बंगाल में संवैधानिक संकट: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी पर लगाया भड़काने का आरोप; चुनाव अधिकारियों के लिए मांगी विशेष सुरक्षा

नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन SIR को लेकर निर्वाचन आयोग ECI और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रही जंग अब सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में पहुँच गई है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक बेहद तीखे हलफनामे में चुनाव आयोग ने बंगाल की स्थिति को ‘असाधारण’ करार देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आयोग का कहना है कि राज्य में चुनाव अधिकारियों को न केवल डराया-धमकाया जा रहा है, बल्कि मुख्यमंत्री के सार्वजनिक भाषणों से अधिकारियों के खिलाफ नफरत और हिंसा का माहौल बनाया जा रहा है। अधिकारियों की जान को खतरा और पुलिस की चुप्पी चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल में चुनावी मशीनरी को पंगु बनाने का प्रयास किया जा रहा है। आयोग ने हलफनामे में जिक्र किया कि मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘हरि दास’ नामक एक माइक्रो-ऑब्जर्वर का नाम सार्वजनिक रूप से लिया, जिससे उस अधिकारी की जान खतरे में पड़ गई है। हालात इतने बेकाबू हैं कि मुर्शिदाबाद के 9 माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने सामूहिक इस्तीफा देते हुए काम करने से मना कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन पर जानलेवा हमले हो रहे हैं और राज्य पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। उत्तर दिनाजपुर में तो 700 लोगों की भीड़ ने उस केंद्र पर ही धावा बोल दिया जहाँ सूची संशोधन का कार्य चल रहा था। आयोग ने स्पष्ट कहा कि पुलिस FIR दर्ज करने में भी आनाकानी कर रही है। देश का इकलौता राज्य जहाँ CEO को मिली ‘Y+’ सुरक्षा चुनाव आयोग ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि बंगाल की जमीनी हकीकत देश के अन्य राज्यों से पूरी तरह अलग और डरावनी है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को ‘Y+ श्रेणी’ की सुरक्षा प्रदान करनी पड़ी है। पूरे भारत में बंगाल इकलौता ऐसा राज्य बन गया है जहाँ एक चुनाव अधिकारी को अपनी सुरक्षा के लिए कमांडो के घेरे में रहना पड़ रहा है। आयोग ने दलील दी कि जहाँ अन्य राज्यों में SIR प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है, वहीं बंगाल में राजनीतिक हस्तक्षेप ने संकट खड़ा कर दिया है। ममता बनर्जी का पक्ष:लोकतंत्र को खतरा दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका की पैरवी करते हुए चुनाव आयोग की नीयत पर हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर केवल बंगाल में ही ‘माइक्रो-ऑब्जर्वर्स’ की नियुक्ति क्यों की जा रही है? मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि करीब 58 लाख वैध मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने मांग की कि 2026 का विधानसभा चुनाव पुरानी सूची के आधार पर ही हो और वर्तमान संशोधन प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फिलहाल चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह नामों की त्रुटियों को सुधारते समय संवेदनशीलता बरते ताकि किसी भी असली नागरिक का मताधिकार न छीने। अब सोमवार को होने वाली अगली सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं कि क्या बंगाल में चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो पाएगी या हिंसा का यह साया गहराता जाएगा।
50 साल बाद पहली बार रूस-अमेरिका के बीच कोई परमाणु सीमा नहीं, न्यू स्टार्ट संधि समाप्त, वैश्विक सुरक्षा पर चिंता

