आलू डालने से बढ़ेगा पुदीना या सिर्फ सोशल मीडिया का दावा? जानिए वायरल ट्रिक कितनी कारगर और पौधे को हरा-भरा रखने के सही उपाय

नई दिल्ली । घर में ताजा और हरा-भरा पुदीना उगाना आजकल गार्डनिंग के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक ऐसी ट्रिक तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि गमले की मिट्टी में आलू का टुकड़ा दबाने से पुदीने की ग्रोथ तेजी से होती है और पौधा अधिक घना बनता है। हालांकि बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि इस दावे के समर्थन में कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और इसे केवल एक घरेलू प्रयोग के रूप में देखा जाना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी पौधे की अच्छी वृद्धि का आधार उसकी मिट्टी, पोषण, नमी और नियमित देखभाल होती है। पुदीना विशेष रूप से ऐसी मिट्टी में बेहतर बढ़ता है जो भुरभुरी, उपजाऊ और जैविक पदार्थों से भरपूर हो। साथ ही मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होना भी आवश्यक है ताकि अतिरिक्त पानी जमा न हो और जड़ों को नुकसान न पहुंचे। वायरल वीडियो में यह दावा किया जाता है कि मिट्टी में रखा गया आलू धीरे-धीरे गलकर स्टार्च और कुछ जैविक तत्व छोड़ता है, जिससे पौधे को अतिरिक्त पोषण मिलता है। हालांकि बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया का पुदीने की वृद्धि पर कितना प्रभाव पड़ता है, इसे लेकर कोई प्रमाणित अध्ययन उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग मौसम, मिट्टी और वातावरण के अनुसार इसके परिणाम भी भिन्न हो सकते हैं। इसलिए केवल इस उपाय पर निर्भर रहना उचित नहीं माना जाता। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि पुदीने को घना और स्वस्थ बनाना है तो नियमित सिंचाई सबसे महत्वपूर्ण है। मिट्टी में हमेशा हल्की नमी बनी रहनी चाहिए, लेकिन पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए। अत्यधिक पानी से जड़ों में सड़न की समस्या हो सकती है, जिससे पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। इसी प्रकार हर 20 से 25 दिनों के अंतराल पर वर्मी कम्पोस्ट या अन्य जैविक खाद देने से पौधे को आवश्यक पोषक तत्व मिलते रहते हैं। पुदीने की नियमित कटाई भी उसकी अच्छी बढ़त का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि समय-समय पर ऊपरी टहनियों और पत्तियों की छंटाई करने से नई शाखाएं तेजी से निकलती हैं और पौधा अधिक घना दिखाई देता है। यदि पौधा पुराना हो जाए तो उसकी स्वस्थ कटिंग लेकर नया पौधा तैयार करना भी एक प्रभावी तरीका माना जाता है। धूप का संतुलन भी पुदीने की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पौधे को ऐसी जगह रखना बेहतर होता है जहां सुबह की हल्की धूप मिले, जबकि दोपहर की तेज धूप से बचाव हो। इससे पत्तियां ताजा बनी रहती हैं और पौधे की वृद्धि लगातार होती रहती है। उचित प्रकाश और संतुलित नमी के साथ पुदीना लंबे समय तक स्वस्थ बना रह सकता है। बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर साझा की जाने वाली कई गार्डनिंग ट्रिक्स रोचक जरूर होती हैं, लेकिन सभी उपाय हर परिस्थिति में प्रभावी नहीं होते। इसलिए किसी भी वायरल दावे को अपनाने से पहले उसकी विश्वसनीयता और व्यावहारिक उपयोगिता को समझना आवश्यक है। यदि उद्देश्य लंबे समय तक हरा-भरा और घना पुदीना उगाना है, तो सही मिट्टी, जैविक खाद, संतुलित सिंचाई, नियमित छंटाई और उचित धूप जैसी बुनियादी बागवानी तकनीकों पर ध्यान देना सबसे अधिक लाभकारी और भरोसेमंद तरीका माना जाता है।
सिर्फ गर्मी नहीं स्कैल्प का पसीना भी पहुंचा सकता है बालों को नुकसान एक्सपर्ट्स ने बताए बचाव के असरदार तरीके

नई दिल्ली । गर्मियों का मौसम अपने साथ तेज धूप उमस और पसीने की समस्या लेकर आता है। शरीर का पसीना आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो शरीर का तापमान नियंत्रित रखने में मदद करती है लेकिन जब यही पसीना लंबे समय तक सिर की त्वचा यानी स्कैल्प पर जमा रहता है तो यह बालों की सेहत के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। यही वजह है कि गर्मियों में कई लोगों को बाल झड़ने डैंड्रफ खुजली और स्कैल्प से बदबू आने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार स्कैल्प पर लगातार नमी बनी रहने से वहां बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपने लगते हैं। पसीना तेल और धूल मिलकर रोमछिद्रों को बंद कर देते हैं जिससे