केरल हाई कोर्ट बोला- यूनिवर्सिटी में राजनीति नहीं, पढ़ाई होनी चाहिए, इस मामले पर की सख्त टिप्पणी
केरल हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालयों में विरोध-प्रदर्शन पर सख्त रुख अपनाया। श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी के 16 छात्रों की परीक्षा राहत रद्द कर दी गई।

केरल हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालयों में विरोध-प्रदर्शनों को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षण संस्थान पढ़ाई के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं। अदालत के मुताबिक, संवैधानिक लोकतंत्र में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी गतिविधियों के लिए विश्वविद्यालयों में जगह नहीं है। ऐसी गतिविधियों में शामिल छात्रों के खिलाफ निलंबन से निष्कासन तक की कार्रवाई की जा सकती है। यह मामला कालडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी के 16 निलंबित विद्यार्थियों से जुड़ा है। डिवीजन बेंच ने सिंगल जज का अंतरिम आदेश रद्द कर दिया, जिसमें छात्रों को 4 नवंबर से शुरू होने वाली सेमेस्टर परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। SFI से जुड़े विद्यार्थियों का कहना है कि परीक्षा नहीं दे पाने से उनका सेमेस्टर प्रभावित होगा।
VC के प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का आरोप
13 अगस्त को यूनिवर्सिटी की सिंडिकेट बैठक के दौरान SFI से जुड़े छात्रों ने 18 मांगों को लेकर प्रदर्शन किया था। मांगों में पानी की समस्या दूर करना, कैंपस में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाना और शिक्षकों के खाली पद भरना शामिल था। छात्रों ने नुक्कड़ नाटक किया, जिसमें प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का दृश्य दिखाया गया। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसे VC सीजा थॉमस का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार बताया। वाइस चांसलर ने आरोप लगाया कि बैठक के बाद कैंपस से बाहर निकलते समय 18 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने उन्हें रोका और धक्का दिया। उन्होंने बाल खींचने और वाहन को नुकसान पहुंचाने की बात भी कही। पुलिस ने 19 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था और चार SFI कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
16 विद्यार्थियों पर निलंबन की कार्रवाई
यूनिवर्सिटी सिंडिकेट ने 22 अगस्त को घटना की जांच के लिए कमेटी बनाने का निर्णय लिया। 1 सितंबर को 16 छात्रों को निलंबित कर दिया गया। इनमें MSW, MFA, MA, चार वर्षीय अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUGP) और PhD के विद्यार्थी थे। निलंबन के साथ उनके कैंपस में प्रवेश पर रोक लगा दी गई। छात्रों को केवल जांच कमेटी की ओर से निर्धारित तारीखों पर सुनवाई में शामिल होने की अनुमति थी।
याचिका में छात्रों ने अटेंडेंस को लेकर उठाया सवाल
छात्रों ने 12 अक्टूबर को हाई कोर्ट में निलंबन के खिलाफ याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि कैंपस से लंबे समय तक बाहर रहने के कारण उनकी पढ़ाई और नियमित कक्षाओं में उपस्थिति प्रभावित हुई। छात्रों के अनुसार, अटेंडेंस कम होने के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यूनिवर्सिटी ने ही कैंपस आने से रोका था।
यूनिवर्सिटी ने कहा, परीक्षा की पात्रता पूरी नहीं
यूनिवर्सिटी ने अदालत में बताया कि छात्र परीक्षा में शामिल होने के लिए जरूरी शर्तें पूरी नहीं करते। इनमें न्यूनतम अटेंडेंस, इंटरनल परीक्षाएं पास करना और समय पर परीक्षा रजिस्ट्रेशन शामिल हैं। यूनिवर्सिटी ने यह भी कहा कि छात्रों ने अटेंडेंस की कमी माफ कराने के लिए जरूरी आवेदन और दस्तावेज जमा नहीं किए थे। संबंधित विभाग प्रमुख या सेंटर निदेशक की सिफारिश भी आवश्यक थी।
डिवीजन बेंच ने 30 अक्टूबर का आदेश पलटा
30 अक्टूबर को हाई कोर्ट के सिंगल जज ने यूनिवर्सिटी को परीक्षा फीस स्वीकार करने और छात्रों को 4 नवंबर से शुरू होने वाली सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने का निर्देश दिया था। यह आदेश मुख्य याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर था। यूनिवर्सिटी ने इसे चुनौती दी और डिवीजन बेंच ने अंतरिम आदेश रद्द कर दिया। इसके बाद छात्रों को फिलहाल परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिली है।
अब सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद
डिवीजन बेंच के फैसले के बाद 16 छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वे सेमेस्टर परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति चाहते हैं, ताकि पढ़ाई का नुकसान न हो। छात्र अपने शैक्षणिक भविष्य और कैंपस से बाहर रखे जाने के असर को लेकर चिंतित हैं, जबकि यूनिवर्सिटी परीक्षा नियमों के पालन पर जोर दे रही है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से आगे की स्थिति सामने आएगी।



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