टैक्स नहीं बढ़ेगा फिर भी तेज होगा विकास इंदौर नगर निगम के डिजिटल बजट में बड़े ऐलान

इंदौर । मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में नगर निगम ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 8455 करोड़ रुपये का महत्वाकांक्षी बजट पेश किया है जो विकास और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार का बड़ा रोडमैप माना जा रहा है। खास बात यह है कि इतने बड़े बजट के बावजूद न तो कोई नया टैक्स लगाया गया है और न ही मौजूदा करों में किसी तरह की बढ़ोतरी की गई है। निगम ने इस बजट को पूरी तरह डिजिटल स्वरूप में प्रस्तुत किया है जो पारदर्शिता और आधुनिक प्रशासन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। नगर निगम का दावा है कि यह बजट आम जनता को राहत देने के साथ साथ शहर के तेजी से विकास को गति देगा। पिछले वित्तीय वर्ष में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक राजस्व संग्रह का हवाला देते हुए यह विश्वास जताया गया है कि नागरिकों के सहयोग से विकास कार्यों को बिना टैक्स बढ़ाए भी आगे बढ़ाया जा सकता है। बजट में सबसे बड़ा फोकस स्वच्छता पर रखा गया है क्योंकि इंदौर लगातार देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। इस स्थिति को बरकरार रखने के लिए वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को और मजबूत करने की योजना बनाई गई है। बायो सीएनजी प्लांट की क्षमता को 550 टन से बढ़ाकर 800 टन प्रतिदिन करने का लक्ष्य रखा गया है वहीं 200 टन प्रतिदिन क्षमता वाला नया सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट भी स्थापित किया जाएगा। जीरो वेस्ट मॉडल की दिशा में काम करते हुए कचरे से ऊर्जा और उपयोगी उत्पाद बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए भी बड़े स्तर पर निवेश का प्रावधान किया गया है। शहर में सड़कों ड्रेनेज और जल आपूर्ति नेटवर्क को मजबूत करने के लिए व्यापक योजनाएं तैयार की गई हैं। पिछले वर्ष 150 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया था और अब इस रफ्तार को और बढ़ाने की योजना है। करीब 700 किलोमीटर ड्रेनेज लाइन और 150 से 200 किलोमीटर नई पानी की पाइपलाइन बिछाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही नए पुल पुलिया और रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट भी शहर के विस्तार को नई दिशा देंगे। डिजिटल इंदौर के विजन को आगे बढ़ाते हुए नगर निगम ने तकनीकी सुधारों पर भी जोर दिया है। 25 हजार घरों को डिजिटल पहचान देने और करीब 30 लाख दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन की योजना बनाई गई है। निगम का अपना डिजिटल पोर्टल तैयार किया जा रहा है जिससे नागरिक सेवाएं आसान पारदर्शी और तेज हो सकेंगी। बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए जल प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। नर्मदा परियोजना के विस्तार के साथ नई टंकियों और पाइपलाइन नेटवर्क का निर्माण किया जाएगा। वर्ष 2050 तक शहर में 1620 एमएलडी पानी की जरूरत का अनुमान लगाया गया है और उसी के अनुसार दीर्घकालीन योजना तैयार की गई है। स्वास्थ्य खेल और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए भी कई अहम घोषणाएं की गई हैं। हर वार्ड में संजीवनी क्लीनिक और पॉली क्लीनिक स्थापित किए जाएंगे वहीं स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स खेल मैदान सार्वजनिक शौचालय पार्क और ग्रीन फॉरेस्ट डेवलपमेंट पर भी काम किया जाएगा ताकि नागरिकों को बेहतर जीवन स्तर मिल सके। कुल मिलाकर इंदौर नगर निगम का यह बजट विकास स्वच्छता डिजिटल सिस्टम और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने का संतुलित प्रयास है। बिना टैक्स बढ़ाए इतने बड़े स्तर पर योजनाओं का ऐलान निश्चित रूप से सराहनीय है लेकिन अब सबसे अहम सवाल यही है कि इन योजनाओं को जमीन पर कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है क्योंकि असली सफलता क्रियान्वयन में ही छिपी होती है।
मध्य पूर्व संघर्ष के तेज होने की चिंताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में खुला, सेंसेक्स 300 अंक टूटा

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान युद्ध के तेज होने की चिंताओं के बीच सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को भी भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ लाल निशान में खुला। इसके पहले सोमवार को भी बाजार लाल रंग में खुला था। इस दौरान, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 372.49 अंक या 0.50 प्रतिशत गिरकर 73,734.36 पर खुला, तो वहीं निफ्टी 50 129.55 अंक या 0.56 प्रतिशत गिरकर 22,838.70 पर खुला। इसके अलावा, बैंक निफ्टी 350.40 अंक या 0.67 प्रतिशत गिरकर 52,258.70 पर खुला। (सुबह 9:28 बजे के करीब) सेंसेक्स 0.43 प्रतिशत यानी 315.64 अंक गिरकर 73,791.21 पर ट्रेड कर रहा था, तो वहीं निफ्टी50 0.38 प्रतिशत या 87.40 अंक गिरकर 22,880.85 पर कारोबार कर रहा था। व्यापक बाजारों में, निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.47 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 0.23 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। वहीं सेक्टरवार देखें तो निफ्टी आईटी में 0.93 प्रतिशत और निफ्टी एफएमसीजी में 0.15 प्रतिशत की उछाल देखने को मिली। जबकि निफ्टी ऑटो में 1.33 प्रतिशत, निफ्टी बैंक में 0.82 प्रतिशत, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में 