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COLLECTOR HEARING : अशोकनगर कलेक्टर बोले- तमाशा नहीं चलेगा, स्कूलों की मनमानी फीस और टीकाकरण लापरवाही पर अधिकारियों को फटकारा

COLLECTOR HEARING

HIGHLIGHTS: अशोकनगर में 212 आवेदकों ने उठाए अपने मुद्दे निजी स्कूलों की मनमानी फीस और घटिया गुणवत्ता वाली ड्रेस पर सवाल HPV टीकाकरण में लापरवाही पर अधिकारियों को कलेक्टर की फटकार कलेक्टर ने अधिकारियों को समय पर काम करने के निर्देश दिए जनसुनवाई सामान्य से डेढ़ घंटे लंबी चली   COLLECTOR HEARING : अशोकनगर। कलेक्टर साकेत मालवीय ने मंगलवार को कलेक्ट्रेट में जनसुनवाई आयोजित की। बता दें कि इस दौरान कुल 212 आवेदक अपनी समस्याओं के साथ पहुंचे और अधिकारियों से समाधान की मांग की। मुलताई स्टेशन पर चलती ट्रेन में चढ़ते समय यात्री की मौत, पुलिस जांच में जुटी स्कूलों की मनमानी फीस पर सवाल समाजसेवियों ने निजी स्कूलों पर किताबें, कॉपियां और ड्रेस अत्यधिक कीमत पर बेचने का आरोप लगाया। स्कूलों की अपनी बुक स्टोर से खरीदारी करने की मजबूरी और घटिया गुणवत्ता वाली ड्रेस के लिए अधिक पैसे वसूलने की शिकायतें सामने आईं। टीकाकरण में लापरवाही पर फटकार जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर ने HPV टीकाकरण में लापरवाही बरतने पर जिला शिक्षा अधिकारी चंद्रशेखर सिसोदिया और टीकाकरण अधिकारी डॉ. रजनी छारी को फटकार लगाई। साथ ही उन्होंने अधिकारियों से कहा, “आप लोग काम करोगे या तमाशा देखोगे? हम तमाशा देखने नहीं देंगे। राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक तनाव: बाला बच्चन ने जताई भाजपा पर हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका समस्या समाधान के लिए निर्देश कलेक्टर ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बच्चों को समय पर टीकाकरण सुनिश्चित किया जाए और स्कूलों में उचित मूल्य पर किताबें व ड्रेस उपलब्ध कराई जाए। सुबह 11 बजे शुरू हुई यह जनसुनवाई डेढ़ घंटे बढ़कर दोपहर ढाई बजे समाप्त हुई। इस दौरान कलेक्टर ने अधिकारियों और विभागों की कार्यप्रणाली पर सख्त निर्देश दिए।