नई दिल्ली। रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों पर लगी अंतिम बड़ी कानूनी पाबंदी अब समाप्त हो गई है। 5 फरवरी 2026 को न्यू स्टार्ट संधि की अवधि पूरी हो गई, जिससे लगभग 50 साल बाद दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों-जैसे अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च मिसाइलें और बॉम्बर-पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं रही। विशेषज्ञ इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं। न्यू स्टार्ट संधि क्या थी?न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटीNew START2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के बीच हस्ताक्षरित एक ऐतिहासिक समझौता था। यह संधि उन रणनीतिक हथियारों की तैनाती को सीमित करती थी जो देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते थे। इसे 2011 में लागू किया गया और मूलतः 10 साल के लिए थी। 2021 में इसे राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 5 साल बढ़ाकर 2026 तक कर दिया। संधि का इतिहासपरमाणु हथियारों पर नियंत्रण की पहल शीत युद्ध के समय से चली आ रही है। 1970 के दशक में SALT समझौते ने संख्या पर सीमा लगाई, लेकिन कटौती नहीं की। 1991: START I – हजारों हथियारों में कटौती 1993: START II – और कटौती, पर पूरी तरह लागू नहीं 2002: SORT – 1,700-2,200 वारहेड्स पर सहमति, जांच-पड़ताल सीमित 2010: न्यू स्टार्ट – रणनीतिक हथियारों पर बाध्यकारी सीमा 2021 के बाद स्थिति2023 में रूस ने निरीक्षण बंद कर दिया, लेकिन सीमा पालन का दावा जारी रखा। इसका कारण यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की भूमिका बताया गया। अब संधि पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और दोनों देश स्वतंत्र हैं। रूस का बयानरूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अब न्यू स्टार्ट संधि के तहत कोई दायित्व या पारस्परिक घोषणा दोनों देशों पर लागू नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए “गंभीर क्षण” करार दिया।संभावित असरसंधि समाप्त होने के बाद रूस और अमेरिका दोनों अपनी मिसाइलों और रणनीतिक वारहेड्स की संख्या बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी और लॉजिस्टिक कारणों से यह तुरंत संभव नहीं है, लेकिन लंबी अवधि में हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है।वैश्विक संतुलनरूस और अमेरिका के पास दुनिया के 90% से अधिक परमाणु हथियार हैं। जनवरी 2025 तक रूस के पास 4,309 और अमेरिका के पास 3,700 वारहेड्स थे। अन्य देशों जैसे चीन600), फ्रांस290और ब्रिटेन225के पास अपेक्षाकृत कम हथियार हैं। विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय चेतावनीसुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि न्यू स्टार्ट के खत्म होने से वैश्विक परमाणु होड़ तेज हो सकती है। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के मैट कोर्डा के अनुसार, दोनों देश अपनी तैनात क्षमताओं को लगभग दोगुना कर सकते हैं। संधि समाप्त होने से पहले पोप लियो और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने दोनों देशों से अपील की कि वे परमाणु सीमाओं को बनाए रखें और नई, सत्यापनीय संधि पर तुरंत बातचीत शुरू करें। गुतारेस ने चेतावनी दी कि दशकों में पहली बार दुनिया सबसे बड़े परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बिना किसी बाध्यकारी सीमा के दौर में प्रवेश कर रही है, जिससे हथियारों के इस्तेमाल का जोखिम सबसे अधिक बढ़ गया है।
अमेरिका की नई योजना: 50 देशों के साथ चीन के खनिज प्रभुत्व को देगा चुनौती, भारत की भूमिका अहम

नई दिल्ली। रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों पर लगी अंतिम बड़ी कानूनी पाबंदी अब समाप्त हो गई है। 5 फरवरी 2026 को न्यू स्टार्ट संधि की अवधि पूरी हो गई, जिससे लगभग 50 साल बाद दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों-जैसे अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च मिसाइलें और बॉम्बर-पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं रही। विशेषज्ञ इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं। न्यू स्टार्ट संधि क्या थी?न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटीNew START2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के बीच हस्ताक्षरित एक ऐतिहासिक समझौता था। यह संधि उन रणनीतिक हथियारों की तैनाती को सीमित करती थी जो देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते थे। इसे 2011 में लागू किया गया और मूलतः 10 साल के लिए थी। 2021 में इसे राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 5 साल बढ़ाकर 2026 तक कर दिया। संधि का इतिहासपरमाणु हथियारों पर नियंत्रण की पहल शीत युद्ध के समय से चली आ रही है। 