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क्या जनप्रतिनिधियों को भी आम नागरिकों की तरह जवाबदेह बनाया जाए?

– अशोक कुमार झा लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार समानता है। संविधान का मूल भाव भी यही कहता है कि कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं लेकिन जब व्यवहारिक व्यवस्था की बात आती है तो अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में सभी के लिए नियम समान हैं? हाल के वर्षों में अनेक राज्यों में यह देखा गया है कि यदि किसी गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, उसके पास मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर या अन्य कुछ संपत्तियां आ जाती हैं अथवा उसकी आय निर्धारित सीमा से ऊपर चली जाती है तो उसका राशन कार्ड निरस्त किया जा सकता है या उसकी पात्रता समाप्त हो सकती है। ऐसे में समाज में यह बहस तेज हो जाती है कि यदि सामान्य नागरिकों के लिए इतनी कठोर पात्रता शर्तें हैं, तो क्या जनप्रतिनिधियों—जैसे सांसद, विधायक या मंत्री को भी अपनी आर्थिक स्थिति के आधार पर मिलने वाली सरकारी सुविधाओं की समीक्षा के दायरे में लाया जाना चाहिए? सोशल मीडिया पर प्रसारित एक संदेश भी इसी भावना को व्यक्त करता है कि यदि किसी गरीब के पास मोटरसाइकिल होने से उसका राशन कार्ड समाप्त हो सकता है, तो करोड़पति नेताओं की पेंशन और अन्य सुविधाएं भी समाप्त होनी चाहिए। यह कथन भावनात्मक अपील अवश्य करता है लेकिन इस विषय का गंभीर और संवैधानिक विश्लेषण आवश्यक है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि राशन कार्ड कोई सामान्य सरकारी उपहार नहीं है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। इसलिए इसकी पात्रता आय, संपत्ति और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर तय की जाती है। यदि कोई परिवार अब गरीब की श्रेणी में नहीं आता, तो सिद्धांततः उसकी जगह किसी अधिक जरूरतमंद परिवार को मिलनी चाहिए। इस दृष्टि से पात्रता की समीक्षा अनुचित नहीं कही जा सकती, बशर्ते यह निष्पक्ष, पारदर्शी और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित हो। दूसरी ओर, सांसदों और विधायकों को मिलने वाली पेंशन, वेतन और अन्य सुविधाएं अलग कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित होती हैं। इनका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को उनके सार्वजनिक दायित्वों के निर्वहन में सहायता देना तथा संबंधित कानूनों के अनुसार उन्हें पारिश्रमिक और कुछ मामलों में पेंशन उपलब्ध कराना है। इन व्यवस्थाओं पर समय-समय पर सार्वजनिक बहस होती रही है कि क्या इनका स्वरूप, मात्रा और पात्रता वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप है। यही वह बिंदु है जहां समाज में असमानता की भावना जन्म लेती है। जब एक गरीब परिवार मामूली आय बढ़ने पर सरकारी योजनाओं से बाहर हो जाता है और दूसरी ओर आर्थिक रूप से समृद्ध जनप्रतिनिधियों को भी विभिन्न सुविधाएं मिलती रहती हैं, तो आम नागरिकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या जवाबदेही के मानक सभी के लिए समान होने चाहिए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई लोकतांत्रिक देशों में जनप्रतिनिधियों के वेतन और पेंशन की समय-समय पर स्वतंत्र आयोगों द्वारा समीक्षा की जाती है। उद्देश्य यह होता है कि न तो उन्हें अनावश्यक विशेषाधिकार मिले और न ही वे आर्थिक असुरक्षा के कारण स्वतंत्र निर्णय लेने में बाधित हों। इसलिए भारत में भी समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि सांसदों और विधायकों की पेंशन व्यवस्था, आजीवन सुविधाओं और अन्य विशेषाधिकारों की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या एक बार केवल एक कार्यकाल विधायक या सांसद रहने वाला व्यक्ति आजीवन पेंशन का अधिकारी होना चाहिए? अनेक नागरिक संगठन इस व्यवस्था की समीक्षा की मांग करते रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजनाएं लागू हो सकती हैं, तो जनप्रतिनिधियों की पेंशन व्यवस्था भी समयानुकूल पुनर्विचार के योग्य है। दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि जनप्रतिनिधित्व भी सार्वजनिक सेवा है और उसके लिए उचित वित्तीय सुरक्षा आवश्यक है। इसलिए यह विषय नारेबाजी से नहीं बल्कि नीति-आधारित विमर्श से तय होना चाहिए। राशन कार्ड की पात्रता को लेकर भी अनेक शिकायतें सामने आती रही हैं। कई बार वास्तविक गरीब सूची से बाहर रह जाते हैं जबकि अपेक्षाकृत सक्षम लोग लाभ लेते रहते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल नियमों की नहीं बल्कि उनके निष्पक्ष क्रियान्वयन की भी है। यदि पात्रता निर्धारण पारदर्शी और नियमित रूप से अद्यतन हो, तो सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास तभी मजबूत होता है जब सत्ता में बैठे लोग स्वयं भी वही मानक अपनाने को तैयार हों जिनका पालन वे आम नागरिकों से अपेक्षित करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि राशन कार्ड और जनप्रतिनिधियों की पेंशन जैसी अलग-अलग प्रकृति की व्यवस्थाओं को सीधे समान माना जाए बल्कि यह कि सभी सार्वजनिक व्यय और सुविधाओं की समय-समय पर निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए ताकि वे पारदर्शी, न्यायसंगत और सार्वजनिक हित के अनुरूप रहें। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें गरीबों के अधिकारों की रक्षा करें, पात्र लाभार्थियों को योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करें, अपात्र लोगों को सूची से हटाएं और साथ ही जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं पर भी समय-समय पर सार्वजनिक समीक्षा और पारदर्शिता बनाए रखें। इससे लोकतंत्र में विश्वास बढ़ेगा और जनता को यह संदेश जाएगा कि जवाबदेही केवल आम नागरिकों के लिए नहीं बल्कि सार्वजनिक पद पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। अंततः यह बहस किसी एक वर्ग के विरुद्ध नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में समानता, पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करने की बहस है। यदि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ “जनता का शासन, जनता के लिए और जनता द्वारा” है, तो यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि सरकारी संसाधनों, सुविधाओं और विशेषाधिकारों के संबंध में बने नियम समय-समय पर निष्पक्ष रूप से परखे जाएं और जहां आवश्यक हो, उनमें सुधार किया जाए। यही एक सशक्त, उत्तरदायी और विश्वासपूर्ण लोकतंत्र की पहचान होगी।

क्या हम विकास और विनाश के बीच संतुलन साध पाएंगे?

