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Summer Skin Care Tips: गर्मियों में त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए अपनाएं ये 5 असरदार टिप्स

नई दिल्ली:गर्मी का मौसम शुरू हो गया है और लगातार बढ़ते तापमान के साथ लोगों को तेज धूप और पसीने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस मौसम में केवल सेहत ही नहीं बल्कि त्वचा का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी हो जाता है। चिलचिलाती धूप में बाहर निकलते ही त्वचा टैनिंग, सनबर्न और रूखी हो सकती है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी त्वचा गर्मियों में भी हेल्दी और चमकदार बनी रहे तो कुछ आसान और असरदार उपाय अपनाना जरूरी है। 1. सनस्क्रीन का नियमित इस्तेमाल यदि आप छात्र हैं या काम के सिलसिले में घर से बाहर निकलते हैं, तो एसपीएफ 30+ वाला सनस्क्रीन चेहरे और हाथ-पांव पर रोजाना लगाना बेहद जरूरी है। इसे दिन में 3 से 4 बार दोहराना चाहिए। इससे त्वचा टैन होने, सनबर्न और रूखेपन से बची रहती है। 2. पर्याप्त पानी पिएं गर्मियों में शरीर में पानी की कमी होने का खतरा अधिक होता है। इसलिए दिन भर में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पीना चाहिए। यह न केवल त्वचा को हाइड्रेट रखता है बल्कि पूरे शरीर को भी ठंडक और ऊर्जा देता है। 3. मौसमी फल शामिल करें फलों में पानी की मात्रा अधिक होती है और ये विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। गर्मियों में तरबूज, खरबूजा, खीरा और संतरा जैसे मौसमी फल न सिर्फ ताजगी देते हैं बल्कि त्वचा को भी स्वस्थ बनाए रखते हैं। 4. हल्के और सूती कपड़े पहनें भीषण गर्मी में हल्के रंग और सूती कपड़े पहनें। इससे शरीर में गर्मी कम लगेगी और पसीने की समस्या भी कम होगी। घर से बाहर निकलते समय स्कार्फ, टोपी, धूप का चश्मा या छाता का इस्तेमाल करें ताकि त्वचा तेज धूप से सुरक्षित रहे। 5. तेज धूप में बाहर निकलने से बचें सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक धूप सबसे तेज होती है। इस समय बाहर निकलने से त्वचा टैन और सनबर्न होने का खतरा बढ़ जाता है। कोशिश करें कि इस समय बाहर जाना जरूरी न हो। टैनिंग को दूर करने के घरेलू उपाय अगर धूप में त्वचा टैन हो जाती है, तो घर पर कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं। एलोवेरा जेल, दही, खीरे या टमाटर का रस टैनिंग हटाने में मदद करते हैं। इन्हें त्वचा पर हल्के हाथों से लगाएं और 15-20 मिनट बाद धो लें। ये उपाय त्वचा को ठंडक देने के साथ-साथ उसका नमी स्तर भी बनाए रखते हैं। गर्मी में थोड़ी सावधानी और सही दिनचर्या से आपकी त्वचा लंबे समय तक स्वस्थ, चमकदार और हाइड्रेटेड बनी रहेगी।

मुंबई मेयर की गाड़ी से हटाईं लाल-नीली फ्लैश लाइट, वीआईपी कल्चर विवाद पर BMC ने दी कार्रवाई

