₹997 में 150 दिन की वैलिडिटी के साथ बीएसएनएल का दमदार ऑफर, लंबी अवधि और हाई डेटा बेनिफिट्स से बढ़ी प्रतिस्पर्धा

नई दिल्ली । सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल अपने ग्राहकों के लिए एक लंबी वैधता और किफायती दर वाले प्रीपेड प्लान को लेकर चर्चा में है। कंपनी का ₹997 वाला यह प्लान खास तौर पर उन उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है जो बार-बार रिचार्ज कराने की परेशानी से बचते हुए लंबे समय तक निर्बाध सेवा चाहते हैं। इस योजना में 150 दिनों की वैधता के साथ प्रतिदिन 2GB हाई-स्पीड डेटा और अनलिमिटेड कॉलिंग की सुविधा शामिल है। इसके अलावा यूजर्स को प्रतिदिन 100 SMS भेजने का लाभ भी मिलता है, जिससे यह पैक समग्र रूप से एक कॉम्प्रिहेंसिव ऑफर बन जाता है। बीएसएनएल ने इस प्लान को अपने डिजिटल विस्तार और प्रतिस्पर्धी बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति के तहत पेश किया है। देश के टेलीकॉम सेक्टर में लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनी ऐसे प्लान्स पर फोकस कर रही है जो लंबी अवधि की वैल्यू और स्थिर सेवाएं प्रदान करें। ₹997 का यह पैक उन उपभोक्ताओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी माना जा रहा है जो मध्यम से अधिक डेटा उपयोग करते हैं और लगातार रिचार्ज की झंझट से बचना चाहते हैं। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी वैधता अवधि है, जो लगभग पांच महीने तक सेवाएं उपलब्ध कराती है। रोजाना 2GB डेटा के साथ कुल डेटा उपयोग का लाभ इसे स्टूडेंट्स, वर्क फ्रॉम होम यूजर्स और सामान्य मोबाइल इंटरनेट उपभोक्ताओं के लिए आकर्षक बनाता है। अनलिमिटेड कॉलिंग की सुविधा इसे और अधिक उपयोगी बनाती है, खासकर उन लोगों के लिए जो नियमित रूप से वॉइस कॉल पर निर्भर रहते हैं। कंपनी की ओर से इस प्लान के साथ अतिरिक्त बोनस डेटा भी दिया जा रहा है, जिससे यूजर्स को थोड़ा अतिरिक्त लाभ मिलता है। हालांकि अलग-अलग टेलीकॉम सर्कल में इसकी उपलब्धता और शर्तों में अंतर हो सकता है, इसलिए उपभोक्ताओं को अपने क्षेत्र में योजना की पुष्टि करने की सलाह दी जा रही है। बीएसएनएल का यह कदम ऐसे समय में आया है जब देश में निजी टेलीकॉम कंपनियां भी आक्रामक डेटा और वैलिडिटी प्लान्स पेश कर रही हैं। ऐसे में सरकारी कंपनी का यह ऑफर बाजार में संतुलन बनाए रखने और किफायती विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार लंबी वैधता वाले प्लान उन उपभोक्ताओं के लिए अधिक उपयोगी होते हैं जो स्थिर और बजट-फ्रेंडली कनेक्टिविटी चाहते हैं। बीएसएनएल का यह नया पैक इसी जरूरत को पूरा करने का प्रयास करता है और कंपनी की रणनीति को भी दर्शाता है कि वह ग्राहकों को लंबे समय तक बनाए रखने पर ध्यान दे रही है।
स्मार्ट टीवी हो गए हाईटेक लेकिन रिमोट अब भी पुरानी तकनीक पर आखिर ब्लूटूथ क्यों नहीं अपनाया गया
नई दिल्ली। आज लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में ब्लूटूथ तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। स्मार्टफोन स्मार्टवॉच वायरलेस ईयरबड्स और स्मार्ट टीवी तक ब्लूटूथ से लैस हैं। ऐसे में एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि जब टीवी खुद ब्लूटूथ सपोर्ट करता है तो उसका रिमोट अब भी इंफ्रारेड तकनीक पर क्यों चलता है। इसके पीछे कई तकनीकी और व्यावहारिक कारण हैं जो दशकों बाद भी इस तकनीक को प्रासंगिक बनाए हुए हैं। इंफ्रारेड यानी आईआर तकनीक का इस्तेमाल 1970 और 1980 के दशक से टीवी रिमोट में किया जा रहा है। यह तकनीक बेहद सरल तरीके से काम करती है। रिमोट के अंदर मौजूद माइक्रोप्रोसेसर किसी बटन को दबाने पर एक डिजिटल कोड तैयार करता है। इसके बाद इंफ्रारेड एलईडी उस कोड को प्रकाश की तेज पल्स के रूप में टीवी की ओर भेजती है। टीवी में लगा सेंसर इस सिग्नल को पढ़कर उसे संबंधित कमांड में बदल देता है और उसी के अनुसार चैनल बदलना आवाज कम या ज्यादा करना तथा अन्य कार्य पूरे करता है। हालांकि ब्लूटूथ तकनीक अधिक आधुनिक मानी जाती है लेकिन टीवी रिमोट के लिए इंफ्रारेड आज भी कई मामलों में बेहतर विकल्प साबित होती है। सबसे बड़ा कारण इसकी कम लागत है। इंफ्रारेड आधारित रिमोट बनाना काफी सस्ता पड़ता है जिससे कंपनियां उत्पाद की कुल कीमत को नियंत्रित रख पाती हैं। दूसरी बड़ी वजह कम बिजली की खपत है। इंफ्रारेड रिमोट बहुत कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं इसलिए इनकी बैटरी कई महीनों तक आसानी से चल जाती है। वहीं ब्लूटूथ लगातार कनेक्शन बनाए रखने के कारण अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा खर्च करता है। विश्वसनीयता भी एक अहम कारण है। इंफ्रारेड तकनीक सीधे डिवाइस से संपर्क करती है और इसमें पेयरिंग या नेटवर्क संबंधी परेशानियां नहीं होतीं। उपयोगकर्ता को केवल रिमोट टीवी की ओर करना होता है और