0.61 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी 50 में हिंडाल्को, विप्रो, टेक महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, एचसीएल टेक, ओएनजीसी, आईटीसी और टीसीएस में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिली, जबकि इसके विपरीत मैक्स हेल्थ, इंडिगो, एमएंडएम, इटरनल, आयशर मोटर, एक्सिस बैंक और अल्ट्राटेक सीमेंट के शेयर सबसे ज्यादा गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक बाजार इस समय बेहद सतर्क हैं, क्योंकि एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक समयसीमा नजदीक आ रही है। निवेशकों की नजर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दिए गए अल्टीमेटम पर टिकी हुई है, जिसकी समयसीमा भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 6:30 बजे (अमेरिकी समयानुसार रात 8:00 बजे) है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा नहीं खोलता, तो सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी है और डब्ल्यूटीआई क्रूड ऑयल 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जिसकी मुख्य वजह यह है कि ट्रंप ने अपने अल्टीमेटम को दोहराते हुए ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर हमले की चेतावनी दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई गुजरती है, 28 फरवरी से जारी संघर्ष के कारण बाधित है, जिससे इस साल अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 90 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं, ईरान ने अमेरिका समर्थित 45 दिन के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसे पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये जैसे देशों ने समर्थन दिया था। ईरान का कहना है कि वह स्थायी शांति, प्रतिबंधों में राहत और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई चाहता है। एक मार्केट एक्सपर्ट के अनुसार, तकनीकी रूप से निफ्टी के लिए निकट अवधि का रेजिस्टेंस 23,465 पर है, जबकि सपोर्ट लेवल 22,800 और 22,540 पर देखा जा रहा है।
एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स के रिकॉर्ड बिक्री के चलते पहली तिमाही के परिचालन लाभ में 33 प्रतिशत की हुई बढ़ोतरी

नई दिल्ली।दक्षिण कोरिया की दिग्गज कंपनी एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है। मजबूत बिक्री और खासतौर पर होम अप्लायंस बिजनेस की दमदार ग्रोथ के चलते कंपनी का परिचालन लाभ (ऑपरेटिंग प्रॉफिट) साल-दर-साल 33 प्रतिशत बढ़ गया है। ऑपरेटिंग प्रॉफिट में जबरदस्त उछालकंपनी की नियामक फाइलिंग के अनुसार, पहली तिमाही में ऑपरेटिंग प्रॉफिट 1.25 ट्रिलियन वॉन से बढ़कर 1.67 ट्रिलियन वॉन (करीब 1.1 अरब डॉलर) हो गया। यह बढ़ोतरी ऐसे समय आई है, जब पिछली तिमाही में कंपनी को नुकसान उठाना पड़ा था। बिक्री ने बनाया नया रिकॉर्डएलजी इलेक्ट्रॉनिक्स की कुल बिक्री 4.4 प्रतिशत बढ़कर 23.73 ट्रिलियन वॉन तक पहुंच गई, जो पहली तिमाही के लिए अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक शुद्ध लाभ (नेट प्रॉफिट) के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। फाइनल अर्निंग रिपोर्ट इस महीने के अंत में जारी की जाएगी। पिछली तिमाही से शानदार वापसीगौरतलब है कि पिछली (चौथी) तिमाही में कंपनी को 109 बिलियन वॉन का ऑपरेटिंग नुकसान हुआ था। इसकी वजह कमजोर मांग और रिस्ट्रक्चरिंग से जुड़े एकमुश्त खर्च थे। लेकिन नई तिमाही में कंपनी ने शानदार वापसी करते हुए न सिर्फ नुकसान की भरपाई की, बल्कि मजबूत मुनाफा भी दर्ज किया। होम अप्लायंस बिजनेस बना ग्रोथ का इंजन कंपनी के मुताबिक, उसके होम अप्लायंस सॉल्यूशन डिवीजन ने इस ग्रोथ में अहम भूमिका निभाई। सब्सक्रिप्शन मॉडल को मजबूत करने और प्रीमियम प्रोडक्ट्स पर फोकस ने बिक्री को बढ़ावा दिया। इसके अलावा, मीडिया और एंटरटेनमेंट बिजनेस भी पिछली तिमाही के नुकसान से उबरकर मुनाफे में लौट आया है, जिसमें लागत कटौती का बड़ा योगदान रहा। व्हीकल और अन्य सेगमेंट का प्रदर्शनव्हीकल सॉल्यूशन बिजनेस में भी साल-दर-साल मुनाफे में सुधार देखने को मिला। दक्षिण कोरियाई मुद्रा वॉन के कमजोर होने से इस सेगमेंट को फायदा मिला, क्योंकि इसके ज्यादातर ग्राहक विदेशों में हैं। हालांकि, इको सॉल्यूशन बिजनेस में बाजार की अनिश्चितताओं के चलते बिक्री और मुनाफे में गिरावट दर्ज की गई। AI और भविष्य की रणनीति पर फोकसएलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने बताया कि वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर से जुड़ी मांग को पूरा करने पर ध्यान देगी। इसके साथ ही, कंपनी भविष्य के ग्रोथ इंजन के रूप में होम रोबोट और स्मार्ट उपकरणों पर निवेश बढ़ाने की योजना बना रही है। वैश्विक चुनौतियों से निपटने की तैयारीकंपनी ने कहा कि मध्य पूर्व में तनाव, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और कच्चे माल व लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इनसे निपटने के लिए कंपनी लागत में कटौती और लचीली रणनीति अपनाएगी, ताकि आने वाले समय में ग्रोथ को बनाए रखा जा सके। एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने रिकॉर्ड बिक्री के दम पर पहली तिमाही में 33% मुनाफा बढ़ाया। होम अप्लायंस बिजनेस इसकी सबसे बड़ी ताकत रहा, जबकि कंपनी भविष्य में AI और नए टेक्नोलॉजी सेगमेंट पर फोकस बढ़ा रही है।
क्या डिजिटल राजनैतिक प्रचार की कोई नैतिक सीमा है?

