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बैडमिंटन एशिया चैंपियनशिप में भारत का जलवा, आयुष शेट्टी ने वर्ल्ड नंबर-1 को दी मात

नई दिल्ली। भारत के उभरते स्टार शटलर Ayush Shetty ने बैडमिंटन एशिया चैंपियनशिप 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में जगह बना ली है। निंगबो के निंगबो ओलंपिक स्पोर्ट्स सेंटर में खेले गए सेमीफाइनल में उन्होंने दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी Kunlavut Vitidsarn को हराकर बड़ा उलटफेर किया। पहला गेम हारकर की दमदार वापसीकरीब 1 घंटा 15 मिनट तक चले इस मुकाबले में आयुष शेट्टी ने जबरदस्त जज्बा दिखाया। उन्होंने पहला गेम 10-21 से गंवा दिया था, लेकिन इसके बाद शानदार वापसी करते हुए 21-19 और 21-17 से लगातार दो गेम जीतकर मैच अपने नाम कर लिया। दूसरे और तीसरे गेम में आयुष का धैर्य, आक्रामक खेल और नेट पर नियंत्रण देखने लायक था, जिसने मुकाबले का रुख पूरी तरह बदल दिया। करियर की सबसे बड़ी जीतKunlavut Vitidsarn पेरिस ओलंपिक 2024 के रजत पदक विजेता हैं। ऐसे में उनके खिलाफ जीत आयुष शेट्टी के करियर की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जा रही है। इस जीत के साथ आयुष 2018 में H. S. Prannoy के बाद इस टूर्नामेंट में पदक पक्का करने वाले पहले भारतीय पुरुष एकल खिलाड़ी बन गए हैं। फाइनल तक का शानदार सफरआयुष शेट्टी का इस टूर्नामेंट में सफर बेहद दमदार रहा है।क्वार्टरफाइनल में उन्होंने वर्ल्ड नंबर-4 Jonatan Christie को 23-21, 21-17 से हरायाइससे पहले वर्ल्ड नंबर-7 ली शिफेंग को सीधे गेम में मात दीसाथ ही चाउ तिएन-चेन जैसे अनुभवी खिलाड़ी को भी हराया इस लगातार प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि आयुष बड़े मंच के खिलाड़ी बन चुके हैं। भारत के लिए मिले-जुले नतीजेजहां आयुष ने शानदार प्रदर्शन किया, वहीं बाकी भारतीय खिलाड़ियों के लिए यह टूर्नामेंट ज्यादा सफल नहीं रहा। P. V. Sindhu दूसरे दौर में बाहर हो गईं, जबकि Lakshya Sen पहले ही राउंड में हार गए। इतिहास रचने का मौकायूएस ओपन सुपर 300 चैंपियन आयुष शेट्टी अब फाइनल में खिताब जीतकर इतिहास रचने के बेहद करीब हैं। अगर वह यह मुकाबला जीतते हैं, तो यह उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी और भारतीय बैडमिंटन के लिए भी गर्व का क्षण होगा।

शिवपुरी सड़क हादसा बना काल बनकर टूटा ट्रक दूल्हा-दुल्हन सहित चार की मौके पर मौत

शिवपुरी । शिवपुरी में एक दिल दहला देने वाला सड़क हादसा सामने आया है जहां खुशियों से भरा एक परिवार पल भर में गहरे शोक में डूब गया हादसे में दूल्हा दुल्हन समेत चार लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई जिससे पूरे इलाके में मातम पसर गया है यह भीषण दुर्घटना सिरसौद थाना क्षेत्र के टोंगरा रोड पर हुई जहां एक ऑटो में सवार होकर नवविवाहित दंपती और उनके परिजन यात्रा कर रहे थे बताया जा रहा है कि वे किसी पारिवारिक कार्य से जा रहे थे तभी सामने से आ रहा एक ट्रक अचानक अनियंत्रित हो गया और सीधे ऑटो के ऊपर पलट गया टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि ऑटो पूरी तरह ट्रक के नीचे दब गया और उसमें सवार लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला आसपास मौजूद लोगों ने जैसे ही यह मंजर देखा तो वे सहम गए और तुरंत राहत कार्य के लिए दौड़े लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी इस हादसे में जिन चार लोगों की मौत हुई उनमें 50 वर्षीय अजेश पुत्र पीतम शाक्य 20 वर्षीय राजेश्वर पुत्र वीरेंद्र शाक्य 35 वर्षीय राजो पत्नी हरविलास शाक्य और 22 वर्षीय वीरेंद्र पुत्र प्रीतम शाक्य शामिल हैं सभी मृतक ग्राम राजगढ़ तेंदुआ के निवासी बताए जा रहे हैं हादसे की सबसे दर्दनाक बात यह रही कि मृतकों में दूल्हा और दुल्हन भी शामिल थे जिनकी शादी मात्र दो दिन पहले ही हुई थी नई जिंदगी की शुरुआत से पहले ही यह सफर हमेशा के लिए थम गया जिससे पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है घटना के बाद स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और राहत व बचाव कार्य शुरू किया गया शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है वहीं पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है यह हादसा एक बार फिर सड़क सुरक्षा और भारी वाहनों की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है

