वंदे मातरम के छह छंद अनिवार्य -जिसने जलाई स्वतंत्रता की ज्वाला, अब उसे मिला औपचारिक सम्मान
नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:। माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।भारत की आत्मा में यदि कोई सबसे पवित्र भाव प्रवाहित होता है, तो वह है, मातृभूमि का भाव। यह भाव आज की राजनीति से नहीं, सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक चेतना से जन्मा है। सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वज धरती को उर्वरता और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में पूजते थे।अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (12.1.12) में उद्घोष है , माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। अर्थात-धरती मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। यह केवल मंत्र नहीं, भारतीय अस्मिता का मूल स्वर है। यस्यां वेदाः प्रतिष्ठिताः-जिस भूमि पर ज्ञान और संस्कृति प्रतिष्ठित हुई, वह केवल मिट्टी नहीं, चेतना है। भारत की हर परंपरा इस भाव की साक्षी है ,निर्माण से पहले भूमि-पूजन, किसान का बोआई से पहले मिट्टी को प्रणाम, गृहप्रवेश से पूर्व भूमि स्पर्श। यह सब बताता है कि जो हमें अन्न, जल और वायु देती है, वह पूज्य है। इसी मातृभाव को शब्द दिए बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने, अपने उपन्यास आनंदमठ में। वंदे मातरम् कोई कविता नहीं थी, यह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का बिगुल था। 1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह स्वदेशी क्रांति का घोष बना। क्रांतिकारी फाँसी के फंदे पर झूलते हुए यही कहते थे , वंदे मातरम्! अरविंद घोष से लेकर भगत सिंह तक, इस गीत ने अनगिनत हृदयों में ज्वाला जलाई। यह जन-जन के कंठ की आवाज बन गया। औपनिवेशिक काल में सांप्रदायिक संवेदनशीलता और राजनीतिक संतुलन के कारण गीत के कुछ अंशों को सीमित किया गया। परंतु प्रश्न आज भी वही है-क्या मातृभूमि की वंदना किसी एक पंथ का विषय है? अनेक देशों के राष्ट्रगानों में भूमि और राष्ट्र की स्तुति है। यदि जन्मदात्री माँ का सम्मान स्वाभाविक है, तो धात्री माँ-जो हमें जीवन देती है-उसका सम्मान विवाद क्यों बने? दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था यदि ‘भारत माता’ में से ‘माता’ निकाल दें, तो ‘भारत’ का अर्थ ही नहीं रह जाता। यह कथन आज और भी प्रासंगिक प्रतीत होता है।आज की ऐतिहासिक घोषणाकेंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2026 वंदे मातरम् के संबंध में स्पष्ट और औपचारिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान, एकरूपता और गरिमा सुनिश्चित करना बताया गया नए दिशा-निर्देश : क्या-क्या अनिवार्य है?जब भी राष्ट्रीय गीत के आधिकारिक संस्करण का गायन या वादन होगा, सभी उपस्थित व्यक्तियों को सावधान मुद्रा में खड़ा होना होगा। यदि फिल्म, समाचार-फीचर या वृत्तचित्र के हिस्से के रूप में बजाया जाए, तो खड़े होना अनिवार्य नहीं है। अब वंदे मातरम् के सभी छह छंद गाए/बजाए जाएंगे। जिसकी अवधि 3 मिनट 10 सेकंड (190 सेकंड) जो पहले प्रायः केवल पहले दो छंद (लगभग 65 सेकंड) उपयोग में आते थे। यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों हों, तो पहले वंदे मातरम् उसके बाद जन गण मन होगा। वन्दे मातरम का गायन राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर, राष्ट्रपति/राज्यपाल के आगमन-प्रस्थान पर , नागरिक सम्मान समारोह (जैसे पद्म पुरस्कार) , औपचारिक सरकारी कार्यक्रम , विद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों में और अन्य सार्वजनिक अवसर (सरकार के निर्देशानुसार) पर होगा। विद्यालयों में शुरुआत सामूहिक राष्ट्रगीत से की जा सकती है। इस हेतु ध्वनि-प्रसारण की उचित व्यवस्था हो। गीत के शब्द प्रतिभागियों में वितरित किए जा सकते हैं। गायन सामूहिक और सम्मानपूर्ण हो। वंदे मातरम के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह मूल रूप से संस्कृत और बंगाली भाषा के मिश्रण में लिखा गया था। बंकिम चंद्र ने यह गीत हुगली नदी के किनारे, चिनसुरा (Chinsurah) में लिखा था, जो वर्तमान पश्चिम बंगाल में स्थित है। यह माना जाता है कि वंदे मातरम् की कल्पना बंकिम चंद्र को लगभग 1876 के आसपास तब हुई, जब वे ब्रिटिश शासन में जिला अधिकारी (डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर) के पद पर कार्यरत थे। यह गीत बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंदमठ (प्रकाशित: 1882) से लिया गया है। गीत लिखे जाने के तुरंत बाद जदुनाथ भट्टाचार्य से इसे संगीतबद्ध (धुन तैयार करने) का अनुरोध किया गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे जन गण मन (राष्ट्रीय गान) के साथ समान सम्मान प्रदान करते हुए राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। 