कमांड तुरंत काम करने लगती है। इसके अलावा इंफ्रारेड तकनीक के उपयोग के लिए किसी अतिरिक्त लाइसेंस या वायरलेस प्रोटोकॉल से जुड़ी जटिलताओं का सामना भी नहीं करना पड़ता। हालांकि ब्लूटूथ के अपने कई फायदे हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें टीवी की ओर रिमोट घुमाने की आवश्यकता नहीं होती। ब्लूटूथ की रेंज अधिक होने से दूसरे कमरे से भी डिवाइस को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा एक ही ब्लूटूथ रिमोट कई स्मार्ट डिवाइस के साथ भी काम कर सकता है। यही वजह है कि अब प्रीमियम स्मार्ट टीवी में ब्लूटूथ रिमोट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इनमें वॉयस कमांड गूगल असिस्टेंट एलेक्सा और एयर माउस जैसे फीचर भी मिलते हैं। हालांकि सामान्य और बजट टीवी में कम लागत और बेहतर बैटरी बैकअप के कारण इंफ्रारेड तकनीक अब भी सबसे लोकप्रिय विकल्प बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में स्मार्ट टीवी के साथ ब्लूटूथ रिमोट का इस्तेमाल बढ़ेगा लेकिन कम कीमत वाले मॉडलों में इंफ्रारेड तकनीक लंबे समय तक अपनी जगह बनाए रखेगी।आज लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में ब्लूटूथ तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। स्मार्टफोन स्मार्टवॉच वायरलेस ईयरबड्स और स्मार्ट टीवी तक ब्लूटूथ से लैस हैं। ऐसे में एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि जब टीवी खुद ब्लूटूथ सपोर्ट करता है तो उसका रिमोट अब भी इंफ्रारेड तकनीक पर क्यों चलता है। इसके पीछे कई तकनीकी और व्यावहारिक कारण हैं जो दशकों बाद भी इस तकनीक को प्रासंगिक बनाए हुए हैं। इंफ्रारेड यानी आईआर तकनीक का इस्तेमाल 1970 और 1980 के दशक से टीवी रिमोट में किया जा रहा है। यह तकनीक बेहद सरल तरीके से काम करती है। रिमोट के अंदर मौजूद माइक्रोप्रोसेसर किसी बटन को दबाने पर एक डिजिटल कोड तैयार करता है। इसके बाद इंफ्रारेड एलईडी उस कोड को प्रकाश की तेज पल्स के रूप में टीवी की ओर भेजती है। टीवी में लगा सेंसर इस सिग्नल को पढ़कर उसे संबंधित कमांड में बदल देता है और उसी के अनुसार चैनल बदलना आवाज कम या ज्यादा करना तथा अन्य कार्य पूरे करता है। हालांकि ब्लूटूथ तकनीक अधिक आधुनिक मानी जाती है लेकिन टीवी रिमोट के लिए इंफ्रारेड आज भी कई मामलों में बेहतर विकल्प साबित होती है। सबसे बड़ा कारण इसकी कम लागत है। इंफ्रारेड आधारित रिमोट बनाना काफी सस्ता पड़ता है जिससे कंपनियां उत्पाद की कुल कीमत को नियंत्रित रख पाती हैं। दूसरी बड़ी वजह कम बिजली की खपत है। इंफ्रारेड रिमोट बहुत कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं इसलिए इनकी बैटरी कई महीनों तक आसानी से चल जाती है। वहीं ब्लूटूथ लगातार कनेक्शन बनाए रखने के कारण अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा खर्च करता है। विश्वसनीयता भी एक अहम कारण है। इंफ्रारेड तकनीक सीधे डिवाइस से संपर्क करती है और इसमें पेयरिंग या नेटवर्क संबंधी परेशानियां नहीं होतीं। उपयोगकर्ता को केवल रिमोट टीवी की ओर करना होता है और कमांड तुरंत काम करने लगती है। इसके अलावा इंफ्रारेड तकनीक के उपयोग के लिए किसी अतिरिक्त लाइसेंस या वायरलेस प्रोटोकॉल से जुड़ी जटिलताओं का सामना भी नहीं करना पड़ता। हालांकि ब्लूटूथ के अपने कई फायदे हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें टीवी की ओर रिमोट घुमाने की आवश्यकता नहीं होती। ब्लूटूथ की रेंज अधिक होने से दूसरे कमरे से भी डिवाइस को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा एक ही ब्लूटूथ रिमोट कई स्मार्ट डिवाइस के साथ भी काम कर सकता है। यही वजह है कि अब प्रीमियम स्मार्ट टीवी में ब्लूटूथ रिमोट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इनमें वॉयस कमांड गूगल असिस्टेंट एलेक्सा और एयर माउस जैसे फीचर भी मिलते हैं। हालांकि सामान्य और बजट टीवी में कम लागत और बेहतर बैटरी बैकअप के कारण इंफ्रारेड तकनीक अब भी सबसे लोकप्रिय विकल्प बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में स्मार्ट टीवी के साथ ब्लूटूथ रिमोट का इस्तेमाल बढ़ेगा लेकिन कम कीमत वाले मॉडलों में इंफ्रारेड तकनीक लंबे समय तक अपनी जगह बनाए रखेगी।
अब सिर्फ स्मार्ट नहीं होगा आपका फोन GenAI फीचर्स बनेंगे नई पहचान अगले साल से बदलने लगेगा पूरा मोबाइल अनुभव

