वैदिक चेतना से सामाजिक क्रांति तक भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत महर्षि दयानंद सरस्वती – आचार्य ललित मुनि

आचार्य ललित मुनिउन्नीसवीं सदी का भारत गहरे संक्रमण का समय था। एक ओर अंग्रेजी शासन का राजनीतिक वर्चस्व था, दूसरी ओर समाज भीतर से जर्जर हो चुका था। धार्मिक जीवन कर्मकांडों में उलझा हुआ था, जातिगत ऊंच नीच ने सामाजिक एकता को तोड़ दिया था, स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और शिक्षा का दायरा सीमित था। मिशनरियों का प्रभाव बढ़ रहा था और पश्चिमी चिंतन भारतीय परंपराओं को चुनौती दे रहा था। ऐसे दौर में कुछ व्यक्तित्व प्रकाशस्तंभ बनकर उभरे, जिन्होंने भारतीय समाज को आत्मचिंतन की दिशा दी। इन अग्रदूतों में स्वामी दयानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने न कोई राजनीतिक दल बनाया और न किसी सत्ता का सहारा लिया। उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक उत्थान भीतर से होता है। वेदों की ओर लौटने का उनका आह्वान केवल धार्मिक सुधार का संदेश नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष था। स्वामी दयानंद का जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका बाल्यकालीन नाम मूलशंकर था। परिवार धार्मिक था और वैदिक संस्कारों का पालन करता था। किंतु बालक मूलशंकर का मन प्रश्नों से भरा था। किशोरावस्था में एक शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में जागरण के दौरान उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग को देवता मानकर पूजा जा रही है, उस पर चूहे निर्भय होकर घूम रहे हैं। यह दृश्य उनके मन में गहरी हलचल का कारण बना। उन्होंने स्वयं से पूछा कि यदि यह ईश्वर है तो स्वयं को चूहों से क्यों नहीं बचाता। यह प्रश्न साधारण नहीं था। यही प्रश्न आगे चलकर उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला बना। उन्होंने घर छोड़ दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े। वर्षों तक वे विभिन्न साधु संतों के संपर्क में रहे, हिमालय की कंदराओं में तप किया और शास्त्रों का अध्ययन किया। अंततः मथुरा में उन्हें स्वामी विरजानंद का सान्निध्य मिला। विरजानंद ने उन्हें वेदों का गहन अध्ययन कराया और कहा कि सत्य का मूल स्रोत वेद हैं। शिष्य दयानंद ने गुरु को वचन दिया कि वे वेदज्ञान का प्रचार करेंगे और समाज को अज्ञान से मुक्त करने का प्रयास करेंगे। स्वामी दयानंद का सबसे प्रसिद्ध वाक्य था कि वेदों की ओर लौटो। इसका अर्थ अतीत में पलायन नहीं था, बल्कि मूल स्रोतों की ओर लौटकर शुद्धता और विवेक को अपनाना था। उनका मानना था कि वेद ज्ञान, विज्ञान और नैतिकता का मूल आधार हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा, अवतारवाद और कर्मकांडों की कठोर आलोचना की। उनके अनुसार ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। उसे पत्थर या धातु की मूर्तियों में सीमित करना उचित नहीं। वे जाति व्यवस्था को जन्म पर आधारित मानने के विरोधी थे। उनके विचार में वर्ण व्यवस्था कर्म और गुण पर आधारित होनी चाहिए। उनकी वाणी में स्पष्टता और तर्क था। वे संस्कृत के विद्वान थे, किंतु उन्होंने हिंदी में प्रवचन देकर आम जनता तक अपने विचार पहुंचाए। काशी, हरिद्वार, अजमेर और अन्य नगरों में उन्होंने शास्त्रार्थ किए। इन बहसों में वे वेदों की प्रामाणिकता और तार्किकता पर बल देते थे। 1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। आर्य समाज का उद्देश्य समाज को वैदिक सिद्धांतों पर संगठित करना और सामाजिक सुधार को गति देना था। इसके दस नियम सरल किंतु गहरे थे। इनमें ईश्वर की एकता, सत्य का अनुसरण, विद्या का प्रचार, अज्ञान का नाश और सर्वहित की भावना प्रमुख थे। आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। शुद्धि आंदोलन के माध्यम से उन लोगों को पुनः हिंदू समाज में स्थान दिया गया, जो विभिन्न कारणों से अन्य धर्मों में चले गए थे। इस अभियान ने समाज में आत्मविश्वास का संचार किया। स्वामी दयानंद स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि समाज तभी प्रगति कर सकता है जब स्त्रियां शिक्षित हों। उन्होंने वेदाध्ययन का अधिकार स्त्रियों को दिया और उनके लिए विद्यालय स्थापित करने का आह्वान किया। बाल विवाह, सती प्रथा और बहुविवाह जैसी कुरीतियों के वे विरोधी थे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और स्त्रियों की गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। उनके विचारों ने समाज में नई बहस छेड़ी और सुधार आंदोलनों को प्रेरणा दी। उनकी प्रमुख कृति सत्यार्थ प्रकाश है। इसमें उन्होंने वेदों की व्याख्या के साथ साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं का विश्लेषण किया। उनका उद्देश्य विवाद खड़ा करना नहीं था, बल्कि सत्य की खोज करना था। उन्होंने तर्क, प्रमाण और विवेक पर बल दिया। सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय समाज में आत्ममंथन की प्रक्रिया को तेज किया। यह ग्रंथ आज भी आर्य समाज के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक है। स्वामी दयानंद के विचारों से प्रेरित होकर दयानंद एंग्लो वैदिक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों ने आधुनिक शिक्षा और वैदिक मूल्यों का समन्वय प्रस्तुत किया। आज भी डीएवी संस्थाएं देश भर में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। गुरुकुल कांगड़ी जैसे संस्थानों ने वैदिक पद्धति और आधुनिक विषयों का संगम प्रस्तुत किया। इस शिक्षा मॉडल ने भारतीय युवाओं में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। स्वामी दयानंद का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक आधार पर टिका था। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हो। उन्होंने स्वराज की अवधारणा को स्पष्ट किया। आर्य समाज से जुड़े अनेक नेता आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए। लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे व्यक्तित्वों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इस प्रकार स्वामी दयानंद का प्रभाव सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण तक पहुंचा। स्वामी दयानंद निर्भीक थे। वे राजाओं और शासकों से भी प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करते थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों की भी आलोचना की। 1883 में जोधपुर में उन्हें विष दिया गया। यह घटना दुखद थी, किंतु उनके विचारों को रोक न सकी। उनका जीवन अल्पकालिक था, पर प्रभाव दीर्घकालिक। आज का भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। जातीय विभाजन, अंधविश्वास और सांस्कृतिक असंतुलन अब भी विद्यमान हैं। ऐसे समय में स्वामी दयानंद के विचार नई प्रेरणा देते हैं। उनका आग्रह था कि सत्य को तर्क की कसौटी पर परखा जाए और समाज को ज्ञान आधारित बनाया जाए। उनका संदेश था कि शिक्षा, नैतिकता और आत्मगौरव से ही राष्ट्र सशक्त बनता है। वे आधुनिकता
वन्दे मातरम्: राष्ट्र चेतना का सनातन गीत और आधुनिक भारत का पुनर्जागरण

– कैलाश चंद “वन्दे मातरम्” ये दो शब्द सिर्फ एक नारा नहीं, भारत की आत्मा का गूढ़ और दिव्य उद्गार हैं। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक जड़ है, जो भूमि, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान इन चारों को मातृभाव में एक सूत्र में पिरोता है। जब कोई भारतीय “वन्दे मातरम्” कहता है तो वह केवल मातृभूमि को प्रणाम नहीं करता बल्कि उस चेतना, परंपरा और जीवन दर्शन को नमन करता है जिसने इस देश को हजारों वर्षों से जीवित और गतिशील बनाए रखा है। आज, जब इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार के 2026 के नए दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय अपील सामने आई है, तब यह गीत एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित होता दिखाई दे रहा है। भारतीय सभ्यता में भूमि को केवल भौगोलिक सीमा या प्राकृतिक संसाधनों का समूह नहीं माना गया है। यहां धरती को “माता” कहा गया है, एक ऐसी माता जो जीवन देती है, पोषण करती है और संस्कार प्रदान करती है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” भारतीय चिंतन की इसी भावना को प्रकट करता है। यह वाक्य बताता है कि मनुष्य और भूमि का संबंध केवल उपयोग का नहीं बल्कि आत्मीयता और मातृत्व का है। यही वैदिक आधार “वन्दे मातरम्” की आत्मा में समाहित है। जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना की, तब उन्होंने केवल एक राजनीतिक नारा नहीं दिया। उन्होंने भारत की प्राचीन आत्मा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं था बल्कि एक जीवित मातृशक्ति थी, जो लक्ष्मी के रूप में समृद्धि देती है, सरस्वती के रूप में ज्ञान प्रदान करती है और दुर्गा के रूप में शक्ति का संचार करती है। इसीलिए इस गीत की हर पंक्ति में प्रकृति, शक्ति, ज्ञान और मातृत्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। सन् 1875 का वह काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। ब्रिटिश शासन का दमन, सांस्कृतिक अपमान और आत्मगौरव का संकट समाज में गहराई तक समा चुका था। भारतीयों के भीतर अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बचाने की तीव्र आकांक्षा जन्म ले रही थी। इसी समय बंकिमचन्द्र ने “वन्दे मातरम्” की रचना की। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं था बल्कि एक जागरण का मंत्र बनकर उभरा। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया, तब यह गीत पूरे देश में फैल गया और एक राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बन गया। धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण मंत्र बन गया। साल 1905 के बंग भंग आंदोलन के समय “वन्दे मातरम्” हर गली, हर सभा और हर आंदोलन की धड़कन बन गया। विद्यार्थी जुलूसों में यह गूंजता था, महिलाओं की सभाओं में यह प्रेरणा देता था, क्रांतिकारियों के शपथ पत्रों में यह आत्मबल जगाता था और राष्ट्रीय आंदोलनों में यह एकजुटता का स्वर बन जाता था। यह केवल गीत नहीं रहा, यह आत्मगौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा का घोष बन गया। श्री अरविन्द ने इसे राष्ट्र आत्मा का मंत्र कहा। लाला लाजपत राय, सुब्रमण्य भारती, लाला हरदयाल और भीकाजी कामा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी पत्रिकाओं और पत्रों के शीर्षक में “वन्दे मातरम्” को स्थान दिया। महात्मा गांधी भी अपने कई पत्रों का समापन इसी मंत्र के साथ करते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस गीत के प्रभाव को समझा और इसे रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए, लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन जितना दमन हुआ, उतनी ही इसकी शक्ति और बढ़ती गई। यह जनता के हृदय में बस चुका था और वहां से इसे कोई नहीं हटा सकता था। समय के साथ यह गीत केवल स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति बनकर नहीं रह गया बल्कि भारतीय पहचान का स्थायी प्रतीक बन गया। 30 से 31 अक्टूबर तथा 1 नवम्बर 2025 को जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसे राष्ट्र चेतना का मूल स्वरबद्ध गीत बताया। उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम् एक दिव्य गीत है, जो राष्ट्र चेतना को जागृत करता है और समाज को जोड़ने वाली अद्भुत डोर है।” उनके अनुसार यह गीत सभी प्रांतों, भाषाओं और समुदायों के बीच समान रूप से स्वीकार्य है और यह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और आत्मस्वत्व का आधार है। संघ ने समाज से आह्वान किया कि इस 150 वर्ष के पावन काल में “वन्दे मातरम्” की ज्योति हर हृदय में प्रज्ज्वलित हो और इसी भाव से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया जाए। इसी संदर्भ में 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार द्वारा घोषित नए दिशा-निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। इन निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले “वन्दे मातरम्” के सभी छह अंतरों का गायन किया जाएगा, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड होगी। राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज समारोह, पद्म पुरस्कार और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में इसे गाना अनिवार्य किया गया है। विद्यालयों में भी प्रार्थना की शुरुआत “वन्दे मातरम्” से करने का सुझाव दिया गया है। हालांकि इस संबंध में किसी प्रकार की कानूनी सजा का प्रावधान नहीं रखा गया है। यह एक दंडात्मक आदेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में है। आज के समय में “वन्दे मातरम्” अक्सर केवल दो शब्दों तक सीमित होकर रह जाता है। लोग इसे एक नारे के रूप में बोलते हैं किंतु इसकी वास्तविक महत्ता पूरे गीत में निहित है। ये दो शब्द भावना जगाते हैं, लेकिन पूरा गीत चेतना जगाता है। इसकी संपूर्ण रचना में राष्ट्र चेतना को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करने की क्षमता है। इसमें प्रकृति का सौंदर्य है, संस्कृति का गौरव है, ज्ञान का प्रकाश है और शक्ति का तेज है। ये चारों तत्व मिलकर इसे केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन दर्शन बना देते हैं। “वन्दे मातरम्” हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं होता, यह एक जीवित सांस्कृतिक सत्ता होता है। इसकी सेवा कर्तव्य से बढ़कर है, यह तप और साधना है। मातृभूमि सिर्फ भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी चेतना, पहचान और अस्तित्व का आधार है। जब हम “वन्दे मातरम्” कहते हैं तो हम उस परंपरा को
UP Medical Negligence: मोतियाबिंद सर्जरी बनी काल! 42 मरीजों में फैला खतरनाक संक्रमण, स्वास्थ्य विभाग ने सील किया अस्पताल का ओटी

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से एक ऐसी झकझोर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य मानकों और निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। सिकरीगंज स्थित न्यू राजेश हाईटेक हॉस्पिटल में एक और दो फरवरी को मोतियाबिंद की सर्जरी कराने वाले परिवारों के लिए यह ऑपरेशन किसी भयावह दुस्वप्न में बदल गया है। अस्पताल में सर्जरी कराने वाले कुल 42 मरीजों में से 22 की हालत इतनी बिगड़ी कि उन्हें आनन-फानन में दिल्ली के एम्स अस्पताल रेफर करना पड़ा। संक्रमण की तीव्रता इतनी घातक थी कि अब तक चार मरीजों की आंखें सर्जरी कर निकालनी पड़ी हैं, जबकि छह अन्य की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए बुझ चुकी है। यह पूरी घटना स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और संक्रमण नियंत्रण की पोल खोलती नजर आ रही है। एम्स के विशेषज्ञों की देखरेख में चल रहे इस उपचार के दौरान कई दर्दनाक कहानियां सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि शुरुआत में सात मरीजों को भर्ती कराया गया था, लेकिन संक्रमण की गंभीरता के चलते मंगलवार और बुधवार के बीच 15 और मरीज दिल्ली पहुंच गए। इन सभी की आंखों में संक्रमण फैल चुका है और उनका इलाज विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में जारी है। जिन 12 मरीजों में संक्रमण की स्थिति बेहद गंभीर थी, उनमें से चार की आंखें निकालनी पड़ीं ताकि संक्रमण दिमाग तक न पहुंचे। तीन अन्य मरीजों की स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है और डॉक्टर एक से दो दिन में आगे की सर्जरी या उपचार को लेकर निर्णय लेंगे। बेलघाट क्षेत्र की रहने वाली 60 वर्षीय महिला बहाउद्दीन का इलाज एम्स में चल रहा है। उनकी बेटी के अनुसार संक्रमण के कारण उनकी मां की आंखों की रोशनी चली गई। इसी तरह बारी गांव की देवराजी की आंख में संक्रमण इतना बढ़ गया कि मवाद और खून आने लगा। जांच के बाद डॉक्टरों ने पाया कि रोशनी पूरी तरह जा चुकी है और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए आंख निकालनी पड़ी। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों ने बताया कि देरी होती तो संक्रमण का असर दिमाग तक पहुंच सकता था। इन्नडीह के अर्जुन सिंह और बेलीपार के रामदरश सहित अन्य मरीजों की भी आंखें निकालनी पड़ी हैं या अतिरिक्त सर्जरी की तैयारी चल रही है। इन घटनाओं ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी है। मामले की जांच के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी टीम ने अस्पताल पहुंचकर ऑपरेशन थियेटर और अन्य स्थानों से 10 से अधिक सैंपल लिए हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. अमरेश सिंह के अनुसार जांच रिपोर्ट गुरुवार तक आने की संभावना है। रिपोर्ट से संक्रमण के असली कारणों का पता चल सकेगा। अस्पताल संचालक राजेश राय का कहना है कि उनके यहां वर्षों से मोतियाबिंद की सर्जरी की जा रही है और पहली बार इस तरह की घटना सामने आई है। एसीएमओ डॉ. एके चौधरी ने बताया कि अस्पताल का ऑपरेशन थियेटर सील कर दिया गया है और स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले पर नजर रखे हुए है। रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर निजी अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण और ऑपरेशन थियेटर की स्वच्छता को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। फिलहाल पीड़ित परिवारों की उम्मीद एम्स के डॉक्टरों पर टिकी है।
Lawrence Bishnoi Gang: अशोकनगर के बिल्डर को लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर 10 करोड़ की रंगदारी, वॉयस नोट में दी धमकी

HIGHLIGHTS: बिल्डर अंकित अग्रवाल को 10 करोड़ की रंगदारी की धमकी। धमकी देने वाला खुद को ‘हरि बॉक्सर’ बता रहा था। अंतरराष्ट्रीय नंबरों से कॉल और व्हाट्सऐप वॉइस नोट। धमकाने वाले ने परिवार और व्यवसाय की पूरी डिटेल का हवाला दिया। अन्य व्यापारी बलबीर खुराना को भी कॉल आई थी। Lawrence Bishnoi Gang: ग्वालियर। अशोकनगर के बिल्डर और कारोबारी अंकित अग्रवाल को लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर 10 करोड़ रुपए की धमकी मिली है। धमकी देने वाले ने खुद को ‘हरि बॉक्सर’ बताया और व्हाट्सऐप वॉयस नोट में कहा कि “हमने जिसे फोन किया उसे बगैर पैसे लिए नहीं छोड़ा। उसे मारा है या पैसे लिए हैं। तेरी हर डिटेल मेरे पास है। अंतरराष्ट्रीय नंबर से कॉल और वॉइस नोट 11 फरवरी को अंकित अग्रवाल को तीन अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय नंबरों से कॉल और मैसेज आए। कॉल न उठाने पर वॉइस नोट भेजे गए। वॉइस नोट में हरि बॉक्सर ने 10 करोड़ रुपए की मांग की और दो दिन में रकम देने का दबाव बनाया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर बात नहीं मानी गई तो जीवन और परिवार को नुकसान पहुंचाया जाएगा। MORENA NEWS: मुरैना में रास्ते के विवाद पर गोलियां और लाठी का तांडव, दो महिलाएं घायल व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा धमकाने वाले ने बिल्डर और उनके परिवार की पूरी जानकारी का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उनके पास घर, वाहन और व्यवसाय की पूरी डिटेल है। घर की लोकेशन, फोटो और परिवार के आने-जाने का समय भी उनके पास है। हरि बॉक्सर ने आगे कहा कि अभी 10 करोड़ चाहिए, बाद में 20 करोड़ रुपए लिए जाएंगे। पुलिस जांच धमकी मिलने के बाद अंकित अग्रवाल ने थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने साइबर सेल की मदद ली और कॉल डिटेल, नेटवर्क और इंटरनेट रूट का पता लगाकर आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश शुरू कर दी है। ASP गजेंद्र सिंह कंवर ने बताया कि शुरुआती जांच में यह संभावना है कि किसी ने लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम पर डर पैदा करने और वसूली की कोशिश की। Ekadashi 2026 Daan: विजया एकादशी के दिन दान करना क्यों माना जाता है शुभ? जानें किन-किन चीजों का दान करना होता है फलदायी अन्य प्रभावित कारोबारी शहर के अन्य व्यापारी बलबीर खुराना को भी अंतरराष्ट्रीय नंबर से कॉल आई थी। उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया और तुरंत पुलिस को जानकारी दी। पुलिस अब तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान करने में जुटी है।
उतरन की तपस्या से बिग बॉस की स्ट्रॉन्ग कंटेस्टेंट तक, रश्मि देसाई का दमदार सफर..