1896 में कलकत्ता (कोलकाता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। यह प्रस्तुति रवीन्द्रनाथ टैगोर ने दी थी।इसका गद्य रूप में अंग्रेज़ी अनुवाद श्री अरविंद ने 20 नवंबर 1909 को अपनी पत्रिका कर्मयोगिन में प्रकाशित किया। 1896 – पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी गई 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् को सार्वजनिक रूप से गाया।1937 – सीमित उपयोग का निर्णय लिया गया, 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति (कोलकाता/फैजपुर संदर्भ) ने निर्णय लिया कि आधिकारिक कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद गाए जाएँ।प्रख्यात शास्त्रीय गायक ओंकारनाथ ठाकुर ने इस सीमित संस्करण का विरोध किया। उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन में गाने से इंकार कर दिया, परंतु अपने निजी संगीत समारोहों में पूरा वंदे मातरम् गाना जारी रखा। 15 अगस्त 1947 – ऐतिहासिक रेडियो प्रसारण इस दिन स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 1947) की सुबह आल इंडिया रेडियो से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण गाया।प्रसिद्ध गायिका हीराबाई बड़ोदेकर ने इसे राग तिलक कामोद में प्रस्तुत किया (AIR दिल्ली) , दिलीपकुमार रॉय ने इसे ध्रुपद-धमार शैली में गाया। विष्णुपंत पागनीस ने ग्रामोफोन रिकॉर्ड में इसे राग सारंग में प्रस्तुत किया। केशवराव भोले ने इसे राग देशकार में रिकॉर्ड किया। वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना का प्रवाह है। नए दिशा-निर्देश इसे संस्थागत सम्मान देने का प्रयास हैं। पर एक मूल प्रश्न भी उठता है क्या अपनी ही धरा-माता के सम्मान के लिए कानून बनाना पड़े? सच यह है कि मातृभूमि का सम्मान हमारा जन्मजात कर्तव्य है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तौलना उचित नहीं। स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं होता। माँ का सम्मान बहस का विषय नहीं, संस्कार का विषय है। वंदे मातरम् भारत की आत्मा का स्वर है। वंदे मातरम् केवल गीत नहीं-भारतीयता का चिरंतन स्पंदन है। सिंधु सभ्यता से वेदों तक, स्वतंत्रता संग्राम से आज तक मातृभूमि का सम्मान हमारी संस्कृति का मूल तत्व रहा है। आज जब छहों अंतरों के साथ इसे औपचारिक सम्मान मिला
वैलेंटाइन डे स्पेशल: कपिल शर्मा ने पूछा- क्या आज भी मिलते हैं लड़कियों के मैसेज? शाहिद कपूर के स्मार्ट जवाब ने लूटी महफिल

नई दिल्लीबॉलीवुड के चॉकलेटी बॉय शाहिद कपूर और ‘नेशनल क्रश’ तृप्ति डिमरी इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘ओ रोमियो’ को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। फिल्म 13 फरवरी को सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली है और वैलेंटाइन वीक के इस रोमांटिक माहौल को और अधिक खास बनाने के लिए फिल्म की पूरी टीम ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शर्मा शो’ के मंच पर पहुंची। नेटफ्लिक्स द्वारा जारी किए गए इस एपिसोड के ट्रेलर ने सोशल मीडिया पर पहले ही धूम मचा दी है जिसमें विशाल भारद्वाज की निर्देशन वाली इस फिल्म की स्टारकास्ट मस्ती के मूड में नजर आ रही है। शो के दौरान कॉमेडी किंग कपिल शर्मा ने अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज में शाहिद कपूर की खिंचाई करने की कोशिश की। कपिल ने मुस्कुराते हुए सवाल दागा कि क्या शादीशुदा होने के बावजूद आज भी उन्हें वैलेंटाइन्स डे पर लड़कियों के मैसेज आते हैं? इस गुदगुदाते सवाल पर शाहिद पहले तो थोड़ा हिचकिचाए लेकिन फिर अपनी चतुराई का परिचय देते हुए बोले कि वे अभी बैकस्टेज अपने बच्चों की उम्र पर चर्चा कर रहे थे। जब कपिल ने चुटकी लेते हुए कहा किबच्चों को क्या पता चलेगा वे तो छोटे हैं तब शाहिद ने अपनी पत्नी मीरा राजपूत की ओर इशारा करते हुए बेहद ही शानदार जवाब दिया। उन्होंने हंसते हुए कहाबच्चों की मम्मी को काफी कुछ पता चल जाता है। शाहिद के इस पारिवारिक और मजाकिया जवाब ने दर्शकों को ठहाकों से सराबोर कर दिया। हंसी का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। कपिल ने तृप्ति डिमरी की ओर रुख करते हुए उनके कॉलेज के दिनों के प्यार और लव लेटर्स Love Letters पर सवाल किया। तृप्ति ने बेहद मासूमियत और बेबाकी से जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने कभी लव लेटर लिखे तो नहीं लेकिन पढ़े बहुत सारे हैं। उनकी इस साफगोई पर जज अर्चना पूरन सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। वहीं शो के चहेते कलाकार सुनील ग्रोवर और कीकू शारदा ने रिंकू भाभी और ननद के किरदारों में मेहमानों के साथ ऐसी स्किट पेश की जिसने मनोरंजन के स्तर को दोगुना कर दिया। इस खास एपिसोड का एक और बड़ा आकर्षण रहीं दिग्गज अभिनेत्री फरीदा जलाल। फिल्म ‘ओ रोमियो’ के टीजर में उन्हें गाली देते देख हर कोई हैरान था। शो में इस पर से पर्दा उठाते हुए फरीदा जी ने बताया कि जब विशाल भारद्वाज फिल्म का ऑफर लेकर उनके घर पहुंचे तो उन्होंने पहले ही पूछ लिया था कि क्या उन्हें गाली देनी होगी। उन्होंने मुस्कुराते हुए खुलासा किया कि अगर गाली बहुत ज्यादा मर्यादाहीन नहीं होगी तो वे किरदार की मांग पर इसे जरूर निभाएंगी। 13 फरवरी को रिलीज हो रही फिल्म ‘ओ रोमियो’ से पहले यह एपिसोड दर्शकों के लिए रोमांस और हंसी का एक मुकम्मल पैकेज साबित होने वाला है।