बालों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते। इसका सीधा असर बालों की मजबूती पर पड़ता है और धीरे धीरे बाल कमजोर होकर टूटने लगते हैं। यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए तो हेयर फॉल तेजी से बढ़ सकता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पसीने में पानी के साथ नमक और लैक्टिक एसिड भी मौजूद होता है। जब यह लंबे समय तक स्कैल्प पर बना रहता है तो सिर की त्वचा का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगता है। इससे बालों की बाहरी परत कमजोर हो जाती है और बाल रूखे बेजान तथा दोमुंहे दिखाई देने लगते हैं। कई बार स्कैल्प में जलन और खुजली भी शुरू हो जाती है जो आगे चलकर डैंड्रफ का रूप ले सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मौसम में बालों की देखभाल के लिए सबसे पहले स्कैल्प की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। यदि ज्यादा पसीना आता है तो जरूरत के अनुसार हल्के और सौम्य शैंपू से बाल धोना फायदेमंद रहता है। इससे अतिरिक्त तेल धूल और पसीना साफ हो जाता है तथा रोमछिद्र खुले रहते हैं। हालांकि जरूरत से ज्यादा शैंपू करने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे स्कैल्प का प्राकृतिक तेल कम हो सकता है। हल्की तेल मालिश भी स्कैल्प को स्वस्थ रखने में मदद करती है। आंवला नारियल या अन्य प्राकृतिक तेलों से हल्के हाथों से मालिश करने से रक्त संचार बेहतर होता है और बालों की जड़ों तक पोषण आसानी से पहुंचता है। आंवला में मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट बालों को मजबूत बनाने में सहायक माने जाते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी बालों की अच्छी सेहत के लिए बेहद जरूरी है। शरीर में पानी की कमी होने पर स्कैल्प का संतुलन बिगड़ सकता है। पर्याप्त हाइड्रेशन शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है और त्वचा के साथ साथ स्कैल्प को भी स्वस्थ बनाए रखता है। एलोवेरा जेल गर्मियों में स्कैल्प को ठंडक देने का एक प्राकृतिक उपाय माना जाता है। इसे सीधे सिर की त्वचा पर लगाने से खुजली और जलन में राहत मिल सकती है। वहीं गुलाब जल का हल्का स्प्रे स्कैल्प को ताजगी देता है और पसीने की बदबू कम करने में मदद करता है। कुछ विशेषज्ञ पानी में मिलाकर ऐप्पल साइडर विनेगर का सीमित उपयोग भी स्कैल्प का पीएच संतुलित रखने के लिए लाभदायक मानते हैं। इसके अलावा बहुत टाइट हेयर स्टाइल बनाने और बार बार हेयर ड्रायर या हीट स्टाइलिंग उपकरणों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। ढीले हेयर स्टाइल अपनाने से हवा आसानी से स्कैल्प तक पहुंचती है और पसीना जल्दी सूख जाता है। स्वस्थ बालों के लिए संतुलित खानपान भी उतना ही जरूरी है। हरी सब्जियां मौसमी फल मेवे बीज और पर्याप्त प्रोटीन युक्त भोजन बालों की जड़ों को मजबूत बनाते हैं जबकि अधिक मसालेदार भोजन जंक फूड और जरूरत से ज्यादा चाय कॉफी शरीर की गर्मी बढ़ाकर पसीना बढ़ा सकते हैं। यदि बालों का झड़ना लगातार बढ़ रहा हो डैंड्रफ लंबे समय तक बना रहे या स्कैल्प में संक्रमण के लक्षण दिखाई दें तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प है।
मीठा खाने का भी होता है सही समय वरना बढ़ सकता है ब्लड शुगर और वजन का खतरा जानिए क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट्स

नई दिल्ली । त्योहार हो जन्मदिन हो शादी का जश्न हो या फिर कोई छोटी सी खुशी भारत में हर खास मौके की शुरुआत मीठे से होती है। मिठाई हमारे खानपान और संस्कृति का अहम हिस्सा है लेकिन क्या आप जानते हैं कि मीठा सिर्फ कितनी मात्रा में खाया जाए यह ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उसे किस समय खाया जाए यह भी आपकी सेहत पर बड़ा असर डालता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गलत समय पर मीठा खाने की आदत धीरे धीरे ब्लड शुगर बढ़ने वजन बढ़ने और भविष्य में डायबिटीज जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है। अक्सर लोग सुबह उठते ही चाय के साथ बिस्कुट मिठाई चॉकलेट या अन्य मीठी चीजें खा लेते हैं। कुछ लोग खाली पेट ही मीठे से दिन की शुरुआत करते हैं। डॉक्टरों के अनुसार यह आदत शरीर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। खाली पेट मीठा खाने पर उसमें मौजूद शुगर तेजी से खून में पहुंचती है जिससे ब्लड ग्लूकोज का स्तर अचानक बढ़ जाता है। इसके कुछ समय बाद शुगर तेजी से नीचे भी आ जाती है जिससे कमजोरी थकान और बार बार भूख