WOMEN RATION PROTEST : राशन के लिए सड़कों पर उतरी महिलाएं; शिवपुरी कलेक्ट्रेट पर किया जोरदार प्रदर्शन

HIGHLIGHTS: राशन न मिलने पर महिलाओं का कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन वार्ड 30 और 32 के लोग लंबे समय से परेशान घोटाले के बाद बदली व्यवस्था भी फेल सेल्समैन पर अभद्रता और राशन न देने के आरोप प्रशासन से जल्द समाधान की मांग WOMEN RATION PROTEST : ग्वालियर। शिवपुरी में मंगलवार को वार्ड क्रमांक 30 और 32 की महिलाएं राशन न मिलने से परेशान होकर कलेक्ट्रेट पहुंचीं, जहां उन्होंने प्रदर्शन करते हुए प्रशासन से जल्द खाद्यान्न वितरण की मांग की। पार्षद कमलकिशन शाक्य के नेतृत्व में पहुंचीं महिलाओं ने अपनी समस्या अधिकारियों के सामने रखी, लेकिन लंबे समय से समाधान न मिलने पर नाराजगी जाहिर की। भारत में 2025 में डेटा का क्रेज़, प्रति यूजर औसत मासिक खपत 31GB से अधिक वितरण व्यवस्था पर उठे सवाल पार्षद कमलकिशन शाक्य ने आरोप लगाया कि पिछले एक साल से वार्ड के लोगों को राशन के लिए भटकना पड़ रहा है। पहले वार्ड 30 के लोगों को वार्ड 32 की दुकान से राशन मिलता था, लेकिन नई व्यवस्था के बाद स्थिति और खराब हो गई है। दुकान पर महीने में केवल तीन दिन ही वितरण होने से मजदूर वर्ग को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। PSL में पाकिस्तान क्रिकेट पर कलंक, फखर जमान को बॉल टैंपरिंग पर 2 मैच का बैन घोटाले के बाद बदली व्यवस्था दरअसल, वार्ड 32 की दुकान पर करीब 250 क्विंटल अनाज के गबन का मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने दुकान बंद कर दी थी और हितग्राहियों को वार्ड 34 की दुकान से राशन लेने के निर्देश दिए थे। लेकिन नई व्यवस्था भी सुचारू रूप से लागू नहीं हो पाई। इंडिगो का नया CEO, विलियम वॉल्श लेंगे कमान संभालने का जिम्मा सेल्समैन पर गंभीर आरोप पार्षद ने आरोप लगाया कि वार्ड 34 की दुकान के सेल्समैन सुनील राठौर राशन देने में आनाकानी कर रहे हैं और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार भी कर रहे हैं। प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने दावा किया कि राशन मांगने पर उनके कार्ड फेंक दिए गए और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। Punjab & Sind Bank में 1000 LBO पदों पर बंपर भर्ती, आज से आवेदन शुरू प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग पार्षद का कहना है कि घोटाले के दोषियों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इसका खामियाजा गरीब परिवारों को नहीं भुगतना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से सभी पात्र हितग्राहियों को जल्द राशन उपलब्ध कराने की मांग की है।
global trade risk : वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा: बाब-अल-मंदेब पर संकट, भारतीय नौसेना सतर्क

global trade risk : नई दिल्ली । नई दिल्ली में वेस्ट एशिया का बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी टकराव में अब हूती विद्रोही भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है। हूतियों द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमलों ने इस संघर्ष को और व्यापक बना दिया है। पहले ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के बाधित होने की आशंका से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, और अब स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब पर भी संकट गहराने की संभावना जताई जा रही है। यह अहम समुद्री मार्ग रेड सी और अदन की खाड़ी को जोड़ता है और दुनिया के करीब 12 प्रतिशत व्यापार का रास्ता है। इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना पूरी तरह अलर्ट मोड में है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत तैनात किए गए हैं। एंटी-पायरेसी मिशन के तहत पहले से मौजूद निगरानी को अब और मजबूत किया गया है। भारतीय नौसेना इस समय कच्चे तेल और एलपीजी ले जाने वाले भारतीय टैंकरों को एस्कॉर्ट कर रही है ताकि उन्हें किसी भी संभावित खतरे से सुरक्षित रखा जा सके। आवश्यकता पड़ने पर भारतीय ध्वज वाले जहाजों को अतिरिक्त सुरक्षा देने की भी तैयारी है। हालांकि अभी तक हूती विद्रोहियों ने रेड सी में किसी बड़े जहाज को निशाना नहीं बनाया है, लेकिन हालात तेजी से बदल सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञ संजय कुलकर्णी का मानना है कि ईरान पर बढ़ते दबाव के चलते हूती इस रणनीतिक मार्ग को ‘वेपोनाइज’ कर सकते हैं, यानी इसे दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। महंगाई बढ़ सकती है, उर्वरकों की कीमतों में इजाफा हो सकता है और निर्यात प्रभावित हो सकता है। जिबूती जैसे रणनीतिक स्थानों पर अमेरिका, चीन, जापान और फ्रांस की सैन्य मौजूदगी के कारण इस क्षेत्र को पूरी तरह बाधित करना आसान नहीं है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला भी नहीं है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा है। एक प्रमुख मार्ग फारस की खाड़ी से होकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, ओमान की खाड़ी और अरब सागर तक जाता है, जबकि दूसरा मार्ग स्वेज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी के जरिए अरब सागर से जुड़ता है। यदि ये दोनों मार्ग प्रभावित होते हैं, तो जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों में भारी बढ़ोतरी होगी। भारत के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई, रूस और अमेरिका से आता है। कुल मिलाकर, वेस्ट एशिया में बढ़ता यह संघर्ष अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
fuel price hike : मध्य पूर्व तनाव का असर: अमेरिका और UAE में पेट्रोल-डीजल के दाम 72% तक बढ़े

fuel price hike : नई दिल्ली मध्य पूर्व में बढ़ते राजनीतिक तनाव का असर पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है। इस संघर्ष ने खासतौर पर तेल बाजार को हिला दिया है, जिससे अमेरिका और खाड़ी देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 30 से 72 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। अमेरिका में गैसोलीन और डीजल महंगे अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन (लगभग 380 रुपए) के पार चली गई हैं। यह बीते तीन वर्षों में पहला मौका है जब अमेरिकी उपभोक्ताओं को इतने महंगे दाम चुकाने पड़ रहे हैं। अमेरिकी मीडिया के अनुसार, देश में औसत गैसोलीन की कीमत 4.018 डॉलर प्रति गैलन हो गई है। डीजल की कीमतों में भी तेजी देखी गई है। डीजल अब 5 डॉलर प्रति गैलन (करीब 475 रुपए) के पार बिक रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर संभावित हमलों और मध्य पूर्व में तनाव के कारण गैसोलीन और डीजल की कीमतों में क्रमशः 30 और 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। खाड़ी देश यूएई में रिकार्ड बढ़ोतरी यूएई की फ्यूल प्राइस कमेटी ने 1 अप्रैल से लागू होने वाली नई कीमतों का ऐलान किया है। नए दामों के अनुसार: सुपर 98 पेट्रोल की कीमत 30% बढ़कर 3.39 दिरहम प्रति लीटर (लगभग 87 रुपए) हो गई है, जो पहले 2.59 दिरहम थी। स्पेशल 95 पेट्रोल का दाम 32% बढ़कर 3.28 दिरहम प्रति लीटर (लगभग 84 रुपए) हो गया है, जो पहले 2.48 दिरहम था। डीजल की कीमत में सबसे बड़ी बढ़ोतरी हुई, जो 72% बढ़कर 4.69 दिरहम प्रति लीटर (करीब 120 रुपए) पहुंच गई है, जबकि पहले यह 2.72 दिरहम थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यूएई में डीजल की यह सबसे तेज और रिकॉर्ड बढ़ोतरी है, जो घरेलू और वाणिज्यिक वाहनों के लिए महंगी होगी। कच्चे तेल की कीमत में उछाल मध्य पूर्व में तनाव और अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के चलते कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमत में जबरदस्त तेजी देखी गई है। पिछले एक महीने में ब्रेंट क्रूड के दाम 48 प्रतिशत बढ़कर 107.28 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गए हैं। इस उछाल का सीधा असर ग्लोबल फ्यूल प्राइस पर पड़ रहा है, जिससे उपभोक्ताओं की जेब पर दबाव बढ़ा है। वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव विश्लेषकों का कहना है कि इस बढ़ोतरी का असर केवल अमेरिका और यूएई तक सीमित नहीं है। यूरोप, एशिया और भारत सहित कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। उभरते देशों में तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति चिंता का कारण बन सकती है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता

– डॉ. प्रियंका सौरभभारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (2026) ऐसे समय में उभरकर सामने आया है, जब भारत एक ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी को विस्तार देने की दिशा में अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर अपनी कृषि-आधारित सामाजिक-आर्थिक संरचना की रक्षा करने की अनिवार्य चुनौती का सामना कर रहा है। फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम रूपरेखा ने जहां भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में नए अवसरों के द्वार खोले हैं, वहीं सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पादों के संभावित आयात ने देश के करोड़ों किसानों के बीच चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। इस संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह समझौता भारत को एक सशक्त वैश्विक कृषि निर्यातक के रूप में स्थापित करेगा या यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध ऐतिहासिक रूप से रणनीतिक और बहुआयामी रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच कृषि व्यापार में भारत को अधिशेष प्राप्त हुआ है, जो यह संकेत देता है कि भारतीय कृषि उत्पादों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता मौजूद है। प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों—जैसे मसाले, चाय, कॉफी, काजू, आम, पपीता और प्रसंस्कृत खाद्य—पर शुल्क में कमी या समाप्ति भारतीय निर्यात को प्रोत्साहित कर सकती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा अर्जन में वृद्धि होगी, बल्कि कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योग को भी बढ़ावा मिल सकता है। किन्तु इस समझौते का दूसरा पक्ष कहीं अधिक जटिल और संवेदनशील है। अमेरिका अपने किसानों को व्यापक सब्सिडी प्रदान करता है, जिससे उसके कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं। यदि ऐसे उत्पाद—जैसे DDGS, सोयाबीन तेल और ज्वार—भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर प्रवेश करते हैं, तो घरेलू किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जो पहले से ही आय संकट से जूझ रहे किसानों के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न करेगी। भारत की कृषि संरचना मुख्यतः छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है, जो कुल किसानों का लगभग 86% हिस्सा हैं। ये किसान सीमित संसाधनों, अस्थिर बाजार और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच अपनी आजीविका बनाए रखते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी नीतियां इन किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं, किंतु इसकी पहुंच सीमित है और यह सभी फसलों तथा क्षेत्रों को समान रूप से लाभ नहीं पहुंचा पाती। ऐसे में यदि सस्ते आयात घरेलू बाजार में बढ़ते हैं, तो MSP की प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। एक अन्य महत्वपूर्ण चिंता जैव-सुरक्षा और जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों से जुड़ी हुई है। अमेरिका GM फसलों का एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक है, जबकि भारत में इस विषय पर अभी भी सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाता है। व्यापार समझौते के तहत गैर-शुल्कीय बाधाओं को कम करने का दबाव भारत पर पड़ सकता है, जिससे GM उत्पादों के आयात की संभावना बढ़ सकती है। यह स्थिति देश की जैव-विविधता, पारंपरिक कृषि पद्धतियों और खाद्य सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न कर सकती है। इसके अतिरिक्त, डेयरी, पोल्ट्री और तिलहन जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इस समझौते से प्रभावित हो सकते हैं। भारत का डेयरी क्षेत्र न केवल विश्व में अग्रणी है, बल्कि यह करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार भी है। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश करते हैं, तो स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार तिलहन क्षेत्र, जिसमें भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासरत है, सस्ते आयातों के कारण प्रभावित हो सकता है, जिससे घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिलने में बाधा उत्पन्न होगी। इन आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ इस समझौते के सामाजिक और रणनीतिक आयाम भी महत्वपूर्ण हैं। कृषि क्षेत्र में संभावित आय हानि और प्रतिस्पर्धा से ग्रामीण रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे सामाजिक असमानता और क्षेत्रीय विषमताएँ बढ़ सकती हैं। वहीं रणनीतिक दृष्टि से यह समझौता भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते सहयोग का प्रतीक है, जो QUAD और Indo-Pacific में शक्ति संतुलन के व्यापक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में भारत के लिए इस समझौते को पूरी तरह अस्वीकार करना व्यवहारिक नहीं है, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इस संदर्भ में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह वैश्विक आर्थिक अवसरों का लाभ उठाते हुए अपने कृषि हितों की रक्षा कैसे करे। इसके लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, व्यापारिक सुरक्षा उपायों—जैसे मात्रा सीमाएँ (TRQ), न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) और विशेष संरक्षण उपाय (SSM)—का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि अचानक बढ़ते आयातों से घरेलू बाजार को सुरक्षित रखा जा सके। दूसरे, घरेलू कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं। इसमें कृषि उत्पादक संगठनों (FPOs) को बढ़ावा देना, आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना और प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करना शामिल है। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और किसान बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकेंगे। तीसरे, निर्यातोन्मुख कृषि नीति को मजबूत किया जाना चाहिए। भारत के पास मसाले, जैविक उत्पाद, बागवानी फसलें और पारंपरिक खाद्य उत्पादों में वैश्विक बाजार पर कब्जा करने की अपार संभावनाएँ हैं। यदि इन क्षेत्रों में गुणवत्ता मानकों, ब्रांडिंग और लॉजिस्टिक्स पर ध्यान दिया जाए, तो भारत न केवल व्यापार संतुलन बनाए रख सकता है, बल्कि उसे और सुदृढ़ भी कर सकता है। चौथे, जैव-सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को लेकर स्पष्ट और सख्त नीति अपनाना आवश्यक है, ताकि देश की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन से समझौता न हो। इसके साथ ही, तकनीकी नवाचारों को अपनाते हुए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। अंततः, यह समझौता केवल एक आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें निहित अवसरों और जोखिमों के बीच संतुलन स्थापित करना ही इसकी सफलता की कुंजी होगा। भारत को “नेशन फर्स्ट” दृष्टिकोण अपनाते हुए ऐसी रणनीति विकसित करनी होगी, जो किसानों की सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा—इन तीनों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके। यदि भारत स्मार्ट और संवेदनशील नीति-निर्माण के माध्यम से इस संतुलन को साधने में
बढ़ते तनाव के बीच ईरान का कड़ा कानून: दुश्मन देशों को सूचना भेजना पड़ेगा भारी

नई दिल्ली । तेहरान में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा और सख्त फैसला लेते हुए स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि अमेरिका और इजरायल को किसी भी प्रकार की संवेदनशील जानकारी फोटो या वीडियो भेजने वालों को मौत की सजा दी जा सकती है। यह बयान ईरान की न्यायपालिका के प्रवक्ता असगर जहांगीर ने दिया है जिसने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। असगर जहांगीर ने कहा कि दुश्मन देशों को किसी भी प्रकार की सूचना देना सीधे तौर पर जासूसी की श्रेणी में आता है और इसके लिए कठोरतम दंड का प्रावधान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हमले से प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीरें या वीडियो साझा करता है तो यह दुश्मन को यह संकेत देने जैसा है कि उनका हमला सही जगह पर हुआ है। इस तरह की गतिविधियां राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ मानी जाएंगी। यह सख्त रुख ऐसे समय में सामने आया है जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा हाल ही में ईरान के तेल भंडार को निशाना बनाते हुए हमला किया गया। इस हमले के वीडियो भी सार्वजनिक किए गए जिसके बाद ईरान की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया गया है। ईरान के अधिकारियों के मुताबिक पिछले अक्टूबर में पारित किए गए नए जासूसी कानून के तहत अब दुश्मन देशों को किसी भी प्रकार की सूचना भेजना गंभीर अपराध माना जाएगा। इस कानून में दोषी पाए जाने पर न सिर्फ संपत्ति जब्त की जा सकती है बल्कि मौत की सजा तक दी जा सकती है। इसी क्रम में ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने कार्रवाई तेज कर दी है। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिन पर अमेरिका और इजरायल से जुड़ी खुफिया एजेंसियों को संवेदनशील जानकारी भेजने का आरोप है। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने कथित तौर पर सुरक्षित स्थानों की जानकारी देने के बदले क्रिप्टोकरेंसी प्राप्त की थी। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन दोनों को पूर्वी अजरबैजान प्रांत के ओस्कू इलाके से हिरासत में लिया गया और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों को सौंप दिया गया है। इससे पहले भी इसी तरह के आरोपों में दो अन्य लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी है जिससे यह साफ है कि ईरान इस मुद्दे पर कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं है। इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने क्षेत्रीय समर्थन को लेकर इराक का आभार जताया है। उन्होंने कहा कि इराकी लोग इस संघर्ष में मजबूरी से नहीं बल्कि साझा इतिहास पहचान और धार्मिक मूल्यों के आधार पर ईरान के साथ खड़े हैं। कुल मिलाकर अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान का यह कड़ा रुख यह संकेत देता है कि देश अपनी आंतरिक सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क है और किसी भी प्रकार की जासूसी गतिविधि को सख्ती से कुचलने के लिए तैयार है।
भारत में 2025 में डेटा का क्रेज़, प्रति यूजर औसत मासिक खपत 31GB से अधिक

नई दिल्ली भारत में मोबाइल डेटा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। नोकिया की नई मोबाइल ब्रॉडबैंड इंडेक्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, देश में प्रति यूजर औसत मासिक डेटा उपभोग 31 जीबी से अधिक हो गया है। बीते पांच वर्षों में इसमें 18 प्रतिशत का कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में मुख्य कारण के रूप में 5जी की बढ़ती लोकप्रियता, डेटा-हेवी एप्लीकेशन और डिजिटल मनोरंजन को बताया गया है। डेटा ट्रैफिक में 5जी का बढ़ता योगदान2025 में भारत में कुल मोबाइल डेटा ट्रैफिक 27 एक्सबाइट प्रति माह से अधिक हो गया, जिसमें अकेले 5जी का योगदान 47 प्रतिशत था। 5जी ट्रैफिक सालाना आधार पर 70 प्रतिशत बढ़कर 12.9 एक्सबाइट प्रति माह तक पहुंच गया। मेट्रो शहर 5जी अपनाने में सबसे आगे हैं, जहां कुल डेटा ट्रैफिक में 5जी की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। छोटे शहरों में 5जी का प्रसाररिपोर्ट में बताया गया है कि 5जी अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों में भी इसका तेजी से विस्तार हो रहा है। यह बदलाव भारत के डिवाइस इकोसिस्टम और 5जी-सक्षम स्मार्टफोन की उपलब्धता से संभव हुआ है। 2025 में सक्रिय 4जी उपकरणों की संख्या 892 मिलियन थी, जिनमें से 383 मिलियन से अधिक उपकरण 5जी-सक्षम थे। साथ ही, वर्ष के दौरान बेचे गए स्मार्टफोनों में 90 प्रतिशत से अधिक 5जी-सक्षम थे, जिससे उपयोगकर्ताओं के लिए 5जी अपनाना आसान हो गया। 4के स्ट्रीमिंग, क्लाउड गेमिंग और एआई एप्सभारतीय यूजर पहले से कहीं अधिक डेटा का उपभोग कर रहे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण 4के वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड गेमिंग और एआई-आधारित एप्लीकेशन हैं। इन सेवाओं की बढ़ती लोकप्रियता ने नेटवर्क पर लोड बढ़ा दिया है और इससे उच्च गति, कम विलंबता और बेहतर कनेक्टिविटी की आवश्यकता उत्पन्न हुई है। भविष्य में नेटवर्क और एआई की भूमिकारिपोर्ट में भविष्य के दृष्टिकोण पर भी जोर दिया गया है। जैसे-जैसे एआई-आधारित एप्लिकेशन और डिजिटल अनुभव आम होंगे, नेटवर्क को उच्च डेटा लोड, जटिल कंप्यूटिंग और कम विलंबता संभालने के लिए विकसित होने की आवश्यकता होगी। 2031 तक 5जी ग्राहकों का अनुमानभविष्य में भारत में 5जी ग्राहकों की संख्या 2031 तक 1 अरब से अधिक होने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि मोबाइल डेटा उपभोग और डिजिटल सेवाओं की मांग लगातार बढ़ती रहेगी।
1 अप्रैल से F&O पर बढ़ेगा STT, विशेषज्ञों के अनुसार लंबी अवधि में सीमित असर

नई दिल्ली वित्त वर्ष 2025-26 के समापन के साथ निवेशकों को कई नए बदलावों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें फ्यूचर्स और ऑप्शंस (एफएंडओ) पर लागू सिक्योरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) में बढ़ोतरी सबसे अहम बदलाव है, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट में घोषित ये संशोधन विशेष रूप से ऑप्शंस ट्रेडिंग पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे ट्रेडिंग लागत बढ़ जाएगी। फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर नई एसटीटी दरेंनई दरों के अनुसार फ्यूचर्स पर एसटीटी 0.02% से बढ़कर 0.05%, जबकि ऑप्शंस प्रीमियम और एक्सरसाइज पर एसटीटी 0.10% और 0.125% से बढ़कर 0.15% हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे डेरिवेटिव्स सेगमेंट में निवेश की लागत बढ़ेगी, खासकर उन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए, जो हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग और डेरिवेटिव आधारित रणनीतियों पर निर्भर हैं। एफपीआई और बाजार पर अल्पकालिक असरजनवरी 2026 में एफपीआई ने भारतीय बाजार से 41,000 करोड़ रुपए से अधिक की निकासी की थी, जो वैश्विक अनिश्चितता, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और करेंसी दबाव को दर्शाती है। एसटीटी बढ़ने से टैक्स के बाद रिटर्न कम हो सकता है, जिससे शॉर्ट-टर्म विदेशी निवेश के लिए भारत का आकर्षण थोड़ी मात्रा में घट सकता है। कुछ निवेशक इस कारण एशिया के अन्य बाजारों जैसे अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया में निवेश की ओर रुख कर सकते हैं। लंबी अवधि के निवेशकों पर सीमित प्रभावविशेषज्ञों का कहना है कि लंबी अवधि के निवेशकों पर इसका असर सीमित रहेगा। उनके निवेश निर्णय कंपनी की कमाई, मुद्रा स्थिरता और नीतिगत स्पष्टता जैसे कारकों पर आधारित होते हैं। वहीं, सरकार को टैक्स कलेक्शन में वृद्धि का लाभ मिलेगा, जबकि ट्रेडिंग वॉल्यूम पर अल्पकालिक दबाव पड़ सकता है। रिटेल और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स पर असरएसटीटी बढ़ोतरी से रिटेल और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स की ट्रेडिंग लागत बढ़ेगी। हालांकि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह प्रभाव अल्पकालिक होगा। शुरुआती समय में बाजार में हलचल दिखाई दे सकती है, लेकिन जैसे-जैसे निवेशक समायोजित होंगे, ट्रेडिंग गतिविधियां सामान्य हो जाएंगी। 1 अप्रैल 2026 से लागू हुए नए एसटीटी नियमों के तहत फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर टैक्स बढ़ गया है। अल्पकालिक प्रभाव: ट्रेडिंग लागत बढ़ी- एफपीआई और शॉर्ट-टर्म निवेश प्रभावित। दीर्घकालिक असर: सीमित → लंबी अवधि के निवेशक कंपनी की स्थिति, मुद्रा स्थिरता और नीतिगत स्पष्टता पर ध्यान देंगे। सरकार को टैक्स में लाभ, बाजार में मामूली दबाव और विदेशी निवेश में थोड़ी नरमी संभव है।
36% हिस्सेदारी के साथ गोल्ड लोन भारत में सबसे बड़े क्रेडिट सेगमेंट में शामिल

नई दिल्ली भारत के रिटेल क्रेडिट मार्केट में गोल्ड लोन अब सबसे बड़ा सेगमेंट बन गया है। मंगलवार को जारी ट्रांसयूनियन सीआईबीएल की रिपोर्ट के अनुसार, कुल लोन वॉल्यूम में गोल्ड लोन की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत और वैल्यू (मूल्य) के हिसाब से करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसके पीछे मुख्य कारण सोने की बढ़ती कीमतें और सुरक्षित लोन की ओर बढ़ता ग्राहक रुझान माना गया है। गोल्ड लोन में वृद्धि और औसत राशिरिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में गोल्ड लोन की औसत राशि काफी बढ़ी है। दिसंबर 2025 की तिमाही में औसत गोल्ड लोन करीब 1.9 लाख रुपए तक पहुंच गया, जो इस सेगमेंट की तेजी को दर्शाता है। इसी दौरान कंज्यूमर मार्केट इंडिकेटर (CMI), जो क्रेडिट मार्केट की स्थिति को दर्शाता है, दिसंबर तिमाही में बढ़कर 102 हो गया। एक साल पहले यह 97 और सितंबर तिमाही में 100 था, यानी लगातार तीसरी तिमाही में सुधार देखा गया। क्षेत्रीय और ग्राहक विस्तारपहले गोल्ड लोन का दबदबा दक्षिण भारत में था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे उत्तर और पश्चिम राज्यों में भी इसकी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इस सेगमेंट में अब अलग-अलग तरह के ग्राहक जुड़ रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि आधे से ज्यादा लोन प्राइम और उससे ऊपर की कैटेगरी के ग्राहकों द्वारा लिए जा रहे हैं, जिससे गोल्ड लोन मुख्यधारा का क्रेडिट विकल्प बनता जा रहा है। मांग में प्रवृत्ति और नॉन-मेट्रो क्षेत्रत्योहारों और जीएसटी से जुड़े असर के बावजूद क्रेडिट सप्लाई में केवल मौसमी नरमी देखी गई है, न कि स्थायी गिरावट। खासकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों में मांग मजबूत बनी हुई है। नॉन-मेट्रो क्षेत्रों का कुल उधारकर्ताओं में हिस्सा बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया है, जो पिछले साल की तुलना में 3 प्रतिशत ज्यादा है। वहीं, पहली बार लोन लेने वाले ग्राहकों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत तक बढ़ गई है। ऑटो लोन सेगमेंट में स्थिरतारिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऑटो लोन सेगमेंट में स्थिर ग्रोथ बनी हुई है। मिड-सेगमेंट वाहनों की मजबूत मांग के कारण इस क्षेत्र में संतुलित विकास देखा गया और पिछले साल की तुलना में सप्लाई भी बढ़ी है।