नई दिल्ली। फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो धीरे धीरे अपनी जगह बनाते हैं और फिर एक दिन दर्शकों के दिलों पर छा जाते हैं। रश्मि देसाई उन्हीं चेहरों में से एक हैं। 13 फरवरी को अपना 40वां जन्मदिन मना रहीं रश्मि का करियर इस बात का सबूत है कि मेहनत और धैर्य के दम पर कोई भी कलाकार अपनी पहचान गढ़ सकता है। रश्मि ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत भोजपुरी सिनेमा से की थी। शुरुआती दौर आसान नहीं था। उन्होंने कई कम बजट और बी ग्रेड फिल्मों में भी काम किया। साल 2002 में आई फिल्म कन्यादान से उन्होंने इंडस्ट्री में कदम रखा। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही अभिनेत्री आगे चलकर छोटे पर्दे की बड़ी स्टार बनेगी। लेकिन रश्मि ने हर मौके को सीखने और आगे बढ़ने का जरिया बनाया। उनके करियर का असली मोड़ साल 2008 में आया जब टीवी शो उतरन शुरू हुआ। इस सीरियल में उन्होंने तपस्या का किरदार निभाया जो ग्रे शेड लिए हुए था। इस भूमिका में निगेटिव और इमोशनल दोनों रंग थे। रश्मि ने इस किरदार को इतनी गहराई से निभाया कि वह घर घर में पहचानी जाने लगीं। उतरन उस समय का बेहद लोकप्रिय शो बना और तपस्या का नाम रश्मि की पहचान बन गया। इसके बाद उन्होंने कई टीवी शोज में काम किया। दिल से दिल तक में सिद्धार्थ शुक्ला के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को पसंद आई। शो ने अच्छी टीआरपी हासिल की और रश्मि की लोकप्रियता और बढ़ी। टीवी के साथ साथ उन्होंने बॉलीवुड में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। दबंग 2 में उनका छोटा सा रोल नजर आया। इसके अलावा ये लम्हे जुदाई के सबनम मौसी और सुपरस्टार जैसी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया। भले ही फिल्मों में उनकी भूमिकाएं सीमित रहीं लेकिन उन्होंने हर मंच पर खुद को साबित करने की कोशिश जारी रखी। रश्मि की पर्सनैलिटी का एक अलग पहलू तब सामने आया जब उन्होंने बिग बॉस 13 में हिस्सा लिया। इस रियलिटी शो ने उनकी छवि को नया आयाम दिया। दर्शकों ने उन्हें सिर्फ एक अभिनेत्री के रूप में नहीं बल्कि एक संवेदनशील और मजबूत महिला के रूप में देखा। शो में सिद्धार्थ शुक्ला के साथ उनकी नोकझोंक और बहसें काफी चर्चा में रहीं। दोनों पहले एक साथ काम कर चुके थे और बिग बॉस में उनकी टकराहट ने शो को और दिलचस्प बना दिया। बिग बॉस के बाद रश्मि की फैन फॉलोइंग में जबरदस्त इजाफा हुआ। उन्होंने यह साबित किया कि वे केवल एक किरदार तक सीमित नहीं हैं बल्कि असल जिंदगी में भी चुनौतियों का सामना करने का हौसला रखती हैं। 40 की उम्र में भी वे इंडस्ट्री में सक्रिय हैं और नए प्रोजेक्ट्स के जरिए दर्शकों से जुड़ी हुई हैं। उनका सफर संघर्ष से सफलता तक की ऐसी कहानी है जो यह सिखाती है कि शुरुआत चाहे जहां से हो मंजिल मेहनत से ही तय होती है।
अतिक्रमण पर हाईकोर्ट की कड़ी फटकार, BMC को चेतावनी कमिश्नर को घोड़े पर ऑफिस आना पड़ेगा

नई दिल्ली । मुंबई में सड़क अतिक्रमण की समस्या को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने BMC ब्रॉम्बे म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन को कड़ी फटकार लगाई है। पवई के एक स्कूल की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रविंद्र घुघे और न्यायमूर्ति अभय मंत्री की पीठ ने कहा कि शिकायतों के बावजूद अतिक्रमण हटाने में लापरवाही चिंताजनक है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो कमिश्नर को ‘घोड़े पर’ दफ्तर आना पड़ सकता है। पवई के हीरानंदानी इलाके की लगभग 90 फीट चौड़ी सड़क पर अतिक्रमण की तस्वीरें कोर्ट में पेश की गईं। अदालत ने देखा कि फुटपाथ पर कई झुग्गियां बन गई हैं जिससे स्कूली बच्चों और आम जनता को चलने-फिरने में भारी परेशानी हो रही है। सड़क की चौड़ाई घटकर लगभग एक लेन रह गई है जिससे ट्रैफिक जाम की स्थिति बन रही है। जस्टिस घुघे ने कहा देखा जाए तो इस सड़क से चार कारें एक साथ गुजर सकती हैं लेकिन अब देखिए क्या हाल हो गया है यह घटकर सिर्फ एक लेन की रह गई है। मुझे तो यह सोचकर हैरानी होती है कि आने वाले सालों में क्या होगा लोगों को मोटरसाइकिल छोड़नी पड़ेगी और साइकिल अपनानी होगी या फिर सबसे अच्छा विकल्प घोड़ा है घोड़ा भीड़-भाड़ में