Narmada Water Tunnel :17 साल का इंतजार खत्म! कटनी में लगभग तैयार देश की सबसे बड़ी सुरंग; CM मोहन यादव ने लिया जायजा
कटनी में 17 साल से बन रही नर्मदा जल सुरंग परियोजना अंतिम चरण में पहुंच गई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने निर्माण कार्य का निरीक्षण किया।
Narmada Water Tunnel : कटनी। मध्य प्रदेश की नर्मदा जल सुरंग परियोजना अब तैयार होने को है। कटनी के स्लीमनाबाद में बनाई जा रही करीब 12 किलोमीटर लंबी जल सुरंग का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। इस सुरंग के चालू होने के बाद पहली बार बरगी बांध का पानी विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के कई जिलों तक पहुंचेगा।
यह परियोजना प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई योजनाओं में शामिल है। इससे लाखों किसानों को सिंचाई की सुविधा मिलेगी और सूखे क्षेत्रों में खेती की नई संभावनाएं विकसित होंगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने परियोजना का निरीक्षण कर अधिकारियों से प्रगति की जानकारी ली और निर्माण कार्य से जुड़े श्रमिकों का सम्मान भी किया।
मुख्यमंत्री ने किया निरीक्षण
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) के अधिकारियों के साथ सुरंग निर्माण स्थल का दौरा किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने परियोजना की वर्तमान स्थिति और शेष कार्यों की समीक्षा की।
इसके बाद मुख्यमंत्री श्रमिक सम्मान कार्यक्रम में शामिल हुए और निर्माण कार्य में लगे कर्मचारियों से संवाद किया। उन्होंने स्लीमनाबाद में सांदीपनि विद्यालय का भी लोकार्पण किया।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान किसी प्रकार के विरोध की आशंका को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष मोहम्मद इसराइल सहित कई कार्यकर्ताओं को एहतियातन हिरासत में लिया।
1450 गांवों को मिलेगा लाभ
इस परियोजना के शुरू होने के बाद कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों तक बरगी बांध का पानी पहुंच सकेगा। सरकार का दावा है कि इससे लगभग 1450 गांवों की करीब 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थायी सिंचाई सुविधा मिलेगी।
शुरुआती चरण में लगभग 1.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सीधा लाभ मिलने की संभावना है। सिंचाई व्यवस्था बेहतर होने से किसानों की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। जिन क्षेत्रों में अभी केवल एक फसल होती है, वहां दो या तीन फसल लेने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही बागवानी और नकदी फसलों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
17 साल से चल रहा था काम
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी। शुरुआती अनुमान के मुकाबले निर्माण कार्य कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। सुरंग निर्माण के दौरान इंजीनियरों को संगमरमर, चूना पत्थर, मिट्टी और विशाल चट्टानों की परतों से होकर रास्ता बनाना पड़ा।
खुदाई में उपयोग होने वाले विशेष कटर कई बार क्षतिग्रस्त हुए, जिन पर ही करीब 67 करोड़ रुपये खर्च हुए। वर्ष 2013 में सुरंग के भीतर मीथेन गैस मिलने के कारण चार महीने तक काम रोकना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2016 में अमेरिका से मंगाई गई आधुनिक टनल बोरिंग मशीन खराब हो गई। बाद में जर्मनी से नई मशीन मंगाकर निर्माण कार्य को फिर से गति दी गई।
भूजल रिसाव ने बढ़ाई लागत और चुनौती
निर्माण के दौरान सुरंग के भीतर अनुमान से कहीं अधिक भूजल मिला। हर मिनट लगभग 18 से 20 हजार लीटर पानी का रिसाव होने लगा। शुरुआत में कम क्षमता वाले पंप लगाए गए, लेकिन बाद में 4000 हॉर्स पावर तक के पंपों का उपयोग करना पड़ा। केवल सुरंग से पानी निकालने की प्रक्रिया पर ही 200 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए।
लगातार आने वाली तकनीकी और प्राकृतिक चुनौतियों के कारण परियोजना की कुल लागत शुरुआती लगभग 800 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 1600 से 2000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
40 साल पुरानी योजना अब होगी पूरी
बरगी बांध के निर्माण के समय वर्ष 1980 के दशक में ही नर्मदा का पानी सोन नदी बेसिन तक पहुंचाने की योजना बनाई गई थी। उस समय विंध्य पर्वत श्रृंखला सबसे बड़ी बाधा बनी हुई थी।
पहले यहां नहर बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया, लेकिन तकनीकी कारणों से यह संभव नहीं हो सका। इसके बाद जल सुरंग बनाने का निर्णय लिया गया। अब लगभग चार दशक बाद यह योजना वास्तविक रूप लेने जा रही है और प्रदेश के जल प्रबंधन में नया अध्याय जुड़ने वाला है।
ग्रेविटी फ्लो तकनीक से होगी बिजली की बचत
करीब 12 किलोमीटर लंबी और 10.14 मीटर व्यास वाली यह सुरंग देश की सबसे लंबी ग्रेविटी फ्लो आधारित जल सुरंगों में गिनी जाएगी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नर्मदा का पानी प्राकृतिक ढलान के कारण बिना पंप के आगे बढ़ेगा।
इससे बिजली की खपत कम होगी और संचालन पर आने वाला खर्च भी काफी घट जाएगा। यह तकनीक लंबे समय तक परियोजना को आर्थिक रूप से भी लाभकारी बनाएगी।
अंतिम चरण में पहुंचा निर्माण कार्य
सुरंग का अंतिम ब्रेकथ्रू पूरा हो चुका है। अब केवल फिनिशिंग, सुरक्षा परीक्षण और जल प्रवाह शुरू करने की औपचारिक प्रक्रियाएं बाकी हैं। इन कार्यों के पूरा होने के बाद परियोजना का संचालन शुरू किया जाएगा।
इसके साथ ही नर्मदा का पानी पहली बार विंध्य और बुंदेलखंड के कई हिस्सों तक पहुंचेगा। इससे खेती, पेयजल आपूर्ति और औद्योगिक विकास को नई गति मिलने की संभावना है।