लगने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। यही वजह है कि दिनभर मीठा खाने की इच्छा भी बढ़ जाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि मीठा खाना ही है तो उसे मुख्य भोजन के बाद सीमित मात्रा में खाना ज्यादा बेहतर विकल्प माना जाता है। जब हम पहले दाल रोटी सब्जी चावल सलाद या अन्य पौष्टिक भोजन खाते हैं तब शरीर को फाइबर प्रोटीन और आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं। ये तत्व मीठे में मौजूद चीनी को धीरे धीरे अवशोषित होने में मदद करते हैं जिससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता और शरीर पर अतिरिक्त दबाव भी नहीं पड़ता। यही कारण है कि डॉक्टर भोजन के तुरंत बाद थोड़ी मात्रा में मिठाई खाने की सलाह देते हैं। दिन और रात के समय का अंतर भी इस मामले में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। रात में शरीर आराम की अवस्था में पहुंचने लगता है और ऊर्जा की जरूरत भी कम हो जाती है। ऐसे समय अधिक मात्रा में मीठा खाने से अतिरिक्त कैलोरी शरीर में जमा होने लगती है जिससे वजन बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। लगातार रात में मीठा खाने की आदत भविष्य में मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज जैसी समस्याओं की आशंका को भी बढ़ा सकती है। यदि मीठा खाना हो तो दोपहर के भोजन के बाद सीमित मात्रा में खाना अपेक्षाकृत बेहतर माना जाता है क्योंकि दिन के समय शरीर अधिक सक्रिय रहता है और अतिरिक्त ऊर्जा का उपयोग आसानी से कर लेता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि दिनभर मनचाहा मीठा खाया जाए। मात्रा पर नियंत्रण रखना हर स्थिति में जरूरी है। डॉक्टर यह भी कहते हैं कि केवल केक पेस्ट्री चॉकलेट या मीठे पेय पदार्थों के सहारे भूख मिटाना सही आदत नहीं है। इससे शरीर को आवश्यक विटामिन मिनरल्स और प्रोटीन नहीं मिल पाते। संतुलित भोजन के साथ ही मीठे का सेवन करना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है। जिन लोगों को डायबिटीज प्री डायबिटीज मोटापा या ब्लड शुगर से जुड़ी कोई समस्या है उन्हें मीठा खाने से पहले अपने डॉक्टर या डाइट विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए। सही समय सही मात्रा और संतुलित खानपान अपनाकर मीठे का आनंद भी लिया जा सकता है और स्वास्थ्य भी बेहतर बनाए रखा जा सकता है।
पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव

नई दिल्ली । आज के प्रतिस्पर्धी दौर में लगभग हर माता पिता अपने बच्चों को जीवन के हर क्षेत्र में सफल देखना चाहते हैं। अच्छी पढ़ाई बेहतर करियर और हर गतिविधि में उत्कृष्ट प्रदर्शन की इच्छा स्वाभाविक है लेकिन जब यही अपेक्षाएं बच्चों पर दबाव बनकर थोप दी जाती हैं तब यह उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। मनोविज्ञान में इस व्यवहार को पुशी पेरेंटिंग कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पालन पोषण का ऐसा तरीका है जिसमें बच्चों से हमेशा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है और उनकी व्यक्तिगत रुचियों भावनाओं तथा सीमाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पुशी पेरेंटिंग में माता पिता अक्सर अपने अधूरे सपनों और महत्वाकांक्षाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करते हैं। बच्चे पर हमेशा बेहतर अंक लाने हर प्रतियोगिता में जीतने और हर क्षेत्र में सबसे आगे रहने का दबाव बनाया जाता है। बाहर से यह अनुशासन और सफलता की तैयारी जैसा दिखाई देता है लेकिन भीतर ही भीतर बच्चा लगातार तनाव और असुरक्षा की भावना से जूझता रहता है। वह पढ़ाई और गतिविधियों का आनंद लेने के बजाय केवल प्रदर्शन और परिणामों के बारे में सोचने लगता है। ऐसे माहौल में यदि बच्चा अच्छे अंक भी हासिल कर ले लेकिन प्रथम स्थान न ला पाए तो उसकी उपलब्धि की सराहना करने के बजाय उसे डांट या निराशा का सामना करना पड़ता है। धीरे धीरे उसके मन में यह भावना घर करने लगती है कि उसकी मेहनत की कोई अहमियत नहीं है और उसे तभी स्वीकार किया जाएगा जब वह दूसरों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरे। इससे बच्चों में असफलता का डर बढ़ता है और उनका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। पुशी पेरेंटिंग का एक और बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों की अपनी पसंद और रुचियों को महत्व नहीं दिया जाता। कई बच्चों की रुचि खेल संगीत चित्रकला या अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में होती है लेकिन माता पिता उन्हें अपनी पसंद के विषय या करियर की ओर धकेल देते हैं। लगातार ऐसा होने पर बच्चा अपनी इच्छाओं को दबा देता है और केवल दूसरों को खुश करने के लिए जीवन जीने लगता है। इससे उसकी रचनात्मकता और आत्मसंतुष्टि दोनों प्रभावित होती हैं। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि बच्चों की लगातार दूसरों से तुलना करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। जब बार बार किसी दूसरे बच्चे की उपलब्धियों का उदाहरण दिया जाता है तो बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है। उसके भीतर हीन भावना पैदा होती है और धीरे धीरे वह अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। यह स्थिति आगे चलकर चिंता अवसाद और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है। कई परिवारों में माता पिता बच्चों के हर छोटे बड़े फैसले स्वयं लेने लगते हैं। क्या पहनना है क्या खाना है किससे दोस्ती करनी है या भविष्य में कौन सा विषय चुनना है जैसे निर्णय भी बच्चों को लेने का अवसर नहीं मिलता। इससे बच्चे में निर्णय लेने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती और वह बड़े होने के बाद भी हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को सही दिशा देना और अनुशासन सिखाना जरूरी है लेकिन उनकी भावनाओं इच्छाओं और क्षमताओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिए और उनकी सफलता के साथ साथ उनके प्रयासों की भी सराहना करनी चाहिए। सकारात्मक प्रोत्साहन और भरोसे का माहौल ही बच्चों के आत्मविश्वास मानसिक संतुलन और स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास की मजबूत नींव बनता है।
सुबह की ये आसान आदत स्किन को दे सकती है इंस्टेंट फ्रेशनेस, जानें आइस वॉटर थेरेपी के फायदे

नई दिल्ली। हर कोई चाहता है कि उसकी त्वचा लंबे समय तक चमकदार, स्वस्थ और जवां दिखाई दे। इसके लिए लोग महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स और कई तरह के ब्यूटी ट्रीटमेंट अपनाते हैं। हालांकि, कुछ आसान घरेलू उपाय भी त्वचा को ताजगी देने में मदद कर सकते हैं। इन्हीं में से एक है आइस वॉटर थेरेपी या ठंडे पानी से चेहरे की सफाई। हालांकि यह समझना जरूरी है कि आइस वॉटर थेरेपी झुर्रियों को स्थायी रूप से खत्म नहीं करती, लेकिन इससे चेहरे पर अस्थायी कसाव, सूजन में कमी और फ्रेशनेस महसूस हो सकती है।क्या है आइस वॉटर थेरेपी? सुबह उठने के बाद एक बाउल में ठंडा पानी लें और उसमें कुछ आइस क्यूब्स डालें। इसके बाद कुछ सेकंड के लिए चेहरे को ठंडे पानी में डुबोएं या ठंडे पानी से चेहरा धो लें। कई लोग इसे अपनी मॉर्निंग स्किनकेयर रूटीन का हिस्सा बनाते हैं। चेहरे की सूजन कम हो सकती है सुबह उठने के बाद कई लोगों के चेहरे पर हल्की सूजन दिखाई देती है। ठंडा पानी रक्त वाहिकाओं को अस्थायी रूप से संकुचित करता है, जिससे सूजन कुछ समय के लिए कम दिखाई दे सकती है।त्वचा को मिलती है ताजगी ठंडे पानी से चेहरा धोने पर त्वचा फ्रेश महसूस होती है और कई लोगों को इंस्टेंट ग्लो का एहसास होता है।अतिरिक्त ऑयल कम महसूस हो सकता है ऑयली स्किन वाले लोगों को ठंडा पानी चेहरे पर ताजगी और अतिरिक्त तेल कम होने का एहसास दे सकता है, हालांकि यह ऑयल प्रोडक्शन को स्थायी रूप से नियंत्रित नहीं करता।पोर्स छोटे दिखाई दे सकते हैं ठंडे तापमान के कारण त्वचा पर अस्थायी कसाव आता है, जिससे पोर्स कुछ समय के लिए छोटे नजर आ सकते हैं।क्या इससे झुर्रियां खत्म हो जाती हैं? यह दावा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है कि आइस वॉटर थेरेपी झुर्रियों या फाइन लाइंस को स्थायी रूप से खत्म कर देती है। हालांकि ठंडक के कारण त्वचा कुछ समय के लिए टाइट और स्मूद दिखाई दे सकती है। उम्र बढ़ने के साथ आने वाली झुर्रियों को कम करने के लिए सनस्क्रीन, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और सही स्किनकेयर ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं।कैसे करें सही तरीके से? एक बाउल में ठंडा पानी और कुछ बर्फ के टुकड़े डालें। चेहरे को 5–10 सेकंड के लिए पानी में डुबोएं। इस प्रक्रिया को 3–5 बार दोहरा सकते हैं। इसके बाद साफ तौलिए से चेहरा हल्के हाथों से सुखाएं। फिर मॉइस्चराइज़र और दिन में बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगाएं।किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए? यदि आपकी त्वचा बहुत संवेदनशील है, आपको रोजेशिया, एक्जिमा या ठंड से एलर्जी की समस्या है, तो बर्फ को सीधे चेहरे पर लगाने से बचें। बहुत अधिक देर तक चेहरे को बर्फ वाले पानी में रखने से त्वचा में जलन या असहजता हो सकती है।ग्लोइंग स्किन के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं स्वस्थ और चमकदार त्वचा के लिए इन आदतों को भी अपनाएं— पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। संतुलित और पौष्टिक भोजन करें। रोज 7–8 घंटे की नींद लें। धूप में निकलते समय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें। धूम्रपान और अत्यधिक जंक फूड से बचें।