फार्मा, फूड और कृषि सेक्टर को मिलेगा फायदा, केंद्र का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एलपीजी आवंटन का नया फॉर्मूला तय किया है। Ministry of Petroleum and Natural Gas के इस फैसले का मकसद जरूरी सेक्टर्स को गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और ऊर्जा संकट के संभावित असर को कम करना है। किन सेक्टर्स को मिलेगी प्राथमिकतानए फॉर्मूले के तहत फार्मा, फूड, कृषि, पॉलीमर, पैकेजिंग, पेंट, स्टील, बीज, सिरेमिक, फाउंड्री, फोर्जिंग, ग्लास और एयरोसोल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बल्क एलपीजी उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार का मानना है कि ये सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जरूरतों से सीधे जुड़े हैं, इसलिए इन्हें प्राथमिकता देना जरूरी है। खपत के आधार पर तय होगा आवंटनसरकार ने तय किया है कि इन उद्योगों को मार्च 2026 से पहले की उनकी एलपीजी खपत का 70 प्रतिशत आवंटित किया जाएगा। हालांकि, पूरे सेक्टर के लिए कुल सीमा 0.2 टीएमटी (थाउजेंड मीट्रिक टन) प्रति दिन रखी गई है, ताकि सभी को संतुलित तरीके से गैस मिल सके। जहां गैस विकल्प नहीं, वहां पहले एलपीजीनई नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन उद्योगों में एलपीजी की जगह प्राकृतिक गैस (PNG) का उपयोग संभव नहीं है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर एलपीजी दी जाएगी। इससे उत्पादन पर असर कम होगा और सप्लाई चेन बनी रहेगी। रजिस्ट्रेशन और पीएनजी कनेक्शन जरूरीसरकार ने उद्योगों के लिए कुछ शर्तें भी तय की हैं। कंपनियों को तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के साथ रजिस्ट्रेशन कराना होगा और साथ ही सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के पास पीएनजी कनेक्शन के लिए आवेदन करना होगा। हालांकि, जिन उद्योगों में एलपीजी अनिवार्य है, वहां यह शर्त लागू नहीं होगी। राज्यों के लिए भी प्रोत्साहन योजनासरकार ने राज्यों को पहले ही नॉन-डोमेस्टिक पैक्ड एलपीजी का 70 प्रतिशत आवंटन कर दिया है। इसके अलावा 10 प्रतिशत अतिरिक्त कोटा उन राज्यों को मिलेगा, जो पीएनजी से जुड़े सुधार लागू करेंगे। राज्यों को तीन प्रमुख कदम उठाने को कहा गया है गैस वितरण आदेश 2026 को सभी विभागों तक पहुंचानारिफॉर्म-लिंक्ड एलपीजी आवंटन का लाभ उठानाकंप्रेस्ड बायो गैस नीति को जल्द लागू करनाछोटे सिलेंडरों की मांग में उछाल सरकार के मुताबिक, 23 मार्च से अब तक करीब 7.8 लाख 5 किलो के फ्री-ट्रेड एलपीजी सिलेंडर बेचे जा चुके हैं। सिर्फ एक दिन में 1.06 लाख से ज्यादा सिलेंडर बिके, जो मांग में तेज बढ़ोतरी का संकेत है। इसके अलावा तेल कंपनियों ने जागरूकता बढ़ाने के लिए 1,300 से ज्यादा शिविर भी लगाए हैं। क्या होगा असर?विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया फॉर्मूला उद्योगों को राहत देने के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित रखने में मदद करेगा। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई है, यह कदम आर्थिक गतिविधियों को सुचारू बनाए रखने में अहम साबित हो सकता है।

बैतूल में शीतल झिरी परियोजना का विरोध, ग्रामीणों ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन

बैतूल । बैतूल जिले में माचना नदी पर प्रस्तावित शीतल झिरी मध्यम सिंचाई परियोजना को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। सेहरा ग्रामीण संघर्ष मोर्चा और विभिन्न जनजातीय संगठनों ने कलेक्टर कार्यालय पहुँचकर ज्ञापन सौंपा और परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाने की मांग की। उनका आरोप है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया संविधान की पांचवीं अनुसूची भू-अर्जन अधिनियम 2013 और पेसा एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करती हुई आगे बढ़ाई जा रही है। जानकारी के अनुसार शीतल झिरी परियोजना के लिए 23 मार्च 2026 को भूमि अर्जन की प्रारंभिक अधिसूचना जारी की गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इस प्रक्रिया में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई और न ही उनका पक्ष सुना गया। इस अधिसूचना के बाद से स्थानीय लोग चिंतित हैं और उन्हें डर है कि उनकी पारंपरिक जमीनें और कृषि योग्य भूमि नुकसान में आ सकती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना का लाभ केवल कुछ बड़े हितधारकों को मिलेगा और आम ग्रामीण तथा जनजातीय समुदाय इसके दुष्प्रभाव झेलेंगे। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि शीतल झिरी परियोजना के तहत प्रस्तावित बांध और जलाशय से उनके खेत और घर प्रभावित हो सकते हैं। इस कारण से उन्होंने विरोध स्वरूप कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए और इस परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए। सेहरा ग्रामीण संघर्ष मोर्चा के प्रतिनिधियों ने बताया कि वे लंबे समय से परियोजना के प्रभावों को लेकर सरकार और प्रशासन के संपर्क में हैं लेकिन उनकी चिंताओं को अनसुना किया गया। इस परियोजना से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों का जीवन खेती और स्थानीय पारिस्थितिकी प्रणाली सीधे प्रभावित होगी। ग्रामीणों का कहना है कि पेसा एक्ट के तहत उनकी स्वीकृति और पारंपरिक अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। ज्ञापन सौंपने के बाद ग्रामीणों ने जोर देकर कहा कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को उठाएंगे। यदि प्रशासन ने उनकी बात नहीं सुनी और अधिग्रहण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने को तैयार हैं। कलेक्टर कार्यालय ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा कि ज्ञापन प्राप्त हुआ है और इसे संबंधित विभागों के पास भेजकर जांच करवाई जाएगी। प्रशासन ने आश्वस्त किया कि ग्रामीणों की चिंता को ध्यान में रखते हुए परियोजना की अधिग्रहण प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि शीतल झिरी परियोजना जैसे सिंचाई और जल प्रबंधन प्रयास ग्रामीणों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए परियोजना के क्रियान्वयन से पहले स्थानीय समुदायों की सहमति पर्यावरणीय अध्ययन और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है। बैतूल में यह विरोध प्रदर्शन न केवल भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पर सवाल उठाता है बल्कि यह यह भी दर्शाता है कि ग्रामीण और जनजातीय समुदाय अपनी पारंपरिक जमीनों और अधिकारों की सुरक्षा के लिए सतर्क और सजग हैं। प्रशासन और सरकार पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से इस तरह के विकास परियोजनाओं को लागू करें। ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल अपनी भूमि और जीवन-यापन की सुरक्षा करना है और वे किसी भी प्रकार की हिंसा में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने प्रशासन से अपील की है कि स्थानीय लोगों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए और न्यायसंगत समाधान निकाला जाए।

मुलताई स्टेशन पर चलती ट्रेन में चढ़ते समय यात्री की मौत, पुलिस जांच में जुटी

बैतूल । बैतूल जिले के मुलताई रेलवे स्टेशन पर मंगलवार दोपहर ट्रेन में चढ़ते समय एक यात्री की दर्दनाक मौत हो गई। जानकारी के अनुसार, सिकंदराबाद-जयपुर एक्सप्रेस के ठहराव के दौरान महाराष्ट्र के अमरावती जिले के दर्यापुर निवासी सलीम खान (42) पानी लेने के लिए ट्रेन से नीचे उतरे। इसी दौरान उनकी नज़र फिसल गई और वह ट्रैक पर गिर गए। पुलिस ने बताया कि हादसा बहुत जल्दी और अचानक हुआ। ट्रेन ठहरी थी लेकिन सलीम खान की गिरने की स्थिति इतनी गंभीर थी कि उन्हें तुरंत उठाया नहीं जा सका। स्टेशन पर मौजूद यात्रियों ने शोर मचाया और रेलवे कर्मचारियों को सूचना दी। रेलवे और पुलिस टीम तुरंत मौके पर पहुँची और सलीम खान को प्राथमिक सहायता दी, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। हादसे के बाद स्टेशन पर हड़कंप मच गया। यात्री और रेलवे कर्मचारी घटना स्थल पर जमा हुए। रेलवे पुलिस ने ट्रैक और प्लेटफार्म की जांच की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दुर्घटना किसी तकनीकी या सुरक्षा कारण से तो नहीं हुई। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार यह एक व्यक्तिगत हादसा था, जिसमें यात्री की असावधानी और ट्रेन से उतरने के दौरान फिसलने की वजह से मौत हुई। रेलवे पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। मृतक के परिजन और स्थानीय प्रशासन को घटना की सूचना दे दी गई है। पुलिस ने पूरे मामले में रिपोर्ट दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि स्टेशन पर सुरक्षा उपाय पर्याप्त हैं, लेकिन यात्रियों को सावधानी बरतने की आवश्यकता है। रेलवे यातायात विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेन से उतरते समय किसी भी प्रकार की जल्दबाज़ी या असावधानी गंभीर हादसे का कारण बन सकती है। रेलवे स्टेशन पर चेतावनी बोर्ड और कर्मचारियों की मौजूदगी होती है, लेकिन यात्रियों की सतर्कता भी बेहद महत्वपूर्ण है। स्थानीय लोगों ने कहा कि सलीम खान का यह हादसा काफी दुखद है और रेलवे स्टेशन पर ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए और कड़े उपाय किए जाने चाहिए। यात्रियों को ट्रेन के रुकने और चलने की स्थिति में प्लेटफार्म पर सावधानी से चलने के निर्देश दिए जाने चाहिए। मुलताई स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ते समय या उतरते समय यात्रियों की सुरक्षा को लेकर रेलवे ने समय-समय पर चेतावनी जारी की है, लेकिन असावधानी से होने वाली घटनाओं को रोकना चुनौतीपूर्ण होता है। इस हादसे ने एक बार फिर रेलवे सुरक्षा और यात्रियों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाया है। रेलवे प्रशासन ने कहा कि घटना की पूरी जांच की जा रही है और भविष्य में ऐसे हादसों से बचाव के लिए अतिरिक्त सतर्कता और सुरक्षा उपाय किए जाएंगे। यात्रियों से अपील की गई है कि ट्रेन के चलने या रुकने के समय प्लेटफार्म पर सावधानी बरतें और कभी भी ट्रेन से भागते हुए या जल्दी में उतरते हुए जोखिम न लें। इस घटना ने मुलताई रेलवे स्टेशन और आसपास के यात्रियों में सुरक्षा के प्रति चेतना बढ़ा दी है। रेलवे और पुलिस मिलकर जांच और सुरक्षा उपायों को और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि भविष्य में इस तरह के दुखद हादसे रोके जा सकें।