– ललित गर्गवेनेजुएला में हाल में आए भीषण भूकम्प ने केवल एक देश को नहीं, बल्कि पूरी मानवता को झकझोर दिया है। मृतकों और लापता लोगों की संख्या समय के साथ बदलती रही हो, लेकिन त्रासदी की भयावहता निर्विवाद है। हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खोने की असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। ऐसे प्रत्येक अवसर पर पूरी दुनिया संवेदना व्यक्त करती है, राहत सामग्री भेजती है, सहायता अभियान चलाती है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार हमारे सामने खड़ा हो जाता है-क्या हम हर बड़ी आपदा से कोई स्थायी सबक सीखते हैं या फिर कुछ दिनों की चर्चा और शोक के बाद सब कुछ भुलाकर पुनः उसी लापरवाह विकास-यात्रा एवं प्रकृति की घोर उपेक्षा पर निकल पड़ते हैं? प्राकृतिक आपदाएं कभी कैलेंडर देखकर नहीं आतीं। वे न देश चुनती हैं, न मौसम और न समय। जब धरती कांपती है, नदियां उफान पर आती हैं, पहाड़ दरकते हैं या समुद्र विकराल रूप धारण कर लेता है, तब विकास के बड़े-बड़े दावे, ऊंची-ऊंची इमारतें और तकनीकी उपलब्धियों का अहंकार कुछ ही क्षणों में धराशायी हो जाता है। ऐसे समय में किसी देश की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि उसकी पूर्व तैयारी, संवेदनशील शासन व्यवस्था और जागरूक नागरिक होते हैं। वेनेजुएला की त्रासदी ने एक सकारात्मक पक्ष भी सामने रखा। आधुनिक तकनीक ने कुछ क्षेत्रों में लोगों को भूकम्प के झटके महसूस होने से कुछ सेकंड पहले चेतावनी दी। सुनने में यह समय बहुत कम प्रतीत होता है, लेकिन आपदा की घड़ी में यही कुछ सेकंड जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय कर सकते हैं। विज्ञान इस दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे प्रारंभिक चेतावनी तंत्र अधिक सटीक, अधिक तेज और अधिक व्यापक बनाए जाएं, ताकि अधिक से अधिक लोगों का जीवन सुरक्षित रह सके। भारत के लिए यह विषय केवल एक अंतरराष्ट्रीय समाचार नहीं है। हमारा देश स्वयं भूकम्प, बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने, चक्रवात और सुनामी जैसी अनेक प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलता रहा है। 1993 का लातूर भूकम्प, 2001 का भुज भूकम्प, 2004 की सुनामी, 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2023 की जोशीमठ भू-धंसाव की घटनाएं तथा हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ती बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं आज भी हमारी स्मृतियों में जीवित हैं। इन सभी घटनाओं का एक ही संदेश है-प्रकृति को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैज्ञानिक आज भी यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि किस दिन, किस समय और किस स्थान पर भूकम्प आएगा, लेकिन वे वर्षों से यह चेतावनी अवश्य देते रहे हैं कि भारत का लगभग साठ प्रतिशत भूभाग किसी न किसी स्तर के भूकम्पीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। हिमालयी क्षेत्र, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर-पूर्व, गुजरात और अनेक अन्य क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील माने जाते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि यदि भूकम्प की सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं है, तो भी पूर्व तैयारी पूरी तरह संभव है। दुर्भाग्य यह है कि हम तैयारी की अपेक्षा आपदा के बाद राहत और पुनर्वास पर अधिक ध्यान देते हैं। आज देश के लगभग हर शहर में कंक्रीट के विशाल जंगल तेजी से खड़े हो रहे हैं। बहुमंजिला आवासीय परिसर, व्यावसायिक भवन, गगनचुंबी टावर और स्मार्ट सिटी विकास की नई पहचान बन चुके हैं। मुंबई, गुरुग्राम, नोएडा, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और अब जयपुर जैसे शहर भी ऊंची-ऊंची इमारतों की दौड़ में शामिल हो चुके हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन भवनों की मजबूती केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए है या किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना करने के लिए भी? किसी भी भवन की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब धरती कांपती है, जब अचानक बाढ़ आती है, जब तेज हवाएं चलती हैं या जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है। यदि उस समय भवन लोगों की जान बचा सके, तभी उसे वास्तविक विकास का प्रतीक माना जाना चाहिए। केवल ऊंचाई, चमक-दमक और आधुनिक सुविधाएं किसी भवन को सुरक्षित नहीं बनातीं। भारत में भूकम्परोधी निर्माण के लिए मानक और नियम मौजूद हैं। भारतीय मानक ब्यूरो ने स्पष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं। समस्या नियमों की कमी नहीं, बल्कि उनके अनुपालन की है। क्या प्रत्येक बहुमंजिला इमारत वास्तव में उन्हीं मानकों के अनुरूप निर्मित हो रही है? क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच होती है? क्या निर्माण के बाद संरचनात्मक सुरक्षा का स्वतंत्र परीक्षण किया जाता है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है, तो चिंता स्वाभाविक है। नोएडा में अवैध रूप से निर्मित सुपरटेक ट्विन टावरों को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ध्वस्त किया जाना इस बात का प्रतीक है कि किस प्रकार नियमों की अनदेखी कर निर्माण कार्य किए जाते रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि कोई निर्माण अवैध था, तो उसे बनने की अनुमति किसने दी? निर्माण पूरा होने तक प्रशासन मौन क्यों रहा? क्या विकास के नाम पर कुछ लोगों के आर्थिक लाभ के लिए लाखों नागरिकों के जीवन को जोखिम में डाला जा सकता है? यह केवल कानूनी प्रश्न नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी है। शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर विकास न्यासों तथा भवन निर्माण की अनुमति देने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी केवल नक्शों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित नहीं हो सकती। प्रत्येक निर्माण की तकनीकी, पर्यावरणीय और संरचनात्मक जांच अत्यंत कठोरता से की जानी चाहिए। सुरक्षा मानकों का पालन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की रक्षा का दायित्व है। एक अन्य गंभीर चिंता जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ की है। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करना, जंगलों का अंधाधुंध विनाश, अतिक्रमण, खनन और अनियोजित शहरीकरण ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप भूस्खलन, अचानक बाढ़, शहरी जलभराव और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बार-बार आने वाली त्रासदियां हमें चेतावनी दे रही हैं कि विकास का मॉडल प्रकृति-विरोधी नहीं, बल्कि प्रकृति-संगत होना चाहिए। यह मान लेना भी खतरनाक है कि जिस क्षेत्र में पहले कभी बड़ा भूकम्प नहीं आया, वहां भविष्य में भी खतरा नहीं होगा। धरती के भीतर क्या हलचल चल रही है, इसका पूरा रहस्य आज भी मानव नहीं जान पाया है। इसलिए केवल पुराने अनुभवों के आधार पर किसी क्षेत्र को पूर्णतः सुरक्षित

मानसून के मिजाज पर अल नीनो का असर, कुछ इलाकों में अतिवृष्टि तो कहीं बारिश की कमी की आशंका