स्वस्थ रहने का आसान मंत्र: घरेलू चीजें, संतुलित भोजन और अच्छी दिनचर्या से रखें खुद को फिट

नई दिल्ली। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में स्वस्थ रहना हर किसी की प्राथमिकता है। लेकिन तनाव, अनियमित दिनचर्या, जंक फूड और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कई लोग छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। अच्छी बात यह है कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए हमेशा महंगी दवाइयों या सप्लीमेंट्स की जरूरत नहीं होती। यदि हम अपनी रोजमर्रा की आदतों में कुछ सकारात्मक बदलाव करें, तो लंबे समय तक शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखा जा सकता है।दिन की शुरुआत गुनगुने पानी से करें सुबह उठने के बाद एक या दो गिलास गुनगुना पानी पीने से शरीर हाइड्रेट होता है और पाचन तंत्र सक्रिय होने में मदद मिलती है। जिन लोगों को एसिडिटी या पेट में जलन की समस्या रहती है, उन्हें केवल सादा गुनगुना पानी ही पीना चाहिए। घर का संतुलित भोजन है सबसे बड़ी दवा अच्छे स्वास्थ्य की नींव संतुलित और पौष्टिक भोजन है। अपने दैनिक आहार में हरी सब्जियां, मौसमी फल, दालें, साबुत अनाज, दूध, दही, पनीर और अंकुरित अनाज शामिल करें। ये शरीर को आवश्यक विटामिन, मिनरल, प्रोटीन और फाइबर प्रदान करते हैं। वहीं तला-भुना भोजन, जंक फूड, अत्यधिक मीठे और पैकेट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें, क्योंकि इनका अधिक सेवन मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और पाचन संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। रसोई की ये चीजें हैं सेहत की साथी भारतीय रसोई में कई ऐसी प्राकृतिक चीजें मौजूद हैं जो सामान्य स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी जाती हैं। हल्दी में एंटीऑक्सीडेंट और सूजन कम करने वाले गुण पाए जाते हैं। अदरक पाचन को बेहतर बनाने और गले की हल्की परेशानी में राहत देने में सहायक हो सकती है। सीमित मात्रा में लहसुन का सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। तुलसी रोग प्रतिरोधक क्षमता को समर्थन देती है। जीरा, सौंफ और अजवाइन भोजन के बाद गैस और अपच जैसी समस्याओं में राहत पहुंचा सकते हैं। हालांकि, ये घरेलू उपाय सामान्य स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हैं, लेकिन किसी गंभीर बीमारी का विकल्प नहीं हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह आवश्यक है।पर्याप्त पानी पीना न भूलें शरीर के लगभग सभी अंगों के सुचारु संचालन के लिए पर्याप्त पानी जरूरी है। सही मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है, त्वचा स्वस्थ रहती है और पाचन क्रिया भी बेहतर बनी रहती है।रोज करें योग और व्यायाम स्वस्थ रहने के लिए केवल अच्छा भोजन ही पर्याप्त नहीं है। प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट तेज चाल से चलना, योग, स्ट्रेचिंग या हल्का व्यायाम करना फायदेमंद होता है। योग और प्राणायाम शरीर को लचीला बनाने, तनाव कम करने, श्वसन क्षमता बढ़ाने और हृदय को स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।अच्छी नींद भी है जरूरी स्वस्थ जीवन के लिए रोजाना 7 से 9 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लेना आवश्यक है। पर्याप्त नींद शरीर की मरम्मत प्रक्रिया को बेहतर बनाती है, मानसिक एकाग्रता बढ़ाती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करती है।मानसिक स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान स्वस्थ जीवन केवल शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन कुछ मिनट ध्यान, प्राणायाम या गहरी सांस लेने का अभ्यास करें। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना, सकारात्मक सोच रखना और तनाव को नियंत्रित करना मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।