गरीबों की जमीन पर अवैध कब्जे से नाराज हाई कोर्ट: गुना SP को लगाई फटकार, पूछा- 133 मामलों में सिर्फ 14 FIR क्यों?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने गुना में SC-ST वर्ग के गरीब पट्टेदारों की जमीन पर अवैध कब्जे के मामलों में पुलिस कार्रवाई पर नाराजगी जताई।

MP High Court: मध्य प्रदेश में SC-ST वर्ग के गरीब पट्टेदारों की जमीनों पर अवैध कब्जे के मामलों को लेकर हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सख्त रुख अपनाया है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने गुना पुलिस और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि गरीबों को उनकी जमीन का अधिकार दिलाने में प्रशासन की कार्रवाई प्रभावी नजर नहीं आ रही है।
मामले में अदालत ने गुना की पुलिस अधीक्षक हितिका वसल से जवाब मांगा, लेकिन बार-बार पूछे जाने पर भी जवाब नहीं मिलने पर नाराजगी जताई। वहीं, ग्वालियर संभाग के सहायक श्रम आयुक्त और मामले के प्रभारी अधिकारी (OIC) आशीष कुमार तिवारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
133 मामलों में सिर्फ 14 FIR
मामला अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों की जमीनों पर अवैध कब्जे और उन्हें वापस दिलाने से जुड़ा है। इसमें SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम और मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी के प्रावधान भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान सामने आया कि 133 मामलों में जमीन वापस दिलाने के दावों के बावजूद पुलिस ने केवल 14 FIR दर्ज कीं। इनमें कुछ FIR में 96-96 आरोपियों को एक साथ शामिल किया गया। अदालत ने इस तरीके पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अलग-अलग पीड़ितों और घटनाओं से जुड़े मामलों को एक ही FIR में क्यों जोड़ा गया।
गुना SP से जवाब मांगने पर भी नहीं मिला जवाब
अदालत में मौजूद गुना SP हितिका वसल से आवेदन IA 14764/2026 के पैराग्राफ 5 और 6 में बटाई और गलत कब्जे से संबंधित बयानों की सत्यता पर जवाब मांगा गया। बार-बार पूछने के बाद भी जवाब नहीं मिलने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।
बाद में SP की ओर से कहा गया कि संबंधित आवेदन पुलिस विभाग को विश्वास में लिए बिना OIC के आग्रह पर दाखिल किया गया था। इससे पुलिस विभाग और आवेदन दाखिल करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हुए।
OIC को व्यक्तिगत हलफनामा देने का निर्देश
राज्य सरकार के वकील ने अदालत को बताया कि उन्होंने OIC को ऐसा आवेदन दाखिल नहीं करने की सलाह दी थी, क्योंकि उनके अनुसार पिछले अदालती आदेश में कोई अवैधता नहीं थी। हालांकि, OIC के आग्रह पर आवेदन दाखिल किया गया।
इस पर हाईकोर्ट ने OIC आशीष कुमार तिवारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। उन्हें स्पष्ट करना होगा कि आवेदन के पैराग्राफ 5 और 6 में दिए गए बयान किसके कहने पर और किन कारणों से शामिल किए गए।
एक FIR में 96 आरोपी शामिल करने पर सवाल
हाई कोर्ट ने कहा कि बेदखली की प्रत्येक घटना अलग अपराध हो सकती है। ऐसे में जब पीड़ित और घटनाएं अलग-अलग हैं, तो सभी मामलों को एक ही FIR में जोड़ने का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
अदालत ने राज्य सरकार के वकील को एक सप्ताह का समय देते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 242 के तहत कानूनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। सरकार को बताना होगा कि अलग-अलग समय पर और अलग-अलग पीड़ितों के खिलाफ हुए अपराधों को एक संयुक्त FIR में दर्ज करना कानून के मुताबिक उचित है या नहीं।
केस डायरी देखने से कोर्ट ने किया इनकार
गुना SP ने अदालत को बताया कि 14 FIR दर्ज की गई हैं और 60 दिनों के भीतर जांच पूरी कर चालान पेश कर दिया जाएगा। हालांकि जांच की निगरानी को लेकर किसी विवाद से बचने के लिए अदालत ने सीलबंद लिफाफे में पेश केस डायरियों को देखने से इनकार कर दिया।
FIR दर्ज करने के कानूनी प्रावधानों पर जोर
अदालत ने ललिता कुमारी और पृथ्वी राज चौहान के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर FIR दर्ज करने से जुड़े कानूनी प्रावधानों का पालन करना जरूरी है। प्रशासन को अपनी नाकामी छिपाने के लिए कानूनी दांव-पेच का सहारा नहीं लेना चाहिए।
कोर्ट ने गरीब पट्टेदारों के हितों की अनदेखी और प्रभावशाली लोगों को संरक्षण दिए जाने पर भी नाराजगी जताई। मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी। इसमें राज्य सरकार को संयुक्त FIR के कानूनी आधार पर जवाब देना होगा, जबकि OIC को आवेदन दाखिल करने के पीछे की वजहों पर व्यक्तिगत हलफनामा देना होगा।


