वैश्विक संकट के बीच मानवता की अंतिम सुरक्षा-रेखा है ऊर्जा संरक्षण

– योगेश कुमार गोयल आज जब विश्व एक बार फिर भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रहा है और ईरान, अमेरिका तथा इजरायल के बीच टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है, तब ऊर्जा केवल विकास का साधन नहीं बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। तेल और गैस के दामों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और ऊर्जा स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या आधुनिक सभ्यता ने अपनी बुनियाद अत्यधिक अस्थिर संसाधनों पर खड़ी कर दी है। इस परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं बल्कि मानवता की सुरक्षा का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी उपाय बनकर उभर रहा है। ऊर्जा आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग है, चाहे वह उद्योगों की मशीनें हों, परिवहन के साधन हों, डिजिटल अर्थव्यवस्था हो या घरेलू जीवन की सुविधाएं किंतु विडंबना यह है कि जिस ऊर्जा पर हमारी प्रगति आधारित है, वही अब संकट का कारण बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की ‘एनर्जी प्रोग्रेस रिपोर्ट 2024’ के अनुसार आने वाले दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग में लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है जबकि जीवाश्म ईंधनों के भंडार तेजी से सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में यदि ऊर्जा संरक्षण और दक्षता को प्राथमिकता नहीं दी गई तो भविष्य में ऊर्जा संकट केवल आर्थिक चुनौती नहीं रहेगा बल्कि सामाजिक अस्थिरता और वैश्विक संघर्षों का कारण भी बन सकता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इस खतरे को और स्पष्ट करता है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने तेल आपूर्ति पर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर हो रही हैं। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। दरअसल भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। पैट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि केवल परिवहन लागत को नहीं बढ़ाती बल्कि खाद्य पदार्थों से लेकर निर्माण सामग्री तक हर क्षेत्र में महंगाई को जन्म देती है। इस परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा संरक्षण राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। भारत तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है और यहां ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की ‘इंडिया एनर्जी आउटलुक 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी ऊर्जा उपभोक्ता अर्थव्यवस्था बन जाएगा। ऐसे में यदि ऊर्जा खपत को संतुलित नहीं किया गया तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। यही कारण है कि भारत ने ऊर्जा दक्षता और संरक्षण को अपनी नीति का केंद्रीय तत्व बनाया है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा लागू ऊर्जा संरक्षण अधिनियम और ‘उजाला’ जैसे कार्यक्रमों ने यह साबित किया है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकते हैं। 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्बों का वितरण और उससे हुई 48 बिलियन यूनिट बिजली की बचत इस बात का प्रमाण है कि यदि नीति और जनभागीदारी साथ आएं तो ऊर्जा संरक्षण एक जनांदोलन बन सकता है। ऊर्जा संरक्षण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह किसी नई तकनीक या बड़े निवेश पर निर्भर नहीं है बल्कि यह हमारे दैनिक व्यवहार में छोटे-छोटे बदलावों से ही संभव है। उदाहरण के लिए, अनावश्यक रूप से जलती लाइटों को बंद करना, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का उपयोग करना, एयर कंडीशनर का सीमित प्रयोग, सार्वजनिक परिवहन को अपनाना और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना, ये सभी कदम न केवल ऊर्जा बचाते हैं बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। यदि भारत का प्रत्येक परिवार प्रतिदिन केवल एक यूनिट बिजली की बचत करे तो यह देश के लिए ऊर्जा क्रांति के समान होगा। ऊर्जा संरक्षण का संबंध केवल बिजली तक सीमित नहीं है बल्कि यह जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ऊर्जा