1970 के दशक में SALT समझौते ने संख्या पर सीमा लगाई, लेकिन कटौती नहीं की। 1991: START I – हजारों हथियारों में कटौती 1993: START II – और कटौती, पर पूरी तरह लागू नहीं 2002: SORT – 1,700-2,200 वारहेड्स पर सहमति, जांच-पड़ताल सीमित 2010: न्यू स्टार्ट – रणनीतिक हथियारों पर बाध्यकारी सीमा 2021 के बाद स्थिति2023 में रूस ने निरीक्षण बंद कर दिया, लेकिन सीमा पालन का दावा जारी रखा। इसका कारण यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की भूमिका बताया गया। अब संधि पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और दोनों देश स्वतंत्र हैं। रूस का बयानरूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अब न्यू स्टार्ट संधि के तहत कोई दायित्व या पारस्परिक घोषणा दोनों देशों पर लागू नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए “गंभीर क्षण” करार दिया। संभावित असरसंधि समाप्त होने के बाद रूस और अमेरिका दोनों अपनी मिसाइलों और रणनीतिक वारहेड्स की संख्या बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी और लॉजिस्टिक कारणों से यह तुरंत संभव नहीं है, लेकिन लंबी अवधि में हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है। वैश्विक संतुलनरूस और अमेरिका के पास दुनिया के 90% से अधिक परमाणु हथियार हैं। जनवरी 2025 तक रूस के पास 4,309 और अमेरिका के पास 3,700 वारहेड्स थे। अन्य देशों जैसे चीन600), फ्रांस290और ब्रिटेन225के पास अपेक्षाकृत कम हथियार हैं। विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय चेतावनीसुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि न्यू स्टार्ट के खत्म होने से वैश्विक परमाणु होड़ तेज हो सकती है। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के मैट कोर्डा के अनुसार, दोनों देश अपनी तैनात क्षमताओं को लगभग दोगुना कर सकते हैं। संधि समाप्त होने से पहले पोप लियो और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने दोनों देशों से अपील की कि वे परमाणु सीमाओं को बनाए रखें और नई, सत्यापनीय संधि पर तुरंत बातचीत शुरू करें। गुतारेस ने चेतावनी दी कि दशकों में पहली बार दुनिया सबसे बड़े परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बिना किसी बाध्यकारी सीमा के दौर में प्रवेश कर रही है, जिससे हथियारों के इस्तेमाल का जोखिम सबसे अधिक बढ़ गया है।
MP में 30 से ज्यादा जिलों में कोहरे की चादर, ग्वालियर-चंबल क्षेत्र सबसे प्रभावित..

भोपाल। मध्य प्रदेश का आधा से अधिक हिस्सा कोहरे की चपेट में है। गुरुवार सुबह भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन और 30 से अधिक जिलों में मध्यम से घना कोहरा छाया हुआ है। मौसम विभाग ने इस दौरान गाड़ी चलाते समय विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है। बुधवार को दिन में ठंडी हवाओं के चलते अधिकतर शहरों का अधिकतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहा। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कोहरे के कारण विजिबिलिटी 50 मीटर से भी कम हो सकती है, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है। मौसम विभाग ने कहा है कि सुबह के समय अनिवार्य होने पर ही सफर करें और गाड़ी चलाते समय फॉग लाइट का इस्तेमाल करते हुए धीमी गति अपनाएं। शुक्रवार को भी कोहरे का अलर्ट जारी है। किस जिलों में कोहरा छायामौसम विभाग के अनुसार गुरुवार सुबह भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, श्योपुर, मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, विदिशा, रायसेन, सागर, राजगढ़, शाजापुर, आगर-मालवा, रतलाम, नीमच, मंदसौर, निवाड़ी, टीकमगढ़, छतरपुर, दमोह, पन्ना, सतना, रीवा, मऊगंज, सीधी, सिंगरौली, मैहर, कटनी, उमरिया, शहडोल और अनूपपुर जिलों में कोहरे का प्रभाव है। अगले दो दिन का मौसम 6 फरवरी: ग्वालियर, भिंड, दतिया, मुरैना, श्योपुर, शिवपुरी, निवाड़ी, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, मऊगंज, सीधी, सिंगरौली, मैहर, उमरिया, शहडोल और अनूपपुर में घना कोहरा रहेगा। भोपाल, गुना, अशोकनगर, इंदौर, सागर, दमोह, जबलपुर, कटनी, विदिशा, सीहोर, रायसेन सहित कई जिलों में हल्के से मध्यम कोहरे का असर रहेगा। 7 फरवरी: अधिकांश जिलों में हल्के से मध्यम कोहरे का अनुमान है। इस दिन बारिश की संभावना नहीं है। इस मौसम के पीछे की वजहउत्तर भारत में सक्रिय वेस्टर्न डिस्टरबेंस और साइक्लोनिक सर्कुलेशन सिस्टम के कारण प्रदेश के कई जिलों में बादल छाए रहे। पहाड़ी क्षेत्रों में हुई बर्फबारी से ठंडी हवाएं मैदानी इलाकों में पहुंच रही हैं। पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में 8 फरवरी से नया वेस्टर्न डिस्टरबेंस एक्टिव होने वाला है, जिसका असर प्रदेश में नजर आएगा। 10 फरवरी से मावठे गिरने की संभावना है।