नई दिल्ली। स्मार्टफोन इंडस्ट्री तेजी से एक नए दौर में प्रवेश कर रही है जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल एक अतिरिक्त फीचर नहीं बल्कि पूरे मोबाइल अनुभव का आधार बनने जा रहा है। नई रिसर्च के मुताबिक आने वाले समय में स्मार्टफोन केवल आदेश मानने तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि यूजर की जरूरतों को समझकर खुद फैसले लेने और कई काम अपने आप करने में सक्षम होंगे। यही वजह है कि जेनरेटिव एआई यानी GenAI अब मोबाइल उद्योग की सबसे बड़ी तकनीकी दिशा बनता जा रहा है। मार्केट रिसर्च फर्म काउंटरपॉइंट रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2027 तक दुनिया भर में बिकने वाले 52 प्रतिशत स्मार्टफोन GenAI फीचर्स से लैस होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में यह हिस्सेदारी 36 प्रतिशत रहने का अनुमान है जो 2026 में बढ़कर 45 प्रतिशत और 2027 में 52 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। इससे साफ है कि आने वाले समय में एआई प्रीमियम स्मार्टफोन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह लगभग हर श्रेणी के मोबाइल का अहम हिस्सा बन जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख स्मार्टफोन निर्माता कंपनियां अब सामान्य एआई टूल्स से आगे बढ़कर एजेंटिक एआई तकनीक पर काम कर रही हैं। यह तकनीक यूजर के व्यवहार और जरूरतों को समझकर स्वतः कार्य करने में सक्षम होगी। दूसरी ओर एप्पल भी अपनी अगली आईफोन सीरीज में कई नए GenAI फीचर्स पेश करने की तैयारी कर रहा है जिससे स्मार्टफोन का उपयोग पहले से अधिक आसान और स्मार्ट हो जाएगा। हालांकि एआई तकनीक के विस्तार के बीच पूरी स्मार्टफोन इंडस्ट्री के सामने एक बड़ी चुनौती भी खड़ी है। काउंटरपॉइंट रिसर्च का अनुमान है कि वर्ष 2026 में वैश्विक स्मार्टफोन शिपमेंट में लगभग 13.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हो सकती है। इसके बाद कुल बिक्री घटकर करीब 1.08 बिलियन यूनिट रह जाने की संभावना है जो पिछले कई वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह बढ़ती उत्पादन लागत और मेमोरी कंपोनेंट्स की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां हैं। इसका सबसे अधिक असर बजट और एंट्री लेवल स्मार्टफोन पर पड़ सकता है। कई कम कीमत वाले मॉडल बाजार से बाहर भी हो सकते हैं क्योंकि उनमें महंगे GenAI फीचर्स शामिल करना कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा। दूसरी ओर प्रीमियम स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों को इस बदलाव से फायदा मिलने की संभावना है। हाई एंड सेगमेंट में पहले से मजबूत मौजूदगी रखने वाली कंपनियां नई एआई तकनीकों को तेजी से अपनाकर ग्राहकों को अधिक उन्नत अनुभव देने की तैयारी कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे जैसे मेमोरी सप्लाई की स्थिति सुधरेगी और उत्पादन लागत कम होगी वैसे वैसे GenAI फीचर्स आम स्मार्टफोन तक भी पहुंचने लगेंगे। तकनीकी जानकारों का मानना है कि आने वाले वर्षों में स्मार्टफोन केवल कॉलिंग और इंटरनेट चलाने का साधन नहीं रहेंगे बल्कि व्यक्तिगत डिजिटल सहायक के रूप में काम करेंगे। यही बदलाव मोबाइल तकनीक के अगले बड़े दौर की शुरुआत माना जा रहा है जहां एआई हर यूजर के अनुभव को पहले से कहीं अधिक स्मार्ट तेज और व्यक्तिगत बना देगा।
सोलर टेक्नोलॉजी में बड़ा धमाका बिना पारंपरिक बैटरी के सालों तक स्टोर होगी सूरज की ऊर्जा जानिए कैसे काम करती है सन बैटरी

नई दिल्ली। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है जो भविष्य में बिजली और ऊर्जा भंडारण की तस्वीर बदल सकती है। अब सूरज की रोशनी को सीधे एक विशेष मॉलिक्यूल में कैद कर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा और जरूरत पड़ने पर उसे गर्मी के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह तकनीक पारंपरिक बैटरियों पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। यह नई तकनीक अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सांता बारबरा के शोधकर्ताओं ने विकसित की है। इसे मॉलिक्यूलर सोलर थर्मल तकनीक कहा जाता है। इसमें वैज्ञानिकों ने ऐसा विशेष ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल तैयार किया है जो सूर्य की रोशनी से मिलने वाली ऊर्जा को अपने रासायनिक बंधनों में सुरक्षित कर लेता है। खास बात यह है कि यह ऊर्जा लंबे समय तक बिना किसी बड़े नुकसान के सुरक्षित रह सकती है। इस तकनीक का सिद्धांत काफी रोचक है। वैज्ञानिकों ने इस मॉलिक्यूल की संरचना इंसानी डीएनए से प्रेरित होकर तैयार की है। जब इस पर सूर्य की पराबैंगनी किरणें पड़ती हैं तो इसका आकार बदल जाता है और यह स्प्रिंग की तरह ऊर्जा को अपने भीतर लॉक कर लेता है। यह बदली हुई अवस्था लंबे समय तक बनी रह सकती है। बाद में जब इसे हल्की गर्मी या विशेष रासायनिक प्रक्रिया के संपर्क में लाया जाता है तो यह अपने मूल स्वरूप में लौट आता है और अपने भीतर जमा ऊर्जा को गर्मी के रूप में बाहर छोड़ देता है। ऊर्जा भंडारण क्षमता के मामले में भी यह तकनीक बेहद प्रभावशाली मानी जा रही है। जहां एक किलोग्राम लीथियम बैटरी लगभग 0.9 मेगाजूल ऊर्जा स्टोर कर सकती है वहीं समान मात्रा में यह नया मॉलिक्यूल करीब 1.6 मेगाजूल ऊर्जा सुरक्षित रखने में सक्षम है। यानी ऊर्जा