उत्पादन में जल का व्यापक उपयोग होता है और जल की बर्बादी सीधे ऊर्जा की बर्बादी में बदल जाती है। इसी प्रकार, ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि का मुख्य कारण है। आज जब दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, तब ऊर्जा संरक्षण इस दिशा में सबसे प्रभावी हथियार साबित हो सकता है। अक्षय ऊर्जा इस संकट का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करती है लेकिन इसकी सफलता भी ऊर्जा संरक्षण पर ही निर्भर करती है। सौर, पवन और जैव ऊर्जा जैसे स्रोतों का विस्तार तभी प्रभावी होगा, जब ऊर्जा की कुल मांग को नियंत्रित किया जाए। भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और स्मार्ट ग्रिड जैसी तकनीकें इस दिशा में नई संभावनाएं खोल रही हैं लेकिन इन सबका मूल आधार ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग ही है। शहरीकरण के बढ़ते दबाव ने भी ऊर्जा खपत को तेजी से बढ़ाया है। महानगरों में ऊंची इमारतें, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और बढ़ती वाहन संख्या ऊर्जा की मांग को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसे में हरित भवन निर्माण, सौर पैनलों का उपयोग और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना आवश्यक हो जाता है। यदि भवन निर्माण में ऊर्जा दक्षता को प्राथमिकता दी जाए तो बिजली की खपत में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। यह न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। ऊर्जा संरक्षण का एक महत्वपूर्ण आयाम औद्योगिक क्षेत्र भी है। उद्योगों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने से उत्पादन लागत में कमी आती है और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि ऊर्जा संरक्षण को केवल सरकारी नीति या अभियान के रूप में न देखा जाए बल्कि इसे एक सामाजिक संस्कृति के रूप में विकसित किया जाए। विद्यालयों में ऊर्जा शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, मीडिया के माध्यम से जनजागरूकता बढ़ाई जाए और प्रत्येक नागरिक को यह समझाया जाए कि ऊर्जा की बचत केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य है। जब तक ऊर्जा संरक्षण
जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता : बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम और पारंपरिक भ्रांतियाँ

डॉ. शैलेश शुक्ला भारत आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। 2024 में भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ को पार कर गई है। यह एक ऐसी समस्या है जो देश के विकास, संसाधनों, पर्यावरण और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डालती है। एक तरफ जहाँ देश तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती आबादी उस तरक्की को खा जा रही है। सड़कों पर भीड़, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों में जगह की कमी और बेरोजगारी — ये सब बढ़ती जनसंख्या के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। इस लेख में हम बढ़ती जनसंख्या से होने वाले नुकसानों को समझेंगे और उन पारंपरिक विचारधाराओं का खंडन करेंगे जो अधिक संतान पैदा करने को प्रेरित करती हैं। भारतीय समाचार विश्लेषण बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम : गरीबी और भुखमरी : लेख लेखन कार्यशाला जब किसी परिवार में कमाने वाला एक होता है और खाने वाले दस, तो गरीबी अपने आप आ जाती है। यही बात पूरे देश पर लागू होती है। भारत में उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से आबादी बढ़ रही है। नतीजा यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय कम रह जाती है। करोड़ों लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं। गरीबी का सीधा संबंध अधिक जनसंख्या से है। बेरोजगारी : हर साल लाखों युवा पढ़-लिखकर नौकरी ढूँढने निकलते हैं, लेकिन नौकरियाँ उतनी तेजी से नहीं बढ़तीं जितनी तेजी से लोग बढ़ रहे हैं। एक सरकारी पद के लिए लाखों आवेदन आते हैं। इससे निराशा, अपराध और सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है। अगर जनसंख्या नियंत्रित होती तो हर हाथ को काम मिलना आसान होता। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ : सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में 60-70 बच्चे बैठते हैं, जहाँ शिक्षक का ध्यान हर बच्चे पर देना असंभव हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की इतनी भीड़ होती है कि डॉक्टर को एक मरीज को देखने के लिए मुश्किल से दो मिनट मिलते हैं। बढ़ती आबादी के कारण सरकार चाहकर भी हर व्यक्ति तक अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुँचा पाती। पर्यावरण का विनाश : ज्यादा लोग यानी ज्यादा जमीन की जरूरत, ज्यादा पानी की खपत, ज्यादा प्रदूषण और ज्यादा कचरा। जंगल काटकर बस्तियाँ बसाई जा रही हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों को साफ पानी और स्वच्छ हवा भी नसीब नहीं होगी। आवास और शहरीकरण की समस्या : शहरों में जगह कम पड़ रही है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग तंग और अस्वच्छ जगहों पर रहने को मजबूर हैं। ट्रैफिक जाम, पानी की कमी और बिजली की समस्या — ये सब अधिक जनसंख्या का ही नतीजा है। अपराध और सामाजिक अशांति : जब लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो अपराध बढ़ता है। भूख, बेरोजगारी और निराशा लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती है। अधिक जनसंख्या वाले इलाकों में चोरी, लूट और हिंसा की घटनाएँ ज्यादा देखी जाती हैं। पारंपरिक भ्रांतियाँ और उनका खंडन : हमारे समाज में कई ऐसी पुरानी मान्यताएँ प्रचलित हैं जो लोगों को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन मान्यताओं की जड़ें धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में हैं। आइए इन भ्रांतियों को एक-एक करके समझें और उनका तर्कपूर्ण खंडन करें। भ्रांति 1 : संतान से मोक्ष मिलता है : यह सबसे प्रचलित मान्यता है कि पुत्र के बिना मोक्ष नहीं मिलता। कहा जाता है कि पुत्र पिंडदान करेगा तो पूर्वज मुक्त होंगे। इस मान्यता के कारण लोग बेटे की चाह में कई संतानें पैदा करते रहते हैं। खंडन : अगर हम धर्मग्रंथों को गहराई से पढ़ें तो मोक्ष कर्म, ज्ञान और भक्ति से मिलता है, संतान की संख्या से नहीं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग निष्काम कर्म और आत्मज्ञान है। कोई भी धर्मग्रंथ यह नहीं कहता कि जिसके ज्यादा बच्चे होंगे, उसे ज्यादा पुण्य मिलेगा। मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण, सदाचार और आध्यात्मिक साधना पर निर्भर करता है। अगर संतान से ही मोक्ष मिलता तो संन्यासियों, साधुओं और ऋषि-मुनियों को मोक्ष कैसे प्राप्त होता? शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद — इन सबने संतान नहीं उत्पन्न की, फिर भी ये महापुरुष माने गए। भ्रांति 2 : बेटा जरूरी है, बेटी से काम नहीं चलता : समाज में यह धारणा गहरी जड़ें जमाए बैठी है कि बेटा वंश आगे बढ़ाता है, बुढ़ापे का सहारा बनता है और अंतिम संस्कार करता है। इसलिए लोग बेटे की चाह में बच्चे पैदा करते रहते हैं। खंडन : आज के समय में बेटियाँ हर क्षेत्र में बेटों से आगे निकल रही हैं। चाहे सेना हो, अंतरिक्ष हो, खेल हो या प्रशासन — बेटियाँ हर जगह अपना परचम लहरा रही हैं। कई बेटियाँ अपने माता-पिता की बुढ़ापे में बेटों से बेहतर देखभाल करती हैं। रही बात अंतिम संस्कार की, तो आज कानूनी रूप से बेटी को भी यह अधिकार प्राप्त है। जो लोग बेटे की चाह में पाँच-छह बेटियाँ पैदा कर देते हैं, वे न उन बेटियों को अच्छी शिक्षा दे पाते हैं, न अच्छा जीवन। यह कोई समझदारी नहीं, बल्कि मूर्खता है। भ्रांति 3 : ज्यादा बच्चे यानी बुढ़ापे का सहारा : कई लोग सोचते हैं कि जितने ज्यादा बच्चे होंगे, बुढ़ापे में उतना ज्यादा सहारा मिलेगा। उनका मानना है कि एक-दो बच्चे हुए तो कौन देखभाल करेगा। खंडन : सच्चाई यह है कि आज के समय में ज्यादा बच्चे होने का मतलब ज्यादा सहारा नहीं बल्कि ज्यादा खर्चा और ज्यादा चिंता है। अगर आप दो बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं, उन्हें संस्कारवान बनाते हैं तो वे दो बच्चे दस बच्चों से बेहतर देखभाल करेंगे। दूसरी तरफ, अगर पाँच-छह बच्चे हों और किसी को भी अच्छी शिक्षा या संस्कार न मिले, तो वे सब मिलकर भी बुढ़ापे में सहारा नहीं बन पाएँगे। आज वृद्धाश्रमों में ऐसे बहुत से बुजुर्ग हैं जिनके चार-पाँच बच्चे हैं, लेकिन कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं।
