सिंधु जल संधि सस्पेंड के बाद बड़ा कदम, चिनाब नदी पर 5129 करोड़ का सावलकोट पावर प्रोजेक्ट शुरू

नई दिल्ली। पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने अब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में सरकारी कंपनी एनएचपीसी (NHPC) ने जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर बनने वाले सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए टेंडर जारी कर दिया है। इस परियोजना को देश की ऊर्जा जरूरतों और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक बड़ा और रणनीतिक कदम माना जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, इस महत्वाकांक्षी परियोजना को करीब 5129 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया जाएगा। एनएचपीसी द्वारा जारी टेंडर के तहत पूरे निर्माण कार्य को एक ही पैकेज में शामिल किया गया है, ताकि काम को तेज गति से पूरा किया जा सके। टेंडर दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में डाइवर्जन टनल का निर्माण, एडिट, डीटी और कोफर डैम बनाने जैसे प्रमुख कार्य शामिल हैं। इसके अलावा मांडिया नाला डीटी का निर्माण, उससे संबंधित सड़क, राइट बैंक स्पाइरल टनल, एक्सेस टनल और डैम से जुड़े सभी सहायक कार्य भी इसी प्रोजेक्ट के अंतर्गत किए जाएंगे। चिनाब नदी पर बनने वाला यह प्रोजेक्ट बिजली उत्पादन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इससे जम्मू-कश्मीर सहित देश के कई हिस्सों को लाभ मिलने की उम्मीद है। एनएचपीसी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस परियोजना के लिए बोली प्रक्रिया 12 मार्च से शुरू होगी और 20 मार्च तक चलेगी। बोली की वैधता 180 दिनों के लिए तय की गई है। वहीं, इस पूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए लगभग 3285 दिनों की समयसीमा निर्धारित की गई है, यानी इसे चरणबद्ध तरीके से दीर्घकालिक योजना के तहत तैयार किया जाएगा। सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के जरिए कुल 1856 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इतना बड़ा उत्पादन देश के पावर ग्रिड को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाकों में बिजली की उपलब्धता बेहतर होगी और औद्योगिक व घरेलू जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट के शुरू होने से न केवल बिजली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही, यह परियोजना जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और क्षेत्रीय विकास को भी गति देगी। भारत सरकार ने यह कदम ऐसे समय पर उठाया है जब पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में चिनाब नदी पर इस तरह की बड़ी परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भारत अपने जल संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगा और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और मजबूत कदम बढ़ाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति और जल प्रबंधन योजना का भी अहम हिस्सा है। आने वाले वर्षों में इसके पूरा होने पर देश की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।
साबरकांठा में ‘जहर का कारोबार’: डिटर्जेंट-यूरिया मिलाकर 5 साल से बन रहा था नकली दूध

नई दिल्ली। गुजरात के साबरकांठा जिले में खाद्य सुरक्षा को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। यहां डिटर्जेंट, यूरिया और अन्य खतरनाक केमिकल का इस्तेमाल कर नकली दूध और छाछ बनाने वाली एक फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया गया है, जो पिछले करीब पांच वर्षों से अवैध रूप से संचालित हो रही थी। इस कार्रवाई में अधिकारियों ने करीब 71 लाख रुपये का सामान जब्त किया है और एक नाबालिग समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यह छापेमारी श्री सत्य डेयरी प्रोडक्ट्स नाम की यूनिट पर की गई, जहां कथित तौर पर पानी, मिल्क पाउडर, कास्टिक सोडा, रिफाइंड पामोलिन तेल, सोयाबीन तेल, डिटर्जेंट पाउडर और यूरिया खाद मिलाकर बड़े पैमाने पर नकली दूध तैयार किया जा रहा था। यह मिलावटी दूध आसपास के कई गांवों में पाउच में पैक कर सप्लाई किया जाता था, जिससे हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा था। 300 लीटर असली दूध से बनाते थे 1800 लीटर नकली दूध जांच में सामने आया कि आरोपी बेहद संगठित तरीके से इस धंधे को चला रहे थे। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, आरोपी रोजाना लगभग 300 लीटर असली दूध का इस्तेमाल करते थे। इसमें विभिन्न केमिकल और पाउडर मिलाकर वे 1,700 से 1,800 लीटर तक नकली दूध तैयार कर लेते थे। यानी कम मात्रा में असली दूध को आधार बनाकर उसकी मात्रा छह गुना तक बढ़ा दी जाती थी। इसके बाद इस दूध को पाउच में पैक कर गांव-गांव पहुंचाया जाता था, जहां आम लोग इसे असली समझकर इस्तेमाल करते थे। इसी तरह मिलावटी छाछ भी तैयार की जाती थी, जिससे यह कारोबार और अधिक फैल गया था। छापे में मिली खतरनाक सामग्री लोकल क्राइम ब्रांच, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी FSL और फूड एंड ड्रग्स डिपार्टमेंट की संयुक्त टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर इस फैक्ट्री पर कार्रवाई की। तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में खतरनाक केमिकल और मिलावट में इस्तेमाल होने वाला सामान बरामद किया