Ekadashi 2026 Daan: विजया एकादशी के दिन दान करना क्यों माना जाता है शुभ? जानें किन-किन चीजों का दान करना होता है फलदायी

Ekadashi 2026 Daan:विजया एकादशी का दिन भगवान विष्णु की आराधना और पुण्य कर्मों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि पर व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। खासतौर पर विजया एकादशी पर किया गया दान कई गुना फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस दिन किन-किन वस्तुओं का दान करना शुभ माना गया है और इसका क्या आध्यात्मिक महत्व है। किन-किन वस्तुओं का दान करना माना जाता है शुभ अन्न और चावल का दानइस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खासकर चावल का दान शुभ फलदायी माना गया है। मान्यता है कि अन्न का दान करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।धार्मिक पुस्तकों का दानविजया एकादशी के अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम या हनुमान चालीसा जैसी पवित्र पुस्तकों का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। इससे ज्ञान की वृद्धि होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह दान व्यक्ति को मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है। पीले वस्त्र का दानभगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस दिन पीले वस्त्र दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की परेशानियां धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। विशेषकर आर्थिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह दान लाभकारी माना गया है। देसी घी का दानविजया एकादशी पर शुद्ध देसी घी का दान भी शुभ माना गया है। धार्मिक दृष्टि से घी पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि घी का दान करने से मान-सम्मान में वृद्धि होती है और कुंडली में गुरु या शुक्र से संबंधित दोषों में भी राहत मिल सकती है। तिल और गुड़ का दानतिल और गुड़ का दान स्वास्थ्य और मानसिक शांति से जुड़ा माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और आरोग्य की प्राप्ति होती है। यह दान विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है, जिन्हें कार्यों में बार-बार रुकावटों का सामना करना पड़ता है।
बांग्लादेश चुनाव पर भारत की नजर, BNP या जमात? नई दिल्ली के सामने भरोसे और ‘तिहरे संकट’ की चुनौती

नई दिल्ली । बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाला आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का मामला नहीं है बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव भी है। इस बार चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है जिससे मतदाता दो वोट डालेंगे एक सरकार के लिए और दूसरा जनमत संग्रह के मुद्दे पर। संकेत मिल रहे हैं कि चुनावी परिणाम इस्लामवादी दलों की ओर झुक सकते हैं जो भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है। सड़कों पर प्रदर्शन हिंसा हड़तालें और प्रशासनिक फेरबदल ने माहौल को अनिश्चित बना दिया है। भारत के लिए यह स्थिति संवेदनशील है क्योंकि लंबी साझा सीमा पूर्वोत्तर की सुरक्षा व्यापार कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता सीधे तौर पर ढाका की राजनीति से जुड़ी हैं। अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद मुकाबला मुख्य रूप से तीन संभावनाओं तक सिमट गया है बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार बीएनपी-जमात गठबंधन या जमात-ए-इस्लामी का प्रभुत्व। कुछ सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त दिखाई गई है। इनोविजन कंसल्टिंग के आंकड़ों के अनुसार बीएनपी को 52.8% वोट शेयर मिल सकता है हालांकि अन्य सर्वे इसे कांटे की टक्कर बता रहे हैं। निर्णायक भूमिका अवामी लीग के पारंपरिक मतदाताओं की होगी। भारत के नीति-निर्माताओं का आकलन है कि बीएनपी नेता तारिक रहमान के साथ काम करना अपेक्षाकृत व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। हालांकि अतीत में बीएनपी सरकारों पर पाकिस्तान समर्थक रुख और भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवाद को हवा देने के आरोप लगे थे फिर भी उसे एक मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी और व्यवहारिक दल माना जाता है। भारत की