विश्व मौसम संगठन और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार वर्ष 2026 में प्रशांत महासागर में रिकॉर्ड तापीय विसंगति के साथ ऐतिहासिक ‘सुपर अल नीनो’ सक्रिय हो चुका है जो कि भारत के लिए कमजोर मानसून और सूखे की गंभीर चेतावनी है। भारत में मानसून केवल मौसमीय घटना नहीं है। देश की लगभग आधी कृषि आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वर्षा पर निर्भर है। करोड़ों किसानों की आय, खाद्यान्न उत्पादन, पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था मानसून से प्रभावित होती है। यही कारण है कि अल नीनो की हर आहट नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और किसानों की चिंता बढ़ा देती है। हालांकि देश ने 2023 के अल नीनो का कुशल प्रबंधन किया था, लेकिन इस बार का संकट मैदानी कृषि से कहीं आगे बढ़कर संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र पर मंडरा रहा है। मैदानों में कम बारिश होने पर भी नलकूपों और सूखा-सहिष्णु बीजों के रूप में कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएं संभव हैं, परंतु उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे हिमालयी राज्यों की नाजुक पारिस्थितिकी में इस तापीय असंतुलन को कृत्रिम उपायों से नियंत्रित करना आसान नहीं। यही नहीं मानसून पर्वतीय क्षेत्रों के सदानीरा जल स्रोतों, हिमनदों, जंगलों और संपूर्ण जैव विविधता की जीवनरेखा है, जो अब सीधे खतरे में है।इतिहास वैज्ञानिक शोधों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में दो से तीन गुना तेजी से गर्म हो रहा है। 2026 के इस ‘सुपर अल नीनो’ जनित अतिरिक्त ताप से हिमालयी हिमनदों के पीछे खिसकने की दर तेज हो सकती है तथा शीतकालीन स्नोपैक का घनत्व घटने से गंगा-यमुना जैसी बारहमासी नदियों का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। वैसे भी त्वरित हिमनद गलन से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों का खतरनाक विस्तार हो रहा है। चमोली (2021) और सिक्किम की दक्षिण ल्होनाक त्रासदी (2023) की आपदायें इस खतरे के स्पष्ट उदाहरण हैं। अल नीनो के कारण कुल मानसूनी वर्षा भले ही औसतन 90 प्रतिशत तक सीमित रहे, लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से स्थानीय स्तर पर बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता बढ़ने की चेतावनी विशेषज्ञ दे रहे हैं। मौसम विज्ञान विभाग ने इस वर्ष मानसून को दीर्घकालिक औसत के केवल 90 प्रतिशत रहने की संभावना जताई है, जो पिछले 11 वर्षों में सबसे कमजोर पूर्वानुमान है। साथ ही मौसम वैज्ञानिकों ने सचेत किया है कि कुल वर्षा कम होने का अर्थ यह नहीं है कि पहाड़ों में आपदाएं नहीं आएंगी। बढ़ते तापमान के कारण वातावरण में जलवाष्प धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है। जब अत्यधिक नमी युक्त हवा स्थानीय वायुमंडलीय कारकों या सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ से टकराती है, तो कम समय में एक ही स्थान पर मूसलाधार बारिश या बादल फटने जैसी स्थितियां बन जाती हैं। उत्तराखंड के अनुभव बताते हैं कि कमजोर मानसून के वर्षों में भी अचानक बाढ़, तीव्र भूस्खलन और मलबे के बहाव की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जो संवेदनशील पहाड़ी ढलानों और बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। हिमालयी क्षेत्र में इसका एक और तात्कालिक प्रभाव पारंपरिक जल सुरक्षा और ग्रामीण जनजीवन पर पड़ता है। जून के शुरुआती पखवाड़े में ही उत्तराखंड में वर्षा सामान्य से काफी कम दर्ज की गई है। पहाड़ों में जीवन का आधार कहे जाने वाले धारे, नौले, गधेरे और झरने पर्याप्त वर्षा न होने के कारण पुनर्भरित नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप न केवल गर्मियों में बल्कि आगामी शीतकाल में भी गंभीर पेयजल संकट पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है। हिमालयी राज्यों के सैकड़ों गांव पहले ही जलाभाव के कारण पलायन की कगार पर हैं और यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। पानी की कमी और बढ़ते तापमान का सीधा संबंध हिमालयी जंगलों में लगने वाली आग से भी है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कई वर्षों का अनुभव बताता है कि जब भी शुष्क मौसम लंबा खिंचा है, वनाग्नियों ने विकराल रूप धारण कर हजारों हेक्टेयर वन संपदा, वन्यजीवों और पर्वतीय पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। इसके अलावा पर्वतीय कृषि और बागवानी भी इसकी सीधी मार झेलती है। मैदानों की तरह पहाड़ों में नहरों का नेटवर्क नहीं है और यहां की 80 प्रतिशत से अधिक खेती वर्षा पर निर्भर है। जून और जुलाई के महत्वपूर्ण महीनों में पर्याप्त बारिश न होने से धान, मक्का, मंडुवा और दलहन जैसी खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होती है। साथ ही लंबे सूखे के कारण मिट्टी की नमी घटने से मूल्यवान बागवानी उत्पादों की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से सेब की आवश्यक चिलिंग रिक्वायरमेंट पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे बागवानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। इस स्थिति से निपटने की वर्ष 2023 की प्रबंधकीय सफलता से उम्मीद तो मिलती है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों को यह समझना होगा कि पहाड़ों के लिए केवल पारंपरिक कृषि आकस्मिक योजनाएं या कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं होगा। हिमालय के संदर्भ में आपदा प्रबंधन और विकास की रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। सबसे पहली प्राथमिकता उच्च हिमालयी हिमनदीय झीलों की उपग्रह और सेंसर आधारित चौबीसों घंटे निगरानी होनी चाहिए, ताकि किसी भी संभावित विस्फोट की सूचना निचले इलाकों तक समय रहते पहुंच सके। वर्ष 2026 का अल नीनो भारत के लिए केवल कृषि उत्पादन या जीडीपी को बचाने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय जल सुरक्षा के उद्गम स्थल, हिमालय की रक्षा की वास्तविक परीक्षा है। वैश्विक तापवृद्धि ने अल नीनो और ला नीना के पारंपरिक चक्र को अधिक अनिश्चित और आक्रामक बना दिया है। प्रश्न यह नहीं है कि अल नीनो का प्रभाव कितना बड़ा होगा, बल्कि यह है कि क्या हमारे नीति निर्माता योजनाएं बनाते समय देश के सबसे नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को केंद्र में रख पाते हैं। आने वाले कुछ महीने न केवल इस वर्ष के मौसम का रुख तय करेंगे, बल्कि हिमालय के जल, जंगल, जमीन और जीवन की सुरक्षा के लिए एक नए और व्यावहारिक रोडमैप की दिशा भी निर्धारित करेंगे।इतिहास अल नीनो एक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और भारत सहित एशिया के अनेक देशों में मानसूनी वर्षा

UP Politics: ब्राह्मण वोट बैंक पर छिड़ी बड़ी जंग, SP-BJP के बीच चुनाव से पहले शुरू हुआ शह-मात का खेल