अमेरिका ने ट्रेड डील पर ऐसे बदला रुख, अजीत डोभाल ने दिया था रूबियो को सख्त संदेश : रिपोर्ट

नई दिल्ली। भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर हाल ही में सामने आए दावों पर नई रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी सरकार ने वाशिंगटन को साफ संकेत दिया कि वह ट्रंप प्रशासन के दौरान किसी जल्दबाजी में समझौता नहीं करेगी और जरूरत पड़ी तो इंतजार भी कर सकती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो को स्पष्ट संदेश दिया: “बुली करने की नीति बंद करें।” इसके बाद अमेरिका ने अपनी स्थिति पर फिर से विचार किया और अधिक सौहार्दपूर्ण रुख अपनाया। अजीत डोभाल की रणनीतिसितंबर 2025 में हुई अहम बैठक में डोभाल और रुबियो आमने-सामने थे। इस दौरान भारत ने साफ कर दिया कि वह अमेरिकी दबाव में समझौता नहीं करेगा। उस समय अमेरिकी उत्पादों पर 50% तक की ऊंची टैरिफ दरें लागू की गई थीं। डोभाल ने रुबियो से कहा कि भारत ट्रंप या उनके सहयोगियों के दबाव में नहीं आएगा और पूरे राष्ट्रपति कार्यकाल तक डील पर जल्दबाजी नहीं करेगा।बैठक के बाद अमेरिका ने अपने रुख में नरमी दिखाई। राष्ट्रपति ट्रंप ने सितंबर में पीएम मोदी को जन्मदिन पर फोन कर बधाई दी, जिसे भारतीय रणनीति का असर माना गया। ट्रंप टीम ने मोदी पर लगाए आरोपट्रंप और उनके सहयोगियों ने मोदी पर कड़े आरोप लगाए। विशेष रूप से पीटर नवारो ने भारत को पाकिस्तान युद्ध और रूस-यूक्रेन विवाद में झूठे दावे करने का आरोप लगाया। नवारो ने मोदी की संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों पर भी सवाल उठाए। भारत ने ट्रंप के दावों को ठुकरायामई 2025 में भारत-पाक युद्ध के दौरान हुई सीजफायर को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत किया, लेकिन भारत ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हुए। ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म पर भारत-अमेरिका ट्रेड डील पूरी होने की घोषणा कर दी, लेकिन मोदी सरकार ने सार्वजनिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि डील पर फरवरी 2025 से चर्चा जारी थी और अब इसे अंतिम रूप दिया गया। ट्रंप की एकतरफा घोषणा और विपक्षी सवालट्रंप की बिना औपचारिक प्रक्रिया के घोषणा से भारत में विपक्ष और विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। डील के विवरण सार्वजनिक नहीं होने के कारण आलोचना की जा रही है। हालांकि अजीत डोभाल की रणनीति ने स्पष्ट किया कि भारत ने कोई ऐसी शर्त स्वीकार नहीं की जो देशहित के खिलाफ हो। पूरे कार्यकाल तक इंतजार का मतलबट्रंप का राष्ट्रपति कार्यकाल जनवरी 2025 से शुरू हुआ। भारत की रणनीति के मुताबिक, बिना शर्त डील के लिए इंतजार करना पड़ता तो यह समझौता 2029 तक स्थगित रह सकता था।
बांग्लादेश चुनाव: जमात-ए-इस्लामी का घोषणापत्र जारी, पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने का वादा

नई दिल्ली। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले इस्लामिक कंजर्वेटिव पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया है। पार्टी ने इसमें भारत और अन्य पड़ोसी देशों के साथ सहयोगात्मक और रचनात्मक संबंध बनाने का वादा किया है। घोषणापत्र के मुताबिक ये संबंध आपसी सम्मान और निष्पक्षता पर आधारित होंगे। पार्टी ने भारत, भूटान, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और थाइलैंड के साथ शांतिपूर्ण और मित्रतापूर्ण रिश्तों को प्राथमिकता देने का भरोसा दिया है। इसके जरिए क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने और देश के पासपोर्ट की वैश्विक स्वीकार्यता मजबूत करने का भी वादा किया है। इसका उद्देश्य बांग्लादेशी नागरिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाना और देश की छवि को सुदृढ़ करना है। मुस्लिम दुनिया और अन्य क्षेत्रीय संबंधघोषणापत्र में मुस्लिम देशों के साथ मजबूत सहयोग और पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों के साथ कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सक्रियताजमात-ए-इस्लामी ने शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार और आर्थिक विकास जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में बांग्लादेश की सक्रिय भूमिका जारी रखने का संकल्प दोहराया। रोहिंग्या संकट और शांति मिशनपार्टी ने रोहिंग्या शरणार्थियों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित करने और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भागीदारी जारी रखने का भी वादा किया है।इस चुनाव में सत्तारूढ़ आवामी लीग को भाग लेने से रोका गया है। ऐसे में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी प्रमुख प्रतियोगी हैं। जुलाई 2024 में हुए ‘जुलाई जनआंदोलन’ के बाद से देश के राजनीतिक परिदृश्य में बड़े बदलाव आए हैं। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने भी चुनाव की विश्वसनीयता और संभावित तनाव को लेकर चिंता जताई है। कुल मिलाकर 12 फरवरी का चुनाव बांग्लादेश के भविष्य और विदेश नीति की दिशा तय करेगा, और जमात-ए-इस्लामी का घोषणापत्र इस महत्वपूर्ण समय में जारी हुआ है।
शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर को वॉशिंगटन पोस्ट ने निकाला, सोशल मीडिया पर जताई भावुक प्रतिक्रिया

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर को अमेरिका के अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट से नौकरी से निकाला गया है। ईशान ने स्वयं इस खबर की पुष्टि की और सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए अपनी निराशा व्यक्त की। सूत्रों के अनुसार, ईशान उन पत्रकारों में शामिल हैं जिन्हें अखबार ने हाल ही में बड़े पैमाने पर छंटनी के तहत हटाया। इस कदम का असर वॉशिंगटन पोस्ट की अंतरराष्ट्रीय कवरेज और स्पोर्ट्स डेस्क पर भी पड़ा है। ईशान का भावुक संदेशईशान ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि यह दिन उनके लिए बेहद कठिन और विनाशकारी था। उन्होंने बताया कि ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय कर्मचारी भी छंटनी की चपेट में आए हैं। ईशान ने न्यूज रूम की खाली तस्वीर साझा करते हुए कहा कि इस स्थिति ने उन्हें और उनके सहयोगियों को गहरा दुख पहुंचाया। उन्होंने विशेष रूप से उन पत्रकारों का जिक्र किया, जो वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय कवरेज में योगदान देते रहे और जिनके साथ काम करना उनके लिए सम्मान की बात रहा। बड़ी छंटनी का असररिपोर्ट के अनुसार, वॉशिंगटन पोस्ट की हालिया छंटनी से संगठन का लगभग एक तिहाई कर्मचारी वर्ग प्रभावित हुआ है। मिडिल ईस्ट, यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई वरिष्ठ संवाददाता और संपादक भी इसमें शामिल रहे। वॉशिंगटन पोस्ट गिल्ड ने इस कदम की आलोचना करते हुए मालिक जेफ बेजोस से अपील की कि वे अखबार के पत्रकारिता मिशन में निवेश जारी रखें और कर्मचारियों के भविष्य के प्रति जवाबदेही दिखाएं। 300 से अधिक कर्मचारी प्रभावितअखबार ने बुधवार को लगभग 300 कर्मचारियों को नौकरी से हटाया। इसके तहत स्पोर्ट्स सेक्शन बंद कर दिया गया, कई अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो को बंद किया गया और किताबों की कवरेज भी समाप्त कर दी गई। मीडिया विशेषज्ञ इसे अमेरिकी मीडिया क्षेत्र की अब तक की सबसे बड़ी छंटनी में से एक मान रहे हैं। इस कार्रवाई से नई दिल्ली और मिडिल ईस्ट के कई प्रमुख संवाददाता और संपादक भी प्रभावित हुए हैं। छंटनी की वजहवॉशिंगटन पोस्ट ने इसे अपने बड़े रीस्ट्रक्चरिंग प्लान का हिस्सा बताया है। एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने कहा कि यह कठिन लेकिन जरूरी कदम था। उन्होंने बताया कि संगठन को बदलती टेक्नोलॉजी और पाठकों की बदलती प्राथमिकताओं के अनुसार ढालना आवश्यक था। हालांकि, इस फैसले की कई आलोचनाएँ भी सामने आई हैं।
BJP सांसद का दावा- PM मोदी पर हमला करना चाहती थीं महिला सांसद…. संसद में घेर ली उनकी कुर्सी

