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प्रदेश का भिंड जिला एकमात्र ऐसा जिला, जहां बीजेपी-कांग्रेस के साथ सपा-बसपा का भी वजूद

– संसदीय सीट भाजपा का गढ़, लेकिन विधानसभा चुनावों में होता है चतुर्थकोणीय मुकाबला

– भिंड जिले ने प्रदेश की राजनीति को दिए एक से बढक़र एक प्रभावी नेता

मध्यप्रदेश में 55 जिले हैं, जबकि 230 विधानसभा सीटे हैं. ज्यादातर जिले व विधानसभा सीटों पर बीजेपी-कांग्रेस के बीच ही आमने सामने की टक्कर देखने को मिलती है, लेकिन प्रदेश का भिंड जिला ही एकमात्र ऐसा जिला है, जहां विधानसभा चुनाव में चतुर्थकोणीय मुकाबला देखने को मिलता है. भिंड जिले में राजनीतिक दल बीजेपी-कांग्रेस जितने प्रभावी है, उतने ही बहुजन समाज पार्टी और समाज वादी पार्टी भी प्रभावी है. यहां होने वाले विधानसभा चुनावों में यह कहना मुश्किल होता है कि कौन जीतेगा-कौन हारेगा. 

बता दें संसदीय सीट के मामले में भिंड की 5 विधानसभा और दतिया की तीन विधानसभा मिलाकर संसदीय सीट है. संसदीय सीट में बीते लंबे अर्से से बीजेपी भारी है, लेकिन भिंड की पांच विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनावों में चतुर्थकोणीय मुकाबला देखने को मिलता है. भिंड जिले की विधानसभा सीटों से बीजेपी-कांग्रेस के साथ ही बसपा-सपा भी प्रभावी है. सबसे खास बात यह है कि भिंड जिले में जातीय समीकरण बहुत तेजी से हावी है. जातियों के आधार पर ही यहां राजनीति तय होती है. यहां अनुसूचित जाति, ठाकुर/क्षत्रिय(राजपूत/भदौरिया) ओबीसी (यादव, कुशवाह, कुर्मी, लोधी), ब्राह्मण, जैन, मुस्लिम समाज प्रभावी जातियां हैं, जो राजनीति को दिशा और दशा बदलने में सक्षम है. 

संसदीय सीट में समाहित है 8 विधानसभा

भिंड लोकसभा सीट में 8 विधानसभा सीट समाहित हैं, जिनमें 5 सीटेें भिंड की, जबकि 3 सीटें दतिया की शामिल हैं. इन आठ विधानसभाओं में 4 पर भाजपा काबिज है, जबकि 4 विधानभाओं में कांग्रेस का कब्जा है. भिंड की अटेर विधानसभा से कांग्रेस के हेमंत सत्यदेव कटारे विधायक हैं, इसी तरह भिंड से भाजपा के नरेन्द्र कुशवाह, लहार में भाजपा के अंबरीश शर्मा, मेहगांव से भाजपा के राकेश शुक्ला, गोहद से कांग्रेस के केशव देसाई एवं दतिया जिले की सेवदा विधानसभा से भाजपा के प्रदीप अग्रवाल, भांडेर से कांग्रेस के फूलसिंह बरैया और दतिया से भी कांग्रेस के राजेन्द्र भारती विधायक हैं. 

लोकसभा में 3 चुनाव ही जीत सकी कांग्रेस

भिंड लोकसभा सीट साल 1952 से अस्तित्व में आई थी. अब तक हुए 17 चुनावों में से कांग्रेस यहां 3 बार ही विजय हो सकी है, जबकि एक बार भारतीय जनसंघ, एक बार जनता पार्टी और एक निर्दलीय उम्मीदवार यशवंत सिंह कुशवाह यहां से सांसद रहे. शेष समय से यहां से बीजेपी के ही सांसद रहे. साल 1952 और 1962 में कांग्रेस के सूरज प्रसाद यहां से सांसद रहे. 1967 निर्दलीय यशवंत सिंह कुशवाह, 1971 में भारतीय जनसंघ से विजया राजे सिंधिया, 1977 में जनता पार्टी से रघुवीर सिंह मछंद, 1980 में कांग्रेस से कालीचरण शर्मा, 1984 में कांग्रेस से कृष्णपाल सिंह सांसद रहे. जबकि साल 1989 से यह सीट में भाजपा के खाते में ही जा रही है. 1989 से यहां क्रमश: नरसिंह राव दीक्षित, योगानंद सरस्वती, रामलखन सिंह, अशोक अर्गल, भागीरथ प्रसाद रहे, जबकि वर्तमान में संध्या राय यहां से सांसद हैं. 

यह है भिंड जिले के प्रभावी नेता

भिंड जिले ने अनेक प्रभावी नेता दिए हैं, इन नेताओं में पूर्व विधायक डॉ. गोविंद सिंह जो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सहित प्रदेश सरकार के मंत्री पद को संभाल चुके हैं. वह मुखर नेता है और अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं. इसी तरह कैप्टन जयपाल सिंह सिंह भिंड-दतिया लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं. सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद उन्होंने राजनीति में अपनी किस्मत आजमाई और सफल हुए. रामलखन सिंह बीजेपी के प्रमुख नेता रहे, भिंड लोकसभा सीट से सांसद भी रहे. चौधरी दिलीप सिंह चतुर्वेदी जो भिंड विधानसभा क्षेत्र में कई बार विधायक चुने गए, वह बीजेपी और कांग्रेस दोनों का दलों से प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. दलित नेता फूलसिंह बरैया भी भिंड से प्रभावी नेता माने जाते हैं. वर्तमान में विधायक हैं, दलितों के लिए आवाज उठाने वाले प्रमुख नेता माने जाते हैं. बहुजन समाज पार्टी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं, हालांकि अब कांग्रेस में है. ओपी भदौरिया मेहगांव विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं. केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोडक़र बीजेपी शामिल होने वाले प्रमुख नेता हैं. मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री पद का भी दायित्व संभाल चुके हैं. 

विधानसभा चुनाव में चतुर्थकोणीय मुकाबला

भिंड जिले में संसदीय चुनाव में भले ही बीजेपी भारी रहती हो, लेकिन विधानसभा चुनाव में यहां की सभी सीटों पर कशमकश भरा मुकाबला देखने को मिलता है. प्रदेश भर में भिंड जिला ही एक मात्र ऐसा जिला होता है जहां चतुर्थकोणीय मुकाबला देखने को मिलता है. कुल मिलाकर यहां जितने भारी बीजेपी-कांग्रेस के उम्मीदवार होते हैं, उतने ही प्रभावी बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार भी दम दिखाते हैं. यहां चुनावों के दौरान किसकी जीत होगी और किस की हार होगी, यह कहना मुश्किल होता है. 

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