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विपक्षी दलों के घेरे को मजबूती से तोड़ते हुए उन्हें कमजोर करती जा रही है। ऐसे में कई लोगों का अनुमान है कि तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना समूह के पतन के बाद, अब समाजवादी पार्टी (सपा) की बारी है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव अगले साल होने हैं। हाल में प्रदेश के मंत्री संजय निषाद ने कहा कि उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के 37 सांसदों में से दो दर्जन से अधिक सांसद उनके संपर्क में हैं और दल-बदल करने को तैयार हैं। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, जो आमतौर पर बड़बोलापन नहीं दिखाते, उन्होंने भी संकेत दिया कि 25 से 26 सांसद जल्द ही समाजवादी पार्टी छोड़ सकते हैं। लेकिन सबसे स्पष्ट बयान उत्तर प्रदेश के पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर का था, जिनकी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भाजपा की सहयोगी है। उन्होंने इशारों-इशारों में ‘बागी’ बलिया के एक बेटे का जिक्र किया, जो भाजपा में अपने समर्थकों को लाने का बीड़ा उठाएगा। बलिया को बागी इसलिए कहा जाता है  क्योंकि 1857 के विद्रोह के नायक मंगल पांडे इसी जिले से थे। बलिया से सपा के सांसद सनातन पांडेय काफी मुखर और बेबाक हैं। पांडेय ने बेशक इस दावे को खारिज कर दिया है लेकिन राजभर का तर्क दिलचस्प है। उनका कहना है कि पांडेय का विद्रोह पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा इस महीने की शुरुआत में ब्राह्मण नेताओं के साथ आयोजित परामर्श बैठक से उपजे असंतोष के कारण है। विधान सभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण पहचान की राजनीति फिर से जोर पकड़ रही है। हाल के महीनों में हुए कई राजनीतिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक घटनाक्रम इसी ओर इशारा करते हैं। इस साल जनवरी में भाजपा के 50 से अधिक मौजूदा विधायक और एमएलसी (सभी ब्राह्मण) लखनऊ में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर पर ‘सहभोज’ के लिए मिले। इस बैठक को सामाजिक मेलजोल से ज्यादा सामूहिक राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में देखा गया। यह बैठक कुंभ में ब्राह्मण युवकों के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस के ‘दुर्व्यवहार’ के बाद हुई थी। इनमें से अधिकांश युवक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अनुयायी थे, जो उत्तर प्रदेश सरकार की कुछ नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और जिनके खिलाफ बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन के लिए एफआईआर दर्ज की गई है। उन्होंने अयोध्या राम मंदिर के प्रशासकों द्वारा धन के क​थित दुरुपयोग के बारे में भी बात की है। जन्म से क्षत्रिय योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच तनाव भाजपा का सबसे बड़ा राज रहा है। वर्ष 1990 से, जब राष्ट्रीय मोर्चा-वाम मोर्चा सरकार ने सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की, तब से ब्राह्मणों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से भाजपा की ओर सामूहिक रूप से अपनी निष्ठा बदलकर राजनीतिक प्रतिक्रिया व्यक्त की। पिछड़े वर्गों के प्रति भाजपा के स्पष्ट झुकाव के बावजूद, वे भाजपा के प्रति वफादार बने रहे, सिवाय उन मौकों के जब उन्होंने 2007 में बसपा और 2012 में सपा का समर्थन किया, हालांकि सपा का समर्थन कुछ हद तक कम था। वर्ष 2017 में भाजपा को इस समुदाय के लगभग 82 फीसदी मत मिले और उसके 58 ब्राह्मण प्रत्याशी निर्वाचित हुए। योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद भाजपा के लिए ब्राह्मणों का समर्थन कम होने का आभास सबसे पहले सपा को ही हुआ। परशुराम की स्मृति में सार्वजनिक अवकाश घो​षित करने और उनकी ऊंची मूर्ति लगाने (2020) के वादे से लेकर ब्राह्मण संगठनों और नेताओं तक पहुंच बनाने तक, सपा ने कई प्रयास किए। हालांकि भाजपा ब्राह्मणों के उससे दूर होने को लेकर बहुत चिंतित नहीं है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पतन के बाद ब्राह्मणों के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं, फिर भी वह कार्यकर्ताओं के मनोबल में गिरावट और जाति आधारित आंतरिक कलह से होने वाले नुकसान को लेकर चिंतित है। ओबीसी नेता और उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा ब्राह्मण सहभोज का आयोजन करने वालों की सार्वजनिक रूप से निंदा करना इसका पहला उदाहरण था। हालांकि, भाजपा जातिवादी आग्रह को भले ही गलत ठहराए, पर इस होड़ को लेकर वह कुछ खास नहीं कर सकती। सनातन पांडेय के बारे में बात की जाए तो वह खुद को ‘झगड़ालू’ बताते हैं और जिला अ​धिकारियों को सार्वजनिक रूप से यह धमकी देने के लिए जाने जाते हैं कि अगर वे अपना कर्तव्य नहीं निभाएंगे तो उन्हें परिणाम भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने 2024 के लोक सभा चुनावों में बलिया से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को हराया था, लेकिन उससे पहले उन्हें लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ा है। उनके पास सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा है और राजनीति में आने से पहले वह उत्तर प्रदेश सरकार में जूनियर इंजीनियर थे। वे 2017 में विधान सभा चुनाव में सपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े थे लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। असंसदीय भाषा के प्रयोग के कारण सदन में उनके भाषणों के कुछ अंश हटा दिए गए हैं। इसलिए शायद वह संसदीय लोकतंत्र के आदर्श उदाहरण नहीं हैं। लेकिन उन्हें बागी बलिया का सक्षम रक्षक माना जाता है। क्या ऐसा जुझारू व्यक्तित्व वास्तव में सपा से भाजपा में पलायन के लिए एक बड़े समूह का नेतृत्व कर सकता है? शायद वह मदद कर सकें। लेकिन इन कदमों से यह संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश में अंदर ही अंदर जातिगत समीकरणों में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है।

16 जून का इतिहास: शिवाजी महाराज की वीरता

इतिहास के पन्नों में 16 जून का दिन कई महत्वपूर्ण घटनाओं और उपलब्धियों के कारण विशेष स्थान रखता है। यह तारीख केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व इतिहास के लिए भी यादगार रही है। समय-समय पर इस दिन घटित घटनाओं ने समाज, राजनीति, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान की है। छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के उन महान योद्धाओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने स्वराज्य की अवधारणा को साकार रूप दिया। उनके साहस, नेतृत्व और रणनीति ने मराठा साम्राज्य को नई पहचान दी। शिवाजी महाराज का जीवन भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और सुशासन का प्रतीक माना जाता है। आज भी उनकी वीरता और राष्ट्र निर्माण की भावना देशवासियों को प्रेरित करती है। 16 जून का दिन विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भी विशेष महत्व रखता है। भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष में अपने उल्लेखनीय योगदान से दुनिया भर में पहचान बनाई। उन्होंने लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहकर कई रिकॉर्ड स्थापित किए और विज्ञान के क्षेत्र में नई पीढ़ी को प्रेरित किया। उनकी उपलब्धियां भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। इतिहासकारों का मानना है कि 16 जून को घटित कई घटनाओं ने अपने-अपने समय में समाज और शासन व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला। यह दिन हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल बीते समय की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाला अनुभव भी है। भारत के इतिहास में यह दिन उन महान व्यक्तित्वों को स्मरण करने का अवसर भी है, जिन्होंने अपने कार्यों और उपलब्धियों से देश का नाम रोशन किया। चाहे वह युद्धभूमि में दिखाई गई वीरता हो, विज्ञान के क्षेत्र में हासिल की गई सफलता हो या समाज सुधार के लिए किए गए प्रयास, 16 जून का इतिहास प्रेरणादायक उदाहरणों से भरा हुआ है। आज के दौर में जब नई पीढ़ी तेजी से बदलती दुनिया के साथ आगे बढ़ रही है, तब इतिहास के ऐसे दिनों को याद करना और उनसे सीख लेना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इतिहास हमें बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ संकल्प, साहस और मेहनत के बल पर असंभव को संभव बनाया जा सकता है। 16 जून की ऐतिहासिक घटनाएं हमें यह संदेश देती हैं कि राष्ट्र निर्माण में हर पीढ़ी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि प्रेरणा, उपलब्धि और गौरव का प्रतीक बनकर हमारे सामने आता है।

फीफा का नया मॉडल: खेल, दर्शक और बढ़ता व्यावसायीकरण..

