Saurabh Sharma Bail: 52 किलो सोना, 11 करोड़ कैश और 108 करोड़ केस… आखिर क्यों चर्चा में आया था सौरभ शर्मा मामला?
52 किलो सोना, करीब 11 करोड़ रुपये नकद और कथित 108 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले ने सौरभ शर्मा को देशभर में चर्चा का विषय बना दिया था। अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत दे दी है। जानिए पूरे मामले की टाइमलाइन, कोर्ट का फैसला और जांच से जुड़े अहम तथ्य।
भोपाल. कथित 108 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग और आय से अधिक संपत्ति वाले मामले में RTO के पूर्व कांस्टेबल सौरभ शर्मा को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से नियमित जमानत मिल गई है , ऐसा कहा गया है। जबलपुर हाई कोर्ट ने उन्हें 10 लाख रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया है. हालांकि मामला सिर्फ जमानत तक नहीं है , क्योंकि बड़े पैमाने में सोना और नकदी मिलने के दावों की वजह से ये लंबे समय से पूरे देश में सुर्खियों में बना हुआ है।
कैसे चर्चा में आया सौरभ शर्मा केस?
सौरभ शर्मा का नाम तब राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा जब जांच एजेंसियों ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए करीब 52 किलोग्राम सोना और करीब 11 करोड़ रुपये नकद के मिलने का दावा किया. इसके बाद मामला कथित तौर पर 108 करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग और आय से ज्यादा संपत्ति के आरोपों से जुड़ गया. यही बात इसे प्रदेश के सबसे चर्चित मसलों में शुमार कर देती है।
हाई कोर्ट ने किस तरह के आधारों पर जमानत दी?
जबलपुर हाई कोर्ट की जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की एकल पीठ ने सुनवाई के बाद ये नियमित जमानत मानी। अदालत का कहना रहा कि जांच की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, आरोप तय हो चुके हैं और ट्रायल का जल्दी खत्म होना भी संभव नहीं दिख रहा था. इन ही हालात को देखते हुए अदालत ने सौरभ शर्मा को राहत दे दी।
पहले तो कई बार याचिकाएं हुई थीं खारिज
इससे पहले सौरभ शर्मा ने जिला अदालत और फिर हाई कोर्ट में नियमित जमानत के लिए आवेदन किया था , लेकिन दोनों जगह पर उनकी याचिकाएं खारिज हो गईं. उन्होंने पत्नी की तबीयत को लेकर अंतरिम जमानत भी चाही थी, लेकिन अदालत ने वो मांग स्वीकार नहीं की. अब जब जांच प्रक्रिया पूरी हो गई, तब हाई कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत मंजूर कर दी।
कोर्ट ने आदेश में आखिर क्या लिखा?
हाई कोर्ट ने ये बात भी स्पष्ट की कि जमानत मिलने का मतलब ये नहीं है कि अदालत ने मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई राय बना ली है , ऐसा नहीं. अदालत के अनुसार आदेश सिर्फ कानूनी प्रक्रिया और मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पारित किया गया है। मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में चलती रहेगी और अंतिम फैसला उपलब्ध साक्ष्यों व दलीलों के आधार पर होगा।