घनत्व के मामले में यह पारंपरिक लीथियम बैटरियों से काफी बेहतर प्रदर्शन करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर सफल होती है तो सोलर ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौती का समाधान मिल सकता है। अभी सौर ऊर्जा का उपयोग मुख्य रूप से दिन के समय ही प्रभावी रहता है जबकि रात या बादलों के मौसम में ऊर्जा संग्रह के लिए महंगी बैटरियों की जरूरत पड़ती है। नई तकनीक इस समस्या को काफी हद तक दूर कर सकती है। भविष्य में इस मॉलिक्यूल का उपयोग तरल पदार्थ के रूप में सोलर कलेक्टर सिस्टम में किया जा सकता है। दिनभर यह सूर्य की ऊर्जा को सोखेगा और बाद में टैंकों में सुरक्षित रखा जाएगा। जरूरत पड़ने पर यही ऊर्जा घरों को गर्म रखने पानी गर्म करने या ऑफ ग्रिड हीटिंग सिस्टम में इस्तेमाल की जा सकेगी। कैंपिंग और दूरदराज के इलाकों में भी इसका उपयोग काफी उपयोगी साबित हो सकता है। इस तकनीक की एक और बड़ी खासियत इसका पर्यावरण अनुकूल होना है। शोधकर्ताओं के अनुसार इस मटेरियल को कई बार रिचार्ज और रीसायकल किया जा सकता है जिससे इसकी उपयोगिता लंबे समय तक बनी रहेगी। यदि आगे के परीक्षण और व्यावसायिक विकास सफल रहे तो आने वाले वर्षों में यह तकनीक स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई क्रांति ला सकती है।
AI की नई उड़ान इंसानी सोच और कबूतरों की पैनी नजर से तैयार होगा भविष्य का मेडिकल सुपर टूल

नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को पहले से अधिक सक्षम और भरोसेमंद बनाने की दिशा में अमेरिका में एक बेहद दिलचस्प और अनोखा प्रयोग चल रहा है। इस बार शोधकर्ताओं का फोकस केवल इंसानी दिमाग तक सीमित नहीं है बल्कि उन्होंने कबूतरों की असाधारण देखने की क्षमता को भी अध्ययन का हिस्सा बनाया है। इस रिसर्च का उद्देश्य ऐसा एडवांस्ड एआई सिस्टम तैयार करना है जो मेडिकल स्कैन में छिपे उन बेहद छोटे संकेतों को भी पहचान सके जो कई बार अनुभवी डॉक्टरों की नजर से भी छूट जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में एआई कंपनियां अपने मॉडल्स को इंसानों की मदद से प्रशिक्षित करती रही हैं लेकिन अब शोध एक नए स्तर पर पहुंच गया है। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इंसानी मस्तिष्क और पक्षियों की विजुअल क्षमता किस तरह जटिल मेडिकल इमेज को समझती है और इसी प्रक्रिया को एआई में विकसित किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण शोध अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित कॉलेज ऑफ द होली क्रॉस में डॉ ग्रेगरी डिगिरोलामो और उनकी टीम कर रही है। उनका उद्देश्य यह समझना है कि रेडियोलॉजिस्ट एक्स रे और सीटी स्कैन देखते समय किस तरह निर्णय लेते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि कई बार इंसानी दिमाग किसी असामान्यता को महसूस तो कर लेता है लेकिन वह जानकारी अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंच पाती। यदि इस प्रक्रिया को एआई समझ जाए तो वह डॉक्टरों की मदद करते हुए अधिक सटीक परिणाम दे सकता है। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने रेडियोलॉजिस्ट की आंखों की गतिविधियों का भी विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि जब डॉक्टर सीटी स्कैन में फेफड़ों की गांठों को देखते हैं तो उनकी नजर उसी हिस्से पर अधिक देर तक टिकती है और आंखों की पुतलियां भी फैल जाती हैं। कई मामलों में डॉक्टर बाद में रिपोर्ट सामान्य लिख देते हैं लेकिन दिमाग शुरुआती स्तर पर असामान्यता को महसूस कर चुका होता है। यह संकेत बताता है कि मानव मस्तिष्क अवचेतन स्तर पर कई ऐसी जानकारियां पकड़ लेता है जिन्हें बाद में निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाता। इसी सिद्धांत को और बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने छह कबूतरों को विशेष प्रशिक्षण दिया। इन पक्षियों को सीटी स्कैन के छोटे वीडियो दिखाए गए और उनसे यह पहचानने का अभ्यास कराया गया कि फेफड़ों में गांठ मौजूद है या नहीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि कबूतरों की विजुअल पहचान क्षमता बेहद प्रभावशाली होती है और वे सूक्ष्म अंतर भी पहचान सकते हैं। यही विशेषता भविष्य के एआई सिस्टम को अधिक संवेदनशील और सटीक बनाने में मदद कर सकती है। डॉ डिगिरोलामो का कहना है कि इस तकनीक का उद्देश्य डॉक्टरों की जगह लेना नहीं बल्कि उनकी क्षमता को और मजबूत बनाना है। भविष्य में ऐसे एआई टूल विकसित किए जा सकते हैं जो रेडियोलॉजिस्ट के साथ मिलकर काम करें और उन संकेतों की ओर ध्यान दिलाएं जो सामान्य जांच के दौरान अनदेखे रह जाते हैं। इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में पता लगाना आसान हो सकता है और मरीजों का इलाज समय रहते शुरू किया जा सकेगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी। भविष्य में इसका उपयोग हृदय रोगों की पहचान कला की असली और नकली कृतियों की जांच सुरक्षा एजेंसियों की स्क्रीनिंग प्रणाली और कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले समय में एआई केवल तेज ही नहीं बल्कि पहले से कहीं अधिक समझदार और संवेदनशील भी बन सकता है।