– डॉ. शैलेश शुक्ला राजनीतिक प्रचार उतना ही पुराना है जितनी कि राजनीति स्वयं। प्राचीन रोम में दीवारों पर संदेश लिखे जाते थे। मध्यकाल में राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन भव्य स्मारकों और अनुष्ठानों के माध्यम से करते थे। बीसवीं सदी में रेडियो, टेलीविज़न और समाचार पत्र राजनीतिक प्रचार के मुख्य माध्यम बने। लेकिन इन सभी युगों में एक बात साझी थी — प्रचार की एक सार्वजनिक दृश्यता और उसके साथ एक निहित जवाबदेही। आज, डिजिटल राजनीतिक प्रचार ने इस जवाबदेही की अवधारणा को ही उलट दिया है। जब प्रचार अदृश्य हो, व्यक्तिगत हो, तात्कालिक हो, और किसी भी तथ्यात्मक जाँच से मुक्त हो — तो प्रश्न उठता है कि क्या इसकी कोई नैतिक सीमा है? और यदि है, तो उसे कौन तय करेगा और कौन लागू करेगा? नैतिकता के प्रश्न पर विचार करने से पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राजनीतिक प्रचार और राजनीतिक संवाद के बीच की रेखा स्पष्ट नहीं है। हर राजनेता अपने विचारों को श्रेष्ठ और विरोधी के विचारों को निकृष्ट प्रस्तुत करता है — यह राजनीति का स्वाभाविक अंग है। नैतिक समस्या तब शुरू होती है जब प्रचार झूठ पर आधारित हो, जब वह लोगों को हेरफेर करे बजाय सूचित करने के, और जब वह समाज में नफरत, विभाजन, या हिंसा को बढ़ावा दे। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की नैतिक समस्याओं की पहली श्रेणी है — असत्य और भ्रामक जानकारी का जानबूझकर प्रसार। जब कोई राजनीतिक दल या उसका समर्थक यह जानते हुए कि कोई बात असत्य है, उसे सोशल मीडिया पर फैलाता है ताकि मतदाताओं की राय को प्रभावित किया जा सके — यह नैतिक दृष्टि से स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है। एमआईटी के 2018 के अध्ययन ने प्रमाणित किया कि असत्य सूचनाएँ ट्विटर पर 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट होती हैं। यह लोकतंत्र की उस बुनियाद पर सीधा हमला है जिसके अनुसार नागरिक सही जानकारी के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें। दूसरी नैतिक समस्या है व्यक्तिगत डेटा का बिना सहमति के राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ प्रकरण इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। इस कंपनी ने करीब 87 मिलियन फेसबुक उपयोगकर्ताओं के डेटा का उपयोग करके लोगों के मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाए और उनकी कमज़ोरियों को लक्षित करने वाले राजनीतिक विज्ञापन दिखाए। यह केवल गोपनीयता का उल्लंघन नहीं था — यह मानवीय स्वायत्तता और स्वतंत्र इच्छा पर हमला था। जब एक प्रणाली यह तय करने लगती है कि आपके मन में कौन सा डर है और फिर उसी डर को और गहरा करने वाला राजनीतिक संदेश आप तक पहुँचाती है, तो आपकी ‘स्वतंत्र पसंद’ वास्तव में कितनी स्वतंत्र है? तीसरी नैतिक समस्या है सांप्रदायिक या जातीय विद्वेष को भड़काने के लिए डिजिटल प्रचार का उपयोग। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध 2017 में हुई हिंसा में फेसबुक की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र की तथ्य-अन्वेषण टीम ने अपनी 2018 की रिपोर्ट में ‘निर्णायक’ बताया। 700,000 से अधिक रोहिंग्या को बांग्लादेश भागना पड़ा। 2022 में एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक विस्तृत रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि मेटा के एल्गोरिदम ने रोहिंग्या-विरोधी नफरत भरी सामग्री को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। यह एक चरम उदाहरण है, लेकिन यह दर्शाता है कि डिजिटल राजनीतिक प्रचार में ‘नफरत’ एक हथियार बन सकती है जिसके परिणाम जीवन और मृत्यु की रेखा तक पहुँच सकते हैं। नैतिक सीमाओं के प्रश्न पर तीन मुख्य दृष्टिकोण हैं। पहला ‘बाज़ार-आधारित’ दृष्टिकोण यह मानता है कि सूचना के मुक्त बाज़ार में अच्छे विचार बुरे विचारों को हरा देंगे। दूसरा ‘सरकार-नियंत्रण’ का दृष्टिकोण मानता है कि सरकार को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। तीसरा ‘मंच-उत्तरदायित्व’ का दृष्टिकोण मानता है कि डिजिटल मंचों को स्वयं अपने नैतिक मानक तय करने और लागू करने चाहिए। इन तीनों दृष्टिकोणों की अपनी-अपनी सीमाएँ और जोखिम हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण सत्ताधारी दलों को विपक्षी आवाज़ों को दबाने का अवसर दे सकता है — यह जोखिम भारत जैसे देश में विशेष रूप से प्रासंगिक है। ‘माइक्रोटार्गेटिंग’ की नैतिकता पर विशेष विचार आवश्यक है। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ के पूर्व सीईओ अलेक्जेंडर निक्स ने 2016 में एक साक्षात्कार में बताया था कि उनकी कंपनी के पास अमेरिका के 230 मिलियन वयस्कों पर 4,000 से 5,000 ‘डेटा पॉइंट’ थे और वे हर व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रोफाइल बनाते थे। यदि इस डेटा का उपयोग केवल लोगों को उनकी पहचानी गई कमज़ोरियों पर प्रहार करके एक निश्चित तरीके से वोट देने के लिए प्रेरित करने में किया जाए, तो यह सूचना नहीं, मनोवैज्ञानिक हेरफेर है — जो नैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य है। डिजिटल मंचों की नैतिक ज़िम्मेदारी भी इस प्रश्न का एक केंद्रीय हिस्सा है। फेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ्रांसेस हाउजेन ने अपनी सीनेट गवाही में कहा था, “फेसबुक ने बार-बार अपने मुनाफे और लोगों की सुरक्षा के बीच टकराव में मुनाफे को चुना। परिणाम एक ऐसी प्रणाली है जो विभाजन, उग्रवाद और ध्रुवीकरण को बढ़ाती है।” जब ये कंपनियाँ राजनीतिक विज्ञापनों से अरबों डॉलर कमाती हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ‘तटस्थ मंच’ का तर्क खोखला है — जब कोई मंच अपने एल्गोरिदम के माध्यम से तय करता है कि कौन सी सामग्री करोड़ों लोगों तक पहुँचेगी, तो वह संपादकीय निर्णय ले रहा है। नागरिक समाज और पत्रकारिता की भूमिका भी नैतिक सीमाओं को परिभाषित और लागू करने में महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र तथ्य-परीक्षण संस्थाएँ, निगरानी समूह, और खोजी पत्रकार डिजिटल प्रचार के दुरुपयोग को उजागर करने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं। भारत में ऑल्ट न्यूज़, बूम, और अन्य संस्थाएँ यह काम करती हैं। यूरोपीय संघ के ‘कोड ऑफ प्रैक्टिस ऑन डिसइन्फर्मेशन’ और यूनेस्को की ‘इंटरनेट यूनिवर्सलिटी इंडिकेटर्स’ जैसे दस्तावेज़ नैतिक सिद्धांतों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को रेखांकित करते हैं — जैसे पारदर्शिता, सत्यता, और नफरत की अपील के लिए कोई स्थान नहीं। अंतिम और शायद सबसे महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न यह है — क्या राजनीतिक दलों में स्वयं नैतिक प्रचार का संकल्प होना चाहिए? कानून और नियामक संस्थाएँ अपना काम करें लेकिन अंततः एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि राजनेता स्वयं यह तय करें कि वे क्या करेंगे और क्या नहीं — केवल इसलिए नहीं कि कानून मना करता है, बल्कि इसलिए कि यह सही है। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की कोई भी नैतिक सीमा तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक कि राजनीतिक नेता, दल, और उनके समर्थक
जब हर तरफ आग ही आग थी सीधी में कार्यकर्ता की हिम्मत से सुरक्षित निकले मासूम बड़ा खतरा टला

सीधी । मध्य प्रदेश के सीधी जिले में मंगलवार का दिन उस समय दहशत में बदल गया जब रामपुर नैकिन क्षेत्र के शिकारगंज स्थित एक आंगनवाड़ी केंद्र के पास अचानक भीषण आग भड़क उठी और देखते ही देखते हालात बेकाबू हो गए। आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ ही मिनटों में पूरा परिसर लपटों से घिर गया और हर तरफ धुआं और अफरा तफरी का माहौल बन गया लेकिन इसी बीच एक महिला की सूझबूझ और साहस ने सात मासूम बच्चों की जिंदगी बचा ली। घटना सुबह करीब 11 बजे की है जब आंगनवाड़ी केंद्र में सात छोटे बच्चे मौजूद थे और उनकी देखरेख कर रही थीं कार्यकर्ता उर्मिला द्विवेदी। अचानक पास के क्षेत्र से आग उठती नजर आई जो तेजी से फैलते हुए केंद्र के आसपास पहुंचने लगी। हालात की गंभीरता को समझते हुए उर्मिला द्विवेदी ने बिना किसी घबराहट के तुरंत निर्णय लिया और एक एक कर सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालना शुरू किया। उन्होंने न केवल बच्चों को आग से दूर पहुंचाया बल्कि उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाकर राहत की सांस ली। कुछ ही देर में आग ने विकराल रूप धारण कर लिया और आंगनवाड़ी भवन के तीनों ओर ऊंची लपटें उठने लगीं। आग की भयावहता इतनी ज्यादा थी कि आसपास के लोग भी सहम गए लेकिन जैसे ही घटना की जानकारी फैली ग्रामीण मौके पर पहुंचने लगे और अपने स्तर पर आग बुझाने की कोशिश करने लगे। हालांकि आग लगातार फैलती जा रही थी और उस पर काबू पाना आसान नहीं था। स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब आग पास के जंगल की ओर बढ़ने लगी जिससे बड़े क्षेत्र में नुकसान की आशंका पैदा हो गई। तत्काल फायर ब्रिगेड को सूचना दी गई लेकिन टीम को मौके तक पहुंचने में कुछ समय लगा। करीब आधे घंटे बाद दमकल दल घटनास्थल पर पहुंचा और आग बुझाने का अभियान शुरू किया। इसके साथ ही डायल 112 और 108 की टीमें भी मौके पर पहुंच गईं और राहत व बचाव कार्य में जुट गईं। ग्रामीणों और प्रशासन की टीम ने मिलकर लगातार प्रयास किए लेकिन आग की तीव्रता इतनी अधिक थी कि डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक लपटें शांत नहीं हुईं। कड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार आग पर काबू पाया जा सका और स्थिति नियंत्रण में आई। रामपुर नैकिन थाना प्रभारी सुधांशु तिवारी ने बताया कि सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड और अन्य आवश्यक सेवाओं को तुरंत मौके पर भेजा गया था और प्राथमिकता के आधार पर बचाव कार्य शुरू किया गया। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि इस घटना में किसी भी प्रकार की जनहानि नहीं हुई है जो कि सबसे बड़ी राहत की बात है। यह पूरी घटना एक बड़ी चेतावनी भी है कि संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कितनी जरूरी है लेकिन साथ ही यह भी साबित करती है कि मुश्किल हालात में सही समय पर लिया गया निर्णय कितनी बड़ी त्रासदी को टाल सकता है। उर्मिला द्विवेदी की सतर्कता और साहस ने आज सात परिवारों को एक बड़ी विपत्ति से बचा लिया।