Ola-Hero को टक्कर देने आ रहे VinFast के नए ई-स्कूटर, लॉन्च की तैयारी पूरी

नई दिल्ली। वियतनाम की ऑटो कंपनी VinFast अब भारतीय इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार में कदम रखने जा रही है। कंपनी ने पुष्टि की है कि वह अपने तीन इलेक्ट्रिक स्कूटर Evo, Feliz और Viper को भारत में लॉन्च करेगी। ऑटोकार की रिपोर्ट के अनुसार, इन स्कूटर्स को भारतीय सड़कों और उपयोग के हिसाब से तैयार किया जाएगा, ताकि लोकल कंडीशंस में बेहतर परफॉर्मेंस मिल सके।भारत में ऐसे होगी एंट्री शुरुआती चरण में ये स्कूटर CKD यूनिट्स के रूप में भारत लाए जाएंगे और तमिलनाडु स्थित प्लांट में असेंबल किए जाएंगे। कंपनी ने राज्य सरकार के साथ MoU साइन किया है, जिसके तहत थूथुकुडी के SIPCOT इंडस्ट्रियल पार्क में लगभग 200 हेक्टेयर जमीन पर अपनी सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। भारतीय बाजार में इनका सीधा मुकाबला TVS iQube, Bajaj Chetak, Ola S1, Ather Rizta और Hero Vida जैसे इलेक्ट्रिक स्कूटर्स से होगा। VinFast स्कूटर्स के फीचर्स Viper इस नई लाइनअप का सबसे प्रीमियम मॉडल होगा, जिसमें एडवांस डिजाइन और नई टेक्नोलॉजी दी जाएगी। इसमें LED प्रोजेक्टर हेडलैंप, स्मार्ट-की सिस्टम, व्हीकल ट्रैकिंग, रिमोट सर्च और एंटी-थेफ्ट फीचर्स मिलेंगे। इसमें 3,000W BLDC इन-हब मोटर दी गई है, जो इसे 70 किमी/घंटा की टॉप स्पीड तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। Feliz भी लगभग इसी परफॉर्मेंस के साथ आएगा, जबकि Evo में 2,450W इन-हब मोटर दी जाएगी। ये दोनों मॉडल भी 70 किमी/घंटा की टॉप स्पीड हासिल कर सकते हैं। वहीं, Evo Lite वर्जन की स्पीड 50 किमी/घंटा से कम रखी गई है, जिससे इसे बिना ड्राइविंग लाइसेंस के चलाया जा सकता है। बैटरी और रेंज इन सभी स्कूटर्स में बैटरी स्वैप टेक्नोलॉजी दी जाएगी। सीट के नीचे दो बैटरी स्लॉट होंगे, जिनमें 1.5 kWh की LFP बैटरियां लगेंगी। दोनों बैटरियों के फुल चार्ज होने पर Evo करीब 165 किमी तक चल सकता है, जबकि Viper और Feliz लगभग 156 किमी की रेंज देने में सक्षम होंगे। खबरों के मुताबिक, कंपनी ने Evo सीरीज के लिए एडवांस बुकिंग भी शुरू कर दी है, जिससे शुरुआती ग्राहकों को खास लाभ मिलने की संभावना है।
नवरात्रि का अंतिम दिन: मां सिद्धिदात्री की महिमा और कथा से मिलेगा सुख समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद

नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी पर मां सिद्धिदात्री पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के नौवें और पूर्ण स्वरूप की आराधना का होता है, जिसे सिद्धियों की दात्री कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिवत पूजा के बाद उनकी कथा का पाठ करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं। कहा जाता है कि शिवने भी मां की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अष्टसिद्धियां प्रदान कीं। यही कारण है कि भगवान शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर कहलाता है, जिसमें वे आधे शिव और आधी शक्ति के रूप में विराजमान हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब असुरों का अत्याचार बढ़ गया और देवता परेशान हो उठे, तब सभी देवताओं ने विष्णुऔर भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। इसके बाद सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसे मां सिद्धिदात्री कहा गया। यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और कल्याणकारी माना जाता है, जो भक्तों के जीवन से भय और बाधाओं को दूर करता है। ऐसी मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की आराधना के बिना किसी भी देवी-देवता की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। देवी हिमालय के शिखर पर विराजमान होकर समस्त सिद्धियों की रक्षा करती हैं और अपने भक्तों को ज्ञान, बुद्धि, स्वास्थ्य और धन का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। महानवमी के दिन भक्त पूरे श्रद्धा भाव से मां की पूजा करते हैं, कथा सुनते और पढ़ते हैं तथा अंत में आरती कर भोग अर्पित करते हैं। पूजा के समापन पर मां से क्षमा याचना करना भी अत्यंत आवश्यक माना गया है। भक्त विनम्र भाव से प्रार्थना करते हैं कि पूजा में हुई किसी भी त्रुटि को मां क्षमा करें और अपने आशीर्वाद से जीवन को सुखमय बनाएं। यह पावन दिन हमें यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से जीवन की हर बाधा दूर की जा सकती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की कथा और पूजा से न केवल आध्यात्मिक बल मिलता है बल्कि जीवन में सफलता और संतुलन भी प्राप्त होता है।