नई दिल्ली। बुधवार को लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का भाषण स्थगित कर दिया गया, जिसके बाद भाजपा ने विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। भाजपा सांसद मनोज तिवारी (BJP MP Manoj Tiwari) ने दावा किया कि विपक्ष की महिला सांसदों (Women MPs.) ने पीएम मोदी की कुर्सी को घेर लिया और वे “हमला करने की नीयत” से आई थीं, जिससे पीएम मोदी भाषण नहीं दे सके। तिवारी ने कहा कि यह एक सुनियोजित प्रयास था, ताकि प्रधानमंत्री के भाषण को रोका जा सके। मनोज तिवारी ने कहा, “आज सदन में जो हुआ, वह देखकर देश कांग्रेस को धिक्कारेगा। पीएम मोदी का भाषण था और जब पांच बजे का समय आया, तो महिला सांसदों को आगे बढ़ाकर पीएम मोदी की कुर्सी तक घेर लिया गया। इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने कुर्सी के चारों ओर घेरा डाला। क्या इसका उद्देश्य पीएम मोदी पर हमला करना था? वे गुस्से में आकर हमला करने के लिए आई थीं। हम सब सदन में बैठकर आश्चर्यचकित थे कि यह क्या हो रहा है, यह सब प्री-प्लान था।” सदन में हंगामा और विवादइस घटना के बाद, सदन में हंगामा बढ़ गया। बजट सत्र की शुरुआत से ही कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखी नोकझोंक चल रही है। राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के उद्धरण का हवाला देने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे सदन में विवाद बढ़ा और कार्यवाही कई बार स्थगित हो गई। इसके बाद, बुधवार को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने गांधी-नेहरू परिवार पर टिप्पणी की, जिससे और भी हंगामा मच गया। कांग्रेस की महिला सांसदों, जिनमें वर्षा गायकवाड़ भी शामिल थीं, ने निशिकांत दुबे से जवाब मांगने के लिए पोस्टर दिखाते हुए विरोध किया और उन पर तीखा हमला किया। भाजपा का आरोप है कि इस दौरान महिला सांसदों ने पीएम मोदी की कुर्सी घेर ली, जिससे पीएम मोदी अपने भाषण के लिए सदन में नहीं आ सके। राहुल गांधी का पीएम मोदी पर हमलावहीं, इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज संसद में इसलिए नहीं आए क्योंकि वह “डरे हुए” थे और “सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते थे”। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, “जैसा मैंने कहा था, पीएम मोदी संसद में नहीं आएंगे क्योंकि वे डरते हैं और सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि पीएम मोदी सदन में आते, तो वह पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे की किताब उन्हें भेंट करते। सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित होने के बाद राहुल गांधी ने यह बयान दिया, जबकि भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी जारी रही।
ट्रेड डील पर नया खुलासा…. डोभाल ने US से दो टूक कहा था- ट्रंप के दबाव में नहीं आएगा भारत

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका (India and America) के बीच रिश्तों में फिर से सुधार की प्रक्रिया शुरू हो गई है। दो दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर सहमति और भारत द्वारा टैरिफ में कमी करने की जानकारी दी। अब यह खुलासा हुआ है कि सितंबर में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Advisor of India-NSA) अजीत डोभाल (Ajit Doval) ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो को स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहा था कि भारत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और उनके अधिकारियों के दबाव में नहीं आएगा। भारत और चीन के बीच एससीओ बैठक में पीएम मोदी की मुलाकात के बाद अजीत डोभाल ने अमेरिका यात्रा की थी। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, डोभाल ने इस बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री को एक अहम संदेश दिया – भारत अमेरिका के साथ रिश्तों में तनाव को पीछे छोड़ते हुए फिर से व्यापारिक बातचीत शुरू करना चाहता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अमेरिकी दबाव के सामने नहीं झुकेगा और ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक इंतजार करने को तैयार है, जैसा कि भारत ने पहले भी अमेरिकी विरोधी सरकारों का सामना किया था। डोभाल ने बैठक में यह भी कहा कि भारत चाहता है कि ट्रंप और उनके सलाहकार भारत की सार्वजनिक आलोचना कम करें, ताकि दोनों देशों के रिश्ते और भी मजबूत हो सकें। तनाव घटने के संकेत इस बैठक के तुरंत बाद दोनों देशों के बीच तनाव में कमी के संकेत मिलना शुरू हो गए। 