फीफा द्वारा आयोजित 23वें फुटबॉल विश्व कप की शुरुआत हो गई है। इस बार 39 दिन चलने वाले इस टूर्नामेंट की सबसे गौर करने वाली बात यही है कि यह अपने सर्जक जूल्स रिमेट द्वारा प्रतिपादित मूल मूल्यों से कितना भटक गया है। पहला विश्व कप 1930 में उरुग्वे में खेला गया था। उस समय फीफा अध्यक्ष ने विश्व कप को श्रमिक वर्ग के खिलाड़ियों के लिए एक पेशेवर मंच बनाकर इसे सार्वभौमिक एकजुटता और शांति को बढ़ावा देने के साधन के रूप में देखा था। हालांकि 18 कैरट सोने की ट्रॉफी के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे 1,248 फुटबॉलर अभी भी साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन यह कहना उचित होगा कि खेल संस्था के नियंत्रण से बाहर के कारणों से वैश्विक शांति हासिल करना असंभव हो गया है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि फीफा द्वारा इस टूर्नामेंट से अधिकतम राजस्व प्राप्त करने के लिए आक्रामक रूप से किए जा रहे प्रयासों से सार्वभौमिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, जो अब उसका सबसे बड़ा आय का स्रोत बन गया है। वर्ष 2010 से यही चलन रहा है। उस साल फीफा ने मेजबान देश के साथ प्रसारण अधिकार, प्रायोजन, टिकट और व्यापारिक वस्तुओं से होने वाली आय साझा करना बंद कर दिया था। इस कदम से खेल संस्था उन देशों से मेजबानी के प्रस्ताव स्वीकार करने लगी जो स्टेडियम और संबंधित बुनियादी ढांचे के निर्माण का भारी खर्च उठा सकते थे, न कि उन देशों से जिनकी फुटबॉल में मजबूत साख थी। व्लादीमिर पुतिन द्वारा क्राइमिया पर आक्रमण के चार साल बाद 2018 के टूर्नामेंट का आयोजन रूस को दिया जाना फीफा की अनैतिकता का पहला संकेत था। वर्ष 2022 में कतर का चयन व्यापक रूप से वोट खरीदने और धांधली का परिणाम था। वह एक ऐसा देश है जिसकी फुटबॉल में कोई साख नहीं है और लोकतांत्रिक साख तो उससे भी कम है। हालांकि नवीनतम त्रिपक्षीय आयोजन तीन लोकतांत्रिक देशों-अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको-में आयोजित किया जा रहा है लेकिन यह रिमेट की उम्मीदों से बिल्कुल परे है। सबसे पहले, जिस देश में सबसे अधिक मैच (कुल 104 में से 78) आयोजित होंगे, वह ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए है, ग्रीनहाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है, और एक हानिकारक आप्रवासन-विरोधी नीति का पालन करता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को एक विशेष शांति पुरस्कार से सम्मानित करने के बाद, फीफा ने मेजबान देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अमेरिका में होने वाले विश्व कप मैचों के लिए ईरानी प्रशंसकों के टिकट आवंटन रद्द कर दिए हैं। ईरानी टीम को अपने प्रतिनिधिमंडल के कई सदस्यों, जिनमें फुटबॉल महासंघ के प्रमुख भी शामिल थे, को वीजा नहीं मिलने के बाद अमेरिका से मेक्सिको में अपना ठिकाना बदलना पड़ा। एक सोमाली रेफरी को 11 घंटे की पूछताछ के बाद मियामी से वापस भेज दिया गया। कई गैर-श्वेत देशों के प्रशंसकों को दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश से इसी तरह के व्यवहार की उम्मीद है। अन्य लोग आईसीई एजेंटों द्वारा मनमानी गिरफ्तारी के डर से दूर रह रहे हैं। टिकटों की कीमतें भी कम चौंकाने वाली नहीं हैं। ग्रुप स्टेज के टिकट न केवल चार साल पहले कतर में टिकटों की कीमतों से दोगुने महंगे हैं, बल्कि फीफा वेबसाइट पर गतिशील दाम वाले टिकट और द्वितीयक मूल्य निर्धारण सुविधाओं की शुरुआत ने टिकटों की कीमतों को आसमान छूने लायक बना दिया है, जिससे आम प्रशंसक के लिए टिकट खरीदना लगभग नामुमकिन हो गया है। फाइनल के टिकट की कीमत 7,500 डॉलर से अधिक है, जो 2022 के फाइनल की कीमत से चार गुना से भी अधिक है। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो बहुचर्चित इंगलिश प्रीमियर लीग (19 मैच) के एक सीजन टिकट की कीमत 900 डॉलर है और लोकप्रिय यूएफा चैंपियंस लीग के द्वितीयक बिक्री पर एक टिकट की कीमत 348 डॉलर है। अंततः, फीफा दशकों से खेल को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले वास्तविक मेहनतकश प्रशंसकों को नाराज करके खुद ही अपना नुकसान करने का जोखिम उठा रहा है।

देश की राजनीति में खास मुकाम हासिल करने की कहानी.