महाभूकंप से पहले Google ने कैसे भेज दी चेतावनी? करोड़ों स्मार्टफोन बने सेंसर, सेकंडों में मिला खतरे का संकेत

नई दिल्ली । वेनेजुएला में आए शक्तिशाली भूकंप के बाद एक बार फिर आधुनिक तकनीक की क्षमता चर्चा का विषय बन गई है। कई लोगों ने दावा किया कि उन्हें भूकंप के तेज झटके महसूस होने से कुछ क्षण पहले ही Google की ओर से चेतावनी संदेश प्राप्त हो गया था। इस घटना ने लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर किसी भूकंप के आने से पहले तकनीकी प्रणाली को इसकी जानकारी कैसे मिल जाती है और स्मार्टफोन इस प्रक्रिया में क्या भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आज अधिकांश आधुनिक स्मार्टफोन केवल संचार उपकरण नहीं रह गए हैं, बल्कि वे कई उन्नत सेंसरों से लैस होते हैं। इनमें मौजूद एक्सेलेरोमीटर सेंसर फोन की गति, झुकाव और कंपन को मापने का काम करता है। सामान्य परिस्थितियों में यही सेंसर स्क्रीन को ऑटो-रोटेट करने या गतिविधियों को रिकॉर्ड करने में मदद करता है, लेकिन भूकंप जैसी प्राकृतिक घटनाओं की पहचान में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब किसी क्षेत्र में भूकंप की शुरुआती तरंगें उत्पन्न होती हैं, तो वहां मौजूद स्मार्टफोन इन असामान्य कंपन को दर्ज कर सकते हैं। यदि बड़ी संख्या में उपकरण एक जैसे कंपन का संकेत रिकॉर्ड करते हैं, तो यह जानकारी केंद्रीय सर्वर तक पहुंचती है। इसके बाद विशेष एल्गोरिदम इन संकेतों का विश्लेषण करके यह निर्धारित करते हैं कि क्या वास्तव में भूकंपीय गतिविधि शुरू हो चुकी है। यदि खतरे की पुष्टि होती है, तो प्रभावित क्षेत्र के लोगों को तुरंत चेतावनी भेजी जाती है। भूकंप विज्ञान के अनुसार किसी भी भूकंप के दौरान विभिन्न प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं। सबसे पहले पहुंचने वाली प्राथमिक तरंगें अपेक्षाकृत तेज होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव कम होता है। इसके बाद आने वाली द्वितीयक तरंगें अधिक विनाशकारी साबित होती हैं और अधिकांश नुकसान का कारण बनती हैं। आधुनिक चेतावनी प्रणाली प्राथमिक तरंगों की पहचान करके लोगों को कुछ सेकंड से लेकर कुछ दर्जन सेकंड तक का महत्वपूर्ण समय उपलब्ध करा सकती है। यही समय आपात स्थिति में बेहद मूल्यवान साबित होता है। अलर्ट मिलने के बाद लोग सुरक्षित स्थान पर पहुंच सकते हैं, बिजली या गैस जैसी सुविधाओं को बंद कर सकते हैं और संभावित खतरे से बचाव के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही यह समय बहुत कम हो, लेकिन बड़े भूकंपों के दौरान यही कुछ सेकंड जीवन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। Android आधारित भूकंप चेतावनी प्रणाली इसी सिद्धांत पर कार्य करती है। दुनिया भर में सक्रिय करोड़ों स्मार्टफोन एक विशाल सेंसर नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं। जब किसी इलाके में कई फोन एक साथ असामान्य कंपन दर्ज करते हैं, तो केंद्रीय प्रणाली उसे संभावित भूकंप के संकेत के रूप में पहचान लेती है। इसके बाद आसपास के क्षेत्रों में मौजूद उपयोगकर्ताओं को चेतावनी भेजी जाती है। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रणाली पारंपरिक भूकंप निगरानी नेटवर्क का विकल्प नहीं है, बल्कि उसका पूरक है। जहां वैज्ञानिक संस्थान विशेष उपकरणों के माध्यम से भूकंप की निगरानी करते हैं, वहीं स्मार्टफोन आधारित नेटवर्क अधिक व्यापक क्षेत्र में तेजी से जानकारी एकत्र करने में मदद करता है। इससे चेतावनी प्रणाली की पहुंच और प्रभावशीलता दोनों बढ़ जाती हैं। भारत सहित कई देशों में यह सुविधा पहले से उपलब्ध है। जिन स्मार्टफोनों में उपयुक्त ऑपरेटिंग सिस्टम और इंटरनेट कनेक्टिविटी मौजूद है, वे इस सेवा का लाभ उठा सकते हैं। उपयोगकर्ताओं को भूकंप संबंधी अलर्ट प्राप्त होने पर सुरक्षा निर्देश भी उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे वे स्थिति के अनुसार उचित कदम उठा सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर तकनीक और रियल-टाइम डेटा विश्लेषण के विकास के साथ ऐसी चेतावनी प्रणालियां और अधिक सटीक एवं प्रभावी बनेंगी। वेनेजुएला की हालिया घटना ने यह दिखा दिया है कि आधुनिक तकनीक केवल सूचना का माध्यम नहीं है, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नए ईयरबड्स, बजट स्मार्टफोन, AI फीचर्स और GTA 6 प्री-ऑर्डर ने बढ़ाई यूजर्स की उत्सुकता