प्राथमिकता स्थिर और निर्वाचित सरकार है भले ही वह पूर्णतः अनुकूल न हो। दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी का उभार नई दिल्ली के लिए तिहरे संकट की आशंका पैदा करता है। पहला सीमापार उग्रवाद और कट्टरपंथ के फिर से सक्रिय होने का खतरा; दूसरा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से कथित समीकरण; और तीसरा चीन के साथ बढ़ती नजदीकी जिसमें रणनीतिक बुनियादी ढांचे तक पहुंच की चर्चा शामिल है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया अस्थिरता के दौरान जमात ने प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी पकड़ मजबूत की है जो चुनावी लाभ में बदल सकती है। भारत की चिंता यह भी है कि 2024 की उथल-पुथल के बाद कुछ ऐसे तत्व रिहा हुए जिन पर पहले कट्टरपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप थे। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि क्षेत्रीय अस्थिरता का असर सीमाओं के पार भी पड़ सकता है। फिर भी भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से व्यवहारिक रही है। नई दिल्ली ने ढाका में हर तरह की सरकार के साथ काम किया है और आगे भी ऐसा करने की संभावना है। लेकिन पिछले 18 महीनों में जिस धैर्य और संतुलन के साथ भारत ने स्थिति संभाली है उसकी परीक्षा इस चुनाव के नतीजों के बाद हो सकती है। अंततः बांग्लादेश का यह चुनाव केवल ढाका की सत्ता का फैसला नहीं करेगा बल्कि यह तय करेगा कि भारत-बांग्लादेश संबंध सहयोग स्थिरता और संतुलन की राह पर आगे बढ़ेंगे या नई रणनीतिक चुनौतियों का सामना करेंगे।
पंजाब-दिल्ली में बड़े हमले की साजिश नाकाम, अमृतसर में पाकिस्तान समर्थित आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश

नई दिल्ली । पंजाब और दिल्ली को दहलाने की साजिश को सुरक्षा एजेंसियों ने समय रहते नाकाम कर दिया है। अमृतसर में स्टेट स्पेशल ऑपरेशंस सेल ने पाकिस्तान समर्थित एक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। कार्रवाई के दौरान एक रिमोट कंट्रोल आईईडी विदेशी निर्मित पिस्तौल और भारी मात्रा में जिंदा कारतूस बरामद किए गए हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस विस्फोटक खेप का इस्तेमाल पंजाब और दिल्ली समेत अन्य राज्यों में बड़े हमलों के लिए किया जाना था। पंजाब के डीजीपी गौरव यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस ऑपरेशन की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि जांच में स्पष्ट हुआ है कि बरामद आतंकी सामग्री सीमा पार से पाकिस्तान की ओर से भेजी गई थी। गिरफ्तार आरोपी कथित तौर पर पाकिस्तान स्थित अपने हैंडलर के सीधे संपर्क में था जो एक आतंकी नेटवर्क के इशारे पर काम कर रहा था। जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी को इंटरनेट कॉलिंग और सोशल मीडिया ऐप्स के जरिए निर्देश दिए जा रहे थे। वह एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी से बचने की कोशिश कर रहा था। बरामद रिमोट कंट्रोल आईईडी इस बात का संकेत देता है कि किसी भीड़भाड़ वाले इलाके या महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान को निशाना बनाने की योजना थी। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता से संभावित बड़ा हमला टल गया। पुलिस अब आरोपी से गहन पूछताछ कर रही है ताकि इस मॉड्यूल से जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा सके। यह भी जांच की जा रही है कि फंडिंग लॉजिस्टिक्स और हथियारों की सप्लाई की पूरी श्रृंखला कैसे संचालित हो रही थी। अधिकारियों का मानना है कि इस नेटवर्क के तार सीमा पार बैठे आकाओं से जुड़े हो सकते हैं। हाल के दिनों में पंजाब में हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी की घटनाएं बढ़ी हैं। एक दिन पहले भी आरडीएक्स से बने एक आईईडी को बरामद कर बड़ी साजिश को विफल किया गया था। उस मामले में भी एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया था जिसके आतंकी नेटवर्क से जुड़े होने के संकेत मिले थे। इसके अलावा अमृतसर क्षेत्र में सीमा पार से भेजे गए दो हैंड ग्रेनेड भी जब्त किए गए थे। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के जरिए ड्रोन और अन्य माध्यमों से हथियारों की तस्करी की कोशिशें की जा रही हैं। पंजाब पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां मिलकर ऐसे नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए अभियान चला रही हैं। फिलहाल गिरफ्तार आरोपी के नेटवर्क की परतें खोलने का काम जारी है। अधिकारियों का कहना है कि राज्य और देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा और साजिश रचने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
T20 World Cup: बुमराह की 'घातक' यॉर्कर से सहमा भारतीय खेमा, ईशान किशन चोटिल; क्या संजू सैमसन की होगी सरप्राइज एंट्री?

