ग्वालियर में धार्मिक स्वतंत्रता कानून के तहत पहली सजा, अमन शाह को 4 साल की जेल, धर्म बदलकर शादी का बना रहा था दबाव
ग्वालियर में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पहली सजा सुनाई गई। विशेष अदालत ने अमन शाह को युवती की पहचान और धर्म परिवर्तन से जुड़े मामले में दोषी ठहराते हुए 4 साल के सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

Gwalior News: ग्वालियर में मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के तहत एक अहम फैसले में विशेष अदालत ने अमन शाह को दोषी ठहराते हुए 4 साल के सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। अभियोजन के मुताबिक, आरोपी ने अस्पताल में काम करने के दौरान अपनी पहचान अमन वाल्मीकि बताकर युवती से दोस्ती की थी। बाद में धर्म परिवर्तन कर शादी करने का दबाव बनाने और निजी वीडियो वायरल करने की धमकी देने के आरोप सामने आए। हालांकि, अदालत ने दुष्कर्म समेत अन्य आरोपों में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
आधार कार्ड से सामने आई पहचान, अस्पताल में हुई थी मुलाकात
मामला ग्वालियर का है। न्यायालयीन रिकॉर्ड के अनुसार, युवती और आरोपी की मुलाकात वर्ष 2021 में अस्पताल में काम करने के दौरान हुई थी। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपी ने अपना नाम अमन वाल्मीकि बताया था, जिसके बाद दोनों के बीच दोस्ती हुई और नजदीकियां बढ़ीं। बाद में युवती को आरोपी की वास्तविक पहचान की जानकारी मिली। आधार कार्ड के जरिए उसकी पहचान सामने आई। इसके बाद युवती ने संबंध समाप्त करने की इच्छा जताई।
धर्म परिवर्तन कर शादी का दबाव बनाने का आरोप
अभियोजन के अनुसार, युवती द्वारा संबंध खत्म करने की बात कहने के बाद आरोपी ने उस पर धर्म परिवर्तन कर शादी करने का दबाव बनाया। आरोप यह भी था कि आरोपी ने मोबाइल फोन में मौजूद निजी तस्वीरों और वीडियो को वायरल करने की धमकी दी। मामले में युवती की शिकायत के बाद पुलिस ने प्रकरण दर्ज किया और जांच के बाद मामला अदालत में पहुंचा। अदालत ने सुनवाई के दौरान पेश किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण किया।
धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत दोषी, 4 साल का सश्रम कारावास
विशेष न्यायाधीश सिद्धि मिश्रा की अदालत ने अमन शाह को मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 की धारा 5 के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने आरोपी को 4 साल के सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। रिपोर्टों के मुताबिक, जुर्माने की राशि जमा होने पर उसमें से 25 हजार रुपये पीड़िता को प्रतिकर के रूप में देने का आदेश भी दिया गया है।
दुष्कर्म समेत अन्य आरोपों में मिला संदेह का लाभ
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन), 323 और 506 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराओं 66-डी और 67-क के तहत लगाए गए आरोपों में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत के अनुसार, अभियोजन इन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसलिए फैसले को केवल उन आरोपों और धाराओं के संदर्भ में समझना जरूरी है, जिनमें अदालत ने दोषसिद्धि की है।
अदालत की टिप्पणी: छल से धर्म परिवर्तन सामाजिक सौहार्द पर चोट
जानकारी के मुताबिक, अदालत ने टिप्पणी की कि छल या दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन कराना सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करता है। इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत दोषसिद्धि और सजा सुनाई गई है।

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