नई दिल्ली । भारतीय टेक्नोलॉजी बाजार में गुरुवार को कई महत्वपूर्ण घोषणाओं और उत्पाद लॉन्च ने उपभोक्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा। स्मार्टफोन, ऑडियो डिवाइस, टैबलेट, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम और गेमिंग से जुड़े नए अपडेट्स ने बाजार में प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया है। प्रमुख कंपनियों ने अपने नए उत्पादों और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से विभिन्न श्रेणी के ग्राहकों को आकर्षित करने की कोशिश की है। ऑडियो डिवाइस सेगमेंट में OnePlus ने अपने नए Nord Buds 4 को भारतीय बाजार में उतारा है। कंपनी ने इन्हें विशेष रूप से युवाओं और छात्रों को ध्यान में रखकर विकसित किया है। नए ईयरबड्स में उन्नत एक्टिव नॉइस कैंसलेशन तकनीक, बेहतर ऑडियो क्वालिटी और लंबी बैटरी लाइफ जैसी सुविधाएं दी गई हैं। इसके अलावा गेमिंग उपयोगकर्ताओं के लिए कम लेटेंसी सपोर्ट और स्पेशल ऑडियो तकनीक को भी शामिल किया गया है। कंपनी का दावा है कि यह डिवाइस बजट श्रेणी में प्रीमियम ऑडियो अनुभव प्रदान करेगा। स्मार्टफोन बाजार में भारतीय कंपनी लावा ने भी अपनी मौजूदगी मजबूत करने की दिशा में नया कदम उठाया है। कंपनी ने Lava Smart 4 Plus नाम से नया बजट स्मार्टफोन लॉन्च किया है। यह डिवाइस उन उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है जो सीमित बजट में बड़ी स्क्रीन, लंबी बैटरी और दैनिक उपयोग के लिए संतुलित प्रदर्शन चाहते हैं। फोन में एचडी प्लस डिस्प्ले, बड़ी बैटरी, डुअल कैमरा सेटअप और डस्ट एवं वाटर रेजिस्टेंस जैसी सुविधाएं दी गई हैं, जो इसे एंट्री-लेवल स्मार्टफोन श्रेणी में प्रतिस्पर्धी बनाती हैं। इसी बीच Nothing ने अपने आगामी स्मार्टफोन Nothing Phone (4b) के डिजाइन से पर्दा उठा दिया है। कंपनी ने आधिकारिक रूप से फोन की पहली झलक साझा की है, जिसमें उसका लोकप्रिय ट्रांसपेरेंट डिजाइन बरकरार रखा गया है। हालांकि इस बार पारंपरिक ग्लिफ इंटरफेस की जगह नया ग्लिफ बार डिजाइन पेश किया गया है। कंपनी का लक्ष्य युवा ग्राहकों को आकर्षित करना है, जो तकनीक के साथ अलग और आधुनिक डिजाइन को भी महत्व देते हैं। टैबलेट बाजार में भी गतिविधियां तेज हुई हैं। Motorola जल्द ही अपना नया प्रीमियम टैबलेट लॉन्च करने जा रही है। यह डिवाइस बड़ी और हाई-रिजॉल्यूशन डिस्प्ले, शक्तिशाली प्रोसेसर तथा एआई आधारित सुविधाओं से लैस होगा। कंपनी का उद्देश्य उन उपयोगकर्ताओं को आकर्षित करना है जो मनोरंजन, पढ़ाई और प्रोफेशनल कार्यों के लिए एक शक्तिशाली टैबलेट की तलाश में हैं। दूसरी ओर Apple ने अपने आगामी ऑपरेटिंग सिस्टम iOS 27 के दूसरे डेवलपर बीटा संस्करण में एक महत्वपूर्ण फीचर जोड़ा है। कैमरा एप्लिकेशन के भीतर शामिल किया गया नया Siri Mode उपयोगकर्ताओं को कैमरे के माध्यम से वस्तुओं, स्थानों और विभिन्न जानकारियों की पहचान करने में सहायता करेगा। यह फीचर विजुअल इंटेलिजेंस तकनीक पर आधारित है और स्मार्टफोन अनुभव को अधिक सहज और उपयोगी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। गेमिंग जगत में भी उत्साह देखने को मिला है। बहुप्रतीक्षित GTA 6 के लिए भारत में प्री-ऑर्डर प्रक्रिया शुरू हो गई है। गेम के विभिन्न संस्करणों की घोषणा के साथ ही गेमिंग समुदाय में उत्सुकता बढ़ गई है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में स्मार्ट डिवाइस, एआई आधारित फीचर्स और गेमिंग उत्पादों की बढ़ती मांग भारतीय टेक बाजार को नई गति प्रदान कर सकती है। वर्तमान घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि तकनीकी नवाचार और उपभोक्ता-केंद्रित उत्पाद आने वाले समय में बाजार की दिशा तय करेंगे।
बैटरी बैकअप की दौड़ में नया रिकॉर्ड बनाने की तैयारी, 14,000mAh क्षमता वाले स्मार्टफोन की टेस्टिंग शुरू

नई दिल्ली । स्मार्टफोन बाजार में बैटरी क्षमता को लेकर लगातार नए प्रयोग किए जा रहे हैं और अब एक ऐसा डिवाइस चर्चा में है जो पारंपरिक स्मार्टफोन बैटरी की सीमाओं को काफी पीछे छोड़ सकता है। उद्योग से जुड़ी ताजा जानकारी के अनुसार एक प्रमुख चीनी स्मार्टफोन निर्माता 14,000mAh क्षमता वाली बैटरी से लैस नए स्मार्टफोन पर काम कर रहा है। यदि यह डिवाइस बाजार में लॉन्च होता है तो यह बैटरी बैकअप के मामले में मौजूदा स्मार्टफोनों के लिए नई चुनौती पेश कर सकता है। स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक लंबी बैटरी लाइफ है। वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और एआई आधारित फीचर्स के बढ़ते उपयोग के कारण बैटरी खपत पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है। ऐसे में कंपनियां अधिक क्षमता वाली बैटरियों और बेहतर ऊर्जा प्रबंधन तकनीकों पर लगातार निवेश कर रही हैं। हाल के वर्षों में 5,000mAh और 6,000mAh बैटरी वाले स्मार्टफोन आम हो चुके हैं। इसके बाद 8,000mAh और 10,000mAh क्षमता वाले डिवाइस भी बाजार में दिखाई देने लगे। अब 14,000mAh बैटरी की चर्चा इस बात का संकेत है कि निर्माता कंपनियां लंबे बैकअप को भविष्य की बड़ी जरूरत के रूप में देख रही हैं। जानकारी के अनुसार यह नया स्मार्टफोन अभी विकास और परीक्षण के चरण में है। तकनीकी प्रक्रिया के तहत डिवाइस को नए उत्पाद सत्यापन और मूल्यांकन के विभिन्न चरणों से गुजरना होगा। इस दौरान बैटरी की सुरक्षा, तापमान नियंत्रण, चार्जिंग क्षमता और डिवाइस के कुल वजन जैसे पहलुओं की गहन जांच की जाएगी। किसी भी बड़े बैटरी स्मार्टफोन के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि अधिक क्षमता के बावजूद फोन उपयोग में सुविधाजनक बना रहे। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी बैटरी वाले स्मार्टफोन से उपयोगकर्ताओं को कई दिन तक चार्जिंग की चिंता से राहत मिल सकती है। विशेष रूप से यात्रा करने वाले, गेमिंग पसंद करने वाले और लगातार मोबाइल उपयोग करने वाले लोगों के लिए ऐसे डिवाइस आकर्षक साबित हो सकते हैं। इससे पावर बैंक पर निर्भरता भी काफी हद तक कम हो सकती है। हालांकि बड़ी बैटरी के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं। फोन का वजन बढ़ना, मोटाई अधिक होना और चार्जिंग समय लंबा होना प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं। इसलिए कंपनियां सिलिकॉन-कार्बन जैसी नई बैटरी तकनीकों पर भी काम कर रही हैं, जिनकी मदद से अधिक क्षमता को कम जगह में समाहित किया जा सकता है। उद्योग जगत में यह भी चर्चा है कि कंपनी एक अन्य स्मार्टफोन पर भी काम कर रही है जिसकी बैटरी क्षमता 11,000mAh से 12,000mAh के बीच हो सकती है। इससे स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में स्मार्टफोन बाजार में बैटरी बैकअप को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज होने वाली है। फिलहाल इस नए डिवाइस के नाम, डिजाइन, प्रोसेसर और लॉन्च टाइमलाइन को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। फिर भी तकनीकी जगत में इसे लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। यदि यह परियोजना सफल रहती है और व्यावसायिक रूप से लॉन्च होती है, तो स्मार्टफोन उपयोग का अनुभव पहले की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक और लंबे समय तक निर्बाध हो सकता है।
WhatsApp का नया सुरक्षा कवच! अनजान नंबर से चैट शुरू करने से पहले देगा स्कैम अलर्ट

नई दिल्ली। दुनिया के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स में शामिल WhatsApp लगातार अपने यूजर्स की सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए नए फीचर्स पेश कर रहा है। ऑनलाइन ठगी और साइबर अपराध के बढ़ते मामलों को देखते हुए कंपनी अब एक और महत्वपूर्ण सुरक्षा फीचर लेकर आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार WhatsApp ने ऐसा नया वार्निंग सिस्टम रोलआउट करना शुरू कर दिया है जो किसी अनजान नंबर से आने वाले संदेशों को लेकर यूजर्स को पहले से सतर्क करेगा। डिजिटल युग में साइबर ठगी के तरीके लगातार बदल रहे हैं। स्कैमर्स अक्सर अनजान नंबरों से संपर्क कर लोगों को लालच देकर या डराकर उनकी निजी जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में बैंक डिटेल्स, ओटीपी, पासवर्ड और पैसों की मांग कर लोगों को आर्थिक नुकसान पहुंचाया जाता है। ऐसे खतरों को देखते हुए WhatsApp ने यह नया सुरक्षा फीचर तैयार किया है ताकि यूजर्स किसी भी संदिग्ध चैट को शुरू करने से पहले पूरी जानकारी प्राप्त कर सकें। फीचर ट्रैकर WABetaInfo की रिपोर्ट के मुताबिक जब किसी यूजर को ऐसे नंबर से मैसेज प्राप्त होगा जो उसकी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव नहीं है तो WhatsApp चैट खोलने से पहले एक विशेष चेतावनी संदेश दिखाएगा। इस चेतावनी में कई उपयोगी जानकारियां शामिल होंगी जो यूजर को यह समझने में मदद करेंगी कि सामने वाला व्यक्ति कितना विश्वसनीय हो सकता है। नए फीचर के तहत यूजर को उस देश की जानकारी दिखाई जाएगी जहां संबंधित फोन नंबर रजिस्टर्ड है। इसके अलावा यह भी बताया जाएगा कि नंबर फोनबुक में सेव है या नहीं। यदि यूजर और मैसेज भेजने वाले व्यक्ति के बीच कोई कॉमन ग्रुप मौजूद है तो उसकी जानकारी भी स्क्रीन पर दिखाई जाएगी। इन जानकारियों के आधार पर यूजर यह तय कर सकेगा कि बातचीत आगे बढ़ानी है या नहीं। WhatsApp द्वारा दिखाए जाने वाले चेतावनी संदेश में यह भी स्पष्ट रूप से बताया जाएगा कि स्कैमर्स अक्सर लोगों को उनकी निजी जानकारी साझा करने के लिए बहकाते हैं या पैसे भेजने के लिए दबाव बना सकते हैं। कंपनी का उद्देश्य यूजर्स को जागरूक करना है ताकि वे किसी भी तरह की ऑनलाइन ठगी का शिकार बनने से बच सकें। इस फीचर की सबसे खास बात यह है कि अंतिम फैसला पूरी तरह यूजर के हाथ में होगा। यदि यूजर चाहे तो चैट जारी रख सकता है या फिर बातचीत शुरू होने से पहले ही उसे बंद कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यूजर द्वारा लिए गए निर्णय की कोई सूचना मैसेज भेजने वाले व्यक्ति को नहीं मिलेगी। रिपोर्ट्स के अनुसार यह फीचर एंड्रॉयड और iOS दोनों प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे स्पैम मैसेज, फर्जी ऑफर और ऑनलाइन फ्रॉड से जुड़े मामलों में कमी आ सकती है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ भी लंबे समय से ऐसे सिस्टम की मांग कर रहे थे जो यूजर्स को संदिग्ध नंबरों की पहचान करने में मदद करे। WhatsApp फिलहाल कई अन्य नए फीचर्स पर भी काम कर रहा है। इनमें होम स्क्रीन के लिए वॉयस नोट विजेट और आईफोन यूजर्स के लिए व्यू-वन्स टेक्स्ट मैसेज फीचर शामिल बताए जा रहे हैं। कंपनी का फोकस लगातार यूजर एक्सपीरियंस और सुरक्षा को बेहतर बनाने पर बना हुआ है।
ऑनलाइन ठगी पर लगाम लगाने की तैयारी, WhatsApp का नया फीचर बताएगा किस नंबर पर भरोसा करना है और किससे रहना है सतर्क

नई दिल्ली । डिजिटल संचार के सबसे लोकप्रिय माध्यमों में शामिल व्हाट्सएप अब अपने करोड़ों यूजर्स की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। ऑनलाइन धोखाधड़ी, फर्जी पहचान और साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच कंपनी एक नया सुरक्षा फीचर लेकर आ रही है, जिसे ‘ट्रस्ट वॉर्निंग’ नाम दिया गया है। यह फीचर किसी भी अनजान या कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव न किए गए नंबर से बातचीत शुरू करने से पहले यूजर्स को अतिरिक्त जानकारी और सुरक्षा चेतावनी उपलब्ध कराएगा। बीते कुछ वर्षों में व्हाट्सएप पर फर्जी कॉल, नकली नौकरी के प्रस्ताव, बैंकिंग धोखाधड़ी, कूरियर फ्रॉड और निवेश संबंधी ठगी के मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है। साइबर अपराधी अक्सर अज्ञात नंबरों के जरिए लोगों से संपर्क कर विश्वास हासिल करने का प्रयास करते हैं और बाद में आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए यह नया फीचर तैयार किया गया है। नई व्यवस्था के तहत जब कोई यूजर ऐसे नंबर से चैट शुरू करने का प्रयास करेगा जो उसकी संपर्क सूची में मौजूद नहीं है, तब सीधे चैट विंडो खुलने के बजाय एक विशेष चेतावनी स्क्रीन दिखाई देगी। इस स्क्रीन पर उस नंबर से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदर्शित की जाएंगी, जिससे यूजर बातचीत शुरू करने से पहले अधिक सूचित निर्णय ले सकेगा। इस चेतावनी स्क्रीन में यह जानकारी शामिल होगी कि संबंधित नंबर किस देश में पंजीकृत है, क्या वह नंबर यूजर की कॉन्टैक्ट सूची में सेव है या नहीं, और क्या दोनों किसी साझा व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा हैं। इसके साथ ही सुरक्षा संबंधी सुझाव भी दिए जाएंगे, ताकि उपयोगकर्ता संभावित जोखिमों को समझ सके। इसके बाद यूजर के पास बातचीत जारी रखने या चैट बंद करने का विकल्प रहेगा। विशेष बात यह है कि यूजर द्वारा चुने गए विकल्प की जानकारी सामने वाले व्यक्ति को नहीं मिलेगी। इससे उपयोगकर्ता बिना किसी दबाव के सुरक्षित निर्णय ले सकेगा। कंपनी का मानना है कि इस प्रकार की पूर्व चेतावनी उपयोगकर्ताओं को जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने से रोकने में मदद करेगी और संभावित साइबर अपराधों के जोखिम को कम करेगी। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश ऑनलाइन ठगी साधारण बातचीत से शुरू होती है। कई मामलों में अपराधी खुद को किसी परिचित व्यक्ति, बैंक कर्मचारी, सरकारी अधिकारी या व्यावसायिक प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करते हैं। शुरुआत में बातचीत सामान्य लगती है, लेकिन धीरे-धीरे पीड़ित को वित्तीय या व्यक्तिगत जानकारी साझा करने के लिए प्रेरित किया जाता है। नया फीचर ऐसे प्रयासों के प्रति शुरुआती स्तर पर सतर्कता बढ़ाने का काम करेगा। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया है कि चेतावनी दिखाई देने का अर्थ यह नहीं होगा कि संबंधित नंबर धोखाधड़ी से जुड़ा है। कई बार वास्तविक और वैध उपयोगकर्ता भी नए या विदेशी नंबरों का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह कुछ संदिग्ध नंबर ऐसे भी हो सकते हैं जिन पर चेतावनी न दिखाई दे। इसलिए अंतिम निर्णय लेते समय उपयोगकर्ताओं को अपनी सतर्कता और विवेक का भी उपयोग करना होगा। यह फीचर फिलहाल परीक्षण चरण में है और धीरे-धीरे विभिन्न प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जा रहा है। आने वाले समय में इसके व्यापक स्तर पर जारी होने की संभावना है। डिजिटल सुरक्षा को लेकर बढ़ती चुनौतियों के बीच यह कदम उपयोगकर्ताओं को अधिक सुरक्षित अनुभव प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस फीचर का प्रभावी उपयोग किया गया तो व्हाट्सएप पर होने वाले कई सामान्य साइबर स्कैम को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकेगा।