491 दिन तक मौत के साए में रहा यूक्रेनी सैनिक; फिर आसमान से आया ड्रोन, जानिए कैसे हुआ रेस्क्यू
यूक्रेन के घायल सैनिक को खतरनाक युद्ध क्षेत्र से निकालने के लिए भारी ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। जानिए कैसे हुआ यह अनोखा रेस्क्यू अभियान।

Ukraine Soldier Rescue: यूक्रेन में एक घायल सैनिक को बचाने के लिए ऐसा तरीका अपनाया गया, जिसने युद्ध के मैदान में रेस्क्यू की नई संभावनाएं दिखाईं। कोस्त्यांतिन व्लासेंको लंबे समय तक बेहद खतरनाक मोर्चे पर फंसे रहे। चारों ओर रूसी सेना का खतरा, जमीन पर बारूदी सुरंगें और मदद के लिए पहुंचने का मुश्किल रास्ता—इन हालात में उन्हें निकालना आसान नहीं था। आखिरकार, उन्हें सुरक्षित जगह तक पहुंचाने के लिए भारी क्षमता वाले ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
इस अभियान की खास बात यह थी कि जब जमीन के रास्ते बचाव की कोशिश कामयाब नहीं हुई, तब ड्रोन की मदद से घायल सैनिक को वहां से निकाला गया। दुनिया में पहली बार एक घायल सैनिक का ड्रोन से रेस्क्यू किया गया। कोस्त्यांतिन व्लासेंको नाम का यूक्रेनी सैनिक 491 दिनों से सीमा पर फंसा हुआ था।
रूसी ड्रोन हमले में साथी की मौत, व्लासेंको भी घायल
कोस्त्यांतिन व्लासेंको पूर्वी यूक्रेन के कुपियांस्क मोर्चे पर तैनात थे। यहां रूसी सेना के हमलों का लगातार खतरा बना रहता था। व्लासेंको अपने एक साथी के साथ कंक्रीट के नाली पाइप में बने ठिकाने पर रहकर मोर्चा संभाल रहे थे।
बताया गया है कि 14 फरवरी को रूसी ड्रोन हमले में उनके साथी की मौत हो गई, जबकि व्लासेंको भी गंभीर रूप से घायल हो गए। विस्फोट के छर्रों से उनके दोनों पैर जख्मी हुए। उन्हें तत्काल इलाज की जरूरत थी, लेकिन जिस इलाके में वे मौजूद थे, वहां तक पहुंचना बचाव दल के लिए बेहद जोखिम भरा था।
इलाज नहीं मिला तो गंवाना पड़ा एक पैर
गंभीर चोटों के कारण व्लासेंको की हालत बिगड़ती गई। उनके दाहिने पैर में गैंगरीन फैल गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, समय पर इलाज न मिल पाने के कारण उन्होंने अपना पैर खुद काटकर अलग कर दिया।
घायल होने के बावजूद उन्हें जरूरी सामान पहुंचाने की कोशिश जारी रही। यूक्रेनी सेना ड्रोन के जरिए उनके लिए खाना, पानी और दवाइयां भेजती थी। करीब हर चार से पांच दिन में सामान उनके ठिकाने के पास गिराया जाता था। व्लासेंको रेंगकर वहां तक पहुंचते और जरूरत का सामान इकट्ठा करते थे।
जमीन के रास्ते रेस्क्यू की कोशिश क्यों हुई नाकाम?
व्लासेंको को सुरक्षित निकालने के लिए यूक्रेनी सेना ने पहले जमीन पर चलने वाले रोबोट का सहारा लेने की कोशिश की। लेकिन बताया गया कि रूसी सैनिकों ने उसे पहचानकर नष्ट कर दिया। उस इलाके में पैदल सैनिकों को भेजना भी जोखिम भरा था, क्योंकि वहां बारूदी सुरंगों और दुश्मन के हमलों का खतरा था।
इसके बाद बचाव दल ने दूसरा तरीका अपनाने की योजना बनाई। 30वीं मैकेनाइज्ड ब्रिगेड और 92वीं असॉल्ट ब्रिगेड के सैनिकों ने भारी ड्रोन की मदद से व्लासेंको को निकालने की तैयारी की। इस अभियान के लिए करीब छह महीने तक योजना और तकनीकी तैयारी किए जाने की बात सामने आई है।
130 किलो तक वजन उठाने वाले ड्रोन से किया रेस्क्यू
इस अभियान में गुरज़ुफ डिफेंस के ‘हेवी शॉट अयुदाग-6’ ड्रोन का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी गई है। यह भारी सामान उठाने में सक्षम छह पंखों वाला ड्रोन है, जिसकी बताई गई अधिकतम भार क्षमता करीब 130 किलोग्राम है। रेस्क्यू के लिए ड्रोन में विशेष व्यवस्था की गई, ताकि घायल सैनिक को सुरक्षित तरीके से उठाया जा सके। योजना के मुताबिक, ड्रोन व्लासेंको तक पहुंचा और उन्हें उससे बांधकर जमीन से ऊपर उठाया गया। इसके बाद उन्हें दुश्मन के खतरे वाले इलाके से बाहर ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
इस मिशन में बैटरी की व्यवस्था भी अहम थी। भारी वजन के साथ उड़ान भरने के कारण ड्रोन की बैटरी पर ज्यादा दबाव पड़ सकता था। इसलिए रास्ते में बैटरी बदलने की तैयारी रखी गई थी। निर्धारित प्रक्रिया के बाद ड्रोन ने आगे का सफर पूरा किया और व्लासेंको को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया।
ड्रोन से उतारने के बाद रोबोटिक वाहन से अस्पताल पहुंचाया
ड्रोन से बाहर निकालना बचाव अभियान का पहला चरण था। इसके बाद व्लासेंको को जमीन पर चलने वाले ‘मिरोतवोरेत्स’ नाम के रोबोटिक वाहन पर रखा गया। इस वाहन को दूर से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे बचाव दल के सदस्यों को खुद जोखिम भरे रास्ते पर जाने की जरूरत कम पड़ती है। रोबोटिक वाहन से उन्हें सुरक्षित इलाके तक पहुंचाया गया। इसके बाद बचाव दल ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ। इस अभियान में ड्रोन और रोबोट का इस्तेमाल दिखाता है कि युद्ध के दौरान जब किसी घायल सैनिक तक पहुंचना मुश्किल हो, तो दूर से नियंत्रित तकनीक बचाव कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में क्यों बढ़ रहा है ड्रोन का इस्तेमाल?
रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन निगरानी, सामान पहुंचाने, हमले करने और सैनिकों की मदद करने जैसे कई कामों में इस्तेमाल हो रहे हैं। इनकी मदद से ऐसे इलाकों में भी गतिविधियां संभव हो पाती हैं, जहां सैनिकों या पारंपरिक वाहनों को भेजना बेहद जोखिम भरा होता है।
व्लासेंको का रेस्क्यू भी इसी बदलती सैन्य रणनीति की ओर इशारा करता है। हालांकि, इस तरह के अभियान में तकनीकी क्षमता के साथ-साथ मौसम, बैटरी, वजन और दुश्मन की गतिविधियों जैसे कई जोखिम जुड़े होते हैं। इसलिए इसे हर परिस्थिति में इस्तेमाल किए जा सकने वाले समाधान के बजाय विशेष परिस्थितियों में अपनाई गई बचाव तकनीक के रूप में देखना चाहिए।