मौसमी फल और सब्जियां खाएं हर मौसम में मिलने वाले फल और सब्जियां शरीर की जरूरत के अनुसार पोषण प्रदान करते हैं। पपीता, सेब, अमरूद, संतरा, तरबूज, पालक, गाजर, चुकंदर, लौकी और तोरी जैसे खाद्य पदार्थ विटामिन, मिनरल और फाइबर के अच्छे स्रोत हैं। चीनी और नमक का सीमित सेवन करें अधिक चीनी और नमक का सेवन उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। इसलिए मीठे पेय पदार्थ, अधिक मिठाइयों और प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीमित रखें। धूप और साफ-सफाई का रखें ध्यान सुबह की हल्की धूप शरीर में विटामिन D बनने में मदद करती है, जो हड्डियों और मांसपेशियों के लिए जरूरी है। इसके साथ ही भोजन से पहले हाथ धोना, साफ पानी पीना और रसोई की स्वच्छता बनाए रखना संक्रमण से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छोटी आदतें, बड़ा बदलाव समय पर भोजन करना, भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना, देर रात भारी भोजन से बचना, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना तथा समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना लंबे समय तक स्वस्थ रहने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। यदि परिवार में मधुमेह, उच्च रक्तचाप या हृदय रोग का इतिहास है, तो नियमित मेडिकल चेकअप जरूर कराएं।
हार्ट ट्रीटमेंट में नई उपलब्धि बुजुर्ग मरीज को लगाया 25 साल तक चलने वाला आधुनिक हार्ट वाल्व जटिल प्रक्रिया रही सफल

नई दिल्ली। हृदय रोगों के उपचार में आधुनिक चिकित्सा तकनीक ने एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। टेंडरपाम हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी विभाग ने 78 वर्षीय एक बुजुर्ग मरीज पर अत्यंत जटिल हृदय प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए उन्हें नई जिंदगी देने का दावा किया है। मरीज को गंभीर हृदय संबंधी समस्याओं के साथ एक ऐसा अत्याधुनिक हार्ट वाल्व लगाया गया है जिसकी अनुमानित कार्यक्षमता लगभग 25 वर्षों तक बनी रह सकती है। अस्पताल के अनुसार मरीज मधुमेह कोरोनरी आर्टरी डिजीज सौम्य प्रोस्टेट वृद्धि पेसमेकर और गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित थे। इन बीमारियों के कारण पारंपरिक ओपन हार्ट सर्जरी का जोखिम काफी अधिक था। ऐसे में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने कम जोखिम वाली आधुनिक तकनीक अपनाते हुए एक ही सत्र में ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन और जटिल कोरोनरी एंजियोप्लास्टी करने का निर्णय लिया। प्रक्रिया के दौरान मरीज में एडवर्ड सैपियन अल्ट्रा रेसिलिया नाम का अत्याधुनिक ट्रांसकैथेटर हार्ट वाल्व प्रत्यारोपित किया गया। इस वाल्व की सबसे बड़ी विशेषता इसका विशेष रेसिलिया टिश्यू है जो सामान्य बायोलॉजिकल वाल्व की तुलना में अधिक समय तक टिकाऊ माना जाता है। उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर इसकी अनुमानित आयु लगभग 25 वर्ष बताई जाती है। इसी कारण इसे सरल भाषा में पूरी जिंदगी के लिए एक वाल्व के रूप में भी प्रचारित किया जा रहा है। इलाज के दौरान की गई कोरोनरी एंजियोग्राफी में मरीज की हृदय धमनियों में गंभीर कैल्सीफाइड ब्लॉकेज का पता चला। यह स्थिति सामान्य एंजियोप्लास्टी से उपचार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। डॉक्टरों ने आधुनिक ऑर्बिटल एथेरेक्टॉमी तकनीक की मदद से धमनियों में जमा कैल्शियम को हटाया और इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक का उपयोग कर ब्लॉकेज को खोला। इसके बाद मुख्य धमनी एलएडी में दो स्टेंट सफलतापूर्वक लगाए गए। अस्पताल के अनुसार एक ही सत्र में दोनों जटिल प्रक्रियाएं पूरी करने से मरीज का कुल जोखिम कम हुआ और उपचार अधिक प्रभावी रहा। ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति स्थिर रही तथा उन्हें केवल तीन दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी तकनीकों के कारण अब ऐसे बुजुर्ग और उच्च जोखिम वाले मरीजों का भी सफल उपचार संभव हो रहा है जिनके लिए पारंपरिक ओपन हार्ट सर्जरी सुरक्षित विकल्प नहीं मानी जाती। अस्पताल ने इस उपलब्धि को उत्तर प्रदेश में अपनी तरह की शुरुआती जटिल प्रक्रियाओं में से एक बताया है। हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी भी हार्ट वाल्व की वास्तविक आयु मरीज की स्वास्थ्य स्थिति जीवनशैली संक्रमण के जोखिम और नियमित चिकित्सकीय देखभाल जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए हर मरीज के लिए उपचार और परिणाम अलग हो सकते हैं।