गया। जब्त किए गए सामान में 450 किलो व्हे पाउडर, 625 किलो स्किम्ड मिल्क पाउडर, 300 किलो प्रीमियम SMP पाउडर, यूरिया खाद, कास्टिक सोडा, डिटर्जेंट पाउडर, सोयाबीन तेल और पामोलिन तेल शामिल हैं। इसके अलावा मौके से 1,962 लीटर तैयार मिलावटी दूध और 1,180 लीटर मिलावटी छाछ भी बरामद की गई, जिन्हें बाजार में भेजने की तैयारी थी। अधिकारियों के अनुसार, इन केमिकल्स का इस्तेमाल दूध की मोटाई, झाग और प्रोटीन की मात्रा को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए किया जाता था, ताकि देखने में यह असली लगे और ग्राहक आसानी से धोखा खा जाएं। स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक विशेषज्ञों का मानना है कि डिटर्जेंट, यूरिया और कास्टिक सोडा जैसे तत्वों का सेवन शरीर के लिए बेहद खतरनाक होता है। लंबे समय तक ऐसे मिलावटी दूध का सेवन करने से पेट, किडनी और लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह और भी ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है। पांच साल से चल रहा था गोरखधंधा जांच में यह भी सामने आया है कि यह फैक्ट्री करीब पांच वर्षों से लगातार चल रही थी। इतने लंबे समय तक इस यूनिट का संचालन होना इस बात का संकेत है कि यह नेटवर्क काफी संगठित और योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहा था। गांवों में इसकी नियमित सप्लाई के कारण इसका दायरा भी काफी बड़ा हो गया था। छापेमारी के दौरान फैक्ट्री से दूध बनाने और पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले कई उपकरण भी बरामद किए गए। अधिकारियों ने मौके पर ही यूनिट को सील कर दिया है और आगे की जांच शुरू कर दी गई है। एक नाबालिग समेत पांच गिरफ्तार इस मामले में एक नाबालिग सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस धंधे से और कौन-कौन लोग जुड़े हुए थे और सप्लाई चेन कितनी दूर तक फैली हुई थी। जांच के दौरान और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। साथ ही, जिन इलाकों में यह दूध सप्लाई किया गया, वहां लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। मिलावट के खिलाफ सख्ती जारी फूड एंड ड्रग्स विभाग ने साफ किया है कि इस तरह की अवैध गतिविधियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जाएगा। खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी ताकि आम लोगों की सेहत से कोई समझौता न हो।
त्वरित विकास को समर्पित कल्याणकारी केन्द्रीय बजट

-डॉ. महेन्द्र सिंह केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए संसद में पेश किया गया गया बजट देश के त्वरित विकास को समर्पित कल्याणकारी बजट है। इस बजट में समाहित प्रस्तावों में आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने और उसे निरन्तर बनाये रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही, लोककल्याण के लिए बजट प्रस्तावों पर भी पर्याप्त बल दिया गया है। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में तीन कर्तव्यों को उजागर किया। ये हैं : (ⅰ) अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों के प्रति लचीलेपन में वृद्धि करते हुए आर्थिक विकास को गति प्रदान करना और उसे बनाये रखना; (ii) जन आकाँक्षाओं की पूर्ति और उनकी क्षमताओं का वर्द्धन करना एवं (iii) देश के प्रत्येक परिवार, समुदाय, क्षेत्र और वर्ग तक संसाधनों, सुविधाओं तथा अवसरों की पहुंच को सुनिश्चित करना। इस तरह ये कर्तव्य मोदी सरकार की सर्वसमावेशी एवं पोषणीय विकास की रणनीति को सुस्पष्ट रूप में परिभाषित करते हैं। ध्यातव्य है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के केन्द्र में एक ओर आर्थिक संवृद्धि की गति को तेज करना रहा है वहीं दूसरी तरफ सापेक्षतया वंचित लोगों एवं क्षेत्रों को उनकी क्षमता व सामर्थ्य को बढ़ाते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा में शामिल करना रहा है। इस दृष्टि से यह कहना समीचीन है कि ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास एवं सबका प्रयास’ का ध्येय वाक्य लोकनीतियों के प्रतिपादन एवं कार्यान्वयन का नाभिकेन्द्र रहा है। इसमें आर्थिक समृद्धि एवं लोककल्याण में वृद्धि स्वतः विहित रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा संरचनात्मक आर्थिक सुधारों का मूल विचार ‘रिफार्म, परफार्म व ट्रॉन्सफार्म’ रहा है। इस बजट में भी, बजट प्रावधानों को अधिक परिणामोन्मुखी बनाने के लिए सुधारों के क्रम को जारी रखा गया है। ‘विकसित भारत’ के महालक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस बजट में कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र, एमएसएमई, ओडीओपी, रिन्यूबल व न्यूक्लियर एनर्जी, सेमिकंडक्टर, आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स, जलमार्ग व रेल विकास, डिकार्बनाइजेशन, निर्यात संवर्द्धन, रक्षा क्षेत्र इत्यादि संभावनापूर्ण क्षेत्रों एवं तत्सम्बन्धी क्रियाओं के संवर्द्धन व विकास के लिए वित्तमंत्री द्वारा प्राथमिकता के आधार पर अपेक्षित आवंटन किए गये हैं। साथ ही, मानव पूँजी के निर्माण से सम्बन्धित क्षेत्रों यथा शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला, युवा और दिव्यांग सशक्तिकरण पर पर्याप्त बल दिया गया है। वस्तुतः, मानव पूँजी के बेहतर विकास से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी तथा जनकल्याण में वृद्धि