16 सितंबर को, ट्रंप ने मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया और उनकी सराहना की। इसके बाद, दोनों नेताओं ने फोन पर चार बार बातचीत की और व्यापारिक सौदे को लेकर सहमति बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। ट्रंप ने घोषणा की कि दोनों देशों के बीच एक व्यापार समझौता हुआ है, जिसके तहत भारत के सामानों पर टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया जाएगा, जो एशिया के अधिकांश देशों से कम है। इसके अलावा, रूसी तेल खरीदने पर लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ को भी हटा दिया गया है। बदले में, भारत ने 500 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने, वेनेजुएला का तेल न खरीदने और अमेरिकी आयात पर टैरिफ को शून्य करने पर सहमति जताई है।
रूस का ट्रंप को जवाब…. भारत को तेल खरीदने की पूरी स्वतंत्रता, कोई नई बात नहीं

मास्को। भारत और अमेरिका (India and America) के बीच नए व्यापार समझौते (New trade Agreements.) के बाद एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा या नहीं? हालांकि, इस मुद्दे पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन रूस (Russia) ने अब इस पर स्पष्ट जवाब दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने हाल ही में दावा किया था कि भारत अब रूसी तेल की खरीद रोक देगा, लेकिन रूस ने इस पर प्रतिकार करते हुए कहा है कि भारत पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह किस देश से तेल खरीदे। रूस के राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि भारत कोई एकमात्र देश नहीं है जो रूस से तेल खरीदता है। भारत हमेशा से विभिन्न देशों से तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करता रहा है, और इसमें कोई नई बात नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रूस और अन्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञ जानते हैं कि भारत रूस का एकमात्र तेल आपूर्तिकर्ता नहीं है। यह बयान ट्रंप के उस दावे पर आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी ने रूस से तेल खरीद बंद करने और अमेरिका से तेल खरीदने पर सहमति जताई है। पेस्कोव ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि रूस को इस मामले में नई दिल्ली से कोई जानकारी नहीं मिली है, और रूस अपने भारत के साथ संबंधों को बहुत महत्व देता है। ट्रंप का दावा और भारत का रुखअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते में भारत के लिए टैरिफ में कमी शामिल है, और इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि भारत अब रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। हालांकि, इस पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है, और न ही प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट में रूस से तेल खरीदने पर कोई उल्लेख किया गया है। रूसी तेल आयात को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के बयान में कोई प्रतिबद्धता या समझौता नहीं था, जबकि ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत के बाद यह तय हुआ कि भारत अमेरिकी तेल का आयात बढ़ाएगा और रूस से तेल खरीदने की मात्रा घटाएगा। भारत और रूस के ऊर्जा संबंधरूस के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत रूस से प्रतिदिन 15 लाख से 20 लाख बैरल तेल आयात करता है, जो अमेरिका से प्राप्त शेल तेल के मुकाबले कहीं ज्यादा है। शेल तेल हल्के ग्रेड का होता है, जबकि रूस का यूराल तेल भारी और सल्फर युक्त होता है। इस वजह से भारत को अमेरिकी कच्चे तेल को अन्य ग्रेड के तेल के साथ मिलाना होगा, जिससे अतिरिक्त लागत आएगी। इसलिए, रूस का कहना है कि ट्रंप का दावा एक तरह से दिखावा हो सकता है, क्योंकि अमेरिकी तेल रूस के तेल का सीधे विकल्प नहीं बन सकता। यह स्थिति दिखाती है कि भारत और रूस के बीच तेल संबंधों में कोई तत्काल बदलाव होने की संभावना नहीं है, और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति पर निर्भर रहेगा।