AI तकनीक से प्रभावित 5-Star AC की कीमत, जानें कंपनी ने क्या कहा

नई दिल्ली। आज का दौर टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का है। अब AI सिर्फ इंसान की जिंदगी को आसान नहीं बना रहा, बल्कि घर में इस्तेमाल होने वाले सामान—जैसे AC, TV, वैक्यूम क्लीनर—को भी स्मार्ट बना रहा है। AI की मदद से ये प्रोडक्ट पावर सेविंग, बेहतर कूलिंग और यूजर के बिहेवियर को समझकर खुद एडजस्ट होने लगे हैं। हाइसेंस ग्रुप इंडिया के सीईओ पंकज राणा ने बताया कि आने वाले समय में AI होम एप्लायंसेस की हर कैटेगरी में नजर आएगा। उन्होंने कहा कि हाइसेंस के अधिकांश टीवी में AI पहले से मौजूद है, जिससे यूजर को बेहतर विजुअल और ऑडियो एक्सपीरियंस मिलता है। AC में AI का कमालपंकज राणा के मुताबिक, AC में AI यूजर के व्यवहार को समझकर कूलिंग अपने आप एडजस्ट करता है। इसमें वॉयस कंट्रोल और पावर सेविंग फीचर्स भी शामिल हैं। भारतीय गर्मी के हिसाब से ये फीचर्स 20–30 प्रतिशत तक एनर्जी की बचत कर सकते हैं। इसका मतलब है कि बिजली का बिल कम आएगा और AC की स्मार्ट परफॉर्मेंस भी बढ़ेगी। ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग में AIAI सिर्फ प्रोडक्ट को स्मार्ट बनाने तक सीमित नहीं है। यह ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग में भी मदद करता है। दुनिया भर में जीरो कार्बन फैक्ट्रियों में AI बेस्ड प्रोसेस का इस्तेमाल होता है। हाइसेंस ने भारत में मेक इन इंडिया के तहत लोकल असेंबली और ग्रीन सप्लाई चेन की शुरुआत की है। इससे एफिशिएंट प्रोडक्ट बनेंगे और इंपोर्ट पर निर्भरता कम होगी। कॉपर की बढ़ती कीमत का असरAC, TV और रेफ्रिजरेटर में कॉपर का इस्तेमाल ज्यादा होता है। AC में 100 प्रतिशत कॉपर ट्यूबिंग होती है, जिससे बेहतर हीट ट्रांसफर, मजबूती और लंबी लाइफ मिलती है। कॉपर की बढ़ती कीमतों की वजह से 5 स्टार AC की कीमत 7–8 प्रतिशत और 3 स्टार AC की कीमत 2–4 प्रतिशत बढ़ जाएगी। लोकल प्रोडक्शन और आसान सर्विसिंगहाइसेंस ने आंध्र प्रदेश के श्री सिटी में नए प्लांट में पायलट प्रोडक्शन शुरू किया है। इसमें लोकल कंपोनेंट्स का इस्तेमाल बढ़ेगा, सप्लाई चेन आसान होगी और डिलीवरी तेज होगी। साथ ही, स्क्रू फ्री प्लास्टिक लॉक डिजाइन से सर्विसिंग आसान होगी। नई AC रेंज2026 से लागू नए स्टैंडर्ड के अनुसार हाइसेंस ने AC का प्रोडक्शन शुरू किया है। नई रेंज में 1 टन, 1.5 टन और 2 टन कैपेसिटी के 10–12 मॉडल होंगे। इसमें 3 स्टार और 5 स्टार दोनों रेटिंग उपलब्ध हैं। इन्वर्टर टेक्नोलॉजी के जरिए बेहतर कूलिंग, कम आवाज और ज्यादा एनर्जी एफिशिएंसी मिलेगी।
शेयर बाजार में हाहाकार: सेंसेक्स 1700 अंक लुढ़का, निवेशकों के 9 लाख करोड़ डूबे

नई दिल्ली। दो दिनों की तेजी के बाद शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई। लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप सभी सेगमेंट में भारी बिकवाली देखने को मिली। बीएसई सेंसेक्स 1690 अंक यानी 2.25% गिरकर 73,583 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 486 अंक या 2.09% टूटकर 22,819 पर आ गया। वहीं, निफ्टी बैंक 1433 अंक गिरकर 52,274 पर क्लोज हुआ। इस गिरावट की बड़ी वजह ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव माना जा रहा है। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के तेल ठिकानों पर 10 दिनों तक हमला न करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की समयसीमा 6 अप्रैल तक बढ़ाने की घोषणा की है, फिर भी बाजार में नकारात्मक असर बना हुआ है।