सिर्फ परंपरा नहीं, विज्ञान भी था वजह! पुराने जमाने के घरों में छोटे दरवाजे बनाने का राज

नई दिल्ली । अगर आपने कभी किसी पुराने गांव, हवेली या पारंपरिक घर को देखा होगा, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी कि वहां के दरवाजे आज के मुकाबले काफी छोटे और नीचे होते थे। घर में प्रवेश करने के लिए लोगों को झुकना पड़ता था। पहली नजर में यह अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे कई व्यावहारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारण मौजूद थे। आइए जानते हैं कि आखिर पुराने समय में दरवाजे इतने छोटे क्यों बनाए जाते थे। तापमान नियंत्रित रखने का आसान तरीका उस दौर में न बिजली की सुविधा हर जगह उपलब्ध थी और न ही एसी या हीटर जैसे आधुनिक साधन। ऐसे में छोटे दरवाजे घर के अंदर का तापमान संतुलित रखने में मदद करते थे। गर्मी के मौसम में बाहर की गर्म हवा कम मात्रा में घर के अंदर प्रवेश करती थी, जबकि सर्दियों में घर की गर्माहट लंबे समय तक बनी रहती थी। इससे ऊर्जा के बिना ही प्राकृतिक तापमान नियंत्रण संभव हो जाता था। सुरक्षा के लिहाज से भी था बेहतर पुराने समय में चोरी, डकैती और बाहरी हमलों का खतरा अधिक रहता था। छोटे दरवाजों से कोई भी व्यक्ति सीधे और तेजी से घर में प्रवेश नहीं कर सकता था। घर में आने वाले को झुकना पड़ता था, जिससे उसकी गति धीमी हो जाती थी। ऐसे में घर के लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए प्रतिक्रिया देने का अतिरिक्त समय मिल जाता था। मिट्टी और पत्थर के घरों की मजबूती उस समय अधिकांश घर मिट्टी, ईंट या पत्थर से बनाए जाते थे। भारी लकड़ी के बड़े दरवाजे इन दीवारों पर ज्यादा दबाव डाल सकते थे। इसी वजह से दरवाजों का आकार छोटा रखा जाता था, ताकि चौखट और दीवारों पर कम भार पड़े और घर लंबे समय तक मजबूत बना रहे। घर की निजता बनाए रखने में मददगार छोटे और नीचे बने दरवाजे घर के अंदर की गतिविधियों को बाहर से आसानी से दिखाई नहीं देने देते थे। इससे आंगन और परिवार, विशेषकर महिलाओं की निजता बनी रहती थी। ग्रामीण और पारंपरिक समाज में इसे काफी महत्वपूर्ण माना जाता था। सम्मान और विनम्रता का प्रतीक भारतीय परंपरा में यह भी माना जाता था कि जब कोई व्यक्ति झुककर किसी के घर में प्रवेश करता है, तो वह अपने अहंकार को बाहर छोड़कर सम्मान के साथ अंदर आता है। यही कारण है कि कई पुराने मंदिरों और पारंपरिक भवनों के प्रवेश द्वार भी अपेक्षाकृत छोटे बनाए जाते थे, ताकि प्रवेश करने वाला स्वाभाविक रूप से सिर झुकाए। क्या यह पूरी तरह सच है? हालांकि इन कारणों का उल्लेख इतिहास, पारंपरिक वास्तुकला और लोक मान्यताओं में मिलता है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर पुराने घर में दरवाजे छोटे होने का कारण एक जैसा नहीं था। अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु, निर्माण सामग्री, स्थानीय सुरक्षा जरूरतों और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार इनके आकार में अंतर देखने को मिलता था।
स्ट्रीट फूड जैसा स्वाद, सेहत भी बरकरार! नोट करें हेल्दी होममेड मोमोज की सीक्रेट रेसिपी

नई दिल्ली । मोमोज आज बच्चों से लेकर बड़ों तक का पसंदीदा स्ट्रीट फूड बन चुके हैं। हालांकि बाजार में मिलने वाले ज्यादातर मोमोज मैदे से बनाए जाते हैं, जिनका अधिक सेवन सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता। अगर आपके बच्चे भी बार-बार मोमोज खाने की जिद करते हैं, तो अब चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप इन्हें घर पर ही हेल्दी तरीके से तैयार कर सकते हैं। इस रेसिपी में मैदे की जगह मल्टीग्रेन आटे का इस्तेमाल किया जाता है और भरावन में ताजी सब्जियां व पनीर डाला जाता है, जिससे स्वाद के साथ पोषण भी मिलता है। सामग्री आटे के लिए2 कप मल्टीग्रेन आटा 1 बड़ा चम्मच दूध चुटकीभर नमक आवश्यकतानुसार पानी स्टफिंग के लिए2 चम्मच तेल 2 कप कद्दूकस की हुई पत्तागोभी ½ कप मैश किया हुआ पनीर 1 बारीक कटी गाजर ½ कप बारीक कटा प्याज 1 छोटा चम्मच अदरक-लहसुन पेस्ट 1 छोटा चम्मच सोया सॉस ½ छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर स्वादानुसार नमक ऐसे बनाएं हेल्दी मोमोज सबसे पहले मल्टीग्रेन आटे में नमक, दूध और पानी डालकर मुलायम आटा गूंथ लें और 15-20 मिनट के लिए ढककर रख दें। अब एक पैन में तेल गर्म करें और उसमें अदरक-लहसुन का पेस्ट हल्का भून लें। इसके बाद प्याज, गाजर और पत्तागोभी डालकर तेज आंच पर हल्का स्टिर फ्राई करें, ताकि