होगी। वित्तमंत्री ने इस बजट में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को जारी रखते हुए इस पर विशेष बल दिया है। हाल के वर्षों में जीडीपी के सापेक्ष राजकोषीय घाटा में निरन्तर गिरावट से इस बात की पुष्टि होती है कि मोदी सरकार का राजकोषीय प्रबन्धन सम्बन्धी निष्पादन श्लाधनीय रहा है। वर्ष 2021-22 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.7 प्रतिशत; 2022-24 में 6.5 प्रतिशत 2023-24 में 5.5 प्रतिशत; 2024-25 में 4.8 प्रतिशत एवं 2025-26 में 4.4 प्रतिशत था। इसे 2026-27 के बजट में कम करके 4.3 प्रतिशत पर रख गया है। ये प्रवृत्तियाँ राजकोषीय व्यवस्था की मजबूती की परिचायक हैं। मोदी सरकार की राजकोषीय प्रवीणता एवं बेहतर वित्तीय प्रबंधन का ही परिणाम है कि जीडीपी के सापेक्ष राजकोषीय घाटा निरन्तर घटा है। साथ ही, वित्तमंत्री इस बात में भी सफल रही हैं कि उन्होंने इस बजट में जीडीपी के सापेक्ष केन्द्र सरकार के ऋण को 55.6 प्रतिशत पर रखा है। यह वर्ष 2025-26 के लिए 56.1 प्रतिशत रखा गया था। साथ ही, इस बजट में जीडीपी के सापेक्ष राजस्व घाटा एवं प्राथमिक घाटा में भी कमी आई है। घटते घाटे एवं ऋण से निजी पूँजी निवेश में वृद्धि होगी। इस बजट में, राजस्व में सतत वृद्धि; पूँजीगत व्यय में वृद्धि और राजकोषीय पारदर्शिता में सुधार के संकेतकों से भी देश की राजकोषीय सुदृढ़ता की पुष्टि होती है। पूँजीगत खर्च के जरिये अवस्थापना क्षेत्र के विकास ने विकास को तेज करने और रोजगार को बढ़ाने में उल्लेखनीय तौर पर योगदान दिया है। इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक विकास में धमनियों का कार्य करता है। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर मोदी सरकार द्वारा किया गया निवेश लगातार विकास का इंजन बना हुआ है। एक ओर जहाँ केन्द्र सरकार स्वयं पूंजीगत व्यय को बढ़ा रही है; वहीं दूसरी ओर राज्य सरकारों को भी अनुदान व ऋण देकर उनके पूँजीगत खर्च को बढ़ाने में मदद कर रही है। वर्ष 2025-26 की तुलना में 2026-27 के बजट में पूँजीगत आवंटन में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यदि राज्यों को दी जाने वाली अनुदान राशि को भी जोड़ लिया जाय तब प्रभावी पूँजीगत व्यय की वृद्धि 22 प्रतिशत बैठती है। इस तरह मोदी सरकार की यह विचारणा सुस्पष्ट होती है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर की मजबूती आर्थिक उन्नति का मूलाधार है। इस बजट में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों क्षेत्रों में पूँजीगत व्यय की वृद्धि दरें इस तरह हैं: टेलीकॉम 97 प्रतिशत; रक्षा 18 प्रतिशत; रेलवे 10 प्रतिशत; सड़क व हाईवे 8 प्रतिशत एवं आवास व नगरीय विकास 6 प्रतिशत। यह तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि बेहतर राजकोषीय प्रबन्धन से अब विकासगामी क्रियाओं के लिए अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। जीडीपी के सापेक्ष सरकारी ऋण भार को घटाकर 2030-31 तक 50 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। स्पष्ट है कि इससे आगामी वर्षों में अवस्थापना के विकास के लिए और अधिक ‘फिस्कल स्पेस’ मिल सकेगा। उल्लेखनीय है कि पूँजीगत व्यय में मोदी सरकार द्वारा की गई वृद्धि से आय में तो कई गुना वृद्धि होती ही है, इससे रोजगार में भी उल्लेखनीय तौर पर वृद्धि होती है। इस बजट में छोटे, मझोले एवं धार्मिक नगरों के विकास के लिए भी प्रावधान किए गये हैं। नगरीय क्षेत्रों में जन सुविधाओं के बेहतर विकास से जनजीवन सुगम व स्वस्थ होगा। साथ ही, इसके विकास से कारोबार सुगम होगा, इसमें वृद्धि होगी। धार्मिक व साँस्कृतिक स्थलों के उन्नयन से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तथा देश-विदेश से पर्यटकों की आवाजाही से आर्थिकी सशक्त होगी। इस बजट में हास्पिटेलिटी तथा हेल्थ टूरिज्म से भी लोगों की आजीविका के स्रोतों में वृद्धि, रेल एवं जलमार्गों के विकास एवं अपग्रेडेशन से लाजिस्टिक्स की लागतें घटेंगी। इससे व्यापार में वृद्धि तो होगी ही, साथ ही आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती मिलेगी और अर्थव्यवस्था की स्पर्धात्मकता में वृद्धि से निर्यात-प्रेरित निवेश होगा। इस बात का उल्लेख करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस बजट में अवस्थापना क्षेत्र के विकास के लिए 12.20 लाख
प्रयागराज संगम में पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अस्थियों का विसर्जन, बेटे जय पवार ने दी भावुक विदाई

मुंबई/प्रयागराज। महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अस्थियों का रविवार को प्रयागराज के पवित्र संगम तट पर विधि-विधान के साथ विसर्जन किया गया। इस दौरान उनके बेटे जय पवार ने पूरे धार्मिक अनुष्ठान के साथ अस्थि कलश को मां गंगा में प्रवाहित किया। अंतिम विदाई के इस भावुक क्षण में परिवार के सदस्य, पार्टी कार्यकर्ता और मौजूद लोग गमगीन नजर आए और नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि दी। अस्थि विसर्जन के लिए अजित पवार का परिवार चार्टर्ड फ्लाइट से बारामती से प्रयागराज पहुंचा। रविवार सुबह करीब 11 बजे उनका परिवार प्रयागराज एयरपोर्ट पर उतरा, जहां से वे सीधे संगम की ओर रवाना हुए। एयरपोर्ट से बाहर निकलते समय एक भावुक दृश्य देखने को मिला, जब उनके बेटे जय पवार नंगे पैर अस्थि कलश लेकर बाहर आए। वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं और माहौल शोक में डूबा नजर आया। परिवार एयरपोर्ट से संगम तक लंबे काफिले के साथ पहुंचा। संगम के वीआईपी घाट पर पुरोहितों की उपस्थिति में पूरे विधि-विधान से पूजा-अनुष्ठान कराया गया। इस दौरान शोक संतप्त लोगों ने अजित पवार को श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित की और मां गंगा से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। अस्थि विसर्जन के समय परिवार के सदस्य और समर्थक भावुक नजर आए। अजित पवार की याद में एनसीपी की युवा इकाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष धीरज शर्मा के नेतृत्व में कश्मीर से कन्याकुमारी तक अस्थि कलश यात्रा भी निकाली गई थी। यह यात्रा 12 राज्यों से होकर गुजरी और रविवार, 8 फरवरी 2026 को प्रयागराज संगम में आकर इसका समापन हुआ। इस दौरान भी बड़ी संख्या में लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे और अंतिम संस्कार की परंपराओं का पालन किया गया। बेटे जय पवार और परिवार के अन्य सदस्य इस मौके पर मौजूद रहे। गौरतलब है कि अजित पवार का 28 जनवरी 2026 को बारामती में एक विमान हादसे में निधन हो गया था। इस हादसे में उनके साथ चार अन्य लोगों की भी जान चली गई थी। अगले दिन 29 जनवरी को उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार बारामती के विद्या प्रतिष्ठान ग्राउंड में किया गया था, जहां बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं, समर्थकों और आम लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी थी। संगम में अस्थि विसर्जन के साथ ही उनकी अंतिम धार्मिक रस्म पूरी हुई। इस मौके पर उपस्थित लोगों ने उन्हें याद करते हुए कहा कि अजित पवार ने अपने राजनीतिक जीवन में जनता की सेवा को सर्वोपरि रखा और प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्रयागराज के पवित्र संगम पर की गई यह अंतिम विदाई उनके जीवन की यात्रा का एक भावुक और श्रद्धापूर्ण समापन बन गई।
बांग्लादेश की जेल में अवामी लीग के वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र सेन का निधन, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

ढाका। बांग्लादेश की दिनाजपुर जेल से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रमेश चंद्र सेन के निधन की खबर सामने आई है। अधिकारियों और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनका शनिवार सुबह जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद अस्पताल में निधन हो गया। वे अवामी लीग के प्रमुख अल्पसंख्यक नेताओं में गिने जाते थे और शेख हसीना की सरकार में जल संसाधन मंत्री रह चुके थे। बताया जा रहा है कि 86 वर्षीय रमेश चंद्र सेन पांच बार सांसद चुने गए थे और उन्होंने अपना आखिरी चुनाव साल 2024 में लड़ा था। बांग्लादेश के प्रमुख समाचार पत्र प्रथम आलो की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार सुबह करीब 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी अचानक तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें तत्काल इलाज के लिए दिनाजपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। जेल में एक पूर्व मंत्री की मौत की खबर सामने आने के बाद अवामी लीग के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। पार्टी से जुड़े लोगों और स्थानीय स्तर पर इस घटना को लेकर चिंता जताई जा रही है। जेल प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, रमेश चंद्र सेन की तबीयत अचानक बिगड़ी और वे बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन इलाज के दौरान सुबह करीब 9:30 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अधिकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे, जिसके कारण उनकी हालत पहले से ही कमजोर थी। हालांकि, मामले से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है कि जेल में उनकी देखभाल ठीक से नहीं हो रही थी। उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे हिरासत में हुई मौत बता रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे प्राकृतिक कारणों से हुई मृत्यु बता रहा है। रमेश चंद्र सेन की गिरफ्तारी अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद हुई थी। उन पर हत्या सहित तीन गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया था। उस समय उनकी एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसमें उनके हाथों में रस्सी बंधी हुई नजर आई थी। सरकार बदलने के बाद अवामी लीग के कई नेता हमलों के डर से देश छोड़कर चले गए थे, लेकिन रमेश चंद्र सेन ने अपना घर नहीं छोड़ा। उन्हें भरोसा था कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है और वे कानून का सामना करेंगे। उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने इसे संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिरासत के दौरान अब तक पार्टी के कम से कम पांच वरिष्ठ नेताओं की मौत हो चुकी है, जिससे राजनीतिक माहौल और ज्यादा संवेदनशील हो गया है।
पोरसा में सराफा व्यापारी के बैग से कटकर निकले डेढ़ लाख, सीसीटीवी में दो संदिग्ध, UP के पिनाहट में दबिश