नई दिल्ली के ऐतिहासिक अरुण जेटली स्टेडियम में टी20 विश्व कप 2026 की तैयारियों के बीच उस समय भारतीय खेमे की धड़कनें तेज हो गईं जब नेट अभ्यास के दौरान एक अनहोनी घट गई। नामीबिया के खिलाफ होने वाले दूसरे लीग मैच की पूर्व संध्या पर जब शाम करीब छह बजे खिलाड़ी मैदान पर उतरे तो माहौल काफी उत्साहजनक था। मैच सिमुलेशन के तहत टॉप ऑर्डर बल्लेबाज आक्रामक रुख अपना रहे थे और ईशान किशन अपनी शानदार लय में नजर आ रहे थे। तभी जसप्रीत बुमराह की एक लेजर गाइडेड मिसाइल जैसी सटीक यॉर्कर सीधे ईशान के बाएं पैर पर जा लगी। गेंद की रफ्तार और प्रहार इतना तीखा था कि ईशान तुरंत बल्ला छोड़कर दर्द से कराहते हुए जमीन पर बैठ गए। ईशान किशन की इस स्थिति को देख टीम मैनेजमेंट और साथी खिलाड़ियों के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। टीम के फिजियो ने बिना देरी किए मैदान पर पहुंचकर प्राथमिक उपचार शुरू किया। हालांकि कुछ देर के तनावपूर्ण माहौल के बाद राहत तब मिली जब ईशान अपने पैरों पर खड़े हुए और हल्की बल्लेबाजी करने के बाद मैदान से बाहर गए। यद्यपि उनकी चोट की गंभीरता पर अभी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है लेकिन विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में सलामी बल्लेबाज का चोटिल होना टीम इंडिया के लिए खतरे की घंटी है विशेषकर तब जब टीम का ओपनिंग कॉम्बिनेशन पहले से ही अस्थिर नजर आ रहा है। दूसरी ओर टीम के मुख्य तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह का फॉर्म में लौटना भारत के लिए सबसे बड़ी राहत की खबर है। अमेरिका के खिलाफ बीमारी के कारण पहला मैच न खेल पाने वाले बुमराह ने नेट्स में लगातार दूसरे दिन अपनी धारदार गेंदबाजी का नमूना पेश किया। नामीबिया के खिलाफ उनकी वापसी लगभग तय है जो 15 फरवरी को पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले महा-मुकाबले से पहले टीम इंडिया के लिए एक बूस्टर डोज की तरह है। बुमराह न केवल गेंदबाजी बल्कि कैचिंग ड्रिल में भी पूरी तरह फिट और मुस्तैद दिखाई दिए। टीम के भीतर इस समय प्लेइंग इलेवन को लेकर भी काफी जद्दोजहद चल रही है। युवा बल्लेबाज अभिषेक शर्मा पेट में संक्रमण के कारण अस्पताल से डिस्चार्ज होकर लौटे हैं, लेकिन उनकी कमजोरी को देखते हुए नामीबिया के खिलाफ उनका खेलना संदिग्ध है। इसी संकट के बीच संजू सैमसन की किस्मत चमकती दिखाई दे रही है। संजू ने लगातार दूसरे दिन सबसे पहले नेट्स पर पहुंचकर लंबा अभ्यास सत्र बिताया और स्पिन व तेज गेंदबाजों के खिलाफ बड़े शॉट्स खेलकर अपनी दावेदारी मजबूत कर दी है। खराब फॉर्म के कारण हाशिए पर चल रहे संजू के लिए यह वापसी का सुनहरा अवसर साबित हो सकता है। अभ्यास सत्र के अंत में कप्तान सूर्यकुमार यादव, कुलदीप यादव और रिंकू सिंह ने डीडीसीए अधिकारियों के साथ समय बिताकर माहौल को थोड़ा हल्का किया। अब सबकी निगाहें शाम सात बजे शुरू होने वाले भारत बनाम नामीबिया मुकाबले पर हैं। नीदरलैंड से हारकर आ रही नामीबिया के खिलाफ भारत जीत की लय बरकरार रखना चाहेगा, ताकि सुपर-8 की राह आसान हो सके। हालांकि, मैच की शुरुआत से पहले टीम इंडिया की प्राथमिकता ईशान किशन की फिटनेस रिपोर्ट और संजू सैमसन की संभावित वापसी पर टिकी होगी।
उस्मान तारिक के स्टॉप एंड पॉज एक्शन पर संग्राम, अश्विन का समर्थन, आकाश चोपड़ा ने उठाए तकनीकी सवाल

नई दिल्ली । पाकिस्तान के ऑफ स्पिनर उस्मान तारिक इन दिनों अपने अनोखे स्टॉप एंड पॉज और साइड-आर्म बॉलिंग एक्शन को लेकर क्रिकेट जगत में बहस के केंद्र में हैं। कोलंबो में होने वाले भारत-पाकिस्तान मुकाबले से पहले उनके एक्शन पर चर्चा तेज हो गई है। जहां इंग्लैंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन ने उनके गेंद डालते समय रुकने की शैली को संदिग्ध बताया वहीं भारत के दिग्गज स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने खुलकर तारिक का समर्थन किया है और इसे नियमों के दायरे में बताया है। तारिक ने अभी तक केवल चार टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले हैं लेकिन 11 विकेट लेकर उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित कर दी है। प्रोफेशनल टी20 करियर में 42 मैचों में 70 विकेट उनके प्रभाव का प्रमाण हैं। खासकर धीमी पिचों पर उनका अंदाज बल्लेबाजों को असहज कर देता है। अमेरिका के बल्लेबाज मिलिंद कुमार जैसे खिलाड़ी भी उनकी गेंदों के खिलाफ संघर्ष करते नजर आए। कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम की धीमी सतह पर वे आक्रामक भारतीय बल्लेबाजों के लिए चुनौती बन सकते हैं। तारिक के गेंद डालने से पहले हल्का रुकने या पॉज लेने की आदत ने विवाद को जन्म दिया है। केविन पीटरसन ने इसे अवैध करार देने की बात कही लेकिन अश्विन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर स्पष्ट किया कि किसी भी गेंदबाज के एक्शन की वैधता का फैसला केवल आईसीसी के बॉलिंग एक्शन टेस्टिंग सेंटर में ही हो सकता है। अश्विन ने 15 डिग्री नियम का जिक्र करते हुए कहा कि गेंदबाज अपनी कोहनी को निर्धारित सीमा से अधिक सीधा नहीं कर सकता लेकिन मैदान पर खड़े अंपायर के लिए इसे सटीक रूप से आंक पाना लगभग असंभव है। उनके मुताबिक यह एक ग्रे एरिया है और जब तक वैज्ञानिक परीक्षण में एक्शन गलत साबित न हो तब तक किसी पर आरोप लगाना ठीक नहीं। अश्विन ने यह भी कहा कि अगर क्रीज पर रुकना किसी गेंदबाज की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है तो वह पूरी तरह वैध है। बल्लेबाज के ट्रिगर मूवमेंट का इंतजार करना या लय में बदलाव करना रणनीति का हिस्सा हो सकता है इसे नियमों का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व टीम प्रदर्शन विश्लेषक प्रसन्ना अघोरम ने भी तारिक का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि तकनीकी रूप से तारिक चकिंग नहीं कर रहे हैं और उनके एक्शन को पहले भी दो बार हरी झंडी मिल चुकी है। उनका मानना है कि अगर दोबारा जांच भी हुई तो एक्शन सही ही पाया जाएगा। हालांकि भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज और कमेंटेटर आकाश चोपड़ा ने एक दिलचस्प तकनीकी सवाल उठाया है। उन्होंने पॉज को गलत नहीं बताया लेकिन पूछा कि यदि रन-अप से खास मोमेंटम नहीं बन रहा तो बिना हाथ मोड़े कुछ गेंदों पर 20-25 किमी प्रति घंटे की अतिरिक्त रफ्तार कैसे पैदा हो रही है? उनका सवाल नियमों से ज्यादा तकनीकी विश्लेषण पर केंद्रित है।पूर्व अंतरराष्ट्रीय अंपायर अनिल चौधरी ने भी स्पष्ट किया कि तारिक का एक्शन अलग जरूर है लेकिन अवैध नहीं। उनके अनुसार चूंकि वह हर गेंद लगभग एक ही तरीके से डालते हैं और बांह में कोई संदिग्ध सीधापन नहीं दिखता इसलिए इसे नियमों के खिलाफ नहीं कहा जा सकता।कुल मिलाकर उस्मान तारिक का अनोखा एक्शन क्रिकेट जगत में चर्चा जरूर छेड़ रहा है लेकिन फिलहाल विशेषज्ञों की राय उन्हें नियमों के दायरे में ही रखती है। अब सबकी निगाहें मैदान पर उनके प्रदर्शन पर टिकी होंगी जो इस बहस को नई दिशा दे सकता है।
पारिवारिक अनुशासन और गरुड़ पुराण: पिता के जीवित होने पर पुत्र के इन विशेष कर्तव्यों और वर्जनाओं का क्या है धार्मिक आधार?

नई दिल्ली।हिंदू धर्मग्रंथों की समृद्ध परंपरा में पिता को केवल एक अभिभावक नहींबल्कि परिवार का आधार स्तंभ और आकाश के समान रक्षक माना गया है। शास्त्रों का मत है कि यदि माता हमें इस संसार में लाती है और संस्कारित करती हैतो पिता उस जीवन को दिशासुरक्षा और स्थायित्व प्रदान करते हैं। विशेष रूप से गरुड़ पुराण मेंजो जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों के साथ-साथ लोक-परलोक के कर्तव्यों की व्याख्या करता हैपिता के सम्मान और पारिवारिक मर्यादा को लेकर अत्यंत स्पष्ट और कड़े निर्देश दिए गए हैं। इन नियमों का ध्येय केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं हैअपनिु परिवार के भीतर एक सुदृढ़ अनुशासनसंतुलन और परस्पर आदर की भावना को अक्षुण्ण बनाए रखना है। जब तक पिता जीवित हैंतब तक पुत्र के लिए कुछ विशेष सीमाओं का निर्धारण किया गया हैताकि पीढ़ीगत पदक्रम और सांस्कृतिक परंपराएं सुरक्षित रह सकें। गरुड़ पुराण के अनुसारपिता घर के स्वाभाविक और नैसर्गिक मुखिया होते हैं। शास्त्र यह प्रतिपादित करते हैं