सब्जियां कुरकुरी बनी रहें। अब इसमें सोया सॉस, काली मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाकर अच्छी तरह चलाएं। अगर सब्जियों से ज्यादा पानी निकल जाए, तो स्टफिंग को सूती कपड़े में हल्का निचोड़ लें। अब आटे की छोटी-छोटी लोइयां बेलें, बीच में तैयार स्टफिंग रखें और मनचाही मोमोज की शेप दें। स्टीमर की ट्रे में हल्का तेल लगाएं या पत्तागोभी के पत्ते बिछा दें। सभी मोमोज सजाकर 10-12 मिनट तक स्टीम करें। जब मोमोज हल्के चमकदार दिखाई देने लगें, तो समझिए वे तैयार हैं। इन्हें गर्मागर्म चिली-गार्लिक सॉस या हेल्दी डिप के साथ परोसें। परफेक्ट मोमोज बनाने के खास टिप्स मोमोज का आटा मुलायम रखने के लिए थोड़ा दूध मिलाएं। स्टफिंग हमेशा पूरी तरह ठंडी होने के बाद ही भरें। बेले हुए मोमोज के रैपर को सूखने न दें, उन्हें ढककर रखें। स्टीमर में पत्तागोभी के पत्ते बिछाने से मोमोज चिपकते नहीं हैं। स्टीम होने के तुरंत बाद मोमोज सर्व करें, इससे उनका स्वाद और टेक्सचर दोनों बेहतर रहते हैं।
सिर पर बाल और शरीर पर कम रोएं क्यों? इंसान की बनावट के पीछे छिपा है दिलचस्प वैज्ञानिक कारण

नई दिल्ली। इंसान के सिर पर घने बाल क्यों होते हैं जबकि शरीर के बाकी हिस्सों पर इतने ज्यादा बाल नहीं दिखाई देते। यह सवाल देखने में भले ही साधारण लगे लेकिन इसके पीछे मानव विकास की एक बेहद दिलचस्प और वैज्ञानिक कहानी छिपी हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसान की वर्तमान शारीरिक बनावट लाखों वर्षों में विकसित हुई है और सिर पर मौजूद बाल इस विकासक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आज के समय में सिर पर बालों को सुंदरता और व्यक्तित्व से जोड़कर देखा जाता है लेकिन उनकी असली भूमिका इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार लाखों साल पहले जब मानव पूर्वज अफ्रीका के गर्म और खुले सवाना क्षेत्रों में रहते थे तब उन्हें लंबे समय तक धूप में रहकर शिकार करना पड़ता था। ऐसे माहौल में शरीर का तापमान नियंत्रित रखना जीवन और मृत्यु का सवाल बन जाता था। यदि शरीर अत्यधिक गर्म हो जाता तो शिकार करना और जीवित रहना मुश्किल हो जाता। इसी आवश्यकता के कारण मानव शरीर में धीरे-धीरे बड़े बदलाव हुए। वैज्ञानिकों का मानना है कि समय के साथ शरीर के घने बाल कम होने लगे और उनकी जगह पसीने की ग्रंथियां अधिक सक्रिय हो गईं। पसीना शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है। जब पसीना त्वचा से वाष्पित होता है तो शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर निकल जाती है। यदि शरीर पर घने बाल मौजूद रहते तो पसीना आसानी से नहीं सूख पाता और शरीर का तापमान नियंत्रित रखना कठिन हो जाता। यही वजह है कि विकासक्रम के दौरान शरीर के अधिकांश हिस्सों से घने बाल गायब हो गए और उनकी जगह बेहद बारीक बाल रह गए। हालांकि शरीर से बाल कम होना जरूरी था लेकिन सिर के साथ ऐसा नहीं हुआ। सिर मानव शरीर का वह हिस्सा है जो सीधे सूर्य की किरणों के संपर्क में सबसे ज्यादा रहता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सिर पर मौजूद बाल प्राकृतिक ढाल की तरह काम करते हैं। ये तेज धूप और गर्मी को सीधे खोपड़ी तक पहुंचने से रोकते हैं जिससे मस्तिष्क अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। बालों की यह परत सूर्य की हानिकारक गर्मी को कम करती है और लू या सनस्ट्रोक जैसी स्थितियों से बचाने में मदद करती है। यही कारण है कि विकासक्रम के दौरान सिर पर बाल बने रहे और घने होते गए। सिर्फ सिर ही नहीं बल्कि चेहरे पर मौजूद दाढ़ी और मूंछों की कहानी भी अलग है। वैज्ञानिकों के अनुसार चेहरे के बालों का विकास मुख्य रूप से सामाजिक पहचान और आकर्षण से जुड़ा हुआ है। हार्मोन और आनुवंशिक गुण यह तय करते हैं कि किसी व्यक्ति के चेहरे पर कितने बाल होंगे। पुराने समय में दाढ़ी और मूंछ परिपक्वता ताकत और बेहतर स्वास्थ्य के संकेत माने जाते थे। यही वजह है कि चेहरे के बाल मानव समाज में पहचान और व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए। इस तरह इंसान के सिर पर घने बाल और शरीर पर कम बाल होना प्रकृति की एक अद्भुत जैविक व्यवस्था है। सिर के बाल जहां मस्तिष्क की सुरक्षा और तापमान नियंत्रण के लिए विकसित हुए वहीं चेहरे के बाल पहचान और सामाजिक संकेतों का माध्यम बने। मानव शरीर का यह अनोखा संतुलन हमें बताता है कि विकासक्रम ने किस तरह इंसान को बदलते वातावरण के अनुसार ढाला और जीवित रहने के लिए उसे सबसे उपयुक्त रूप प्रदान किया।