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विजयपुर चुनाव फैसले पर सियासी घमासान: पटवारी-सिंघार ने BJP पर साधा निशाना

भोपाल । मध्य प्रदेश की राजनीति में विजयपुर को लेकर नया विवाद उभर कर सामने आया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने साफ कहा कि विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा का निर्वाचन शून्य घोषित करने के फैसले पर कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट तक जाएगी। पटवारी ने न्यायपालिका का सम्मान करते हुए यह भी भरोसा जताया कि अदालत में पार्टी को न्याय मिलेगा। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि उसे यह स्वीकार नहीं हो रहा कि एक आदिवासी नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गया। पटवारी ने भाजपा पर तंज कसते हुए विधायक निर्मला सप्रे के मामले का जिक्र किया और कहा कि अगर हिम्मत है तो उस मामले में भी निर्णय करवा कर दिखाएं। उनका कहना था कि भाजपा दबाव बनाकर फैसले करवाने की कोशिश कर रही है और यह पूरी तरह से राजनीतिक रोटेशन का हिस्सा लगता है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी राज्य सूचना आयोग में लंबित पदों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति लंबे समय से नहीं हो पाई है और सरकार इसमें बेहद धीमी गति से काम कर रही है। सिंघार ने कहा कि सरकार सांप की तरह धीरे-धीरे रेंगती है जबकि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति तुरंत होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने मुख्यमंत्री से बातचीत भी की है और दो सूचना आयुक्तों की नियुक्ति करनी तय की गई है। सिंघार ने पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा से जुड़े मामले की भी याद दिलाई। उनका कहना था कि भाजपा दबाव बनाकर फैसले करवाने की कोशिश करती है और यह संभव है कि कांग्रेस की राज्यसभा सीट प्रभावित करने के लिए ऐसा किया जा रहा हो। वहीं गैस सिलेंडर की कमी और महंगाई पर भी उन्होंने सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उनका कहना था कि सरकार हर मामले में देर से निर्णय लेती है कोविड काल में भी देरी हुई थी। उन्होंने कहा कि सरकार को टैक्स में कमी कर जनता को राहत देनी चाहिए लेकिन वह केवल अपना खजाना भरने में लगी है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने इस पर पलटवार किया। इंदौर में उन्होंने कहा कि कांग्रेस को उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करना चाहिए और न्यायालय के फैसले पर अनावश्यक टिप्पणी करने से उनकी अज्ञानता उजागर होती है। उन्होंने जीतू पटवारी और उमंग सिंघार के बयानों को तूल देने से भी बचने की सलाह दी। राजनीतिक गलियारों में यह विवाद लगातार गर्माता जा रहा है। विजयपुर विधानसभा सीट और संबंधित मामलों को लेकर दोनों पार्टियों के बीच सियासी टकराव और तेज होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है जबकि बीजेपी अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए लगातार बयानबाजी कर रही है।

मिडिल ईस्ट तनाव में नरमी के संकेत, कच्चे तेल की कीमतों में 6% की बड़ी गिरावट

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में Iran के साथ तनाव कम होने की उम्मीद के बीच मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। बाजार में अचानक आई इस नरमी के कारण कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आ गया। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क Brent Crude फ्यूचर्स की कीमत 6.51 डॉलर यानी लगभग 6.6 प्रतिशत गिरकर 92.45 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। वहीं अमेरिकी मानक West Texas Intermediate (WTI) कच्चे तेल की कीमत 6.12 डॉलर या 6.5 प्रतिशत गिरकर 88.65 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। ट्रंप के बयान के बाद बाजार में आई नरमीतेल की कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान “बहुत जल्द” समाप्त हो सकता है। ट्रंप ने कहा कि इस अभियान की सफलता का मतलब यह होगा कि तेहरान के पास ऐसे हथियार विकसित करने की क्षमता नहीं रहेगी जो अमेरिका, Israel या उसके सहयोगी देशों के लिए खतरा बन सकें। उनके इस बयान से वैश्विक बाजारों को संकेत मिला कि क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है, जिससे तेल आपूर्ति बाधित होने का जोखिम घट सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दी चेतावनीट्रंप ने ईरान को Strait of Hormuz के जरिए वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित करने की किसी भी कोशिश के खिलाफ चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि यह जलडमरूमध्य सुरक्षित रहेगा क्योंकि वहां अमेरिकी नौसेना के कई जहाज तैनात हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों से निर्यात होने वाला कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी तरह का खतरा वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ी चिंता बन सकता है। इजरायल के साथ संयुक्त अभियान का असरइस महीने की शुरुआत में अमेरिका ने Iran की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को कमजोर करने के उद्देश्य से Israel के साथ संयुक्त सैन्य अभियान चलाया था। इस अभियान के तहत ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए गए थे। इन घटनाओं के चलते वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई थी और तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था। हालांकि अब तनाव कम होने की उम्मीद से बाजार में राहत का माहौल बना है। सोमवार को कई साल के उच्च स्तर पर पहुंचा था तेलगौरतलब है कि इससे एक दिन पहले यानी सोमवार को तेल की कीमतें कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गई थीं। उस समय Brent Crude की कीमत 119.50 डॉलर प्रति बैरल और West Texas Intermediate की कीमत 119.48 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जो 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था। इसके बाद मंगलवार को बाजार में मुनाफावसूली और भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीद से कीमतों में तेज गिरावट आ गई। भारत में महंगाई पर असर सीमित रहने की उम्मीदइस बीच भारत की वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने सोमवार को संसद में कहा कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में हालिया वृद्धि का भारत की मुद्रास्फीति दर पर फिलहाल बड़ा असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि देश में महंगाई दर अभी “निम्नतम सीमा” के करीब बनी हुई है। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में 28 फरवरी 2026 को भू-राजनीतिक तनाव शुरू होने से पहले तक भारत द्वारा आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की कीमतें लगभग एक साल से लगातार गिर रही थीं।

म्यूचुअल फंड में बढ़ा निवेश का जोश, फरवरी में इक्विटी इनफ्लो 25,977 करोड़ पार; AUM 82 लाख करोड़ से ऊपर

नई दिल्ली। भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग में फरवरी के दौरान इक्विटी निवेश में मजबूती देखने को मिली। Association of Mutual Funds in India (AMFI) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में नेट इक्विटी इनफ्लो बढ़कर 25,977.91 करोड़ रुपये हो गया। यह जनवरी के 24,028.59 करोड़ रुपये से अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों का भरोसा इक्विटी म्यूचुअल फंड में बना हुआ है। लंबी अवधि के निवेश के लिए निवेशक लगातार इस विकल्प को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसके कारण इक्विटी फंड में निवेश की गति बनी हुई है। इक्विटी AUM में भी हुआ इजाफाफरवरी के अंत तक म्यूचुअल फंड उद्योग का इक्विटी एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 35,39,475.91 करोड़ रुपये हो गया। जनवरी में यह आंकड़ा 34,86,777.63 करोड़ रुपये था। अगर डेट और अन्य फंड कैटेगरी को भी शामिल किया जाए तो पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग का कुल AUM फरवरी के अंत तक 82,02,956.35 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। वहीं पूरे फरवरी महीने में औसत AUM 83,42,616.57 करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले जनवरी के अंत में कुल AUM 81,01,305.58 करोड़ रुपये था और पूरे महीने का औसत AUM 82,01,174.62 करोड़ रुपये रहा था। फ्लेक्सी कैप फंड में सबसे ज्यादा निवेशफरवरी में सबसे ज्यादा निवेश Flexi Cap Funds में दर्ज किया गया। इस श्रेणी में 6,924.65 करोड़ रुपये का नेट इक्विटी इनफ्लो आया। इसके अलावा Multi Cap Funds में 1,933.53 करोड़ रुपये और Large Cap Funds में 2,111.68 करोड़ रुपये का निवेश हुआ। वहीं Large and Mid Cap Funds में 3,137.73 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। मिडकैप और स्मॉलकैप फंड में निवेश जारीफरवरी में Mid Cap Funds में 4,002.99 करोड़ रुपये और Small Cap Funds में 3,881.06 करोड़ रुपये का निवेश दर्ज किया गया। इसके अलावा Sectoral and Thematic Funds में भी 2,987.29 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो देखने को मिला। इससे साफ है कि निवेशक अलग-अलग कैटेगरी के फंड में संतुलित निवेश कर रहे हैं। हाइब्रिड और डेट स्कीम में भी निवेशफरवरी में Hybrid Mutual Fund Schemes में कुल 11,983.37 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया, हालांकि यह जनवरी के 17,356.02 करोड़ रुपये से कम रहा। वहीं Debt Mutual Fund Schemes में फरवरी के दौरान 94,530 करोड़ रुपये का कुल इनफ्लो दर्ज किया गया, जो जनवरी में आए 1,56,458.63 करोड़ रुपये से कम है। गोल्ड ETF और इंडेक्स फंड में भी निवेशफरवरी में निवेशकों ने अन्य निवेश विकल्पों में भी रुचि दिखाई। Gold ETFs में 5,254.95 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। इसके अलावा Index Funds में 3,233.44 करोड़ रुपये और अन्य Exchange Traded Funds में 4,487.15 करोड़ रुपये का निवेश आया। फरवरी में लॉन्च हुए 21 नए फंडफरवरी के दौरान म्यूचुअल फंड उद्योग में कई नए निवेश विकल्प भी सामने आए। इस महीने कुल 21 नए फंड लॉन्च किए गए। इनमें 8 इक्विटी फंड, 1 डेट स्कीम, 1 हाइब्रिड स्कीम, 4 इंडेक्स फंड और 7 ETF शामिल हैं।

ईरान युद्ध : ऑस्ट्रेलिया ने महिला फुटबॉल टीम की 5 खिलाड़ियों को मानवीय आधार पर शरण दी

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असरखेल जगत तक पहुँच गया है। ऑस्ट्रेलिया सरकार ने ईरान की महिला फुटबॉल टीम की पांच खिलाड़ियों को मानवीय आधार पर शरण दे दी है। ये खिलाड़ी एशियाई टूर्नामेंट खेलने के लिए ऑस्ट्रेलिया आई थीं। युद्ध के बीच ईरान लौटने पर उन्हें सत्ता और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई का डर था। ऑस्ट्रेलियाई गृह मामलों के मंत्री Tony Burke ने बताया कि मंगलवार तड़के ऑस्ट्रेलियाई संघीय पुलिस ने खिलाड़ियों को गोल्ड कोस्ट स्थित होटल से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। वहां उनकी मुलाकात की गई और मानवीय वीजा की प्रक्रिया पूरी की गई। सरकार का कहना है कि यह फैसला मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया, क्योंकि ईरान इस समय युद्ध की स्थिति से गुजर रहा है। खिलाड़ियों को शरण क्यों दी गई? ईरान की महिला फुटबॉल टीम पिछले महीने महिला एशियन कप खेलने के लिए ऑस्ट्रेलिया पहुंची थी। टूर्नामेंट खत्म होने के बाद टीम को ईरान लौटना था, लेकिन इस दौरान अमेरिका और इज़राइल के साथ युद्ध तेज हो गया। लगातार हमलों और असुरक्षा के माहौल ने खिलाड़ियों के भविष्य को संकट में डाल दिया। इसी कारण ऑस्ट्रेलिया ने पांच खिलाड़ियों को सुरक्षित रखने का निर्णय लिया। अमेरिकी प्रतिक्रिया अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों को ईरान वापस भेजना मानवीय गलती होगी। ट्रंप ने ऑस्ट्रेलिया से अपील की कि उन्हें शरण दी जाए, और यदि ऐसा नहीं होता तो अमेरिका उन्हें अपने देश में आश्रय देने को तैयार है। परिवारों की सुरक्षा भी चिंता का विषय कुछ खिलाड़ी अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर वापस ईरान लौटने की इच्छा भी जताना चाहती थीं। ट्रंप ने कहा कि कई खिलाड़ियों को डर था कि अगर वे वापस नहीं लौटतीं तो उनके परिवारों को नुकसान पहुंच सकता है। टूर्नामेंट के दौरान खिलाड़ियों का रवैया महिला एशियन कप के दौरान ईरानी खिलाड़ियों की स्थिति भी चर्चा में रही। दक्षिण कोरिया के खिलाफ पहले मैच में राष्ट्रीय गान के दौरान टीम ने शुरुआत में चुप्पी साधी। इसे विरोध या शोक की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। बाद के मैचों में खिलाड़ियों ने गान गाया और सलामी दी। टीम की फॉरवर्ड Sara Didar ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने देश और परिवार के लिए अपनी चिंता जाहिर की। इस कदम से साफ है कि युद्ध का असर खेल जगत पर भी गहरा पड़ रहा है, और खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मानवीय कदम उठाए जा रहे हैं।

मोहन कैबिनेट का बड़ा फैसला: 46 लाख प्रॉपर्टियों की फ्री रजिस्ट्री, युवाओं के लिए नई योजना, किसानों को सौगात, पेट्रोलियम निगरानी के निर्देश

भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मध्यप्रदेश कैबिनेट की अहम बैठक संपन्न हुई। बैठक में कई बड़े फैसले लिए गए जिनका असर सीधे प्रदेश के नागरिकों और युवाओं पर पड़ने वाला है। सबसे बड़ा फैसला स्वामित्व योजना के तहत 46 लाख प्रॉपर्टियों की फ्री रजिस्ट्री का है। इस योजना में उन परिवारों को शामिल किया गया है जिनके पास अपने स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं। राज्य सरकार ने यह भी तय किया कि इन रजिस्ट्री का स्टांप शुल्क माफ रहेगा जिससे आम नागरिकों को काफी राहत मिलेगी। कैबिनेट बैठक में युवाओं के लिए नई पहल मुख्यमंत्री यंग इंटर्न्स फॉर गुड गवर्नेंस प्रोग्राम की शुरुआत की घोषणा भी हुई। इसके तहत 4 865 युवाओं को मासिक 10 हजार रुपये मानदेय दिया जाएगा। यह योजना अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन संस्थान के माध्यम से संचालित होगी। हर ब्लॉक में 15 युवा इस योजना से जुड़े रहेंगे। ये युवा सरकार की योजनाओं का जमीन स्तर पर इम्पैक्ट और उनकी चुनौतियों की जानकारी जुटाएंगे। यह तीन वर्षों तक संचालित होगी और डिजिटल माध्यम से आंकड़े एकत्र करने का कार्य भी करेगी। किसानों के हित में भी कैबिनेट ने कई अहम फैसले लिए। गेंहू उपार्जन का समर्थन मूल्य 2 625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है जिसमें केंद्र सरकार का 2 585 रुपये और प्रदेश सरकार का 40 रुपये प्रति क्विंटल शामिल है। इसके अलावा उड़द पर 600 रुपये प्रति क्विंटल का समर्थन मूल्य भी तय किया गया। मंत्रि परिषद ने सात विभागों की योजनाओं को अगले पांच वर्षों तक सतत जारी रखने की स्वीकृति दी है। यह योजना कुल 33 240 करोड़ रुपये की है। इनमें ऊर्जा विभाग की RDSS योजना वित्त विभाग के पब्लिक फंडिंग प्रोजेक्ट्स पंचायत और ग्रामीण विकास के परिसंपत्ति मरम्मत प्रोजेक्ट समेत अन्य योजनाएं शामिल हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बड़ा कदम उठाया गया है। मैहर कैमूर और निमरानी के अस्पतालों में 51 नए स्टाफ पदों को मंजूरी दी गई जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और उपलब्धता बढ़ेगी। कैबिनेट ने प्रदेश में कमर्शियल सिलेंडर की डिलीवरी पर रोक को जारी रखने का भी निर्णय लिया। केंद्र सरकार के युद्ध के हालातों के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है। मुख्यमंत्री ने पेट्रोलियम पदार्थों की सतत निगरानी के निर्देश दिए ताकि आपूर्ति और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके। कैबिनेट मंत्री चेतन्य कश्यप ने कहा कि मध्यप्रदेश में पेट्रोलियम की पर्याप्त उपलब्धता है और युद्ध से राज्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस तरह कैबिनेट की बैठक ने नागरिकों युवाओं और किसानों के लिए कई राहतकारी फैसले लिए हैं। मुफ्त रजिस्ट्री युवा इंटर्न योजना और समर्थन मूल्य बढ़ाने जैसे कदमों से शासन की पारदर्शिता और जनता के हित में काम करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।

निवेशकों का भरोसा बरकरार! फरवरी में म्यूचुअल फंड SIP इनफ्लो 29,845 करोड़ रुपये पहुंचा

नई दिल्ली। म्यूचुअल फंड में निवेश का लोकप्रिय माध्यम बन चुके SIP (सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के जरिए फरवरी 2026 में 29,845 करोड़ रुपये का निवेश आया। यह आंकड़ा जनवरी 2026 के 31,002 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रहा। यह जानकारी Association of Mutual Funds in India (AMFI) द्वारा मंगलवार को जारी किए गए आंकड़ों से सामने आई है। हालांकि, सालाना आधार पर निवेश में मजबूत बढ़त देखने को मिली है। फरवरी 2025 में SIP इनफ्लो 25,999 करोड़ रुपये था, जबकि इस साल यह बढ़कर 29,845 करोड़ रुपये हो गया। यानी एक साल में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो म्यूचुअल फंड में बढ़ते निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। इक्विटी फंड में भी बढ़ा निवेशइक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है। फरवरी में नेट इक्विटी इनफ्लो बढ़कर 25,977.91 करोड़ रुपये हो गया, जो जनवरी में 24,028.59 करोड़ रुपये था। यह संकेत देता है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशक इक्विटी फंड में निवेश जारी रखे हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि के निवेश के लिए SIP और इक्विटी फंड को निवेशक बेहतर विकल्प मान रहे हैं। यही कारण है कि बाजार में अस्थिरता के बावजूद निवेश की रफ्तार बनी हुई है। फ्लेक्सी कैप फंड में सबसे ज्यादा निवेशफरवरी में सबसे अधिक निवेश Flexi Cap Funds में देखा गया। इस श्रेणी में 6,924.65 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। हालांकि यह आंकड़ा जनवरी के 7,672.36 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रहा। वहीं Multi Cap Funds में फरवरी के दौरान 1,933.53 करोड़ रुपये का निवेश आया, जो जनवरी के 1,995.23 करोड़ रुपये से थोड़ा कम है। इसके अलावा Large Cap Funds में निवेश बढ़कर 2,111.68 करोड़ रुपये हो गया, जबकि जनवरी में यह 2,004.98 करोड़ रुपये था। मिडकैप और स्मॉलकैप फंड में भी निवेशकों की दिलचस्पीमिडकैप और स्मॉलकैप फंड में भी निवेशकों की रुचि बनी रही। फरवरी में Mid Cap Funds में 4,002.99 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। वहीं Small Cap Funds में निवेश बढ़कर 3,881.06 करोड़ रुपये हो गया, जो जनवरी में 2,942.11 करोड़ रुपये था। इसके अलावा Sectoral and Thematic Funds में भी निवेश बढ़कर 2,987.29 करोड़ रुपये हो गया, जो जनवरी के 1,042.56 करोड़ रुपये से काफी ज्यादा है। म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का AUM भी बढ़ाफरवरी के अंत तक म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का इक्विटी एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 35,39,475.91 करोड़ रुपये हो गया। जनवरी में यह 34,86,777.63 करोड़ रुपये था। अगर डेट फंड को मिलाकर देखा जाए तो कुल AUM (Assets Under Management) फरवरी के अंत तक 82,02,956.35 करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं पूरे फरवरी महीने में औसत AUM 83,42,616.57 करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले जनवरी के अंत में कुल AUM 81,01,305.58 करोड़ रुपये था और पूरे महीने का औसत AUM 82,01,174.62 करोड़ रुपये रहा था। SIP के जरिए निवेश का ट्रेंड लगातार मजबूतविशेषज्ञों के मुताबिक SIP के जरिए निवेश का ट्रेंड लगातार मजबूत हो रहा है। छोटे निवेशकों से लेकर बड़े निवेशक तक नियमित निवेश के इस तरीके को अपनाते जा रहे हैं। बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद SIP निवेशकों को लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न देने का भरोसा देता है। यही वजह है कि हर महीने म्यूचुअल फंड उद्योग में SIP के जरिए बड़ी मात्रा में निवेश आता रहा है और भविष्य में भी इसके और बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। 📊

ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

वॉशिंगटन। दुनिया में जब भी कोई युद्ध शुरू होता है तो आमतौर पर ध्यान बमबारी, मिसाइल हमलों और सैनिकों की तैनाती पर जाता है, लेकिन हर युद्ध की एक बड़ी कीमत भी होती है। अमेरिका और ईरान (Iran) के बीच जारी संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती आकलन बताते हैं कि अमेरिका इस अभियान पर हर दिन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। यह खर्च केवल हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें मिसाइल, लड़ाकू विमानों का संचालन, नौसैनिक बेड़े की तैनाती, रक्षा प्रणाली, सैन्य ठिकानों का संचालन और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है। रोज करीब 891 मिलियन डॉलर का खर्च वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका इस संघर्ष में प्रति दिन करीब 891.4 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह अनुमान सैन्य अभियान Operation Epic Fury के पहले 100 घंटों के खर्च के आधार पर लगाया गया है। इन शुरुआती घंटों में कुल खर्च करीब 3.7 अरब डॉलर रहा, जिससे रोजाना खर्च का औसत करीब 891 मिलियन डॉलर निकाला गया। कुछ अन्य विश्लेषणों के मुताबिक वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है और यह 1 अरब से बढ़कर 1.43 अरब डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर इस युद्ध में सबसे बड़ा खर्च हथियारों और मिसाइलों पर हो रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.1 अरब डॉलर केवल इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई (म्यूनिशन रिप्लेसमेंट) पर खर्च किए गए हैं। इसके अलावा सैन्य ऑपरेशन चलाने में भी भारी खर्च आता है। इसमें युद्धपोत, लड़ाकू विमान, सैन्य ठिकाने और सैनिकों की तैनाती शामिल है। शुरुआती चरण में प्रत्यक्ष सैन्य संचालन पर लगभग 196 मिलियन डॉलर खर्च हुए, जबकि युद्ध में हुए नुकसान और सैन्य ढांचे की मरम्मत पर करीब 350 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया है। Pentagon के अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के पहले सप्ताह में ही कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें लगभग 4 अरब डॉलर सिर्फ मिसाइल और उन्नत इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च हुए। विमानवाहक पोत की तैनाती भी महंगी युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत और नौसैनिक बेड़े को भी क्षेत्र में तैनात किया है। अनुमान है कि दो विमानवाहक पोतों के संचालन पर ही रोज करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं। इसके अलावा हवाई हमले, मिसाइल रक्षा प्रणाली और सैनिकों की आवाजाही जैसे कई सैन्य अभियानों से खर्च लगातार बढ़ रहा है। युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगी लागत विश्लेषकों का कहना है कि अभी संघर्ष शुरुआती चरण में है, इसलिए खर्च बहुत ज्यादा दिखाई दे रहा है। अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो इसकी कुल लागत और तेजी से बढ़ सकती है। पिछले युद्धों ने भी खाली किया खजाना अमेरिका के पिछले युद्धों का इतिहास बताता है कि लंबे सैन्य अभियान बेहद महंगे साबित होते हैं। Iraq War पर अमेरिका ने करीब 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए। War in Afghanistan की लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई। 9/11 के बाद विभिन्न युद्ध अभियानों पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 8 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है, जिसमें सैनिकों की देखभाल, कर्ज पर ब्याज और अन्य दीर्घकालिक खर्च भी शामिल हैं। असली खतरा तेल आपूर्ति पर विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक खतरा केवल युद्ध नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति है। Strait of Hormuz दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यहां लंबे समय तक बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है। अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो अमेरिका में महंगाई 1 से 2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केवल ईंधन ही महंगा नहीं होगा, बल्कि परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। साथ ही अमेरिकी सेना का ईंधन खर्च भी बढ़ जाएगा, जिससे युद्ध की कुल लागत और ज्यादा हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का झटका लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था शुरुआती खर्च संभाल सकती है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इसका आर्थिक बोझ काफी भारी पड़ सकता है।

ईरान युद्ध का असर पाकिस्तान पर, स्कूल-कॉलेज बंद

लाहौर। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने के बाद पाकिस्तान सरकार ने ईंधन बचाने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने घोषणा की है कि देश में स्कूल दो सप्ताह के लिए बंद रहेंगे, जबकि सरकारी दफ्तर अब सप्ताह में सिर्फ चार दिन ही खुलेंगे। समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कहा है कि ईंधन की खपत कम करने के लिए बैंकों को छोड़कर अधिकतर सरकारी कार्यालय सीमित दिनों में काम करेंगे। साथ ही उच्च शिक्षा संस्थानों की कक्षाएं फिलहाल ऑनलाइन मोड में संचालित की जाएंगी। सरकारी दफ्तरों में आधा स्टाफ करेगा वर्क फ्रॉम होम सरकार के फैसले के अनुसार जरूरी सेवाओं को छोड़कर कई सरकारी विभागों में 50 प्रतिशत कर्मचारी घर से काम करेंगे। इसके अलावा अगले दो महीनों के दौरान सरकारी विभागों को मिलने वाले ईंधन में भी 50 फीसदी कटौती करने का फैसला किया गया है। क्यों लेना पड़ा यह फैसला पाकिस्तान में ईंधन संकट का मुख्य कारण मध्य-पूर्व में बढ़ता युद्ध और Strait of Hormuz में बढ़ा तनाव बताया जा रहा है। इस समुद्री मार्ग से पाकिस्तान को तेल की बड़ी आपूर्ति मिलती है। क्षेत्रीय हालात बिगड़ने के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई है और कीमतों में तेज उछाल आया है। सरकार ने शनिवार देर रात पेट्रोल की कीमतों में 55 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की घोषणा की, जिसे देश के इतिहास में सबसे बड़ी बढ़ोतरी माना जा रहा है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेट्रोलियम मंत्री Ali Pervaiz Malik, उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री Ishaq Dar और वित्त मंत्री Muhammad Aurangzeb भी मौजूद थे। डीज़ल भी हुआ महंगा सिर्फ पेट्रोल ही नहीं, बल्कि हाई-स्पीड डीज़ल की कीमत में भी करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। डीज़ल की कीमत 280.86 पाकिस्तानी रुपये से बढ़ाकर 335.86 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है। मंत्री अली परवेज मलिक ने कहा कि पड़ोसी क्षेत्र में शुरू हुआ संघर्ष अब पूरे इलाके को प्रभावित कर रहा है और फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह संकट कब तक जारी रहेगा। सरकार का मानना है कि अगर ईंधन की खपत पर अभी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है, इसलिए अस्थायी तौर पर ये कड़े कदम उठाए गए हैं।

52 साल बाद जापान पहुंचे ताइवान के पीएम, क्यों तिलमिलाया ड्रैगन?

वीजिंग। ताइवान के प्रधानमंत्री चो जुंग-ताई के जापान (Japan) दौरे को लेकर एशियाई राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। ताइवान के प्रधानमंत्री के इस दौरे पर ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसके पीछे “नापाक मंशा” होने का आरोप लगाया है। बीजिंग का कहना है कि निजी यात्रा की आड़ में ताइवान की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान के प्रधानमंत्री सप्ताहांत में Japan पहुंचे थे, जहां उन्होंने World Baseball Classic में ताइवान की टीम का समर्थन किया। हालांकि ताइवान सरकार ने साफ किया कि यह पूरी तरह निजी दौरा था और इसका किसी आधिकारिक कूटनीतिक गतिविधि से कोई संबंध नहीं है। 1972 के बाद पहली ऐसी यात्रा ताइवानी मीडिया के अनुसार, 1972 में टोक्यो और ताइपे के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध टूटने के बाद यह पहला मौका है जब किसी मौजूदा ताइवानी प्रधानमंत्री ने जापान का दौरा किया है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने आरोप लगाया कि चो जुंग-ताई “चुपके और गुप्त तरीके से” स्वतंत्रता समर्थक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जापान को ऐसे “उकसावे” की कीमत चुकानी पड़ सकती है। जापान ने बताया निजी दौरा जापान ने इस पूरे मामले के राजनीतिक महत्व को कम करके दिखाने की कोशिश की है। जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव Minoru Kihara ने कहा कि टोक्यो इस यात्रा को निजी मानता है और इस दौरान ताइवानी प्रधानमंत्री तथा जापानी सरकारी अधिकारियों के बीच कोई आधिकारिक बैठक नहीं हुई। हालांकि जापान और Taiwan के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, लेकिन दोनों के बीच मजबूत आर्थिक, सांस्कृतिक और अनौपचारिक राजनीतिक रिश्ते मौजूद हैं। ताइवान का चीन को जवाब ताइवान ने चीन की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि उसके नेताओं को अन्य देशों की यात्रा करने और उनसे संवाद करने का पूरा अधिकार है। ताइपे का कहना है कि चीन का ताइवान पर संप्रभुता का दावा निराधार है और द्वीप का भविष्य वहां की जनता तय करेगी। जापान से लौटने के बाद चो जुंग-ताई ने भी कहा कि उनकी यात्रा पूरी तरह निजी थी और इसका उद्देश्य ताइवान की राष्ट्रीय बेसबॉल टीम का समर्थन करना था। ऐतिहासिक रूप से जटिल रिश्ते ताइवान और जापान के रिश्ते इतिहास में काफी जटिल रहे हैं। Japan ने 1895 से लेकर 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने तक ताइवान पर उपनिवेश के रूप में शासन किया था। औपचारिक कूटनीतिक संबंध न होने के बावजूद दोनों के बीच मजबूत आर्थिक साझेदारी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जारी है। 2022 में Lai Ching-te, जो उस समय ताइवान के उपराष्ट्रपति थे, Shinzo Abe की हत्या के बाद श्रद्धांजलि देने टोक्यो भी गए थे। क्यों नाराज रहता है चीन बीजिंग लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उसकी किसी भी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी का विरोध करता रहा है। चीन का कहना है कि ताइवान के नेताओं और विदेशी सरकारों के बीच अनौपचारिक या प्रतीकात्मक संपर्क भी उसके “एक चीन” सिद्धांत को कमजोर कर सकता है। यही वजह है कि ताइवान के नेताओं के विदेश दौरों पर चीन अक्सर कड़ी प्रतिक्रिया देता रहा है और इस बार भी ऐसा ही देखने को मिला।

शिवराज सिंह चौहान का तीखा हमला: ममता बनर्जी पर निशाना, कहा– ‘प्रधानमंत्री’ शब्द से रोकी केंद्र की योजनाएं, हम बदलेंगे किसानों का भाग्य

नई दिल्ली। लोकसभा में मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर तीखे तेवर अपनाए। प्रश्नकाल के दौरान शिवराज ने कहा कि बंगाल की सरकार को जनहित से ज्यादा राजनीति प्यारी है। उन्होंने कहा, “विपक्ष तख्तियां लेकर हाय-हाय करता रहे, लेकिन दुनिया भारत की कृषि नीतियों की तारीफ कर रही है। जलने वाले जला करें, हम किसानों का भाग्य बदलकर रहेंगे।” नाम की राजनीति: ‘प्रधानमंत्री’ शब्द पर आपत्तिशिवराज सिंह ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री कृषि धन धान्य योजना और अन्य महत्वपूर्ण केंद्र योजनाएं केवल इसलिए लागू नहीं की गईं क्योंकि इनके नाम में ‘प्रधानमंत्री’ जुड़ा हुआ है। उन्होंने इसे किसानों के साथ “खुला अन्याय और पाप” करार दिया। उनका कहना था कि यह नीतियों को रोककर आम जनता और किसानों के हक पर हमला है। वोट बैंक बनाम किसानों की भलाईकेंद्रीय मंत्री ने सदन में यह भी कहा कि टीएमसी सरकार को मिट्टी की उर्वरता, किसानों की आय और जनता के स्वास्थ्य की कोई चिंता नहीं है। उन्होंने बंगाल में प्राकृतिक खेती मिशन के ठंडे बस्ते में डालने को इसका प्रमाण बताया। शिवराज ने कहा कि ममता सरकार केवल अपने वोट बैंक को साधने में लगी है और किसानों के हित की परवाह नहीं करती। चीन को पीछे छोड़ भारत का रिकॉर्डशिवराज सिंह चौहान ने गर्व से बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने चावल उत्पादन में चीन को पछाड़ दिया है। देश का खाद्यान्न उत्पादन 357 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “एक समय था जब हम अनाज मांगते थे, आज हमारी फसलें इतनी हैं कि भंडार भर गए हैं। यह भाजपा सरकार की कृषि नीतियों की सफलता है।” शिवराज का यह बयान राज्य में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव को और तेज कर सकता है। विपक्ष ने केंद्र की योजनाओं को रोकने का आरोप ममता बनर्जी पर लगाया है, जबकि भाजपा इसे किसानों की भलाई और विकास की सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है।