मध्य पूर्व तनाव और ट्रंप की चेतावनी के चलते कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से ज्यादा की उछाल

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी के बीच वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल तेज हो गई है। मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई, जिससे बाजार में अस्थिरता और बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में भू-राजनीतिक घटनाक्रम तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगे। ब्रेंट और WTI क्रूड में जोरदार उछालवैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड वायदा 1.69% यानी 1.86 डॉलर की बढ़त के साथ 111.63 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं WTI क्रूड में 3% से ज्यादा यानी 4.15 डॉलर की तेजी आई और यह 116.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।यह तेजी दिन के शुरुआती कारोबार में ही देखने को मिली, जिससे साफ है कि निवेशकों में तनाव को लेकर चिंता बढ़ी हुई है। कुछ ही दिनों में 60% से ज्यादा चढ़ा तेलमध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने के बाद से तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड 27 फरवरी को 72.48 डॉलर से बढ़कर 9 मार्च को 119.50 डॉलर तक पहुंच गया, यानी करीब 60% की तेजी। साल 2026 में अब तक तेल की कीमतों में लगभग 90% तक उछाल देखा जा चुका है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता जा रहा है। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ी चिंतातेल की कीमतों में यह तेजी उस समय आई, जब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख अपनाया।ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए समयसीमा तय करते हुए चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो “तेहरान पर बड़ा हमला” किया जा सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि ईरान को “एक रात में खत्म किया जा सकता है।” होर्मुज स्ट्रेट: तेल सप्लाई की लाइफलाइनहोर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई रूट्स में से एक है। यहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20% गुजरता है। 28 फरवरी से चल रहे संघर्ष के कारण इस रूट पर असर पड़ा है, जिससे सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है और कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है। ईरान का सख्त रुख, सीजफायर से इनकाररिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने सीजफायर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और संघर्ष जारी रखने का फैसला किया है। इससे स्थिति और गंभीर होती जा रही है और बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। शेयर बाजार पर भी असरतेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में नजर आया। सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 1% की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, अमेरिका का वॉल स्ट्रीट हल्की बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख देखने को मिला। आगे क्या? बाजार की नजर भू-राजनीति परविशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है, तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। वहीं, किसी समझौते की स्थिति में कीमतों में राहत मिल सकती है। मध्य पूर्व तनाव और ट्रंप की चेतावनी के चलते कच्चे तेल की कीमतों में 3% से ज्यादा उछाल आया है। होर्मुज स्ट्रेट पर असर और ईरान के सख्त रुख से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है।
भारत: अस्थिर दुनिया में आत्म निर्भरता जरूरी

– प्रो. महेश चंद गुप्तादुनिया अब अलग-अलग बिखरे देशों का नक्शा मात्र नहीं रही है। यह एक ऐसा तंत्र बन गई है जिसमें कहीं भी हलचल होती है तो उसकी तरंगें दुनिया के हर कोने तक पहुंचती हैं। हाल में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच टकराव की स्थिति के बाद पैदा हुए तनाव ने इस सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है। इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध से भी यह सबक मिल चुका है कि जंग किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं रहती। उसके असर सीमाओं से परे जाते हैं। इस बात को हम लागू होते देख रहे हैं। भारत इस अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष का हिस्सा नहीं है लेकिन उसका असर हमारे यहां साफ दिखाई दे रहा है। पेट्रोल और एलपीजी की आपूर्ति में अस्थिरता, छोटे उद्योगों का ठप पड़ना, निर्यात पर असर—ये सब संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक अस्थिरता का बोझ हम भी ढो रहे हैं। दुनिया इतनी छोटी हो चुकी है कि कई लोग इसकी तुलना एक गांव से भी करते हैं। मानना ही होगा कि यह एक ऐसा साझा घर बन चुकी है, जिसकी एक दीवार पर आग लगे तो दूसरी दीवार पर बैठे लोग भी उसकी आंच महसूस करते हैं। यही वजह है कि ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। उसकी छाया हमारे रसोईघर, बाजार और छोटे-छोटे काम-धंधों तक आ पहुंची है। भारत की नीति स्पष्ट रूप से शांति की है लेकिन वैश्विक व्यवस्था में उसकी भागीदारी इतनी गहरी है कि किसी भी तनाव के असर से बचना संभव नहीं है। शहरों में ठेले पर चाय बेचने वाला हो या मिठाई की दुकान चलाने वाला हलवाई, हर किसी के काम पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। गैस सिलेंडर की बुकिंग में देरी अब सिर्फ एक असुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कमाई पर चोट बनती जा रही है। इसका बड़ा कारण मूलभूत जरूरतों के लिए हमारा अन्य देशों पर निर्भर होना है। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए इतने अधिक बाहरी स्रोतों पर निर्भर हो चुके हैं कि कहीं भी हलचल हो और हमारी जमीन हिलने लगे? यह सच है कि हमारी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आज भी आयात किए गए तेल और गैस से पूरा होता है। खाड़ी क्षेत्र में तनातनी बढ़ते ही सप्लाई चेन पर दबाव पड़ता है और उसका सीधा असर हमारे घरों तक पहुंचता है। यह निर्भरता केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि रणनीतिक कमजोरी भी है। लेकिन बात केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। भारत का औद्योगिक और कृषि ढांचा भी कई मायनों में वैश्विक आपूर्ति पर टिका हुआ है। खाद्य तेल से लेकर उर्वरकों तक, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रक्षा उपकरणों तक कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब वैश्विक संकट लंबा खिंचने लगता है। तीन दशक पहले सद्दाम हुसैन को काबू करने के लिए मित्र देशों द्वारा इराक पर हमलों से डीजल-पेट्रोल के लिए हमारे देश में लगी लंबी कतारें हमें याद हैं। अब हम कमोबेश वैसी ही स्थिति की आशंका देख रहे हैं। बात केवल आयात की नहीं है, निर्यात भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है। बीकानेर का भुजिया, महाराष्ट्र के केले, कपड़ा उद्योग और समुद्री उत्पाद आदि सबका अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचना अब पहले जैसा सहज नहीं रहा। जलगांव से रोजाना दो से तीन हजार टन केला खाड़ी देशों व यूरोप को निर्यात होता है लेकिन इस युद्ध ने निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। केले से भरे सैकड़ों कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं। इसी प्रकार बीकानेर से भुजिया का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। समुद्री रास्तों में असुरक्षा और लागत बढ़ने से कई व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह केवल माल की आवाजाही का संकट नहीं है, बल्कि इन उद्योगों से जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी का भी सवाल है। भारत की आत्मनिर्भरता की बहस में सूचना एवं प्रौद्योगिकी का क्षेत्र अक्सर नजरअंदाज हो जाता है जबकि यह आज की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बेहद अहम है। भारत डिजिटल रूप से तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन इस डिजिटल ढांचे की बुनियाद अब भी काफी हद तक विदेशी तकनीक पर टिकी है। मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, क्लाउड सेवाएं, सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बाहरी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। ऐसे में वैश्विक तनाव या प्रतिबंधों की स्थिति में यह निर्भरता गंभीर जोखिम बन सकती है। इंटरनेट के क्षेत्र में भी हालात अलग नहीं हैं। सोशल मीडिया, सर्च इंजन और डेटा स्टोरेज जैसे प्लेटफॉर्म विदेशी स्वामित्व में हैं जिससे डेटा सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता पर सवाल उठते हैं। यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक चुनौती भी है। इसके साथ ही, भारत में मौलिक आविष्कारों की कमी भी चिंता का विषय है। आईटी सेवाओं में मजबूती के बावजूद, शोध और पेटेंट के मामले में भारत अभी पीछे है। रिसर्च और डवलपमेंट पर कम निवेश इसकी वजह हैं। ऐसे में आत्मनिर्भरता के लिए तकनीकी नवाचार को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है। यह परिदृश्य हमें बाध्य कर रहा है कि हम आत्मनिर्भरता के उस विचार की ओर लौटें जिसे हम अक्सर नारे के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं लेकिन उसे व्यवहार में पूरी तरह उतार नहीं पाए हैं। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि इतना सक्षम बनना है कि वैश्विक उथल-पुथल का असर सीमित किया जा सके। मौजूदा समय में सवाल यह नहीं है कि भारत को वैश्विक व्यापार से दूरी बनानी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारी अपनी नींव इतनी मजबूत है कि बाहरी झटकों को सह सके? समय की मांग है कि हमें ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक रास्तों की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए। सौर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहे हैं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का आधार भी बन चुके हैं। इसी प्रकार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करना, छोटे उद्योगों को तकनीक और वित्तीय सहायता देना और कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना जरूरी है क्योंकि ऐसे कदम ही भारत को भीतर से सशक्त बना सकते हैं। इस बीच, कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिनका उत्तर हमें खोजना चाहिए। बड़ा सवाल है कि क्या हमने