केएल सहगल भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार, संघर्ष से महानता तक की प्रेरक कहानी..

नई दिल्ली:भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी कला से पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा बदल दी, लेकिन उनमें से एक नाम ऐसा है जिसे भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा जाता है। Kundan Lal Saigal ने अपनी अनोखी आवाज, भावनात्मक गायकी और प्रभावशाली अभिनय से वह मुकाम हासिल किया जिसे आज भी स्वर्ण युग की शुरुआत माना जाता है। 1904 में जन्मे केएल सहगल का जीवन साधारण परिस्थितियों में शुरू हुआ था। बचपन में उन्हें किसी बड़े घराने की संगीत शिक्षा नहीं मिली, लेकिन परिवार के भजनों और आसपास के सांस्कृतिक माहौल ने उनके भीतर संगीत के प्रति गहरी रुचि जगा दी। शुरुआती जीवन में उन्होंने कई छोटे काम किए, जिनमें रेलवे में टाइमकीपर और एक कंपनी में सेल्समैन की नौकरी शामिल थी। इन नौकरियों ने उन्हें देश के अलग अलग हिस्सों को देखने और विविध संगीत परंपराओं को समझने का अवसर दिया। धीरे धीरे उनका रुझान संगीत और अभिनय की ओर बढ़ता गया और वे कोलकाता पहुंचे, जहां उस समय फिल्म उद्योग अपने शुरुआती दौर में था। वहां उन्होंने अपनी आवाज और गायकी से लोगों का ध्यान खींचा और यहीं से उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई। उनकी प्रतिभा को पहचान मिली और उन्हें फिल्मों में काम करने का अवसर मिला। उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ फिल्म Devdas साबित हुई। इस फिल्म में उनके अभिनय और गायन ने दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा और वे रातों रात लोकप्रिय हो गए। इस फिल्म के गीतों ने उस दौर में संगीत को एक नई पहचान दी और सहगल को घर घर में मशहूर कर दिया। केएल सहगल की आवाज की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भावनात्मक गहराई और अनोखी शैली थी। उनकी गायकी में दर्द, सादगी और शास्त्रीय संगीत का सुंदर मिश्रण था, जिसने उन्हें अपने समय का सबसे अलग और प्रभावशाली गायक बना दिया। उनकी आवाज केवल मनोरंजन नहीं थी बल्कि एक भावनात्मक अनुभव बन गई थी। उन्होंने मिर्जा गालिब की रचनाओं को भी अपनी आवाज में एक नया जीवन दिया। उनकी प्रस्तुतियों ने ग़ज़ल गायकी को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोग उनकी आवाज को ग्रामोफोन रिकॉर्ड के माध्यम से सुनना पसंद करते थे और उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। उनकी सफलता के साथ-साथ जीवन में संघर्ष और चुनौतियां भी जुड़ी रहीं। लगातार काम का दबाव और जीवनशैली की समस्याओं ने उनके स्वास्थ्य पर असर डाला। फिर भी उन्होंने अपने संगीत और अभिनय से कभी समझौता नहीं किया और लगातार दर्शकों के दिलों पर छाप छोड़ते रहे। भारतीय संगीत जगत की महान गायिका Lata Mangeshkar ने उन्हें अपना प्रेरणास्रोत माना, जो उनकी महानता को दर्शाता है। कई कलाकारों ने उनकी शैली को आदर्श मानकर अपने करियर को आगे बढ़ाया। उनकी आवाज और शैली आज भी संगीत प्रेमियों के बीच सम्मान के साथ याद की जाती है। मात्र 42 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके गीत, उनका अभिनय और उनकी संगीत विरासत आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में जीवित है। उन्हें हमेशा उस कलाकार के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने संघर्ष से शुरुआत कर भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान और ऊंचाई दी।