ईरान में फंसे सभी भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित मार्गों से देश वापसी का उच्च स्तरीय अलर्ट जारी

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात को देखते हुए भारत सरकार ने ईरान में रह रहे अपने नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की है। इसमें सभी भारतीय नागरिकों से आग्रह किया गया है कि जितनी जल्दी संभव हो, तय किए गए सुरक्षित और अधिकृत मार्गों से देश छोड़ दें। इसके साथ यह चेतावनी भी दी गई है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर बिना दूतावास की अनुमति और समन्वय के बढ़ने का प्रयास न करें। यात्रा के दौरान नागरिकों को लगातार दूतावास के संपर्क में रहने और किसी भी आपात स्थिति में हेल्पलाइन नंबर तथा ईमेल आईडी का उपयोग करने की सलाह दी गई है। इससे पहले जारी की गई सलाह में नागरिकों को 48 घंटे तक सुरक्षित स्थानों पर रहने की हिदायत दी गई थी। हालात की संवेदनशीलता के मद्देनजर अब सरकार ने अधिक सतर्कता बरतते हुए देश छोड़ने पर जोर दिया है। यह कदम अमेरिकी और ईरानी तनाव के बीच क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए उठाया गया है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के लिए सीजफायर का ऐलान हुआ था, लेकिन इसे पूरी तरह सुरक्षित स्थिति नहीं माना जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के समय ईरान में लगभग 9,000 भारतीय नागरिक थे, जिनमें छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल हैं। अब तक करीब 1,800 नागरिक सुरक्षित भारत लौट चुके हैं, जबकि बाकी नागरिकों की सुरक्षित वापसी के प्रयास जारी हैं। अमेरिकी चेतावनी और क्षेत्रीय तनाव ने हालात को और भी संवेदनशील बना दिया है। एडवाइजरी में नागरिकों से अपील की गई है कि वे केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें और अफवाहों से दूर रहें। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि यात्रा के सभी मार्ग अधिकृत और सुरक्षित हों। किसी भी जोखिमपूर्ण गतिविधि से बचना अत्यंत आवश्यक है। सरकार स्थिति की निरंतर निगरानी कर रही है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त दिशा-निर्देश जारी कर सकती है।

ऊर्जा संकट से कैसे बाहर निकलें मजदूर ?

