई थी और स्वामी विवेकानंद जी ने भारत के लिए जिस चरित्रवान, आत्मविश्वासी युवा वर्ग की कल्पना की थी, यह पीढ़ी उसी की सच्ची उत्तराधिकारी प्रतीत होती है। यदि यह विवेक, यह एकाग्रता और यह परिश्रम इसी प्रकार बना रहे, तो भारत को विश्व-शक्ति बनने से न कोई आंतरिक षड्यंत्र रोक सकता है, न कोई बाह्य प्रायोजित प्रयास और समाज पूरी निश्चिंतता के साथ आगे बढ़ सकता है।

नमन है इस देश के उन करोड़ों युवाओं को, जिन्होंने भ्रम के घने बादलों के बीच भी सत्य का दामन नहीं छोड़ा, कोलाहल के बीच भी अपने विवेक को डगमगाने नहीं दिया, और उत्तेजना के बीच भी अपनी साधना को नहीं छोड़ा। इन्होंने पुस्तकों को शस्त्र बनाया, परिश्रम को अपना प्रत्युत्तर बनाया, और अपने परिणामों को अपना उद्घोष बनाया। यही वह पीढ़ी है जिसने विपत्ति को अवसर में बदलकर, कोलाहल के बीच मौन तप से यह सिद्ध कर दिया कि भारत का भविष्य न भटका है, न भ्रमित है — बल्कि पूर्ण रूप से जागृत, सजग और समर्पित है। इसीलिए आज पूरा राष्ट्र गर्व से कह सकता है — नमन मेरे देश के युवाओं, तुमने सबका सर गर्व से ऊँचा कर दिया।

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