टॉप शेयरों में बड़ी गिरावट बीएसई के टॉप 30 शेयरों में एयरटेल, टीसीएस और पावरग्रिड को छोड़कर बाकी 27 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। सबसे ज्यादा दबाव रिलायंस इंडस्ट्रीज पर रहा, जिसके शेयर 4.60% गिरकर 1347 रुपये पर आ गए। इसके अलावा इंडिगो, बजाज फाइनेंस और एसबीआई में करीब 4% की गिरावट देखने को मिली, जबकि अन्य कई शेयर 2% से अधिक टूटे। निवेशकों को भारी नुकसान बुधवार को बीएसई का मार्केट कैप 431 लाख करोड़ रुपये था, जो अब घटकर 422 लाख करोड़ रुपये रह गया है। इस तरह निवेशकों को करीब 9 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। गिरावट के प्रमुख कारण मुनाफावसूली का दबाव: पिछले दो सत्रों में करीब 3.5% की तेजी के बाद निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी। आईटी सेक्टर को छोड़कर लगभग सभी सेक्टरों में गिरावट रही। स्मॉल और मिडकैप शेयरों में करीब 1.7% की गिरावट आई। बजाज फाइनेंस, बजाज फिनसर्व, एसबीआई, एक्सिस बैंक और एचडीएफसी लाइफ के शेयर 1-3% तक गिरे, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सबसे ज्यादा दबाव बनाया। जियो-पॉलिटिकल तनाव: ईरान और अमेरिका के बीच स्थिति सामान्य नहीं हो पा रही है। ट्रंप के बयान के बावजूद बाजार इस अनिश्चितता को नकारात्मक रूप में ले रहा है, जिसका असर वैश्विक बाजारों पर भी दिखा। कच्चे तेल की कीमतें: शुक्रवार को कच्चा तेल 109 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जिससे भारतीय बाजार पर दबाव और बढ़ गया। रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर: भारतीय रुपया 94 प्रति डॉलर के पार चला गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। मिडिल ईस्ट में संभावित ऊर्जा संकट को लेकर चिंता ने आयात-आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा दिया है।VIX में उछाल: बाजार की अस्थिरता को दर्शाने वाला इंडिया VIX करीब 9% बढ़कर 28 पर पहुंच गया, जो निकट भविष्य में और गिरावट की आशंका को दर्शाता है।
अष्टसिद्धियों का दिव्य ज्ञान: महानवमी पर जानें 8 शक्तियां और सूर्य पुत्री से हनुमान विवाह का रहस्य

नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी आराधना करता है, उसे जीवन में सुख समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। मां सिद्धिदात्री को सभी प्रकार की सिद्धियों की दात्री कहा गया है और वे अपने भक्तों को अष्टसिद्धियां प्रदान करती हैं। धार्मिक ग्रंथों विशेष रूप से मार्कण्डेय पुराण में इन आठ सिद्धियों का वर्णन मिलता है। ये सिद्धियां केवल अलौकिक शक्तियां नहीं बल्कि साधक के आत्मिक विकास और जीवन की उन्नति का प्रतीक मानी जाती हैं। अष्टसिद्धियों के नाम और अर्थ अणिमा – स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म बना लेने की शक्तिमहिमा – शरीर को अत्यंत विशाल रूप में विस्तार करने की क्षमतागरिमा – शरीर को अत्यधिक भारी बना लेनालघिमा – स्वयं को अत्यंत हल्का कर लेनाप्राप्ति – इच्छित स्थान या वस्तु को प्राप्त करने की शक्तिप्राकाम्य – मनचाही इच्छा को पूर्ण करने की क्षमताईशित्व – समस्त जगत पर प्रभुत्व की शक्तिवशित्व – दूसरों को अपने नियंत्रण में करने की क्षमता इन सिद्धियों को पाने वाला साधक जीवन में सफलता और संतुलन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा को अत्यंत फलदायी माना गया है। इसी संदर्भ में हनुमान जी से जुड़ी एक रोचक कथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार हनुमान जी ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए सूर्य देव को गुरु बनाया था। सूर्यदेव ने उन्हें न केवल समस्त ज्ञान दिया बल्कि अपना तेज भी प्रदान किया। कथा के अनुसार सूर्यदेव ने हनुमान जी को बताया कि वे अष्टसिद्धियां केवल एक गृहस्थ को ही प्रदान कर सकते हैं। ऐसे में हनुमान जी को उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह करना पड़ा ताकि वे पूर्ण ज्ञान और सिद्धियां प्राप्त कर सकें। हालांकि यह विवाह केवल एक आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक रूप में माना जाता है। इसके अलावा मान्यता यह भी है कि हनुमान जी को अष्टसिद्धि और नव निधि का वरदान Sita माता से प्राप्त हुआ था, जिसका उल्लेख हनुमान चालीसा में भी मिलता है। महानवमी का यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति और साधना से व्यक्ति अपने भीतर की शक्तियों को जागृत कर सकता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
भारत में अदाणी पोर्ट्स का नया कदम: पोर्ट ऑफ रिफ्यूज शुरू, समुद्री सुरक्षा मजबूत