कमोडिटी मार्केट में हलचल: तनाव के बीच सोने-चांदी के दाम फिसले

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और डोनाल्ड ट्रंप के सख्त बयानों के बीच मंगलवार को सोने और चांदी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। आमतौर पर ऐसे हालात में निवेशक सोने को सुरक्षित विकल्प मानते हैं, लेकिन इस बार बाजार में वैसी मजबूती नजर नहीं आई। MCX पर गिरावट के साथ खुला सोना-चांदीमल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 5 जून कॉन्ट्रैक्ट वाला सोना पिछले बंद भाव 1,49,981 रुपये के मुकाबले 222 रुपये गिरकर 1,49,759 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। वहीं, 5 मई कॉन्ट्रैक्ट वाली चांदी 1,379 रुपये गिरकर 2,32,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर खुली। शुरुआती कारोबार में दोनों धातुओं में कमजोरी देखने को मिली, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई। दिनभर उतार-चढ़ाव, स्थिरता नहींदोपहर करीब 12:13 बजे तक सोना 175 रुपये यानी 0.12% गिरकर 1,49,806 रुपये प्रति 10 ग्राम पर ट्रेड कर रहा था। दिन के दौरान यह 1,50,474 रुपये के उच्चतम स्तर तक गया, जबकि 1,49,201 रुपये तक नीचे भी आया। इसी तरह चांदी भी 813 रुपये यानी 0.35% गिरकर 2,32,566 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रही थी। इंट्रा-डे में चांदी ने 2,35,547 रुपये का उच्चतम और 2,31,503 रुपये का न्यूनतम स्तर छुआ। ‘सेफ हेवन’ डिमांड कमजोर क्यों?विश्लेषकों का कहना है कि आमतौर पर तनाव के समय सोने-चांदी में निवेश बढ़ता है, लेकिन इस बार “सेफ-हेवन” डिमांड उतनी मजबूत नहीं दिख रही। बाजार फिलहाल अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, जहां निवेशक स्पष्ट संकेतों का इंतजार कर रहे हैं। यही वजह है कि कीमतें एक सीमित दायरे में ऊपर-नीचे हो रही हैं। चांदी के लिए अहम स्तरएमसीएक्स पर चांदी फिलहाल 2,31,000 से 2,33,000 रुपये के दायरे में कारोबार कर रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक 2,33,000–2,34,000 रुपये का स्तर मजबूत रेजिस्टेंस बना हुआ है। अगर यह स्तर टूटता है तो कीमतों में तेजी आ सकती है, लेकिन 2,30,000 रुपये के नीचे जाने पर तेज गिरावट देखने को मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिला-जुला रुखवैश्विक बाजार में कीमती धातुएं लगभग स्थिर रहीं। COMEX पर गोल्ड 3.36 डॉलर की मामूली गिरावट के साथ 4,681.34 डॉलर पर रहा, जबकि सिल्वर 0.09 डॉलर की बढ़त के साथ 72.94 डॉलर पर ट्रेड कर रहा था। स्पॉट मार्केट में सोना हल्की बढ़त के साथ 4,653 डॉलर पर पहुंचा, जबकि चांदी मामूली गिरावट के साथ 72.78 डॉलर पर रही। ईरान-हॉर्मुज तनाव और कच्चे तेल में उछालकीमतों में यह उतार-चढ़ाव उस समय देखने को मिला, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ रहा है। खासतौर पर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। इसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ब्रेंट क्रूड 1.69% बढ़कर 111.63 डॉलर पर पहुंच गया, जबकि WTI क्रूड 3% से ज्यादा चढ़कर 116.56 डॉलर तक पहुंच गया। बाजार की नजर आगे क्या?विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में भू-राजनीतिक घटनाक्रम और अमेरिकी नीतियां ही तय करेंगी कि सोने-चांदी की दिशा क्या होगी। निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं और हर बड़े अपडेट पर नजर बनाए हुए हैं।
कार से फेंकी गई घायल महिला अस्पताल से गायब भोपाल पुलिस CCTV खंगालने में जुटी

भोपाल । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक बेहद चौंकाने वाली और रहस्यमयी घटना सामने आई है जिसने कानून व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बाग सेवनिया थाना क्षेत्र के लहारपुर ब्रिज के पास अज्ञात कार सवारों ने एक करीब 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला को चलती कार से बाहर फेंक दिया। महिला गंभीर रूप से घायल हालत में मिली जिसके सीने में स्टेप्लर पिन चुभी हुई थीं और वह खून से लथपथ थी। घटना रविवार और सोमवार की दरमियानी रात करीब ढाई बजे की बताई जा रही है जब एक तेज रफ्तार कार लहारपुर ब्रिज के पास पहुंची। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कार की रफ्तार धीमी होते ही आरोपियों ने महिला को सड़क किनारे नाले के पास फेंक दिया और तुरंत फरार हो गए। यह दृश्य बेहद भयावह था जिसे आसपास मौजूद एक महिला ने देखा और तुरंत स्थानीय लोगों को इसकी सूचना दी। घटना की जानकारी मिलते ही इलाके के लोगों ने तत्परता दिखाते हुए स्वयंसेवी संस्था चित्रांश ह्यूमन वेलफेयर से संपर्क किया। संस्था के सदस्य मोहन सोनी और पारस मौके पर पहुंचे और पुलिस की मदद से घायल महिला को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। महिला को हमीदिया अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टरों की निगरानी में उसका इलाज शुरू किया गया। हैरानी की बात यह रही कि महिला करीब 22 घंटे तक बेहोश रही और होश में आने के बाद भी वह अपनी पहचान बताने की स्थिति में नहीं थी। वह केवल सलकनपुर शब्द ही बोल पा रही थी जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उसका संबंध सलकनपुर मंदिर क्षेत्र से हो सकता है। उसके हाथ पर एक नाम गुदा हुआ मिला है लेकिन अभी तक उसकी पूरी पहचान स्पष्ट नहीं हो सकी है। इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब इलाज के दौरान महिला अचानक अस्पताल से लापता हो गई। इस घटना ने पुलिस और प्रशासन की चिंता और बढ़ा दी है। बाग सेवनिया थाना पुलिस ने महिला के गायब होने की सूचना मिलने के बाद उसकी तलाश शुरू कर दी है और अस्पताल प्रबंधन से भी पूछताछ की जा रही है। पुलिस का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए आसपास के इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले जा रहे हैं ताकि उस कार और आरोपियों का सुराग लगाया जा सके जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया। थाना प्रभारी अमित सोनी के अनुसार फिलहाल महिला की तलाश प्राथमिकता है और उसकी पहचान होने के बाद ही मामले की असल वजह सामने आ सकेगी। यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है कि आखिर महिला को इस तरह क्यों फेंका गया और अस्पताल जैसी सुरक्षित जगह से वह अचानक कैसे गायब हो गई। फिलहाल पुलिस हर पहलू पर जांच कर रही है लेकिन जब तक महिला मिल नहीं जाती तब तक यह मामला रहस्य बना रहेगा।
बैंकिंग सेक्टर पर मंडराया संकट, युद्धों को बताया सबसे बड़ा जोखिम: JPMorgan CEO

नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी बैंकिंग संस्थाओं में से एक जेपी मॉर्गन चेस के सीईओ जेमी डिमोन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में चल रहे युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव बैंकिंग सेक्टर और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। डिमोन के मुताबिक, यूक्रेन और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों ने अनिश्चितता को काफी बढ़ा दिया है, जिससे दुनिया भर के बाजारों और उद्योगों पर दबाव साफ देखा जा रहा है। युद्ध और तनाव से बढ़ रही आर्थिक अनिश्चितताअपने सालाना शेयरधारक पत्र में जेमी डिमोन ने कहा कि दुनिया इस समय कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इनमें रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान से जुड़े तनाव, मध्य पूर्व में बढ़ती दुश्मनी और आतंकवादी गतिविधियां शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ये सभी घटनाएं “अनिश्चितता का क्षेत्र” तैयार कर रही हैं, जहां भविष्य के परिणामों का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है। इसका सीधा असर कमोडिटी मार्केट, निवेश और वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है। चीन और ट्रेड वॉर भी चिंता का कारणडिमोन ने चीन के साथ बढ़ते तनाव को भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम बताया। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू की गई टैरिफ आधारित ट्रेड वॉर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उनके अनुसार, ये व्यापारिक तनाव भविष्य में वैश्विक आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और नए आर्थिक समीकरण पैदा कर सकते हैं। AI: सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति, लेकिन जोखिम भीजेमी डिमोन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अब तक की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति बताया। उन्होंने कहा कि AI का असर हर सेक्टर पर पड़ेगा और यह पूरी दुनिया के काम करने के तरीके को बदल सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि AI के अंतिम परिणाम को लेकर अभी पूरी तरह स्पष्टता नहीं है, इसलिए सतर्क रहना जरूरी है। अमेरिकी मूल्यों पर भरोसा जरूरीडिमोन ने कहा कि इन चुनौतियों के बीच अमेरिका को अपने मूल्यों स्वतंत्रता, अवसर और लोकतंत्र पर फिर से भरोसा जताने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ ऐसे मूल्यों को मजबूत करने का सही मौका है, जो देश की पहचान रहे हैं। भविष्य की अर्थव्यवस्था पर बड़ा सवालडिमोन के अनुसार, मौजूदा भू-राजनीतिक घटनाएं यह तय करेंगी कि आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था कैसी होगी। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अनिश्चितता इतनी ज्यादा है कि कोई भी सटीक भविष्यवाणी करना मुश्किल है। :जेपी मॉर्गन के सीईओ जेमी डिमोन ने चेतावनी दी है कि यूक्रेन और मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध, चीन के साथ तनाव और ट्रेड वॉर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। साथ ही, AI के तेजी से बढ़ते प्रभाव को लेकर भी उन्होंने सतर्क रहने की सलाह दी।