प्रो. मनोज कुमारकुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता. वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है. एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने. लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है. आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं. 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था. जैसा होता है समय के साथ इस भाव में कहीं कमी दिखी तो चाहने वाले वैसे ही बने रहे. उनकी पहचान वैश्विक नेता के रूप में अपवाद स्वरूप बनी रही तो लगातार और बार-बार राज्यों के चुनावों में उनके नाम पर जीत इस बात की आश्वस्ति दिलाती रही कि ‘मोदी मैजिक’ कायम है. साथ ही अन्य दलों से टूटकर भी आने वाले जनप्रतिनिधियों ने उनके प्रति अपना भरोसा जताया, यह एक अलग किस्म का भारतीय राजनीति को अनुभव हुआ. इसके पहले भी दल-बदल होता रहा है लेकिन इसे दल-बदल के साथ ‘दिल’ बदल के रूप में देखा जाना चाहिए. आम आदमी पार्टी और हालिया तृणमूल कांग्रेस के सांसदों का उनके साथ चले जाना, यह परिघटना के रूप में परिभाषित होगा. हालांकि विरोधियों का कहना है कि उनका ‘डर से दिल’ बदला है. डर या विश्वास, दिल से दल बदल रहा है और 12 वर्षों में इस बदलाव को रेखांकित किया जाएगा. यह भी अजीब सा लगता है कि बार-बार कहा जा रहा है कि मोदी ने नेहरु के रिकार्ड को तोड़ दिया. अरे नहीं, भाई मोदी ने रिकार्ड बनाया है. भारतीय राजनीति में 12 वर्ष का समय बहुत होता है और जब चौतरफा हमले हो रहे हैं तब सत्ता में बने रहना सच में अर्थपूर्ण है. विरोध विरोधियों से हो तो सामान्य सी बात है लेकिन विरोध खुद के घर से हो तो यह चुनौती बन जाता है. विरोधियों के कुछ जायज हमले हैं तो कुछ नाजायज. कुछ हमले तो व्यक्तिगत हो रहे हैं, जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. नीति-नियमों के आधार पर तार्किक विरोध का हर मंच पर स्वागत होता है लेकिन पूर्वाग्रहों से भरे विरोध कोई मायने नहीं रखता है. खैर, वैश्विक संकट का असर भारत में दिखने लगा. अनेक स्तरों पर भारत भी इस संकट से जूझ रहा है और इसका परिणाम यह हुआ कि 12 साल पहले किए गए वायदों को पूरा करने में खरोंच लगी. महंगाई, बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता गया. युद्ध के चलते भारत की आर्थिक हालत पर भी घाव लगा और देखते ही देखते महंंगाई का ग्राफ तेजी से बढऩे लगा. आखिरकार मोदी को आम आदमी के सामने आकर सहयोग का आह्वान करना पड़ा. कुछ बातें ऐसी थी जिसे एक आम भारतीय नहीं मानता है जैसे सोना ना खरीदने की बात लेकिन अर्थशास्त्र के जानकार बताएंगे ऐसा क्यों? हम मोटामोटी तौर पर सहज और सरल जिंदगी चाहते हैं और सरकार को अलादीन का चिराग मानकर उसे हर मुराद पूरी करने की जिद् भी कर बैठते हैं और जब जिद् पूरी नहीं होती है तब सरकार खराब हो जाती है. इस समय सरकार का मतलब समझा दिया गया है मोदी और मोदी को खराब साबित करने के लिए हर स्तर पर कोशिश जारी है. यह भी सच है कि 12 वर्ष पहले युवाओं को जो उम्मीदों के पंख लगे थे, वह टूटकर बिखरने लगे. उम्मीद टूटी लेकिन नाउम्मीद नहीं हुए और वे अपने एक ‘वोट’ से अपने नायक मोदी को मजबूत करते रहे, यह भी एक बड़ा सच है. स्मरण कीजिए कि लोकपाल की माँग को लेकर यही नौजवान सडक़ पर उतरे तो कांग्रेस की सरकार पलट दी तो क्या यह नाराजगी मोदी को चुनौती नहीं दे सकती है? जरूर दे सकती है लेकिन तब जब युवा नाउम्मीद हो जाए. इन 12 वर्षों में ऐसे चाहे-अनचाहे बात-बयान हुआ और उनकी इमेज को सोशल मीडिया के जरिए तोडऩे की कोशिश की गई. अतिरेक में विरोधियों के साथ भी ऐसा ही हुआ और इसका दुष्परिणाम यह निकला कि सत्ता और प्रतिपक्ष में जो समन्वय होना चाहिए था, उसमें दरार पड़ गई. प्रतिपक्ष की प्रकृत्ति प्रतिरोध की रही है लेकिन विरोधी व्यवहार कई नीतिगत मुश्किलें उत्पन्न करता है और ऐसा हुआ भी. समय एक सा नहीं रहता है और यह सबके साथ होता है, मोदी कोइ अपवाद नहीं लेकिन 12 वर्षों तक मोदी करिश्मा अपवाद है. इस अपवाद का सबसे बड़ा गुण है एक कुशल जनसंचार के रूप में स्वयं को स्थापित करना. ‘मन की बात’ के माध्यम से वे देश के करोड़ों लोगों तक पहुँच गए. माटी से खादी तक चर्चा कर हुनरमंद लोगोंं को उनके घेरे से बाहर लाकर मुख्यधारा से जोडक़र एक नया मुकाम दिया. प्रधानमंत्री मोदी तारीफ करें तो उनके हुनर को पंख लग जाना स्वाभाविक है. ‘मन की बात’ की हर ऐपिसोड में समाज के अंतिम छोर पर बैठे हुनरमंद को तलाश कर ले आते हैं. वे जनता की नब्ज भी जानते हैं और समझते हैं. और ऐसे में वे कभी खेल के मैदान में उतर जाते हैं तो कभी गाँव की चौपाल में खाट में बैठकर अपनापन का भाव जताते हैं. जैसा कि उन्होंने खुद ही अपील कर कहा कि मोदीजी नहीं, मोदी कहा जाए. वे जानते हैं कि एक ‘जी’ अपनों से पराया बना देती है. उनका यही हुनर उन्हें एक कुशल संचारक के रूप में स्थापित करता है. संचार की अवधारणा कहती है कि संदेश देने वाले की कामयाबी इस बात में नहीं है कि वह संदेश क्या देता है बल्कि कामयाबी इस बात में है कि संदेश ग्रहण करने वाला उसे कैसे ग्रहण करता है. बातें और भी बहुत सी है और यही बातें उन्हें दूसरों से जुदा करती है. एक बात स्मरण में हो आता है कि एक कामयाब व्यक्ति से पूछा गया कि आपका मुकाबला किससे है? तो उनका जवाब था-मेरा अपने आप से. मोदीजी के बारे में भी यही बात लागू होती है

“बचपन को मिले श्रम नहीं, बल्कि शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार”