– सौरभ वार्ष्णेयआज जब देश ऊर्जा संकट की चुनौती से जूझ रहा है, उसका सबसे गहरा असर समाज के उस वर्ग पर पड़ रहा है जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है—मजदूर वर्ग। महंगी बिजली, बढ़ते ईंधन दाम और अनिश्चित रोजगार ने मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को और कठिन बना दिया है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मजदूर इस संकट से कैसे बाहर निकलें और सरकार व समाज उनकी कैसे मदद कर सकते हैं। ऊर्जा संकट केवल बिजली की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कोयला आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, और नीतिगत कमजोरियों से भी जुड़ा है। जब उद्योगों की लागत बढ़ती है, तो सबसे पहले असर मजदूरों की मजदूरी और रोजगार पर पड़ता है। कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर हैं, जिससे मजदूरों का पलायन तेज हो रहा है। ऊर्जा संकट के बीच मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन ने गहरी चिंता पैदा कर दी है। देश में बढ़ते ऊर्जा संकट ने केवल उद्योगों और अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि इसका सबसे बड़ा असर आम मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है। बिजली की कमी, महंगी ऊर्जा और घटते औद्योगिक उत्पादन के कारण शहरों में रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ रहे हैं। ऐसे हालात में मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन फिर से तेज होता दिख रहा है। ऊर्जा संकट का सीधा असर फैक्ट्रियों और छोटे उद्योगों पर पड़ा है। कई उद्योग या तो बंद हो गए हैं या सीमित क्षमता पर काम कर रहे हैं। इससे दिहाड़ी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय पर गहरा असर पड़ा है। जब शहरों में काम नहीं मिलता, तो मजदूरों के सामने अपने गांव लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह स्थिति हमें कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान हुए बड़े पैमाने के पलायन की याद दिलाती है, जब लाखों मजदूर शहरों से अपने गांवों की ओर लौट गए थे। हालांकि मौजूदा संकट उतना अचानक नहीं है लेकिन इसके प्रभाव धीरे-धीरे उतने ही गंभीर होते जा रहे हैं।गांवों में लौटने के बाद मजदूरों को रोजगार की गारंटी नहीं मिलती। कृषि पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर है और सभी के लिए पर्याप्त अवसर नहीं दे सकती। ऐसे में ग्रामीण बेरोजगारी और गरीबी बढऩे का खतरा है। इससे सामाजिक और आर्थिक असंतुलन और गहरा सकता है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान निकाले और साथ ही शहरी रोजगार को बचाए। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, छोटे उद्योगों को राहत देना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना समय की मांग है।मजदूरों का यह पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर देश के विकास की गति पर भी पड़ सकता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां आर्थिक प्रगति की गाथाएं अक्सर सुनाई जाती हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसकी रोज़मर्रा की जि़ंदगी आज भी संघर्षों से भरी हुई है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं — यह कथन सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बहुत दूर नहीं है। जब तक मजदूर को स्थायी रोजगार, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक उसकी स्थिति में ठोस सुधार संभव नहीं है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं — यह न तो पूरी तरह फ़साना है, न ही हर जगह की सच्चाई। यह उस कड़वी हकीकत का प्रतीक है, जिसे हम अक्सर आंकड़ों और विकास के शोर में नजरअंदाज कर देते हैं। समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि मजदूर वर्ग को सिर्फ योजनाओं का लाभ ही नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर भी मिले। तभी असली विकास संभव होगा। देश के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूर आज भी अस्थिर आय, महंगाई और सामाजिक सुरक्षा की कमी से जूझ रहे हैं। दिहाड़ी मजदूर की कमाई अक्सर इतनी सीमित होती है कि वह सिर्फ दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर पाता है। ऐसे में अगर एक दिन भी काम न मिले, तो चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है। महंगाई ने इस संकट को और गहरा किया है। रसोई गैस, खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि ने गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी है। कई जगहों पर आज भी लोग लकड़ी या कंडे से खाना बनाने को मजबूर हैं। हालांकि यह भी सच है कि सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाई हैं—मुफ्त राशन, उज्ज्वला योजना, मनरेगा जैसी योजनाएं मजदूरों को राहत देने का प्रयास करती हैं। इन योजनाओं से कई परिवारों की स्थिति में सुधार भी आया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं हर जरूरतमंद तक पूरी तरह पहुंच पा रही हैं? अक्सर भ्रष्टाचार, जानकारी की कमी और व्यवस्थागत खामियों के कारण कई मजदूर इन लाभों से वंचित रह जाते हैं। समस्या केवल आय की नहीं, बल्कि असमानता और अवसरों की भी है। समाधान के रास्तेपहला समाधान यह हो सकता है कि सरकारी हस्तक्षेप यानी सरकार को सस्ती बिजली और ईंधन उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी और राहत पैकेज देने चाहिए। ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए विशेष योजनाएं बनाई जानी चाहिए। दूसरा वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देना । सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना इस संकट का स्थायी समाधान हो सकता है। अगर मजदूरों को सोलर पैनल जैसी सुविधाएं सस्ती दरों पर मिलें, तो वे अपनी ऊर्जा जरूरतें खुद पूरी कर सकते हैं। तीसरा रोजगार के नए अवसर पैदा करना ऊर्जा क्षेत्र में ही रोजगार सृजन किया जा सकता है—जैसे सोलर इंस्टॉलेशन, बैटरी मेंटेनेंस आदि। इससे मजदूरों को नया कौशल और काम मिलेगा। चौथा सामाजिक सुरक्षा यानी मजदूरों के लिए राशन, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि वे संकट के समय भी सम्मानजनक जीवन जी सकें। ऊर्जा संकट केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता को बढ़ाने वाला मुद्दा भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा मजदूर वर्ग को ही भुगतना पड़ेगा। सरकार, उद्योग और समाज—तीनों को मिलकर ऐसा समाधान खोजना होगा जिससे विकास की रोशनी