नई दिल्ली। भारत ने अब तक लंबे समय से महसूस की जा रही समुद्री आपातकालीन क्षमता की कमी को दूर करते हुए पहला पोर्ट ऑफ रिफ्यूज (POR) शुरू कर दिया है। इस पहल से संकट में फंसे जहाजों को सुरक्षित आश्रय मिलेगा और जीवन, माल और तटीय पर्यावरण की सुरक्षा मजबूत होगी। यह कदम अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) द्वारा उठाया गया है और इसे एसएमआईटी साल्वेज, रॉयल बोस्कालिस वेस्टमिंस्टर एनवी और समुद्री आपातकालीन प्रतिक्रिया केंद्र (MERC) के सहयोग से संचालित किया जाएगा। पोर्ट ऑफ रिफ्यूज का महत्वअंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन के अनुसार, पोर्ट ऑफ रिफ्यूज वह स्थान होता है जहां जहाज संकट की स्थिति में स्थिर होकर जीवन बचाने, माल की सुरक्षा करने और पर्यावरणीय नुकसान कम करने के लिए आश्रय ले सकते हैं। विश्व की प्रमुख समुद्री अर्थव्यवस्थाओं में यह सुविधा आम है, लेकिन भारत ने अब तक औपचारिक रूप से ऐसा कोई ढांचा स्थापित नहीं किया था। भारत की तटरेखा और वैश्विक शिपिंग मार्गों पर असरAPSEZ भारत की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती एकीकृत परिवहन कंपनी है, जो देश के बंदरगाह कार्गो वॉल्यूम का लगभग 27 प्रतिशत संभालती है। CEO अश्वनी गुप्ता ने कहा, “समर्पित POR स्थापित करके हम भारत की समुद्री तैयारियों को अपग्रेड कर रहे हैं और विश्व स्तरीय तटीय सुरक्षा के लिए नया मानदंड स्थापित कर रहे हैं। यह कदम जीवन और समुद्री अर्थव्यवस्था की सुरक्षा में महत्वपूर्ण है।” दो प्रमुख बंदरगाह होंगे POR के रूप मेंAPSEZ ने दो स्थलों को पोर्ट ऑफ रिफ्यूज के रूप में नामित किया है: दिघी बंदरगाह (पश्चिमी तट): अरब सागर और फारस की खाड़ी की ओर जाने वाले मार्गों पर यातायात को सुविधा देगा।गोपालपुर बंदरगाह (पूर्वी तट): बंगाल की खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य की ओर जाने वाले मार्गों पर जहाजों को सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इन पोर्ट्स में विशेष उपकरण और प्रशिक्षित प्रतिक्रिया टीमें होंगी जो बचाव, जहाज मलबा हटाने, अग्निशमन, प्रदूषण नियंत्रण और आपातकालीन समन्वय जैसी सेवाएं प्रदान करेंगी। विशेषज्ञों की टिप्पणियांशिपिंग के डायरेक्टर जनरल श्याम जगन्नाथन ने कहा, “मानकीकृत POR फ्रेमवर्क से समुद्री दुर्घटनाओं के दौरान अधिक समन्वित और समयबद्ध कार्रवाई संभव होगी। इससे जीवन, माल और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।”एसएमआईटी साल्वेज के MD रिचर्ड जानसेन ने कहा, “किसी दुर्घटनाग्रस्त जहाज को पोर्ट ऑफ रिफ्यूज प्रदान करना बचाव अभियान में बेहद महत्वपूर्ण है। भारत के प्रमुख शिपिंग मार्गों पर तेज़, सुरक्षित और समन्वित आपातकालीन प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता है।” वैश्विक मानक और सुरक्षायह पहल अंतरराष्ट्रीय समुद्री सम्मेलनों के अनुरूप है और सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक शिपिंग कॉरिडोर में भारत की भूमिका को मजबूत करती है। इससे भारत समुद्री सुरक्षा, आपातकालीन प्रतिक्रिया और पर्यावरणीय प्रबंधन के वैश्विक मानकों के अनुरूप कदम बढ़ा रहा है।
बैडमिंटन तुम्हें याद करेगा और मैं भी': पीवी सिंधु ने कैरोलिना मारिन को भावुक संदेश दिया

नई दिल्ली। खेल के मैदान पर प्रतिद्वंद्विता हो या प्रतिस्पर्धा, लेकिन खिलाड़ियों के बीच दोस्ती और सम्मान का रिश्ता भी गहरा होता है। ऐसा ही भाव भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने स्पेन की दिग्गज खिलाड़ी कैरोलिना मारिन के लिए जताया, जिन्होंने चोटों के कारण पेशेवर बैडमिंटन से संन्यास की घोषणा की। कोर्ट पर प्रतिद्वंद्विता, कोर्ट के बाहर दोस्तीपीवी सिंधु ने गुरुवार को एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए कहा, “कुछ प्रतिद्वंद्वी हमेशा के लिए आपकी यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं। कैरोलिना उनमें से एक थीं। हमने पहली बार 15-16 साल की उम्र में मालदीव में एक-दूसरे के खिलाफ खेला, और उसके बाद कई मुकाबले खेले।”