नई दिल्ली। मुंबई में हाल ही में हुए विवाद के बाद मेयर ऋतु तावड़े की आधिकारिक गाड़ी और उनके साथ चलने वाली एस्कॉर्ट वाहन से लाल-नीली फ्लैश लाइटें हटा दी गई हैं। यह मामला सबसे पहले सोशल मीडिया पर तब सुर्खियों में आया जब एक पोस्ट में सवाल उठाया गया कि क्या मेयर की गाड़ी को पुलिस जैसी फ्लैश लाइट लगाने की अनुमति है। इस विवाद के बाद आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने मेयर को पत्र लिखकर इस विषय पर आपत्ति जताई और केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार ऐसी लाइटों का उपयोग केवल आपातकालीन सेवाओं के लिए ही किया जा सकता है, इसलिए इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए, यह स्पष्ट किया। विवाद का केंद्र मेयर की गाड़ी के बोनट पर लगी लाल-नीली फ्लैशिंग लाइट थी, जबकि उनके साथ चल रही एस्कॉर्ट स्कॉर्पियो वाहन में भी ऐसी लाइटें थीं। इस वाहन में मेयर के निजी सहायक और प्रोटोकॉल अधिकारी मौजूद थे। लाइटें देखकर लोगों ने यह सवाल उठाया कि क्या मेयर की गाड़ी को विशेष अधिकार दिया गया है। इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मेयर ऋतु तावड़े ने कहा कि उन्हें अपनी गाड़ी पर बीकन या फ्लैश लाइट लगाने में कोई रुचि नहीं है और यह प्रशासन की गलती थी। उन्होंने बताया कि जब उन्हें आधिकारिक वाहन दिया गया, तब प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि किन लाइटों का प्रयोग किया जा सकता है और किनका नहीं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस विवाद पर कहा कि जांच में पता चला कि लाल-नीली फ्लैश लाइट गाड़ी की छत पर नहीं बल्कि बोनट पर लगी थी। उन्होंने मेयर को दोषी नहीं ठहराया और कहा कि बिना वजह उन्हें निशाना बनाना उचित नहीं है। नगर निगम के अधिकारियों ने बताया कि इसी तरह की फ्लैशिंग लाइटें मेयर, डिप्टी मेयर और हाउस लीडर की गाड़ियों पर भी लगी थीं, जिन्हें शनिवार को हटा दिया गया। इस विवाद के बाद विपक्ष की नेता और पूर्व मेयर किशोरी पेडणेकर ने सवाल उठाया कि यह कदम वीआईपी कल्चर के खिलाफ है और केंद्र सरकार ने 2017 में ही सरकारी वाहनों पर लाल बत्ती और विशेष प्रतीकों का उपयोग रोक दिया था। 2017 में केंद्र सरकार ने सरकारी वाहनों पर लाल बत्ती और वीआईपी कल्चर के प्रतीकों के उपयोग पर रोक लगाई थी। तब से मुंबई की मेयर की गाड़ी से लाल बत्ती हटा दी गई थी। इस विवाद ने शहर में फिर से चर्चा छेड़ दी है कि क्या नए नियमों का सही पालन किया जा रहा है और क्या मेयर अपने पद का अनुचित लाभ उठा रही हैं। कुल मिलाकर, मुंबई मेयर की गाड़ी पर लगी लाल-नीली फ्लैश लाइट हटाने के बाद विवाद समाप्त हुआ, लेकिन यह मुद्दा वीआईपी कल्चर, प्रशासनिक नियमों और पारदर्शिता पर एक बार फिर ध्यान खींचता है।

भोपाल सुसाइड मिस्ट्री: बीटेक छात्र की मौत में बड़ा खुलासा, रिश्तेदार पर ₹1.30 लाख हड़पने और प्रताड़ना का आरोप

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक इंजीनियरिंग छात्र द्वारा वीडियो कॉल पर सुसाइड किए जाने के सनसनीखेज मामले में अब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। मृतक छात्र के पिता ने आरोप लगाया है कि उनके ही एक करीबी रिश्तेदार ने करियर बनाने के नाम पर छात्र से भारी रकम ऐंठी और फिर उसे मौत के मुहाने तक धकेल दिया। शनिवार सुबह अशोका गार्डन स्थित किराए के कमरे में बीटेक थर्ड ईयर के छात्र मोहम्मद इफ्तिखार (21) ने फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। चौंकाने वाली बात यह है कि सुसाइड के वक्त वह अपनी एक दोस्त से वीडियो कॉल पर बात कर रहा था। सूचना मिलते ही जब दोस्त कमरे पर पहुँचे, तो दरवाजा अंदर से बंद था। गेट तोड़कर अंदर जाने पर इफ्तिखार का शव फंदे से लटका मिला और मोबाइल दीवार के सहारे टिका हुआ था, जिससे अंदेशा है कि उसने पूरी वारदात को लाइव दिखाया। परिजनों का गंभीर आरोप रविवार को पोस्टमार्टम के दौरान मृतक के पिता मोहम्मद नवाब अली ने मीडिया के सामने टूटते हुए बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि: सर्टिफिकेट के नाम पर ठगी: एक रिश्तेदार ने डिग्री और सर्टिफिकेट दिलाने का झांसा देकर इफ्तिखार से 1.30 लाख रुपये हड़प लिए थे। धमकी और तनाव: जब इफ्तिखार ने अपने पैसे वापस मांगे, तो आरोपी रिश्तेदार उसे डराने-धमकाने लगा।इसी आर्थिक ठगी और मानसिक प्रताड़ना के कारण छात्र गहरे तनाव में था, जिसके चलते उसने यह आत्मघाती कदम उठाया। पुलिस ने घटनास्थल से छात्र का मोबाइल जब्त कर लिया है। पैटर्न लॉक खुलने के बाद कॉल रिकॉर्ड्स और वीडियो चैट की फॉरेंसिक जांच की जाएगी। पुलिस अब छात्र की उस दोस्त का बयान दर्ज करने की तैयारी में है, जिससे वह आखिरी वक्त पर बात कर रहा था। पुलिस का कहना है कि “रिश्तेदार” वाले एंगल और रुपयों के लेनदेन की बारीकी से जांच की जा रही है।

भोपाल में खाद्य मंत्री ने मिलावट का किया लाइव निरीक्षण: पीली हल्दी लाल हुई, गोविंद राजपूत बोले- हर उपभोक्ता बने जिद्दी

नई दिल्ली। भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति व उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने सभागार में लगी विशेष प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में विभिन्न खाद्य पदार्थों में होने वाली मिलावट और उसकी पहचान के तरीके दर्शाए गए थे। मंत्री ने अपनी आंखों के सामने हल्दी का नमूना केमिकल में डालते ही पीले रंग से लाल रंग में बदलते देखा, जिसे देखकर वे चौंक गए। इस घटना को अपने मुख्य संबोधन में भी उन्होंने शामिल किया और जनता से अपील की कि वे अपने हक के लिए जागरूक और “जिद्दी उपभोक्ता” बनें। मंत्री ने उदाहरण देते हुए प्रख्यात दानवीर और विधिवेत्ता डॉ. हरिसिंह गौर की बहादुरी की ओर इशारा किया, जिन्होंने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक गड़बड़ियों के खिलाफ सख्ती से लड़ाई लड़ी। मंत्री ने नापतौल में होने वाली अनियमितताओं की भी ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि 2 किलो और आधा किलो के बांट का वजन बराबर दिखाने वाले तराजू में गड़बड़ी पाई गई। उन्होंने उपभोक्ताओं से अपील की कि वे खरीदारी करते समय तराजू और पैकेजिंग का ध्यान रखें। इस अवसर पर मंत्री ने 2019 के नए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की जानकारी देते हुए बताया कि अब शिकायत करना आसान है। उपभोक्ता घर बैठे ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल हो सकते हैं। अधिनियम में उपभोक्ताओं के छह प्रमुख अधिकार शामिल हैं: चुनने का अधिकार, जानकारी का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, सुनवाई का अधिकार, समस्याओं का निराकरण और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार। राज्य और जिला उपभोक्ता आयोगों में शिकायतों के निराकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है। वर्ष 2025–26 में राज्य उपभोक्ता आयोग ने करीब 3 हजार मामलों का निपटारा किया, जबकि जिला आयोगों में 14 हजार से अधिक मामलों का समाधान हो चुका है। ऑनलाइन माध्यम से शिकायतें भी बढ़ी हैं; दिसंबर 2020 से अब तक राज्य आयोग में 7,500+ और जिला आयोगों में 26,000+ शिकायतें दर्ज की गई हैं। कार्यक्रम में स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठनों और छात्रों को भी सम्मानित किया गया। कटनी की संस्था अखिल भारतीय उपभोक्ता उत्थान संगठन को प्रथम पुरस्कार (1,11,000 रुपये) मिला, जबकि ग्वालियर की प्राकृतिक चिकित्सालय महाविद्यालय समिति को द्वितीय पुरस्कार (51,000 रुपये) प्रदान किया गया। छात्राओं के लिए आयोजित निबंध और पोस्टर प्रतियोगिता में उज्जैन, छतरपुर और इंदौर की छात्राओं ने प्रमुख स्थान प्राप्त किए। मंत्री राजपूत ने अंत में चेतावनी दी कि अनुचित व्यापारिक प्रथाओं और मिलावटखोरी पर नकेल तभी कसी जा सकती है जब उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और सतर्क रहें, शिकायत करने में हिचकिचाएं नहीं। इस कार्यक्रम ने उपभोक्ताओं को खाद्य सुरक्षा, अधिकारों और जागरूकता की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया, साथ ही डिजिटल माध्यम और नई तकनीकों के जरिए शिकायत और सुनवाई को और सुलभ बनाया।

चैत्र नवरात्रि 2026: गुरुवार से शुरुआत, माता का वाहन बनेगी डोली; जानिए शास्त्रों में कैसे तय होता है आगमन का वाहन

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत जप पाठ तथा भक्ति के माध्यम से माता रानी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय परंपराओं के अनुसार नवरात्रि में माता दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन किस वाहन से होता है इसका विशेष महत्व माना जाता है। यह वाहन घटस्थापना के दिन के आधार पर निर्धारित होता है और इसे उस वर्ष की समग्र ऊर्जा तथा संभावित परिस्थितियों का संकेत भी माना जाता है। साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से हो रही है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार यदि नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार या शुक्रवार से होती है तो माता रानी का आगमन डोली यानी पालकी पर माना जाता है। इसी कारण इस वर्ष माता का वाहन डोली निर्धारित किया गया है। शास्त्रों में यह परंपरा इस विश्वास से जुड़ी है कि देवी का वाहन उस वर्ष के सामाजिक आर्थिक प्राकृतिक और राजनीतिक हालात के बारे में संकेत देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्ताह के अलग-अलग दिनों के आधार पर माता का वाहन तय होता है। यदि नवरात्रि रविवार या सोमवार से शुरू हो तो माता हाथी पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। यह अच्छी वर्षा सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। वहीं शनिवार या मंगलवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का वाहन घोड़ा माना जाता है जो संघर्ष युद्ध या अशांति का संकेत देता है। यदि नवरात्रि बुधवार से प्रारंभ हो तो माता नाव पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार या शुक्रवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन डोली पर माना जाता है। डोली या पालकी को ज्योतिषीय दृष्टि से सामान्यत शुभ संकेत नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसे वर्ष में सामाजिक या आर्थिक चुनौतियां स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं महामारी प्राकृतिक असंतुलन या आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि विद्वान यह भी बताते हैं कि यह भविष्यवाणी किसी निश्चित घटना का संकेत नहीं बल्कि सामूहिक ऊर्जा का प्रतीकात्मक अर्थ है। धार्मिक आस्था के अनुसार माता की कृपा से सभी कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा-पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कन्या पूजन हवन और दान-पुण्य करके माता का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार 2026 की चैत्र नवरात्रि में माता का आगमन डोली पर माना जा रहा है जिसे सतर्कता और संयम का संकेत समझा जा सकता है। आस्था और भक्ति के साथ मनाई गई नवरात्रि न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है बल्कि जीवन में सकारात्मकता और संतुलन भी लाती है।

बलरामपुर में विकास को रफ्तार: सड़क-पुल और डैम समेत कई परियोजनाओं पर खर्च होंगे 1.85 अरब रुपये

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में ग्रामीण विकास और रोजगार बढ़ाने के लिए बड़ा एक्शन प्लान तैयार किया गया है। विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 में करीब 1 अरब 85 करोड़ 93 लाख रुपये खर्च कर सड़क, पुल, डैम सहित कई विकास कार्य कराए जाएंगे। इस योजना से जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति मिलने के साथ-साथ हजारों मजदूरों को रोजगार भी मिलेगा। जिला प्रशासन द्वारा तैयार की गई कार्ययोजना को युक्तधारा पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया है। इस योजना के माध्यम से करीब 44 लाख 26 हजार 910 मानव दिवस सृजित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूरों को काम मिल सकेगा और पलायन पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी। 793 ग्राम पंचायतों में होगा विकासइस योजना के तहत जिले की 793 ग्राम पंचायतों में विभिन्न विकास कार्य कराए जाएंगे। प्रशासन का मानना है कि इससे गांवों में बुनियादी सुविधाएं बेहतर होंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। इसके अलावा ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर आजीविका के साधन विकसित करने पर भी जोर दिया गया है। मजदूरों को मिलेगा 125 दिन तक रोजगारयोजना के तहत इस बार मजदूरों को एक वर्ष में 125 दिन तक रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। जिले में करीब 1 लाख 49 हजार सक्रिय श्रमिकों को इसका सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। इससे ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ेगी और उन्हें गांव में ही रोजगार मिल सकेगा। इन कार्यों पर होगा विशेष फोकसकार्ययोजना के अनुसार कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम कराया जाएगा, जिनमें शामिल हैं: जल संरक्षण और जल संग्रहण से जुड़े प्रोजेक्ट पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधरोपण अभियान पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए कैटल शेड निर्माण जरूरतमंदों के लिए आवास संबंधी कार्य गांवों में सड़क, पुल और छोटे निर्माण कार्य कुछ योजनाएं सीधे लाभार्थियों को व्यक्तिगत लाभ देने के उद्देश्य से इन कार्यों के जरिए गांवों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। 40% बजट निर्माण सामग्री परकुल बजट का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा निर्माण सामग्री और अन्य जरूरी खरीद पर खर्च किया जाएगा, जबकि बाकी राशि मजदूरी के रूप में श्रमिकों को दी जाएगी। ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर प्रस्ताव तैयार कर उन्हें स्वीकृति दी जाएगी। इसके बाद 1 अप्रैल से ग्राम पंचायतों में विकास कार्य जमीन पर शुरू होने की तैयारी है। प्रशासन का मानना है कि इस योजना से न केवल ग्रामीण इलाकों में विकास की गति तेज होगी, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने से आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। बलरामपुर में विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन के तहत 2026-27 में 1.85 अरब रुपये से सड़क, पुल और अन्य विकास कार्य कराए जाएंगे। योजना से 44 लाख से अधिक मानव दिवस सृजित होंगे और हजारों ग्रामीण मजदूरों को रोजगार मिलेगा।

एलपीजी संकट से टाइल्स उद्योग पर असर, फैक्ट्रियां बंद; कीमतों में 20% तक उछाल

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय तनाव और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़े असर का प्रभाव अब निर्माण सामग्री के बाजार में भी दिखाई देने लगा है। एलपीजी गैस की कमी के कारण देश के प्रमुख टाइल्स उत्पादन केंद्र गुजरात की कई फैक्ट्रियों में उत्पादन प्रभावित हो गया है। गैस आपूर्ति बाधित होने से कुछ इकाइयों को अस्थायी रूप से बंद भी करना पड़ा है, जिससे बाजार में टाइल्स की उपलब्धता घटने लगी है और कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दरअसल टाइल्स उद्योग में भट्टियों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर एलपीजी गैस का उपयोग किया जाता है। लेकिन हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़े तनाव और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में आई बाधा के कारण गैस की उपलब्धता कम हो गई है। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है और कई फैक्ट्रियों को सीमित क्षमता पर काम करना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय तनाव का असरविशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति प्रभावित हुई है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों और एलपीजी की उपलब्धता पर पड़ा है, जिससे उद्योगों के संचालन में दिक्कतें आने लगी हैं। बाजार में घट रही उपलब्धतागैस संकट के कारण फैक्ट्रियों का उत्पादन कम होने से टाइल्स की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। कंपनियों द्वारा अब माल की आपूर्ति करीब 40 दिन की वेटिंग के बाद की जा रही है। पहले जहां दुकानदारों को कुछ ही दिनों में माल मिल जाता था, वहीं अब उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ रहा है। कीमतों में तेज उछालआपूर्ति घटने के कारण बाजार में टाइल्स की कीमतों में अचानक तेजी आ गई है। दुकानदारों के अनुसार पहले जो टाइल्स की पेटी करीब 450 रुपये में मिलती थी, उसका दाम बढ़कर 550 रुपये तक पहुंच गया है। वहीं सामान्य रूप से 160 रुपये में मिलने वाली पेटी अब लगभग 230 रुपये तक बिक रही है। स्थानीय बाजार में करीब 15 दुकानें टाइल्स का कारोबार कर रही हैं, जबकि पूरे जिले में 100 से अधिक व्यापारी इस व्यापार से जुड़े हुए हैं। इन दुकानों में बिकने वाला अधिकांश माल गुजरात की फैक्ट्रियों से आता है, इसलिए वहां उत्पादन प्रभावित होने का असर सीधे स्थानीय बाजारों में दिखाई दे रहा है। निर्माण कार्य पर बढ़ा दबावटाइल्स की कीमतों में आई इस बढ़ोतरी से ठेकेदारों, मकान बनवा रहे लोगों और उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ गई है। निर्माण कार्य की लागत बढ़ने से कई परियोजनाओं का बजट प्रभावित हो सकता है। व्यापारियों का कहना है कि यदि गैस आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो आने वाले समय में टाइल्स की कीमतों में और भी वृद्धि हो सकती है। टाइल्स विक्रेता विपुल रस्तोगी के अनुसार, एलपीजी गैस की कमी के कारण फैक्ट्रियों का उत्पादन प्रभावित हुआ है और इसका असर सीधे बाजार पर पड़ा है। पहले जो माल आसानी से उपलब्ध हो जाता था, अब उसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है और कंपनियों ने भी कीमतें बढ़ा दी हैं। एलपीजी गैस की कमी के कारण गुजरात की कई टाइल्स फैक्ट्रियों में उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे बाजार में सप्लाई घट गई है। इसका असर कीमतों पर पड़ा है और टाइल्स के दाम 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं

कीवी का जूस पीना बेहतर या फल खाना? जानिए सेहत के लिए कौन सा तरीका है ज्यादा फायदेमंद

नई दिल्ली । आज के समय में लोग अपनी सेहत को बेहतर बनाए रखने के लिए पोषक तत्वों से भरपूर फलों को डाइट में शामिल कर रहे हैं। इन्हीं फलों में से एक है कीवी, जिसे औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। हल्का खट्टा-मीठा स्वाद रखने वाला यह फल न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट होता है बल्कि शरीर को कई तरह के स्वास्थ्य लाभ भी देता है। अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि कीवी को जूस के रूप में पीना ज्यादा फायदेमंद है या इसे सीधे फल के रूप में खाना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार दोनों ही तरीके लाभकारी हैं, लेकिन साबुत फल खाने से शरीर को ज्यादा फाइबर मिलता है, जबकि जूस जल्दी ऊर्जा देने में मदद करता है। कीवी पोषक तत्वों का खजाना माना जाता है। इसमें विटामिन-सी, विटामिन-के, विटामिन-ई, पोटैशियम, फोलेट, फाइबर, कॉपर और शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। यही कारण है कि इसका सेवन शरीर को कई बीमारियों से बचाने में मदद करता है। खासतौर पर गर्मियों के मौसम में कीवी का जूस पीना शरीर को तरोताजा रखने में सहायक होता है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुबह के समय इसका सेवन करना ज्यादा फायदेमंद मानते हैं। कीवी या उसके जूस का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को मजबूत बनाता है। इसमें मौजूद विटामिन-सी शरीर को संक्रमण से बचाने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है और पेट से जुड़ी समस्याओं जैसे कब्ज और अपच से राहत दिलाने में मदद करता है। कई बार डॉक्टर डेंगू बुखार के दौरान भी कीवी या कीवी के जूस का सेवन करने की सलाह देते हैं, क्योंकि यह शरीर की ताकत बनाए रखने में सहायक होता है। कीवी का सेवन दिल की सेहत के लिए भी काफी लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। साथ ही यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में भी सहायक हो सकता है, जिससे दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। यही नहीं, इसमें मौजूद पोषक तत्व जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करने में भी मददगार माने जाते हैं। कीवी आंखों की सेहत के लिए भी फायदेमंद है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन-सी आंखों को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं और उम्र के साथ होने वाली समस्याओं के जोखिम को कम कर सकते हैं। अगर आप कीवी का जूस बनाना चाहते हैं तो इसे अच्छी तरह धोकर छील लें और छोटे टुकड़ों में काट लें। इसके बाद इसे मिक्सर में डालकर थोड़ा पानी, स्वादानुसार काला नमक और चाहें तो थोड़ी चीनी मिलाकर ब्लेंड कर लें। अंत में इसमें थोड़ा नींबू का रस मिलाकर ताजगी से भरपूर जूस तैयार किया जा सकता है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संभव हो तो कीवी को जूस के बजाय साबुत फल के रूप में खाना ज्यादा फायदेमंद होता है, क्योंकि इससे शरीर को फाइबर भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है।

गैस सिलेंडर की किल्लत ने बदल दी रसोई, पहाड़ों में फिर जगा पारंपरिक चूल्हों का भरोसा

नई दिल्ली:  उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों गैस सिलेंडर की किल्लत ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। सप्लाई में देरी और बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवारों के सामने रसोई चलाना मुश्किल हो गया है। लेकिन इस संकट के बीच पहाड़ों के गांवों ने एक बार फिर अपने पुराने और भरोसेमंद तरीके को याद कर लिया है। कई घरों में अब पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे दोबारा जलने लगे हैं। यह दृश्य एक तरह से उस जीवनशैली की वापसी है, जो कभी पहाड़ों की पहचान हुआ करती थी। पहले के समय में पहाड़ों के लगभग हर घर में मिट्टी और पत्थर से बना चूल्हा होता था। यही चूल्हा रसोई का मुख्य साधन था और पूरे परिवार के मेलजोल का भी केंद्र माना जाता था। सुबह से लेकर शाम तक चूल्हे की आंच के आसपास ही घर की दिनचर्या चलती थी। धीरे-धीरे गैस सिलेंडर आने के बाद इन चूल्हों का इस्तेमाल कम हो गया, लेकिन आज गैस की किल्लत ने लोगों को फिर उसी पुराने रास्ते की ओर मोड़ दिया है। पहाड़ों में ईंधन के लिए लोगों को ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता था। जंगलों और खेतों के आसपास आसानी से मिलने वाली सूखी लकड़ियां, पिरूल यानी चीड़ के सूखे पत्ते और गोबर के उपले ही ईंधन का काम करते थे। गांव की महिलाएं रोजमर्रा के काम के साथ-साथ इन चीजों को इकट्ठा कर लेती थीं और घर की रसोई आसानी से चल जाती थी। इस व्यवस्था में जहां खर्च लगभग शून्य होता था, वहीं चूल्हे पर धीमी आंच में पकने वाले खाने का स्वाद भी अलग ही होता था। आज भी कई लोग मानते हैं कि लकड़ी के चूल्हे पर बने भोजन की खुशबू और स्वाद गैस पर बने खाने से कहीं ज्यादा अच्छा होता है। मौजूदा समय में कई परिवारों ने एक नया तरीका अपनाया है, जिसे गांवों में लोग डबल सिस्टम कह रहे हैं। यानी घर में गैस सिलेंडर भी है और साथ ही पारंपरिक चूल्हा भी जलाया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर गैस का इस्तेमाल किया जाता है और बाकी समय चूल्हे पर खाना बनाकर गैस की बचत की जाती है। इससे एक फायदा यह भी है कि अगर सिलेंडर खत्म हो जाए या समय पर न मिले, तो घर की रसोई बंद नहीं होती। इस तरह यह तरीका पहाड़ों के लोगों के लिए सस्ता और सुरक्षित विकल्प बन गया है। गांव की बुजुर्ग महिला नर्वदा देवी बताती हैं कि पुराने समय के तरीके आज भी उतने ही कारगर हैं जितने पहले थे। उनका कहना है कि पहले गैस का कोई सवाल ही नहीं था। लोग जंगल से सूखी लकड़ी और पिरूल लेकर आते थे और उसी से खाना बनाते थे। अब जब गैस महंगी हो गई है और समय पर नहीं मिल रही है, तो फिर से चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है। उनके अनुसार पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए ये पुराने तरीके आज भी बेहद उपयोगी हैं। दरअसल पहाड़ों की पारंपरिक जीवनशैली सिर्फ पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि संकट के समय वही सबसे बड़ा सहारा बन जाती हैं। बदलते दौर में भले ही आधुनिक तकनीक ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया हो, लेकिन पहाड़ों में पूर्वजों की समझ और आत्मनिर्भरता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गैस सिलेंडर की इस समस्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ तालमेल ही पहाड़ी जीवन की असली ताकत है।