बाल श्रम के विरुद्ध विश्व दिवस-12 जून 2026– ललित गर्ग –हर वर्ष 12 जून को मनाया जाने वाला बाल श्रम के विरुद्ध विश्व दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि मानवता के अंतःकरण को झकझोरने वाला अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि दुनिया का कोई भी बच्चा मजदूर बनने के लिए पैदा नहीं होता। उसके हाथों में औजार, ईंट, बर्तन, हथौड़े, कूड़े की बोरी या कारखानों की मशीनें नहीं, बल्कि किताबें, खिलौने, रंग, सुनहले सपने और संभावनाएं होनी चाहिए। बचपन जीवन का वह स्वर्णिम काल है जिसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व, संस्कार, शिक्षा और भविष्य की नींव रखी जाती है। यदि यही काल श्रम, शोषण और अभाव की भट्टी में झोंक दिया जाए तो केवल एक बच्चे का नहीं, पूरे समाज और राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन- आईअलओ द्वारा 2002 में शुरू किए गए इस दिवस का उद्देश्य बाल श्रम की भयावहता के प्रति वैश्विक चेतना जगाना और इसके उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों को गति देना है। वर्ष 2026 में भी यह दिवस ऐसे समय पर आ रहा है जब दुनिया तकनीकी विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक प्रगति के नए आयाम छू रही है, लेकिन दूसरी ओर करोड़ों बच्चे आज भी शिक्षा और बचपन के अधिकार से वंचित हैं। यह विडम्बना मानव सभ्यता के सामने एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। जब हम किसी ढाबे, होटल, चाय की दुकान, कारखाने, गैरेज, ईंट-भट्टे, खेत या ट्रैफिक सिग्नल पर किसी मासूम बच्चे को कठिन श्रम करते देखते हैं, तब अक्सर हमारी संवेदना कुछ क्षणों के लिए जागती है और फिर हम अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि कब तक हम इस पीड़ा को सामान्य मानते रहेंगे? क्या हम उस बचपन की चीख नहीं सुन पा रहे जो अपने अधिकारों से वंचित होकर मजदूरी के अंधेरे में खो रहा है? आज भी विश्व में करोड़ों बच्चे किसी न किसी रूप में बाल श्रम में संलग्न हैं। इनमें से बड़ी संख्या खतरनाक परिस्थितियों में काम करती है, जहां उनका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास बाधित होता है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, विस्थापन, तस्करी, युद्ध, प्राकृतिक आपदाएं और कमजोर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएं बाल श्रम की प्रमुख वजहें हैं। परिवार की आर्थिक विवशताएं बच्चों को स्कूल की बजाय काम की दुनिया में धकेल देती हैं। लेकिन गरीबी का समाधान बच्चों से काम कराना नहीं, बल्कि परिवारों को सम्मानजनक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। बाल श्रम केवल आर्थिक समस्या नहीं है; यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। यह बच्चों से उनका बचपन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद, आत्मविश्वास और भविष्य छीन लेता है। जो बच्चा विद्यालय में होना चाहिए, वह यदि कारखाने में है, तो यह केवल उस बच्चे की नहीं, पूरे समाज की विफलता है। बाल श्रम गरीबी का चक्र भी बनाए रखता है, क्योंकि अशिक्षित बच्चा बड़ा होकर कम आय वाले कार्यों तक सीमित रह जाता है और अगली पीढ़ी भी उसी अभाव में जीने को मजबूर होती है। भारत सहित अनेक देशों में बाल श्रम रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आईअलओ के कन्वेंशन 138 और कन्वेंशन 182 न्यूनतम कार्य आयु और बाल श्रम के सबसे खतरनाक रूपों पर रोक लगाने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। भारत में भी बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम तथा शिक्षा का अधिकार कानून मौजूद हैं। लेकिन कानूनों की प्रभावशीलता उनके कठोर और ईमानदार क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। कई बार कानूनी प्रावधान होने के बावजूद बाल श्रम छिपे हुए रूपों में जारी रहता है। आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देने की है। बाल श्रम को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जन-जागरण अभियान चलाए जाने चाहिए। विद्यालयों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, मीडिया, उद्योग जगत और नागरिक समाज को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। जिस प्रकार पर्यावरण संरक्षण और महिला अधिकारों को लेकर वैश्विक चेतना विकसित हुई है, उसी प्रकार बाल अधिकारों के लिए भी विश्वव्यापी जनमत तैयार करना होगा। कैसा विरोधाभास है कि हमारा समाज, सरकार और राजनीतिज्ञ बच्चों को देश का भविष्य मानते नहीं थकते लेकिन क्या इस उम्र के लगभग 25 से 30 करोड़ बच्चों से बाल मजदूरी के जरिए उनका बचपन और उनसे पढने का अधिकार छीनने का यह सुनियोजित षड्यंत्र नहीं लगता? मिसाल के तौर पर एक कानून बनाकर हमने बच्चों से उनका बचपन छिनने की कुचेष्टा की है। इस कानून में हमने यदि पारिवारिक कामधंधा या रोजगार है तो 4 से 14 की उम्र के बच्चों से कानूनन काम कराया जा सकता है और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह कैसी विडम्बना है कि जब इस उम्र के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, खानदानी व्यवसाय के नाम पर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षा, खेलकूद और सामान्य बाल्य सुलभ व्यवहार से वंचित किया जा रहा है और हम अपनी पीठ थपथपाए जा रहे हैं। बच्चों को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर हकीकत में हम उन्हें पैसा कमाकर लाने की मशीन बनाकर अंधकार में धकेल रहे हैं। विशेष रूप से डिजिटल युग में तकनीक का उपयोग बाल श्रम उन्मूलन के लिए किया जा सकता है। प्रत्येक उद्योग और आपूर्ति श्रृंखला की पारदर्शी निगरानी, बाल श्रम शिकायतों के लिए ऑनलाइन पोर्टल, त्वरित कार्रवाई तंत्र और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी आपूर्ति श्रृंखला में कहीं भी बाल श्रम का उपयोग न हो। जो कंपनियां ऐसा करती पाई जाएं, उनके विरुद्ध कठोर आर्थिक और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। बाल श्रम समाप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा है। केवल विद्यालय खोल देना पर्याप्त नहीं है; शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों को आकर्षित करे, जीवनोपयोगी कौशल दे और उनके व्यक्तित्व का समग्र विकास करे। गरीब परिवारों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का विस्तार आवश्यक है। यदि परिवार की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित होगी तो बच्चों को मजदूरी के लिए भेजने की मजबूरी भी कम होगी। हमें यह भी समझना होगा कि बचपन केवल जीवित रहने का नाम नहीं है; बचपन का अर्थ है सपने देखने की स्वतंत्रता, खेलने का अधिकार, सीखने का

मनुस्मृति और भारतीय संविधान : नीति-निदेशक तत्वों का तुलनात्मक दृष्टिकोण..