भी अच्छी तरह रास्ता निकाल लेता है। कल्पना कीजिए कि आपके BMC के कमिश्नर घोड़े पर बैठकर अपने ऑफिस आ रहे हैं तो वह कैसे लगेंगे। उन्होंने आगे कहा मुंबई को आखिर क्या होता जा रहा है? जैसे ही कोई सड़क बनती है लोग वहां आकर कब्जा जमा लेते हैं देखिए आप अपने ही शहर का क्या हाल कर रहे हैं। इतनी खूबसूरत सड़क है और आपने इसका क्या बना दिया है? हम नगर निगम के प्रमुख कमिश्नर या किसी भी अन्य अधिकारी को कोर्ट बुला सकते हैं और उनसे इस पर जवाब मांग सकते हैं। याचिका में आरोप लगाया गया कि अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कई बार शिकायतें और बैठकें की गईं लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। साथ ही कहा गया कि कुछ सिविक अथॉरिटीज अतिक्रमण को टैंकर से पानी सप्लाई और टॉयलेट की सुविधा देकर बढ़ावा दे रहे हैं। क्षेत्र में चार स्कूल होने के कारण माता-पिता के आने-जाने से वाहन अधिक होते हैं और अतिक्रमण के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या बढ़ जाती है। हाईकोर्ट ने BMC की ओर से पेश वकील को निर्देशों के पालन के लिए समय दिया है और कार्रवाई की जानकारी अदालत में देने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जल्द से जल्द अतिक्रमण हटाया जाए और सड़क को सामान्य रूप से खुला सुनिश्चित किया जाए।
CM डॉ. मोहन ने वंदे मातरम प्रोटोकॉल का किया स्वागत, कहा यह हमारी एकता का प्रतीक, MP में भी होगा लागू

भोपाल। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के लिए जारी नए प्रोटोकॉल का मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुले दिल से स्वागत किया है। नए निर्देशों में वंदे मातरम के सभी छह छंदों को पूर्ण सम्मान के साथ गाने और राष्ट्रगान जन गण मन से पहले बजाने का प्रावधान किया गया है। मुख्यमंत्री ने इसे देशभक्ति और एकता का प्रतीक बताया है और कहा कि यह निर्णय राष्ट्रीय भावना को मजबूत करेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा आज जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हमारे राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम के लिए नए प्रोटोकॉल जारी किए हैं जिसमें सभी छह छंदों को पूर्ण सम्मान के साथ गाने और राष्ट्रीय गान से पहले बजाने का प्रावधान है तो मेरा हृदय गर्व से भर उठता है। यह न केवल बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना को सच्ची श्रद्धांजलि है बल्कि हमारी मातृभूमि के प्रति उस अनंत प्रेम और बलिदान की याद दिलाता है जिसने स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को प्रेरित किया। उन्होंने आगे कहा वन्दे मातरम हमारे दिल की धड़कन है हमारे रक्त की पुकार है यह वह गीत है जो हमें याद दिलाता है कि भारत माता की सेवा में हमारा जीवन समर्पित है। यह राष्ट्रगीत हमारी एकता का प्रतीक है। आइए हम सब मिलकर इस पवित्र गीत के माध्यम से राष्ट्र की सेवा का संकल्प लें जय हिंद जय भारत वन्दे मातरम! मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश में इस निर्णय का त्वरित और पूर्ण पालन सुनिश्चित किया जाएगा। नए दिशा-निर्देशों के तहत सरकारी कार्यक्रमों स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम के पूरे छह छंद अनिवार्य होंगे और सभी को खड़े होकर सम्मान देना होगा।
MORENA NEWS: मुरैना में रास्ते के विवाद पर गोलियां और लाठी का तांडव, दो महिलाएं घायल

HIGHLIGHTS: मुरैना के कुत्थियाना गांव में सड़क निर्माण को लेकर हिंसक झगड़ा। दोनों पक्षों ने लाठी, कुल्हाड़ी और बंदूक का इस्तेमाल किया। दो महिलाएं घायल; उमा तोमर और उमा देवी। पहले से चल रहा था जमीन विवाद। पुलिस ने क्रॉस मामला दर्ज कर जांच शुरू की। MORENA NEWS: ग्वालियर। मुरैना जिले के अंबाह विकासखंड के कुत्थियाना गांव में बुधवार सुबह सड़क निर्माण के दौरान दो सगे भाइयों के परिवार आमने-सामने आ गए। बता दें कि विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों पक्षों ने घरों से लाठी, कुल्हाड़ी और बंदूक निकाल ली। झगड़े में फायरिंग और मारपीट हुई, जिसमें दो महिलाएं गंभीर रूप से घायल हो गईं। सड़क निर्माण में विवाद स्थानीय ग्राम पंचायत द्वारा स्वीकृत सड़क निर्माण कार्य के दौरान देवेंद्र सिंह तोमर और गंगा सिंह तोमर ठेकेदार पर सड़क को अपनी-अपनी तरफ चौड़ा और मोड़ने के लिए दबाव डाल रहे थे। इस बात पर दोनों पक्षों में कहासुनी शुरू हुई, जो देखते ही देखते हिंसक झगड़े में बदल गई। वंदे मातरम के छह छंद अनिवार्य -जिसने जलाई स्वतंत्रता की ज्वाला, अब उसे मिला औपचारिक सम्मान हिंसा और घायल झगड़े में देवेंद्र तोमर की पत्नी उमा तोमर (42) को सिर में लाठी लगने से चोट आई। वहीं गंगा सिंह तोमर की पत्नी उमा देवी (50) को हाथ में कुल्हाड़ी लगने से गंभीर चोटें आईं। घटना का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे को गालियां देते और ललकारते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में कुछ लोग बंदूक से फायर करते और कुछ हाथों में लाठी लिए दिख रहे हैं। पहले से चल रहा था विवाद अंबाह थाना प्रभारी सतेंद्र कुशवाह ने बताया कि दोनों परिवारों के बीच पहले से जमीन को लेकर विवाद था। सड़क निर्माण के दौरान रास्ता मोड़ने की मांग ने तनाव और भड़का दिया। T20 World Cup: बुमराह की ‘घातक’ यॉर्कर से सहमा भारतीय खेमा, ईशान किशन चोटिल; क्या संजू सैमसन की होगी सरप्राइज एंट्री? पुलिस की कार्रवाई पुलिस ने दोनों पक्षों की शिकायत पर क्रॉस मामला दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि आरोपी और घटना में शामिल अन्य लोगों की पहचान की जा रही है।
कर्नाटक में गन कल्चर का 'विवादित' शो: कांग्रेस विधायक का पिस्टल संग वीडियो वायरल, पुलिस ने शुरू की जांच, उठ रहे गंभीर सवाल

नई दिल्ली। डिजिटल युग में ‘रील’ बनाने का शौक अब जनप्रतिनिधियों के लिए जी का जंजाल बनता जा रहा है। ताजा मामला कर्नाटक के कलबुर्गी जिले से सामने आया है, जहाँ एक पारिवारिक समारोह के दौरान कांग्रेस विधायक मतीन पटेल का कथित तौर पर हथियार लहराते हुए डांस करने का वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैली इस रील ने न केवल विधायक की कार्यशैली पर उंगलियां उठाई हैं, बल्कि सार्वजनिक आयोजनों में हथियार प्रदर्शन और बढ़ती गन कल्चर पर भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सामने आई वायरल वीडियो क्लिप किसी फिल्मी सीन से कम नहीं लगती। इसमें विधायक मतीन पटेल एक चमचमाती काली एसयूवी से टशन में उतरते दिखाई देते हैं। इसके बाद वे फिल्म ‘धुरंधर’ के एक लोकप्रिय गाने पर पिस्टल जैसी दिखने वाली वस्तु हाथ में लेकर थिरकते नजर आते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि वीडियो में उनके पीछे खड़े कुछ समर्थक भी हाथों में बंदूक जैसी वस्तुएं थामे हुए हैं। जैसे ही यह क्लिप इंटरनेट पर आई, नेटिजन्स ने इसे गैर-जिम्मेदाराना आचरण करार देते हुए विधायक की जमकर क्लास लगा दी। लोगों का तर्क है कि एक जनप्रतिनिधि, जिसका काम कानून की रक्षा और समाज को सही दिशा देना है, उसका इस तरह हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन करना बेहद खतरनाक संदेश देता है। मामला जब सियासी गलियारों में गर्म हुआ और चौतरफा घिरने लगे, तो विधायक मतीन पटेल ने अपनी सफाई पेश की। उन्होंने दावा किया कि वीडियो में दिखाई दे रही वस्तु कोई असली हथियार नहीं, बल्कि एक ‘खिलौना बंदूक’ थी। उनके अनुसार, यह पूरी प्रस्तुति एक निजी पारिवारिक कार्यक्रम का हिस्सा थी, जहाँ उन्होंने बच्चों की जिद पर फिल्म के एक काल्पनिक किरदार की तरह कपड़े पहने और एक्ट किया था। पटेल ने यह भी आरोप लगाया कि वीडियो को गलत संदर्भ में फैलाकर उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही है और वे इस बारे में पुलिस को अपना पक्ष रख चुके हैं। हालांकि, पुलिस इस दलील को आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रही है। कलबुर्गी शहर के पुलिस आयुक्त शरणप्पा एस डी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए औपचारिक जांच के आदेश दे दिए हैं। पुलिस अब इस बात का वैज्ञानिक सत्यापन कर रही है कि वीडियो में इस्तेमाल हुए हथियार असली थे या वाकई खिलौने। साथ ही, उस स्थान और क्षेत्र की भी शिनाख्त की जा रही है जहाँ यह वीडियो शूट हुआ था। पुलिस आयुक्त ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि यदि जांच में हथियार असली पाए जाते हैं, तो उनके लाइसेंस की वैधता और नियमों के उल्लंघन की गहनता से पड़ताल की जाएगी। यदि किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि या सार्वजनिक सुरक्षा के नियमों की अनदेखी पाई गई, तो संबंधित धाराओं के तहत कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ गई है कि क्या सोशल मीडिया पर चंद लाइक्स और फेम के लिए जनप्रतिनिधियों को अपनी मर्यादा और कानूनी सीमाओं को ताक पर रख देना चाहिए? फिलहाल, सबकी निगाहें पुलिस की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं।