सिर्फ 5 मिनट में तैयार करें चटपटा महाराष्ट्रीयन ठेचा, बढ़ाए खाने का मज़ा

नई दिल्ली । भारतीय खाने में चटनी का खास महत्व होता है जो साधारण भोजन का स्वाद भी कई गुना बढ़ा देती है। महाराष्ट्रीयन ठेचा ऐसी ही तीखी और चटपटी चटनी है जो दाल-चावल या साधारण रोटियों के साथ खाने के मज़े को दोगुना कर देती है। अगर सब्जी बनाने का मन न हो तो यह रेसिपी आपकी रसोई की रेस्क्यू साबित हो सकती है। महाराष्ट्रीयन ठेचा क्या है?ठेचा महाराष्ट्र की पारंपरिक चटनी है जिसे मुख्य रूप से हरी मिर्च लहसुन और मूंगफली से बनाया जाता है। इसे ज्वार या बाजरे की भाकरी के साथ बड़े चाव से खाया जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसे ओखली या सिलबट्टे पर दरदरा कुचला जाता है जिससे इसका टेक्सचर और स्वाद देसी और अनोखा होता है।सिर्फ 5 मिनट में तैयार ठेचा बनाने के लिए किसी लंबी तैयारी की जरूरत नहीं है। केवल हरी मिर्च लहसुन की कलियां मूंगफली थोड़ा जीरा और नमक का इस्तेमाल करके मिनटों में इसे तैयार किया जा सकता है। यह रेसिपी खासकर हॉस्टल स्टूडेंट्स या व्यस्त लोगों के लिए परफेक्ट है। बनाने की आसान विधि एक पैन में थोड़ा तेल गर्म करें।हरी मिर्च डंठल हटाकर लहसुन की कलियां और मूंगफली डालें।इन्हें तब तक भूनें जब तक मिर्च पर हल्के भूरे धब्बे न आएं और मूंगफली कुरकुरी न हो जाए। थोड़ा जीरा भी डालें। भुनी हुई सामग्री को ओखली में निकालें और स्वादानुसार नमक मिलाएं। इसे दरदरा कूट लें बारीक पेस्ट नहीं बनाना है। इच्छानुसार नींबू का रस या बारीक कटा हरा धनिया डाल सकते हैं। सेवन और स्टोरेज टिप्स ठेचा पराठे पूरी दाल-चावल या सादी रोटी के साथ खाया जा सकता है। इसे एयरटाइट कंटेनर में भरकर फ्रिज में 5-7 दिन तक फ्रेश रखा जा सकता है। सफर में यह त्वरित और स्वादिष्ट विकल्प साबित होता है। स्वाद और सेहत मिर्च और लहसुन का यह मेल सिर्फ खाने का मज़ा नहीं बढ़ाता बल्कि मेटाबॉलिज्म को भी बूस्ट करता है। अगली बार जब सब्जी बनाने का मन न हो तो इस चटपटी महाराष्ट्रीयन ठेचा को ट्राई जरूर करें।