मुरैना । मुरैना के पोरसा कस्बे में सराफा व्यापारी के बैग से डेढ़ लाख रुपए चोरी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। कलकत्ता के दासपुर निवासी 38 वर्षीय सराफा व्यापारी शेख शाहरुल, जो लंबे समय से मुरैना में रहकर गहने बनाने का काम कर रहे हैं, शनिवार को पोरसा कस्बे में एक सराफा दुकान से पेमेंट लेकर वापस मुरैना लौट रहे थे। बताया गया है कि वे पोरसा के संतोष वर्मा की दुकान से डेढ़ लाख रुपए लेकर यात्री बस में सवार होने ही लगे थे कि तभी पीछे से दो लोग भी बस में चढ़े। इसी दौरान बदमाशों ने व्यापारी के बैग की चैन काटकर उसमें रखे 1.5 लाख रुपए निकाल लिए और घटनास्थल से फरार हो गए। घटना की जानकारी होते ही व्यापारी ने तुरंत बस से उतरकर पोरसा थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पोरसा पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी। पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, जिसमें दो संदिग्ध दिखाई दिए। दोनों की पहचान व्यापारी ने भी की है। CCTV फुटेज में दिख रहा है कि आरोपी शातिराना ढंग से बैग की चैन काटते हैं और रुपए निकालकर मौके से भागते हैं। यह वारदात एक ऐसे समय में हुई जब व्यापारी बस में चढ़ रहे थे, इसलिए बदमाशों को पुलिस ने “फुर्तीला और योजनाबद्ध” बताया है। एसडीओपी रवि भदौरिया ने बताया कि पोरसा में सराफा व्यापारियों से वसूली के दौरान यह घटना हुई है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पोरसा से लगे उत्तर प्रदेश के पिनाहट इलाके में दबिश शुरू कर दी है। पुलिस टीम आरोपियों की तलाश में विभिन्न जगहों के CCTV फुटेज भी खंगाल रही है और स्थानीय स्तर पर पूछताछ भी की जा रही है। मामला बढ़ता देख व्यापारी और भी सावधान दिखे। उन्होंने बताया कि वह लंबे समय से मुरैना में सराफा व्यापारियों के लिए गहने बनाने का काम कर रहे हैं। इसी काम के भुगतान के लिए वह शनिवार को पोरसा पहुंचे थे और शाम करीब 4 बजे पैसा लेकर बस में चढ़ रहे थे। लेकिन इसी दौरान यह घटना घटी, जिससे उनके लिए आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सुरक्षा की चिंता भी बढ़ गई। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यदि किसी ने संदिग्धों को देखा हो या किसी भी तरह की जानकारी हो तो तुरंत थाने को सूचित करें। साथ ही यात्रियों को भी सलाह दी गई है कि यात्रा के दौरान नकदी या महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को सुरक्षित रखें और बैग की चैन तथा लॉक का विशेष ध्यान रखें। पुलिस के अनुसार, इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन पिनाहट क्षेत्र में दबिश जारी है और जल्द ही आरोपियों तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है।
कर्नाटक के विजयपुरा में निजी जेट हादसा, खेत में गिरा विमान; दो लोग गंभीर रूप से घायल, तकनीकी खराबी की आशंका

नई दिल्ली। विजयपुरा (कर्नाटक)। कर्नाटक के विजयपुरा जिले में रविवार दोपहर एक निजी जेट विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। रेड बर्ड कंपनी का यह प्राइवेट जेट बालेश्वर तालुका के मैंगलोर गांव के पास एक खेत में गिरकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। हादसे में विमान में सवार दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज जारी है। घटना के बाद आसपास के ग्रामीण बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए। कुछ ही देर में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए और राहत व बचाव कार्य शुरू कर दिया गया। दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच की जा रही है, जबकि शुरुआती जानकारी में तकनीकी खराबी और संतुलन बिगड़ने की बात सामने आई है। खेत में गिरा विमान, मची भगदड़प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, दोपहर के समय आसमान में तेज आवाज सुनाई दी और कुछ ही क्षणों में विमान तेजी से नीचे आता दिखाई दिया। देखते ही देखते वह मैंगलोर गांव के पास एक खेत में जा गिरा। टक्कर के साथ तेज धमाके जैसी आवाज हुई, जिससे आसपास के लोग घबरा गए और घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े। गांव के लोगों ने तुरंत राहत कार्य शुरू किया और घायल यात्रियों को बाहर निकालने में मदद की। स्थानीय लोगों की तत्परता से दोनों घायलों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सका, जिससे उनकी जान बचने की उम्मीद बढ़ गई। दो लोग गंभीर रूप से घायलविमान में सवार दोनों लोग इस हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए हैं। हादसे के तुरंत बाद उन्हें नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही है। प्रशासन की ओर से अभी तक घायलों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन उनकी हालत नाजुक बताई जा रही है। चिकित्सकों के अनुसार, दोनों को सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आई हैं। हालांकि समय पर इलाज मिलने से उनकी स्थिति स्थिर करने की कोशिश की जा रही है। तकनीकी खराबी बनी हादसे की वजह?