मिस्टर इंडिया की मासूम टीना, हुजान खोदाईजी अब 43 साल की और दो बेटियों की मां।

नई दिल्ली। बॉलीवुड की कल्ट फिल्म मिस्टर इंडिया में 6 साल की मासूम बच्ची ने टीना का किरदार निभाकर लोगों के दिलों में जगह बना ली थी। यह छोटी सी बच्ची हुजान खोदाईजी थीं, जिनकी भोली-भाली आँखें और मासूम चेहरे ने फिल्म में विशेष छाप छोड़ी। फिल्म 1987 में रिलीज़ हुई थी, और इसके 38 साल बाद अब हुजान का बदल चुका रूप फैंस के लिए चौंकाने वाला साबित हुआ। सोशल मीडिया पर उनकी हाल की तस्वीरें सामने आने के बाद फैंस को उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया। हुजान खोदाईजी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत इसी फिल्म से की थी और यह उनकी पहली और आखिरी फिल्म साबित हुई। जब मिस्टर इंडिया की शूटिंग हुई, तब हुजान केवल 6 साल की थीं। बाल कलाकारों में आमतौर पर बड़े होने के बाद भी फिल्मी करियर बनाने की कोशिश होती है, लेकिन हुजान ने सिर्फ एक फिल्म के बाद इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। अब वह 43 साल की हैं और दो बेटियों की मां हैं। हुजान ने अभिनय की दुनिया से दूरी बनाए रखी और ग्लैमर और चकाचौंध से दूर एक सादे जीवन को अपनाया। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि फिल्म की शूटिंग के बाद उन्हें लोगों का ध्यान आकर्षित करने से शर्मिंदगी होती थी। उन्होंने बताया कि फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद वह मद्रास चली गईं और अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जीने लगीं। इसके बाद उन्होंने कुछ विज्ञापन किए, लेकिन लाइमलाइट का ध्यान उन्हें कभी पसंद नहीं आया। आज के समय में हुजान खोदाईजी मार्केटिंग क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने एडवरटाइजिंग कंपनी में सफल करियर बनाया है और पेशेवर रूप से विज्ञापन एग्जीक्यूटिव के रूप में काम कर रही हैं। सोशल मीडिया पर उनका प्रोफाइल प्राइवेट है, जिससे यह साफ होता है कि वह अपने निजी जीवन को प्राथमिकता देती हैं और फिल्मी दुनिया में वापसी की इच्छा नहीं रखतीं।