कि जब तक पिता का साया सिर पर हैतब तक घर के किसी भी प्रमुख निर्णय या धार्मिक अनुष्ठान की अगुवाई उन्हीं के हाथों में होनी चाहिए। पुत्र का परम कर्तव्य है कि वह एक सहायक की भूमिका निभाए और अपनी ऊर्जा व आधुनिक अनुभव को पिता के मार्गदर्शन के साथ जोड़े। यदि पुत्र स्वयं को सर्वाधिकार संपन्न मानकर नेतृत्व की बागडोर छीनने का प्रयास करता हैतो इससे न केवल परिवार का संतुलन बिगड़ता हैबल्कि नैतिक मूल्यों का भी ह्रास होता है। शास्त्र हमें समझाते हैं कि अधिकार प्राप्त करने से पहले कर्तव्य को समझना ही वास्तविक धर्म है। इसी क्रम मेंपितृकर्म यानी पूर्वजों के प्रति किए जाने वाले तर्पण और पिंडदान को लेकर भी गरुड़ पुराण में एक विशेष व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पहला अधिकार जीवित पिता का है। जब तक पिता स्वयं सक्षम और जीवित हैंतब तक पुत्र को स्वतंत्र रूप से पितृ तर्पण नहीं करना चाहिए। इसके पीछे का मूल भाव यह है कि वंशावली की कड़ियाँ एक निश्चित क्रम में जुड़ी होती हैं और उस क्रम का उल्लंघन करना प्रकृति के नियमों के विपरीत माना गया है। यह परंपरा परिवार की जड़ों को सींचने और वरिष्ठता का सम्मान करने का एक जीवंत प्रतीक है। दान-पुण्य और सामाजिक प्रतिष्ठा के विषय में भी गरुड़ पुराण का मार्गदर्शन अत्यंत व्यावहारिक है। यदि पुत्र अपनी मेहनत की कमाई से कोई दान करता है या पुण्य कर्म करता हैतो उसे पिता का नाम ही प्राथमिकता के साथ आगे रखना चाहिए। यह मात्र एक औपचारिकता नहींबल्कि इस सत्य की स्वीकारोक्ति है कि पुत्र की जो भी पहचान हैउसका मूल स्रोत उसके पिता ही हैं। सार्वजनिक मंचों और निमंत्रण पत्रों पर भी पिता का नाम पहले और पुत्र का नाम बाद में लिखना शिष्टाचार का हिस्सा माना गया है। यह छोटा सा व्यवहारिक नियम इस गहरे सांस्कृतिक अर्थ को स्पष्ट करता है कि परिवार में वरिष्ठता सर्वोपरि है। प्राचीन मान्यताओं में कुछ शारीरिक प्रतीकों को भी वंश की गरिमा से जोड़ा गया था। जैसे कि पुराने समय में मूंछ और केश को कुल की मर्यादा का प्रतीक माना जाता था और पिता के जीवित रहते पुत्र के लिए इनके संबंध में कुछ वर्जनाएं थीं। यद्यपि आधुनिक युग में इन प्रतीकों का स्वरूप बदल गया हैपरंतु उनका सार आज भी प्रासंगिक है कि पिता के स्वाभिमान को कभी ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए। अंततः, गरुड़ पुराण के ये नियम कोई कठोर बंधन नहीं, बल्कि वे सूत्र हैं जो परिवार को बिखरने से बचाते हैं। जब पुत्र मर्यादा की इन सीमाओं का पालन करता है, तो परिवार में प्रेम, विश्वास और स्थिरता का वास होता है, जो किसी भी समृद्ध समाज की पहली शर्त है।
भारत की धरती पर राशिद खान का 50 धमाका, टी-20I में बनाया अनोखा वर्ल्ड रिकॉर्ड

नई दिल्ली । अफगानिस्तान के स्टार स्पिनर राशिद खान ने भारतीय सरजमीं पर एक ऐसा इतिहास रच दिया है, जो अब तक दुनिया का कोई भी गेंदबाज नहीं कर सका था। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मुकाबले में दो विकेट झटकते ही राशिद खान भारत में टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 50 विकेट पूरे करने वाले दुनिया के पहले गेंदबाज बन गए। जैसे ही उन्होंने मैच में अपना दूसरा शिकार किया, यह खास उपलब्धि उनके नाम दर्ज हो गई और वे इस फॉर्मेट में भारतीय धरती पर सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बनकर उभरे। राशिद खान ने भारत में अब तक 24 टी-20I पारियां खेली हैं और इन मुकाबलों में उन्होंने 50 विकेट हासिल किए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या के लिहाज से ही नहीं, बल्कि उनकी निरंतरता और प्रभावशीलता को भी दर्शाता है। उनकी इकोनॉमी रेट और औसत दोनों ही बेहद प्रभावशाली रहे हैं, जो यह साबित करते हैं कि वे सिर्फ विकेट लेने वाले गेंदबाज नहीं, बल्कि रन रोकने में भी माहिर हैं। भारतीय पिचों पर उनकी तेज रफ्तार लेग स्पिन और सटीक गुगली बल्लेबाजों के लिए लगातार पहेली बनी हुई है। इस सूची में दूसरे स्थान पर भारतीय स्पिनर युजवेंद्र चहल हैं, जिन्होंने 38 पारियों में 49 विकेट हासिल किए हैं। अक्षर पटेल 48 विकेट के साथ तीसरे स्थान पर हैं। उन्होंने 37 पारियों में यह उपलब्धि हासिल की। अर्शदीप सिंह 27 पारियों में 43 विकेट लेकर चौथे स्थान पर हैं, जबकि हार्दिक पांड्या ने 53 पारियों में 38 विकेट झटके हैं। जसप्रीत बुमराह के नाम 35 पारियों में 36 विकेट दर्ज हैं और भुवनेश्वर कुमार ने 33 पारियों में 34 विकेट लिए हैं। वरुण चक्रवर्ती ने मात्र 16 पारियों में 33 विकेट लेकर अपनी प्रभावशीलता दिखाई है। कुलदीप यादव ने 19 पारियों में 27 विकेट और रवि बिश्नोई ने 20 पारियों में 26 विकेट हासिल किए हैं। इन सभी भारतीय गेंदबाजों के बीच राशिद खान का शीर्ष पर पहुंचना उनके असाधारण कौशल और भारतीय परिस्थितियों की गहरी समझ को दर्शाता है। आंकड़े साफ बताते हैं कि भारतीय सरजमीं उन्हें खास तौर पर रास आती है। स्पिन के अनुकूल परिस्थितियों में उनकी गेंदबाजी और भी खतरनाक हो जाती है। वे बल्लेबाजों को न तो खुलकर खेलने का मौका देते हैं और न ही आसानी से रन बनाने देते हैं। राशिद खान लंबे समय से आईपीएल में खेलते आ रहे हैं, जिससे उन्हें भारतीय पिचों और हालात की गहरी समझ है। यही अनुभव अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भी उनके काम आता है। यही कारण है कि वे भारतीय गेंदबाजों को पीछे छोड़ते हुए इस खास सूची में सबसे ऊपर पहुंच गए हैं। भारत की धरती पर 50 टी-20I विकेट का आंकड़ा छूना किसी भी गेंदबाज के लिए बड़ी उपलब्धि है, लेकिन राशिद ने इसे महज 24 पारियों में हासिल कर इस रिकॉर्ड को और भी खास बना दिया है। मौजूदा फॉर्म और निरंतरता को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे आने वाले समय में इस रिकॉर्ड को और आगे ले जाएंगे।
GWALIOR CRIME NEWS: कलयुगी बेटे ने मां की पत्थर से कुचलकर की हत्या, पैत्रिक जमीन हड़पने का प्लान

HIGHLIGHTS: दतिया के विजयपुर गांव में बेटे ने मां की पत्थर से हत्या की। हत्या का मुख्य कारण था पैत्रिक जमीन अपने नाम करने की मंशा। आरोपी अरविंद पाल को पुलिस ने हिरासत में लिया। मृतिका और बेटे के बीच लंबे समय से जमीन को लेकर विवाद था। पुलिस मामले की जांच में जुटी है, कानूनी कार्रवाई जल्द पूरी होगी। GWALIOR CRIME NEWS: ग्वालियर। दतिया जिले के जिगना थाना क्षेत्र के विजयपुर गांव में देर रात एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। पुलिस के अनुसार, स्थानीय निवासी अरविंद पाल ने अपनी मां की पैत्रिक जमीन अपने नाम कराने के लिए पत्थर से हमला कर हत्या कर दी। यह घटना परिवार और गांव दोनों के लिए झटका साबित हुई है। घटना का सिलसिला स्थानीय लोगों के अनुसार, मृतक महिला और उसका बेटा लंबे समय से पैत्रिक संपत्ति को लेकर तनाव में थे। मंगलवार देर रात अरविंद पाल ने अचानक हमला कर अपनी मां को गंभीर रूप से घायल कर दिया। गंभीर चोटों के कारण महिला मौके पर ही दम तोड़ गई। दिल्ली मेट्रो अपडेट: T20 वर्ल्ड कप मैच के लिए DMRC ने बढ़ाई आखिरी ट्रेन की टाइमिंग, यात्रियों को राहत पुलिस की कार्रवाई पुलिस ने घटना के तुरंत बाद आरोपी को हिरासत में लिया। पूछताछ के दौरान आरोपी ने हत्या करने का कारण पैत्रिक जमीन अपने नाम करने की इच्छा बताई। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और मामले की फॉरेंसिक जांच शुरू कर दी है। ग्रामीणों की प्रतिक्रिया गांव के लोग इस घटना से स्तब्ध हैं। उन्होंने बताया कि परिवार में जमीन को लेकर पहले भी कई बार विवाद हो चुका था, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि मामला हत्या तक पहुंच जाएगा। ग्रामीणों ने घटना के बाद सुरक्षा बढ़ाने की मांग की है और स्थानीय प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की अपील की है। US से ट्रेड डील से कश्मीर से हिमाचल तक टेंशन में किसान…. 10,000 CR की इंडस्ट्री पर संकट आगे की जांच पुलिस आसपास के CCTV फुटेज और गवाहों से भी साक्ष्य जुटा रही है। आरोपी के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है और भविष्य में कानूनी कार्रवाई की जाएगी। जांच में मृतिका और बेटे के बीच पहले से दर्ज विवादों, जमीन के दस्तावेज और आरोपी के मनोवृत्ति को भी देखा जा रहा है।