शुरुआती जांच में सामने आया है कि विमान कालबुर्गी के पास उड़ान के दौरान संतुलन खोने लगा था। पायलट ने विमान को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन तकनीकी समस्या के कारण वह सफल नहीं हो पाया। नियंत्रण खोने के बाद विमान तेजी से नीचे आने लगा और अंततः मैंगलोर गांव के पास खेत में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विमान आबादी वाले इलाके में गिरता, तो बड़ा हादसा हो सकता था। खेत में गिरने के कारण किसी अन्य व्यक्ति के हताहत होने की खबर नहीं है। मौके पर पहुंचा प्रशासन, जांच शुरूघटना की सूचना मिलते ही पुलिस, फायर ब्रिगेड और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए। पूरे इलाके को घेरकर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है ताकि कोई भी व्यक्ति मलबे के पास न जा सके। तकनीकी टीम को भी बुलाया गया है, जो विमान के अवशेषों की जांच कर दुर्घटना के असली कारणों का पता लगाएगी। प्रशासन ने बताया कि विमान किस रूट पर था और उसका अंतिम गंतव्य क्या था, इसकी भी जानकारी जुटाई जा रही है। साथ ही कंपनी से जुड़े अधिकारियों से भी संपर्क किया जा रहा है। बाल-बाल बची बड़ी त्रासदी जिस स्थान पर विमान गिरा, वहां आसपास खेती का काम चल रहा था। ग्रामीणों का कहना है कि अगर विमान कुछ मीटर इधर-उधर गिरता, तो कई लोगों की जान जा सकती थी। खेत में गिरने के कारण बड़ी जनहानि टल गई।इस हादसे ने स्थानीय लोगों को हिला कर रख दिया है। कई ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने पहली बार इतने करीब से किसी विमान दुर्घटना को देखा। सुरक्षा मानकों पर उठे सवाल इस घटना के बाद निजी विमानों की सुरक्षा और रखरखाव को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि दुर्घटना तकनीकी खराबी, मानवीय भूल या किसी अन्य कारण से हुई। फिलहाल प्राथमिकता घायलों के इलाज और हादसे की विस्तृत जांच पर है। अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।इस हादसे ने एक बार फिर यह याद दिला दिया है कि छोटी सी तकनीकी गड़बड़ी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। स्थानीय प्रशासन और विमानन से जुड़े विभाग अब हर पहलू की गहन जांच कर रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
जेएनयू में फिर टकराव की स्थिति बनी, अभाविप का उग्र विरोध सामने आया

नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर छात्र राजनीति और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवाद के केंद्र में आ गया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) की जेएनयू इकाई ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए निष्कासन और भारी जुर्माने की कार्रवाई को तानाशाही करार दिया है। संगठन का कहना है कि छात्र आंदोलनों को दबाने के लिए प्रशासन दमनकारी नीतियों का सहारा ले रहा है, जिसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा। अभाविप के अनुसार, हाल के दिनों में कई छात्र कार्यकर्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, जिसमें निष्कासन और आर्थिक दंड शामिल हैं। संगठन ने आरोप लगाया कि प्रशासन इन कदमों के जरिए सक्रिय छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन है, उनके शैक्षणिक भविष्य के साथ भी सीधा खिलवाड़ है। संगठन ने इन फैसलों को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि जुर्माने की राशि इतनी अधिक रखी गई है कि आम छात्र के लिए उसे भर पाना बेहद मुश्किल है। अभाविप जेएनयू अध्यक्ष मयंक पंचाल ने कहा कि कुछ मामलों में जुर्माना करीब 4,83,000 रुपये तक लगाया गया है, जो प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। उनका कहना है कि यह कदम छात्रों को डराने और आंदोलन को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। विरोध जताने के लिए अभाविप कार्यकर्ताओं ने परिसर में दमनकारी आदेशों की प्रतियां जलाकर अपना आक्रोश व्यक्त किया। संगठन ने इसे प्रतीकात्मक विरोध बताते हुए कहा कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ चेतावनी है जो छात्रों के अधिकारों को कुचलने की कोशिश कर रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है, लेकिन अन्याय के खिलाफ उनकी लड़ाई मजबूती से जारी रहेगी। इस पूरे विवाद के केंद्र में CPO (चीफ प्रॉक्टर ऑफिस) मैनुअल भी है, जिसे लेकर अभाविप शुरू से ही विरोध जता रही है। संगठन का कहना है कि यह मैनुअल जेएनयू जैसे खुले और लोकतांत्रिक माहौल वाले विश्वविद्यालय के लिए खतरा है। अभाविप के मुताबिक, इसके प्रावधान छात्रों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और प्रशासन को अत्यधिक अधिकार देते हैं। संगठन ने मांग की है कि इस मैनुअल को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। अभाविप नेताओं का आरोप है कि प्रशासन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए कठोर नियमों का सहारा ले रहा है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय को संवाद और सहयोग के जरिए चलाया जाना चाहिए, न कि दंड और निष्कासन के जरिए। संगठन ने साफ शब्दों में कहा कि राष्ट्रवादी छात्र किसी भी तरह की कायराना कार्रवाई से डरने वाले नहीं हैं। हालांकि, अभाविप ने यह भी स्पष्ट किया कि वह विरोध के नाम पर अराजकता और तोड़-फोड़ का समर्थन नहीं करती। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय की सार्वजनिक संपत्ति उसकी धरोहर है और उसे नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह से उचित नहीं है। इस दौरान अभाविप ने वामपंथी छात्र संगठनों पर परिसर में तोड़-फोड़ की राजनीति करने का आरोप लगाया और उसकी कड़ी निंदा की। अभाविप जेएनयू मंत्री प्रवीण कुमार पीयूष ने प्रशासन की कार्रवाई को गुंडागर्दी करार देते हुए कहा कि छात्रों को डराने की रणनीति अब काम नहीं आने वाली है। उन्होंने कहा कि निष्कासन और भारी जुर्मानों के आदेशों को जलाकर संगठन ने यह साफ संदेश दे दिया है कि वह इन फैसलों को स्वीकार नहीं करता। उनका कहना है कि यदि प्रशासन ने अपने फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो विरोध और तेज हो सकता है। मयंक पंचाल ने कहा कि उनका मुख्य विरोध उस ढांचे के खिलाफ है, जिसमें छात्रों को निष्कासित कर उनके मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। उन्होंने निष्कासित छात्रों की तत्काल बहाली और लगाए गए जुर्मानों को वापस लेने की मांग दोहराई। उनके अनुसार, यह पूरे परिसर के लोकतांत्रिक माहौल का सवाल है। इस घटनाक्रम ने जेएनयू में एक बार फिर प्रशासन और छात्र संगठनों के बीच तनाव को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर छात्र संगठन इसे अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं, वहीं प्रशासन की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इस दौरान अभाविप ने अंत में दोहराया कि वह सामान्य छात्रों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करती रहेगी। संगठन का कहना है कि प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ उसकी लड़ाई अंतिम निर्णय तक जारी रहेगी और वह किसी भी स्तर पर छात्रों की आवाज को दबने नहीं देगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना सियासी तूफान, मुख्यमंत्री सरमा के आरोपों के केंद्र में सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी

गुवाहाटी। असम की राजनीति में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न से जुड़े गंभीर आरोपों को सार्वजनिक किया। गुवाहाटी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरमा ने दावा किया कि एलिजाबेथ कोलबर्न जो ब्रिटिश नागरिक हैं को एक पाकिस्तान आधारित फर्म ने नौकरी पर रखा था और उनकी सैलरी पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख के माध्यम से दी जाती थी। मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले को व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया। दरअसल यह विवाद अचानक नहीं उभरा है इसकी जड़ें फरवरी 2025 में असम सरकार द्वारा गठित एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम SIT तक जाती हैं। इस टीम का गठन अली तौकीर शेख नामक पाकिस्तानी नागरिक की गतिविधियों की जांच के लिए किया गया था। सरकार के अनुसार शेख पर भारत विरोधी साजिश रचने और देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोप थे। SIT ने करीब सात महीने तक जांच करने के बाद सितंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी। सरकार के मुताबिक रिपोर्ट में कुछ संवेदनशील जानकारियां थीं लेकिन राज्य पुलिस के अधिकार क्षेत्र और संसाधनों की सीमाओं को देखते हुए असम कैबिनेट ने निर्णय लिया कि इस मामले को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय MHA को भेजा जाए। अब संभावना जताई जा रही है कि आगे की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो IB या केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर इंटरपोल की मदद लेने की बात भी सामने आई है। मुख्यमंत्री सरमा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि एलिजाबेथ कोलबर्न को मार्च 2011 से मार्च 2012 के बीच पाकिस्तान स्थित एक फर्म में नियुक्त किया गया था। बाद में उन्हें भारत ट्रांसफर किया गया। सरमा के अनुसार उनकी सैलरी अली तौकीर शेख के माध्यम से दी जाती थी जिसे उन्होंने “पाकिस्तानी एजेंट करार दिया। आरोप है कि भारत में रहने के दौरान एलिजाबेथ ने विभिन्न सामाजिक और सरकारी मुद्दों पर जानकारी एकत्र की और कथित तौर पर उसे शेख तक पहुंचाया। मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि अगस्त 2014 की एक रिपोर्ट में भारतीय खुफिया एजेंसी IB से जुड़ी कुछ गोपनीय सूचनाओं का उल्लेख था। साथ ही जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स और सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर भी जानकारी साझा करने की बात कही गई। हालांकि इन दावों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत दस्तावेज पेश नहीं किए गए हैं और जांच अभी आगे की प्रक्रिया में है। अली तौकीर शेख को लेकर भी मुख्यमंत्री ने कई तथ्य रखे। उनके अनुसार शेख 2010 से 2013 के बीच कम से कम 13 बार भारत आया था। उन पर आरोप है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ नैरेटिव बनाने और देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास कर रहे थे। सरमा ने यह भी कहा कि जांच शुरू होने के बाद शेख ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स से कई पोस्ट हटा दिए जिसे उन्होंने सबूत मिटाने की कोशिश बताया। इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण दावा मुख्यमंत्री ने सांसद गौरव गोगोई को लेकर किया। उन्होंने कहा कि गोगोई 2012 से 2016 के बीच पाकिस्तान गए थे और इन यात्राओं की जानकारी केंद्र सरकार को नहीं दी गई थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस दौरान गोगोई सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं थे। हालांकि मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार किया कि फोन कॉल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं लेकिन एक व्यक्ति के पाकिस्तान जाने का सबूत मिलने की बात कही गई। सरमा ने कहा कि इस मामले में तीन मुख्य किरदार हैं एक पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख एक ब्रिटिश नागरिक एलिजाबेथ कोलबर्न और एक भारतीय सांसद गौरव गोगोई। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ पहलुओं में धार्मिक परिवर्तन से जुड़े कोण की भी जांच हो सकती है हालांकि इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। अब राजनीतिक हलकों में यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ जहां राज्य सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रही है वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा मान रहा है।