पीवी सिंधु ने गुरुवार को एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए कहा, “कुछ प्रतिद्वंद्वी हमेशा के लिए आपकी यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं। कैरोलिना उनमें से एक थीं। हमने पहली बार 15-16 साल की उम्र में मालदीव में एक-दूसरे के खिलाफ खेला, और उसके बाद कई मुकाबले खेले।” सिंधु ने मारिन की खेल भावना और कौशल की सराहना करते हुए लिखा, “तुम कोर्ट पर एक बड़ा सिरदर्द भी थीं। लगातार चिल्लाना, जोरदार तेवर, छोटी-छोटी चालें—ये सब किसी को भी परेशान कर सकती थीं। लेकिन तुम्हारा कौशल, गति और लड़ने की भावना बेजोड़ थी।” यादें और सम्मानसिंधु ने 2023 डेनमार्क ओपन के सेमीफाइनल के दौरान हुई ज़ुबानी बहस का भी जिक्र किया, जिसके चलते दोनों को पीला कार्ड मिला था। सिंधु ने लिखा, “उस दिन मैं गुस्से में थी, लेकिन कुछ महीनों बाद हम मैड्रिड में कॉफी पीते हुए हंस रहे थे। उस पल हमारे बीच सिर्फ सम्मान था। कैरोलिना का यही रूप मुझे हमेशा याद रहेगा।” दोस्ती और पीढ़ी का समर्थनपीवी सिंधु ने इस पोस्ट में बताया कि उनकी पीढ़ी के खिलाड़ियों के बीच बनी दोस्ती और महिला एकल मुकाबलों की खास जगह ने उनके खेल को और भी खास बना दिया। उन्होंने कहा, “हमारी लड़कियों की ग्रुप ने महिला एकल को मुकाबले के लिए एक बहुत ही खास जगह बना दिया। मैं इस दोस्ती के लिए हमेशा शुक्रगुजार रहूंगी।” संन्यास पर भावुक संदेशसिंधु ने मारिन के संन्यास पर लिखा, “हर मुकाबले, हर सीख और हमारी दोस्ती के लिए धन्यवाद। कैरोलिना, मैं तुम्हारे रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के लिए ढेर सारी खुशियों की शुभकामनाएं देती हूं। बैडमिंटन तुम्हें बहुत याद करेगा, और मैं भी।” कैरोलिना मारिन की उपलब्धियांस्पेन की दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी कैरोलिना मारिन रियो ओलंपिक 2016 की स्वर्ण पदक विजेता और तीन बार की विश्व चैंपियन रही हैं। उन्होंने कई यूरोपियन चैम्पियनशिप भी जीती हैं। मारिन ने रियो ओलंपिक के फाइनल में पीवी सिंधु को हराकर गोल्ड मेडल जीता था। इस बार चोटों की वजह से पेशेवर बैडमिंटन से संन्यास लेने का निर्णय लिया। सार: पीवी सिंधु ने कैरोलिना मारिन को भावुक संदेश भेजते हुए उनके संन्यास पर सम्मान और दोस्ती जताई। कोर्ट पर भले ही दोनों प्रतिद्वंद्वी थीं, लेकिन मैदान के बाहर उनके बीच दोस्ती, सम्मान और साझा यादें हमेशा बनी रहेंगी। मारिन की उपलब्धियां और उनका खेल भारतीय और वैश्विक बैडमिंटन के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।
आर्चरी एशिया कप: कंपाउंड तीरंदाजों का जलवा, भारत ने जीते 10 पदक

नई दिल्ली। आर्चरी एशिया कप में भारत के कंपाउंड और रिकर्व तीरंदाजों ने शानदार प्रदर्शन कर देश का गौरव बढ़ाया। शुक्रवार को समाप्त हुए मुकाबलों में भारतीय तीरंदाजों ने कुल 10 पदक: दो गोल्ड, चार सिल्वर और चार ब्रॉन्ज अपने नाम किए। इस प्रतियोगिता में पुरुष और महिला व्यक्तिगत इवेंट, टीम इवेंट और मिक्स्ड टीम मुकाबलों में भारत का दबदबा देखने को मिला। पुरुषों के कंपाउंड इवेंट में क्लीन स्वीपपुरुष व्यक्तिगत कंपाउंड फाइनल में उदय कंबोज ने एशियन गेम्स के मेडलिस्ट प्रथमेश जवकर को 145-144 से हराकर गोल्ड मेडल जीता। वहीं रजत चौहान ने थाईलैंड के पीरावत रत्नापोंगकियात को भी 145-144 से मात देकर भारत के लिए क्लीन स्वीप पूरा किया। इस शानदार प्रदर्शन ने भारतीय आर्चरी की ताकत को पूरी दुनिया के सामने रखा। महिला कंपाउंड टीम और व्यक्तिगत उपलब्धियांमहिला व्यक्तिगत कंपाउंड इवेंट में तेजल साल्वे ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर मारिया डिमिडियुक को 144-135 से हराया। टीम इवेंट में भी भारतीय तीरंदाजों ने दमदार प्रदर्शन किया। कंपाउंड मिक्स्ड टीम में भारत की जोड़ी चिकिता तनिपार्थी और रजत चौहान ने कड़े मुकाबले में मलेशिया की टीम को 158-156 से हराकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया। महिला कंपाउंड टीम: चिकिता तनिपार्थी, राज कौर और तेजल साल्वे ने फाइनल में कजाकिस्तान से 229-227 से हारकर सिल्वर मेडल से संतोष किया। रिकर्व इवेंट में भारत की मजबूत उपस्थितिरिकर्व इवेंट में भी भारतीय तीरंदाजों ने अपना दबदबा दिखाया। महिला व्यक्तिगत फाइनल में रिधि को मंगोलिया की ओयुन-एर्डेन बासांडोर्ज ने 6-2 से हराया। पुरुषों की रिकर्व टीम: देवांग गुप्ता, सुखचैन सिंह और जुएल सिंह को फाइनल में कजाकिस्तान के हाथों 5-4 से करीबी हार का सामना करना पड़ा और उन्हें सिल्वर पदक से संतोष करना पड़ा। महिला रिकर्व टीम: रूमा बिस्वास, कीर्ति और रिधि ने मलेशिया को 5-1 से हराकर कांस्य पदक अपने नाम किया। पुरुष कंपाउंड टीम: रजत चौहान, उदय कंबोज और ऋषभ यादव ने प्लेऑफ में भूटान को 234-232 से मात देकर जीत दर्ज की।