अधिकारियों की लापरवाही पर हाई कोर्ट सख्त, ग्वालियर CMHO पर लगाया 3 लाख का जुर्माना, ये थी वजह
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारी देवेंद्र सिंह परमार के मामले में 329 दिन की देरी से रिट अपील दाखिल करने पर ग्वालियर CMHO डॉ. एमएस सागर और OIC पर 3 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई है।

MP High Court: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया। कर्मचारी देवेंद्र सिंह परमार के मामले में कोर्ट ने ग्वालियर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. एमएस सागर और मामले के प्रभारी अधिकारी (OIC) पर 3 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई है। कर्मचारी देवेंद्र सिंह परमार के सेवा समाप्ति मामले में सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देने के लिए शासन ने 329 दिन की देरी से रिट अपील दाखिल की थी।
डिवीजन बेंच ने देरी के पीछे दिए गए कारणों को संतोषजनक नहीं माना। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अपील खारिज कराने के लिए ही देरी की गई थी। कोर्ट ने साफ किया कि 3 लाख रुपए की राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित जिम्मेदार अधिकारी को अपनी जेब से जमा करनी होगी।
इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने और एक महीने के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) पेश करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।
अधिकारी को अपनी जेब से भरने होंगे 3 लाख रुपए
हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि मामले के OIC को एक सप्ताह के भीतर 3 लाख रुपए रजिस्ट्री में जमा कराने होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जुर्माने की भरपाई सरकारी खजाने से नहीं की जा सकती।
हालांकि, शासन चाहे तो देरी के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों से समान अनुपात में राशि की वसूली कर सकता है। इस आदेश के जरिए कोर्ट ने सरकारी कामकाज में जवाबदेही तय करने का सख्त संदेश दिया है।
कोर्ट ने कहा- अपील खारिज कराने की थी मंशा
रिट अपील दाखिल करने में हुई 329 दिन की देरी को लेकर शासन की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण से हाईकोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि पूरे मामले को देखकर ऐसा लगता है कि अपील को जानबूझकर समय-सीमा के बाहर दाखिल किया गया, ताकि वह खारिज हो जाए और पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों से बचा जा सके। अदालत ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना।
देवेंद्र सिंह परमार से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला कर्मचारी देवेंद्र सिंह परमार की नियुक्ति और सेवा समाप्ति से जुड़ा है। परमार की नियुक्ति वर्ष 1989 में रोजगार कार्यालय के माध्यम से एलडीसी (लोअर डिवीजन क्लर्क) के पद पर हुई थी। उनकी नियुक्ति को नियमानुसार माना गया था और राज्य स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी ने भी उनकी सेवा को वैध ठहराया था।
इसके बावजूद विभाग ने मार्च 2016 में उन्हें नोटिस जारी किया। बाद में दिसंबर 2017 और जनवरी 2018 के दौरान उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके खिलाफ परमार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कर्मचारी के पक्ष में आया था सिंगल बेंच का फैसला
देवेंद्र सिंह परमार ने सेवा समाप्ति के फैसले को चुनौती देते हुए कानूनी लड़ाई लड़ी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
राज्य शासन इस फैसले से संतुष्ट नहीं था और उसने डिवीजन बेंच में रिट अपील दाखिल करने का निर्णय लिया। हालांकि, अपील तय समय-सीमा के भीतर दाखिल नहीं की गई। शासन ने 329 दिन की देरी के बाद अपील पेश की, लेकिन देरी माफ कराने के लिए कोई ठोस वजह नहीं बता सका।
प्रमुख सचिव को 30 दिन में देनी होगी ATR
हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। साथ ही एक महीने के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट यानी ATR अदालत में पेश करनी होगी।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को निर्धारित की गई है। इस आदेश के बाद स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही और लंबित मामलों में सरकारी पैरवी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।