बांग्लादेश में चुनाव से पहले बिजली गुल होने का खड़ा हो गया संकट, अडानी ग्रुप का बकाया भुगतान पत्र

नई दिल्ली। बांग्लादेश में आगामी संसदीय चुनावों से ठीक पहले बिजली आपूर्ति और वित्तीय स्थिति को लेकर एक नया विवाद सामने आ गया है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में अडानी ग्रुप ने बकाया भुगतान को लेकर बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (PDB) को एक औपचारिक पत्र भेजा है। इस पत्र के बाद दोनों पक्षों के बीच चल रहा वित्तीय विवाद फिर से चर्चा में आ गया है और देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड ने 29 जनवरी को पीडीबी के चेयरमैन को पत्र लिखकर तत्काल भुगतान की मांग की। कंपनी ने स्पष्ट किया कि पावर प्लांट का नियमित संचालन जारी रखने के लिए 112.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी भारतीय मुद्रा में 1000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का तुरंत भुगतान आवश्यक है। यदि यह भुगतान नहीं किया गया, तो बिना बाधा बिजली आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इस कुल बकाया में 53.2 मिलियन डॉलर की राशि पिछले वर्ष जून तक की देनदारी के रूप में शामिल है, जबकि 59.6 मिलियन डॉलर अक्टूबर तक दी गई बिजली सेवा का भुगतान है। कंपनी का कहना है कि कई बार आग्रह करने के बावजूद बांग्लादेश पावर बोर्ड इस रकम का पूरा भुगतान नहीं कर पाया है। ऐसे में बढ़ते बकाए का दबाव कंपनी के संचालन, मेंटेनेंस और इससे जुड़े साझेदारों पर पड़ने लगा है। पत्र में अडानी ग्रुप ने संकेत दिया है कि अगर भुगतान में और देरी होती है, तो बिजली उत्पादन और आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। हालांकि इसे औपचारिक चेतावनी नहीं कहा गया, लेकिन इस तरह की भाषा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थिति गंभीर होती जा रही है और दोनों पक्षों को जल्द समाधान निकालने की जरूरत है। यह पहला मौका नहीं है जब इस मुद्दे पर तनाव पैदा हुआ हो। पिछले साल भी अडानी ग्रुप ने बकाया भुगतान को लेकर बांग्लादेश को पत्र भेजा था और 10 नवंबर तक की समय सीमा तय की थी। उस समय कंपनी ने साफ कहा था कि अगर तय समय तक पैसे नहीं मिले, तो 11 नवंबर से बिजली आपूर्ति बंद करनी पड़ सकती है। इसके बाद बांग्लादेश सरकार ने उसी महीने करीब 100 मिलियन डॉलर का भुगतान किया था, जिससे तत्काल संकट टल गया था। लेकिन उसके बाद भी पुराने बकाए का पूरा भुगतान नहीं हो पाया और दिसंबर से फिर देनदारी बढ़ने लगी। अब एक बार फिर वही स्थिति बनती नजर आ रही है, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित होने की आशंका जताई जा रही है। बांग्लादेश जैसे देश के लिए, जहां ऊर्जा आपूर्ति आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ मानी जाती है, यह स्थिति काफी गंभीर मानी जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं और इसके साथ जनमत संग्रह भी प्रस्तावित है। चुनावी माहौल पहले से ही गरमाया हुआ है और राजनीतिक दल पूरी ताकत से प्रचार में जुटे हैं। बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल मैदान में सक्रिय हैं, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे माहौल में अडानी ग्रुप का यह पत्र बांग्लादेश की आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में वित्तीय अस्थिरता का असर सीधे आम जनता और उद्योगों पर पड़ सकता है। अगर बिजली आपूर्ति में बाधा आती है, तो इसका असर उद्योग, व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देगा। ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह ऊर्जा कंपनियों के साथ अपने वित्तीय दायित्वों को समय पर पूरा करे। अडानी ग्रुप का बांग्लादेश में बिजली उत्पादन से जुड़ा प्रोजेक्ट वहां की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस वजह से बकाया भुगतान का मुद्दा केवल एक कारोबारी विवाद नहीं, बल्कि एक बड़े ऊर्जा और आर्थिक सवाल के रूप में देखा जा रहा है। यदि इस पर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह चुनावी माहौल में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। इस मामले ने बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े किए हैं। लगातार बढ़ते बकाए और भुगतान में देरी यह संकेत देते हैं कि सरकार वित्तीय दबाव का सामना कर रही है। चुनाव से पहले इस तरह की खबरें राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती हैं। फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड इस बकाया भुगतान को लेकर क्या कदम उठाता है और क्या दोनों पक्षों के बीच कोई समाधान निकल पाता है। अगर भुगतान समय पर हो जाता है, तो बिजली आपूर्ति सामान्य बनी रह सकती है। लेकिन अगर विवाद लंबा खिंचता है, तो इसका असर बांग्लादेश की ऊर्जा व्यवस्था और राजनीतिक माहौल दोनों पर पड़ सकता है।