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में कहा कि धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की समीक्षा करना न्यायपालिका का अधिकार है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विषय पर चल रही समीक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास और असंवैधानिक प्रथाओं की समीक्षा करना न्यायपालिका का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा कि अदालत धर्म विशेषज्ञ नहीं है, लेकिन यदि कोई प्रथा मानवता, संविधान और न्याय की मूल भावना के खिलाफ जाती है, तो उस पर समीक्षा करना न्यायपालिका का संवैधानिक कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर सती प्रथा, मानव बलि और नरभक्षण जैसी प्रथाओं का जिक्र किया और स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर अंधविश्वास को हमेशा अपरिवर्तनीय नहीं माना जा सकता। सुनवाई इस 2018 के निर्णय के पुनरीक्षण से जुड़ी है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं का प्रवेश रोकना असंवैधानिक है। अब यह समीक्षा याचिका नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष है, जो व्यापक संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है कि धार्मिक अभ्यासों पर न्यायिक हस्तक्षेप किस हद तक संभव और उचित है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह मान लेना कि सरकार का निर्णय अंतिम होगा, सही नहीं है और कोर्ट के पास यह देखने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है या नहीं। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से सुरक्षित है और अदालत को केवल धार्मिक विश्वास के आधार पर समीक्षा नहीं करनी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25 आदि के तहत संतुलित रूप से देखा जाएगा और यदि कोई प्रथा मूलभूत अधिकारों के खिलाफ है तो न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। विशेष सुनवाई में कुछ न्यायाधीशों ने कहा कि यदि कोई प्रथा केवल धार्मिक मान्यता पर आधारित है और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देती है, तो उसकी समीक्षा अवश्य होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी है, लेकिन यह असीमित नहीं है, और अदालत के पास यह शक्ति सुरक्षित है कि वह सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अनुरूप न्याय सुनिश्चित करे। सबरीमाला मामला लंबे समय से महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संवेदनशील संतुलन से जुड़ा हुआ है। समीक्षा सुनवाई के निर्णायक चरण में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न्यायिक परंपरा, मूल्यों और संविधान की व्याख्या की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक तनाव: बाला बच्चन ने जताई भाजपा पर हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका

बड़वानी । मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इस बीच कांग्रेस के पूर्व गृहमंत्री और राजपुर विधायक बाला बच्चन ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए राज्यसभा चुनाव में षड्यंत्र की आशंका जताई। बाला बच्चन का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को राज्यसभा पहुंचने से रोकने के लिए अपनी रणनीति के तहत विधायकों की खरीद-फरोख्त कर रही है। बाला बच्चन बुधवार को बड़वानी पहुंचे और मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पहले भी भाजपा ने विधायकों की खरीद-फरोख्त कर सरकारें बनाई हैं। उन्होंने याद दिलाया कि मध्य प्रदेश में 27 विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए सरकार बनाई गई थी और यह प्रयोग अन्य राज्यों में भी होते रहे हैं। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार से मिली जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि राज्यसभा चुनाव में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ की संभावना है, जिसे रोकने के लिए कांग्रेस पूरी तरह सतर्क है। पूर्व गृहमंत्री ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी की ओर से घोषित प्रत्याशी के पक्ष में सभी विधायक मतदान करेंगे और उनके विजयी होने के लिए पूरी सक्रियता के साथ काम करेंगे। बाला बच्चन ने जोर देकर कहा कि बड़वानी जिले के तीनों कांग्रेस विधायक पूरी तरह से पार्टी के साथ हैं और किसी भी प्रकार की बाहरी राजनीति से प्रभावित नहीं होंगे। उनका कहना था कि कांग्रेस पूरे राज्य में अपने विधायकों को संभालने और राज्यसभा में पूर्ण बहुमत सुनिश्चित करने के लिए सजग और अलर्ट है। बाला बच्चन ने यह भी कहा कि भाजपा की कथित षड्यंत्रपूर्ण गतिविधियों से लोकतंत्र कमजोर होता है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने और विधायकों की स्वतंत्र भूमिका सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। बाला बच्चन का यह बयान राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गर्मी को और बढ़ा सकता है। पूर्व गृहमंत्री ने मीडिया से कहा कि कांग्रेस के विधायक अपने मताधिकार का प्रयोग निष्पक्ष और पार्टी लाइन के अनुसार करेंगे। उन्होंने आश्वस्त किया कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार विजयी होगा और पार्टी अपने विधायकों के साथ मजबूती से खड़ी है। राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है। बाला बच्चन के बयान ने भाजपा और कांग्रेस के बीच चुनावी लड़ाई को और अधिक गर्म कर दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कांग्रेस पूरी तरह अपने विधायकों को जुटाकर राज्यसभा में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखेगी। इस प्रकार, बाला बच्चन ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह राज्यसभा चुनाव में अपने हित साधने के लिए षड्यंत्र कर रही है, जबकि कांग्रेस पूरी सजगता और सक्रियता के साथ अपने प्रत्याशी को विजयी बनाने की योजना में लगी हुई है। यह बयान मध्य प्रदेश की राजनीतिक पटल पर आगामी राज्यसभा चुनाव की सख्त लड़ाई और पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।

कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के लिए सात सीटों पर उम्मीदवार बदले।

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारी अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है और सियासी गतिविधियाँ तेज हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस ने दूसरे चरण के चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवार सूची में फेरबदल किया है। महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से जारी नई सूची में कुल आठ उम्मीदवारों के नाम शामिल किए गए हैं, जिनमें से सात पुराने उम्मीदवारों की जगह ले रहे हैं। हावड़ा सीट पर पार्टी ने प्रणब भट्टाचार्य को नया उम्मीदवार घोषित किया है। कांग्रेस ने नाकाशिपारा से गोलाम किबरिया मंडल की जगह ताहिर एसके को, छपरा से रहीदुल मंडल की जगह आसिफ खान को और मिनाखां (एससी) से बरनाली नस्कर की जगह आसिफ खान को टिकट दिया है। मंदिर बाजार (एससी) से कौशिक बैद्य के स्थान पर चांद सरदार, रैना (एससी) से अनिक साहा के स्थान पर पम्पा मलिक, केतुग्राम से मोफिरुल कासिम के स्थान पर एसके अबू बक्कर और औसग्राम (एससी) से निशा बराल के स्थान पर तापस बराल को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने इस बदलाव को चुनावी रणनीति के तहत किया है और सभी नए उम्मीदवारों को विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए मैदान में उतारा गया है। इस बीच, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे। पहले चरण में 23 अप्रैल को 152 सीटों पर मतदान होगा, जबकि दूसरे चरण में 29 अप्रैल को 142 सीटों पर वोटिंग होगी। चुनाव नतीजों की घोषणा 4 मई को की जाएगी। चुनाव के मद्देनजर राज्य सरकार ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। इस बार अब तक की सबसे बड़ी अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है। लगभग 2,400 अर्धसैनिक कंपनियों के 2,40,000 जवानों को तैनात किया गया है। महिला सुरक्षा कर्मियों की तैनाती भी इस चुनाव में रिकॉर्ड स्तर पर की गई है। करीब 20,000 महिला अर्धसैनिक जवानों को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया है, ताकि मतदान प्रक्रिया निष्पक्ष और सुरक्षित ढंग से संपन्न हो सके। चुनाव के दौरान संवेदनशील और संवेदनशील जिलों में विशेष निगरानी रखी जाएगी, और सभी दलों की निष्पक्ष भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 की यह स्थिति दर्शाती है कि राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने के साथ-साथ सुरक्षा और निर्वाचन प्रक्रिया की तैयारी में भी पूरी गंभीरता दिखा रहे हैं। कांग्रेस का यह उम्मीदवार फेरबदल उसके चुनावी अभियान को तेज करने और राज्य के मतदाताओं तक प्रभावी संदेश पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।