खबरदार! अब AI जनरेटेड वीडियो फैलाना पड़ेगा भारी, मोदी सरकार ने बदले IT नियम; अनिवार्य लेबलिंग और सख्त डेडलाइन लागू

नई दिल्ली। डिजिटल दौर में जहां एक ओर तकनीक जीवन को सुगम बना रही है वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दुरुपयोग ने सुरक्षा और नैतिकता के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक और बेहद सख्त कदम उठाया है। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर AI जनरेटेड और डीपफेक कंटेंट को बिना पहचान के फैलाना लगभग नामुमकिन होगा। सरकार ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी फर्जी फोटो वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट डिस्क्लेमर या लेबल लगाना अनिवार्य होगा। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कार्रवाई की गति को लेकर है-अब किसी भी आपत्तिजनक कंटेंट को रिपोर्ट किए जाने के महज तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। यह नया प्रावधान 20 फरवरी 2026 से पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू हो जाएगा। दरअसल बीते कुछ समय में डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल समाज के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। इस तकनीक के जरिए किसी भी व्यक्ति की आवाज या चेहरा बदलकर ऐसे सटीक नकली वीडियो तैयार किए जा रहे हैं जो पहली नजर में बिल्कुल असली लगते हैं। इनका दुरुपयोग न केवल व्यक्तिगत छवि खराब करने के लिए किया जा रहा है बल्कि राजनीतिक अस्थिरता सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और सामाजिक भ्रम पैदा करने के लिए भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसी आसन्न खतरे को भांपते हुए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी IT नियमों में क्रांतिकारी संशोधन किया है। Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code 2021 में किए गए इस नए संशोधन के तहत AI आधारित सामग्री को लेकर लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है। अब यदि कोई फोटो वीडियो या ऑडियो कृत्रिम मेधा AI से निर्मित है या उसमें जरा सा भी तकनीकी बदलाव किया गया है तो प्लेटफॉर्म्स को उसे प्रमुखता से लेबल करना होगा। इसका सीधा उद्देश्य यह है कि आम इंटरनेट यूजर पहली नजर में ही यह पहचान सके कि जो वह देख या सुन रहा है वह वास्तविक नहीं बल्कि सिंथेटिक मीडिया है। इससे भ्रम की स्थिति पैदा होने से पहले ही समाप्त हो जाएगी। सिर्फ पहचान ही नहीं बल्कि जवाबदेही को लेकर भी सरकार ने हथौड़ा चलाया है। अब तक सोशल मीडिया कंपनियों को अवैध सामग्री हटाने के लिए 36 घंटे की मोहलत मिलती थी जिसे अब घटाकर केवल 3 घंटे कर दिया गया है। यह समय सीमा इतनी सख्त है कि कंपनियों को अपने कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम को पूरी तरह से अपग्रेड करना होगा। यदि कोई प्लेटफॉर्म इस समय सीमा का उल्लंघन करता है तो उसे भारी कानूनी परिणाम और भारी-भरकम दंड भुगतना पड़ सकता है। नए नियमों के अंतर्गत अब जब भी कोई यूजर कंटेंट अपलोड करेगा तो प्लेटफॉर्म को तकनीकी तौर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि यूजर से यह सवाल पूछा जाए कि क्या सामग्री AI द्वारा संशोधित है। यदि जवाब हाँ है तो सिस्टम स्वतः ही उस पर एक वाटरमार्क या लेबल चस्पा कर देगा। सरकार का मानना है कि यह कदम डिजिटल इकोसिस्टम में पारदर्शिता लाएगा और जवाबदेही तय करेगा। विशेषज्ञों ने भी इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि तकनीक अपने आप में बुरी नहीं होती लेकिन उसका बिना जिम्मेदारी वाला उपयोग खतरनाक है। 20 फरवरी 2026 से लागू होने वाली यह व्यवस्था भारत को डिजिटल सुरक्षा के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों की कतार में खड़ा कर देगी।