लेखक: डॉ. राकेश कुमार आर्य भारतीय संविधान में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है। ये ऐसे संवैधानिक निर्देश हैं जो राज्य को लोककल्याण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, यद्यपि इन्हें न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता। संविधान सभा के सलाहकार सर बी.एन. राव ने इन तत्वों को नैतिक मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में रखने का सुझाव दिया था, जिसे संविधान सभा ने स्वीकार किया। नीति-निदेशक तत्वों का मूल उद्देश्य यह है कि राज्य एक कल्याणकारी व्यवस्था की ओर अग्रसर हो। अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि ये तत्व न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराए जा सकते, फिर भी शासन की नीतियों के निर्माण में इनका विशेष महत्व है। अनुच्छेद 38 से 51 तक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक उद्देश्यों को रेखांकित किया गया है। इनमें सामाजिक न्याय, समानता, आजीविका के अवसर, श्रमिक कल्याण, समान वेतन, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, समान नागरिक संहिता तथा अंतरराष्ट्रीय शांति जैसे व्यापक विषय शामिल हैं। अनुच्छेद 39 विशेष रूप से राज्य को यह निर्देश देता है कि वह संपत्ति और संसाधनों के समान वितरण की दिशा में कार्य करे तथा पुरुषों और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करे। इसी प्रकार अनुच्छेद 39क में निःशुल्क विधिक सहायता और समान न्याय की व्यवस्था की बात कही गई है। अनुच्छेद 41 से 43 तक रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार जैसे विषयों पर बल दिया गया है। वहीं अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की अवधारणा प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य देश में समान कानून व्यवस्था स्थापित करना है। अनुच्छेद 45 और 46 शिक्षा, विशेषकर बाल शिक्षा तथा कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक उत्थान पर केंद्रित हैं। इसके बाद अनुच्छेद 47 सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण स्तर सुधारने का दायित्व राज्य पर डालता है। अनुच्छेद 48 कृषि और पशुपालन तथा 48क पर्यावरण संरक्षण पर बल देता है। अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के संरक्षण, अनुच्छेद 50 न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण तथा अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा देने का निर्देश देता है। इस संदर्भ में लेखक द्वारा मनुस्मृति की परंपरा का उल्लेख करते हुए यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी राज्य के कर्तव्यों को लोककल्याण, अनुशासन और न्याय व्यवस्था से जोड़ा गया था। मनु के अनुसार राजा का प्रमुख कर्तव्य प्रजा की रक्षा, न्याय व्यवस्था का पालन और अपराध नियंत्रण माना गया है। लेख में यह भी बताया गया है कि महर्षि मनु के विचारों के अनुसार शासक को संसाधनों का उपयोग लोकहित में करना चाहिए तथा प्राप्त संपदा को शिक्षा, धर्म, अनाथों और समाज कल्याण में लगाना चाहिए। साथ ही शासक के लिए यह भी आवश्यक माना गया है कि वह राज्य की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखे। राजा के विभिन्न रूपों—जैसे इंद्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चंद्र आदि—के माध्यम से शासन के विविध गुणों का प्रतीकात्मक वर्णन किया गया है, जिसमें न्याय, अनुशासन, लोकप्रियता, निगरानी और दंड व्यवस्था जैसे तत्वों को जोड़ा गया है। समग्र रूप से यह लेख यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि भारतीय संविधान के नीति-निदेशक तत्व आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की लोककल्याणकारी अवधारणा को स्पष्ट करते हैं, जबकि प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी राज्य के कर्तव्यों को नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों से जोड़ने की परंपरा रही है। इस प्रकार दोनों दृष्टिकोणों में भिन्न ऐतिहासिक संदर्भों के बावजूद लोककल्याण, न्याय और सुव्यवस्था की भावना को एक समान रूप से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

7.8% जीडीपी ग्रोथ ने दिखाई ताकत, पर अर्थव्यवस्था के सामने बनी चुनौतियां

  राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा गत सप्ताह जारी किए गए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 26 की चौथी तिमाही में सालाना आधार पर अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी। यह दर पिछली तिमाही के लगभग समान है और इसके साथ एक सकारात्मक आश्चर्य भी जुड़ा हुआ है। दरअसल राॅयटर्स के अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण ने 7.2 फीसदी की वृद्धि का अनुमान लगाया था। इस प्रकार वित्त वर्ष 26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अस्थायी अनुमान अब 7.7 फीसदी है जो पिछले वर्ष दर्ज 7.1 फीसदी से काफी अधिक है। वर्ष की दूसरी छमाही में अपेक्षित सुस्ती नहीं आई। आंशिक रूप से इसका कारण राष्ट्रीय खातों में एक साथ चल रही आधार वर्ष में बदलाव की प्रक्रिया हो सकती है जिसमें स्थिर मूल्य गणनाओं के लिए आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया। इस बदलाव ने अन्य कुछ प्रणालीगत परिवर्तनों के साथ जीडीपी के स्तर को कम किया लेकिन वृद्धि दर को अधिक सुचारु और ऊंचा कर दिया। इन परिवर्तनों का प्रभाव बहस का विषय बन सकता है। पहले भी सांख्यिकीय पद्धति में बदलावों के साथ ऐसा हुआ है। खासकर क्योंकि नॉमिनल जीडीपी केवल 8.9 फीसदी बढ़ा है जो यह दर्शाता है कि अपेक्षा से कम जीडीपी डिफ्लेटर (नॉमिनल और वास्तविक जीडीपी के बीच का अनुपात) ने इन विश्व-स्तरीय आंकड़ों को सहारा दिया। लेकिन यह भी ध्यान देना चाहिए कि सकारात्मक मांग प्रभाव पिछले सितंबर में संशोधित जीएसटी दर संरचना से और पहले दी गई आयकर राहत से लगातार सामने आते रहे। क्षेत्रवार आंकडों के मुताबिक चौथी तिमाही में वृद्धि अपेक्षाकृत व्यापक रही। सेवाएं 9 फीसदी से अधिक बढ़ीं और विनिर्माण 10 फीसदी से अधिक। निजी उपभोग की वृद्धि पिछले तिमाही से कुछ कम होकर 7.6 फीसदी रही लेकिन सकल स्थिर पूंजी निर्माण की 8.2 फीसदी वृद्धि के साथ मिलकर यह पर्याप्त रही। ध्यान रहे कि ये आंकड़े विशेष रूप से प्रभावशाली हैं क्योंकि फरवरी के अंत में खाड़ी संकट शुरू हुआ था जिससे तिमाही के एक-तिहाई हिस्से पर गंभीर वैश्विक दबाव पड़ा। सरकार ने अपने जिन कदमों के जरिये तेल कीमतों में वृद्धि के सबसे बुरे प्रभावों से अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिश की वे भी इस संदर्भ में मददगार रहे। यद्यपि ऐसा बचाव हमेशा नहीं चल सकता। प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए कुछ खर्च नियंत्रण का आह्वान किया है तथा संकेत दिया है कि आगे और कठोर कदम उठाए जा सकते हैं। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि वर्तमान तिमाही और शायद जुलाई-सितंबर तिमाही भी चौथी तिमाही जैसी ही मजबूती दिखाएगी। एनएसओ के वृद्धि अनुमान जारी होने से कुछ घंटे पहले ही भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के चलते चालू वित्त वर्ष में वृद्धि 6.6 फीसदी तक ही रह सकती है जो पहले के 6.9 फीसदी अनुमान से कम है। मुद्रास्फीति के जोखिम भी मौजूद हैं। खासतौर पर माॅनसून के कमजोर रहने की आशंका के चलते। भारत हमेशा वैश्विक ईंधन कीमतों के ऊंचे होने पर संघर्ष करता रहा है और कमजोर माॅनसून के प्रभाव से भी जूझता रहा है। यदि दोनों चुनौतियां एक साथ असर डालें तो यह गंभीर समस्या होगी। रिजर्व बैंक चिंतित है कि ऊंची ऊर्जा कीमतें और वैश्विक आपूर्ति अवरोध पहले से ही अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे ईंधन कीमतों का असर व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा वैसे-वैसे ये प्रभाव और तीव्र होंगे। इन चुनौतियों के बीच यह सौभाग्य है कि भारत साल की शुरुआत अपेक्षाकृत ऊंची वृद्धि के साथ कर रहा है। अब यह तो समय ही बताएगा कि घरेलू मजबूती कितनी टिकाऊ रहती है। लेकिन सरकार को वैश्विक उथल-पुथल के बीच वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए ठोस और स्थायी सुधारों पर अमल करना होगा ताकि भारत की आर्थिक ढाल मजबूत हो सके।