PSL में पाकिस्तान क्रिकेट पर कलंक, फखर जमान को बॉल टैंपरिंग पर 2 मैच का बैन

नई दिल्ली पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने पाकिस्तान सुपर लीग (PSL) 2026 में बॉल टैंपरिंग के आरोप में दिग्गज बल्लेबाज Fakhar Zaman को दो मुकाबलों के लिए सस्पेंड कर दिया है। फखर को टूर्नामेंट के आचार संहिता के लेवल 3 के उल्लंघन का दोषी पाया गया। घटना का विवरण29 मार्च को गद्दाफी स्टेडियम में लाहौर कलंदर्स और कराची किंग्स के बीच मुकाबले में आखिरी ओवर शुरू होने से पहले फखर जमान गेंद को खुरचते नजर आए। मैदान पर मौजूद अंपायर ने गेंद में जानबूझकर बदलाव पाया। इसके चलते लाहौर कलंदर्स पर 5 रनों की पेनाल्टी लगी और पुरानी गेंद बदलकर नई गेंद मैच में शामिल की गई। इस घटना के बाद कराची किंग्स ने आखिरी ओवर में 4 विकेट से जीत दर्ज की। नियम और सुनवाईफखर पर यह आरोप आर्टिकल 2.14 के तहत लगा, जो गेंद की स्थिति बदलने से संबंधित है। ऑन-फील्ड अंपायर शाहिद सैकत और फैसल खान अफरीदी, टीवी अंपायर आसिफ याकूब और फोर्थ अंपायर तारिक राशिद ने फखर पर आरोप लगाए। फखर ने इन आरोपों से इनकार किया और अपील की, जिसके बाद अनुशासनात्मक सुनवाई हुई। लेवल-3 के अपराध के लिए कम से कम एक और अधिकतम दो मुकाबलों तक का बैन लगाया जा सकता है। मैच रेफरी Roshan Mahanama ने सबूतों की समीक्षा करने और फखर की बात सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। सुनवाई में लाहौर कलंदर्स के कप्तान शाहीन शाह आफरीदी, टीम डायरेक्टर समीन राणा और मैनेजर फारूक अनवर उपस्थित थे। प्रतिबंधित मैचफखर जमान 3 अप्रैल को मुल्तान सुल्तांस और 9 अप्रैल को इस्लामाबाद यूनाइटेड के खिलाफ होने वाले मुकाबलों में हिस्सा नहीं ले सकेंगे।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सामूहिक विफलता का प्रमाण है निरंतर हो रहे अंतरराष्ट्रीय युद्ध

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब वैश्विक समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना की, तब उसका मूल उद्देश्य स्पष्ट था—भविष्य में युद्धों को रोकना, राष्ट्रों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना तथा वैश्विक शांति और सुरक्षा को स्थायी आधार प्रदान करना किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ अनेक युद्ध और सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अपने मूल उद्देश्य में सफल रही हैं। यूक्रेन, गाजा, सूडान, यमन और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार जारी हिंसा इस बात का संकेत देती है कि वैश्विक शांति व्यवस्था का ढांचा गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सामूहिक प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। उप्साला कॉन्फ्लिक्ट डेटा प्रोग्राम के अनुसार वर्ष 2023 में विश्व में 59 राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष दर्ज किए गए जो 1946 के बाद सबसे अधिक संख्या है। यह आंकड़ा केवल संघर्षों की वृद्धि ही नहीं बल्कि इस तथ्य का भी प्रमाण है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस शांति काल की आशा की जा रही थी, वह अपेक्षा के अनुरूप स्थायी नहीं हो सका। उसी वर्ष वैश्विक स्तर पर संगठित हिंसा से लगभग 154000 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई जबकि 2022 में यह संख्या 310000 थी। यद्यपि मृत्यु दर में उतार-चढ़ाव देखा गया किंतु सक्रिय संघर्षों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि विश्व व्यवस्था में अस्थिरता गहराती जा रही है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इन संघर्षों को रोकने या नियंत्रित करने में सीमित सफलता ही प्राप्त कर पा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को वैश्विक शांति और सुरक्षा का मुख्य संरक्षक माना जाता है किंतु व्यवहार में उसकी संरचना और निर्णय प्रक्रिया कई बार उसकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती है। स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो अधिकार के कारण कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव केवल इसलिए पारित नहीं हो पाते क्योंकि महाशक्तियों के भू-राजनीतिक हित उनसे टकराते हैं। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस ने अनेक प्रस्तावों पर वीटो का प्रयोग किया, जबकि गाजा संघर्ष के दौरान भी विभिन्न प्रस्ताव स्थायी सदस्यों के मतभेदों के कारण लंबित या विफल रहे। इस स्थिति ने संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता और क्षमता दोनों पर प्रश्न खड़े किए हैं, क्योंकि जब वही राष्ट्र, जिन पर शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी है, स्वयं संघर्षों में पक्षकार बन जाते हैं या अपने सहयोगियों के पक्ष में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, तब संस्था की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमित प्रभावशीलता का एक अन्य संकेत वैश्विक सैन्य व्यय में लगातार हो रही वृद्धि है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार वर्ष 2024 में विश्व का कुल सैन्य व्यय 2.718 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर है और पिछले 10 वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2.5 प्रतिशत भाग सैन्य खर्च पर व्यय किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि राष्ट्र सुरक्षा के लिए सामूहिक संस्थाओं पर भरोसा करने के बजाय अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल हथियारों की दौड़ को बढ़ावा देती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की उस भूमिका को भी कमजोर करती है, जिसमें वे सामूहिक सुरक्षा और संघर्ष-निवारण के माध्यम से युद्ध की आवश्यकता को कम करने का प्रयास करती हैं। हाल के वर्षों में विश्व के कई प्रमुख संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मध्यस्थता और शांति स्थापना प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। यूक्रेन युद्ध के दो वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद स्थायी और सर्वमान्य समाधान नहीं निकल सका। इसी प्रकार पश्चिम एशिया में इजराइल और हमास के बीच हिंसा बार-बार युद्धविराम के बावजूद पुनः भड़क उठती है। सूडान में आंतरिक संघर्ष ने मानवीय संकट को जन्म दिया, किंतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय समय रहते निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर सका। इन सभी उदाहरणों में यह देखा गया कि संस्थाएँ बयान जारी करने, मानवीय सहायता प्रदान करने और कूटनीतिक प्रयास करने तक तो सक्रिय रहीं, किंतु संघर्षों को शीघ्र समाप्त कराने या दीर्घकालिक शांति स्थापित करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की इस विफलता के पीछे कई संरचनात्मक और राजनीतिक कारण हैं। संयुक्त राष्ट्र की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति संतुलन पर आधारित है, जबकि आज का विश्व बहुध्रुवीय हो चुका है। नए उभरते राष्ट्र और क्षेत्रीय शक्तियाँ वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रही हैं, किंतु सुरक्षा परिषद की संरचना में अब तक व्यापक सुधार नहीं हो सका है। परिणामस्वरूप, अनेक राष्ट्र स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर या हाशिये पर महसूस करते हैं, जिससे संस्थाओं की वैधता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थाओं की शक्ति मुख्यतः सदस्य राष्ट्रों की सहमति और सहयोग पर निर्भर करती है। यदि कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी निर्णय को मानने से इनकार कर देता है या प्रतिबंधों को नजरअंदाज करता है, तो संस्थाओं के पास उसे बाध्य करने के सीमित साधन ही होते हैं। यही कारण है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या परिषदों के निर्णय नैतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए भी व्यवहार में लागू नहीं हो पाते। इससे यह संदेश जाता है कि वैश्विक व्यवस्था में नियमों से अधिक शक्ति और प्रभाव का महत्व है, जो संस्थागत व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है। निरंतर हो रहे युद्धों का मानवीय और आर्थिक प्रभाव भी इस विफलता को और अधिक स्पष्ट करता है। युद्धों के कारण लाखों लोग विस्थापित हो रहे हैं, शरणार्थी संकट बढ़ रहा है और अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाएँ अस्थिर हो रही हैं। जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इन संकटों को समय रहते रोक नहीं पातीं, तो उनका ध्यान संघर्ष के बाद राहत और पुनर्वास पर केंद्रित हो जाता है जबकि मूल उद्देश्य युद्ध को रोकना और शांति बनाए रखना था। इस प्रकार संस्थाएँ प्रतिक्रियात्मक भूमिका में सिमट जाती हैं, जबकि उनसे अपेक्षा सक्रिय और निवारक भूमिका की थी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि आधुनिक युद्धों का स्वरूप पारंपरिक युद्धों से भिन्न हो गया है। अब केवल दो राष्ट्रों के बीच सीधी लड़ाई ही नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध, साइबर आक्रमण, आतंकवाद और