क्रिकेट इतिहास का अनोखा रिकॉर्ड, वीनू मांकड़ ने हर बल्लेबाजी क्रम पर खेलकर रचा इतिहास

नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट इतिहास में Vinoo Mankad का नाम महान ऑलराउंडर्स में शुमार किया जाता है। उनका करियर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने भारतीय क्रिकेट को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह है कि वह भारत के इकलौते ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 1 से लेकर 11 नंबर तक हर क्रम पर बल्लेबाजी की। जन्म और शुरुआती सफरवीनू मांकड़ का जन्म 12 अप्रैल 1917 को Jamnagar में हुआ था। उनका पूरा नाम मुलवंतराय हिम्मतलाल मांकड़ था। दाएं हाथ के बल्लेबाज और बाएं हाथ के स्पिन गेंदबाज के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने जून 1946 में England national cricket team के खिलाफ अपना टेस्ट डेब्यू किया और धीरे-धीरे भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में शामिल हो गए। भारत की पहली टेस्ट जीत के नायकभारतीय क्रिकेट के इतिहास में India first Test win 1952 एक ऐतिहासिक पल रहा, जिसमें वीनू मांकड़ हीरो बनकर उभरे। चेन्नई में खेले गए इस मुकाबले में इंग्लैंड ने पहली पारी में 266 रन बनाए, लेकिन मांकड़ ने शानदार गेंदबाजी करते हुए 8 विकेट झटके। भारत ने जवाब में 457/9 रन बनाकर बड़ी बढ़त हासिल की। दूसरी पारी में भी मांकड़ का जादू चला और उन्होंने 4 विकेट लेकर इंग्लैंड को 183 रन पर समेट दिया। भारत ने यह मैच पारी और 8 रन से जीता। मांकड़ ने मैच में कुल 12 विकेट लेकर इतिहास रच दिया। शानदार ऑलराउंड प्रदर्शन 1946 से 1959 के बीच मांकड़ ने भारत के लिए 44 टेस्ट मैच खेले। इस दौरान उन्होंने 2,109 रन बनाए, जिसमें 5 शतक और 6 अर्धशतक शामिल हैं। उनका सर्वोच्च स्कोर 231 रन रहा। गेंदबाजी में भी उन्होंने कमाल किया और 162 विकेट अपने नाम किए। एक पारी में 5 विकेट लेने का कारनामा उन्होंने 8 बार किया। घरेलू क्रिकेट में भी दबदबावीनू मांकड़ ने Maharashtra, Gujarat, Bengal, Saurashtra, Mumbai और Rajasthan के लिए घरेलू क्रिकेट खेला। 233 प्रथम श्रेणी मैचों में उन्होंने 11,591 रन बनाए और 782 विकेट झटके, जो उनकी ऑलराउंड क्षमता का बेहतरीन उदाहरण है। ‘मांकड़िंग’ की कहानीक्रिकेट में ‘मांकड़िंग’ शब्द की शुरुआत भी वीनू मांकड़ से ही हुई। 1947 में उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज Bill Brown को नॉन-स्ट्राइकर एंड पर क्रीज छोड़ने पर रनआउट किया था। हालांकि, उन्होंने पहले चेतावनी भी दी थी। लंबे समय तक इस तरह के रनआउट को ‘मांकड़िंग’ कहा जाता रहा। आज भी यह नियम चर्चा का विषय बना रहता है। सम्मान और विरासतभारत सरकार ने 1973 में उन्हें Padma Bhushan से सम्मानित किया। उनके सम्मान में Board of Control for Cricket in India अंडर-19 स्तर पर ‘वीनू मांकड़ ट्रॉफी’ का आयोजन करती है। 21 अगस्त 1978 को 61 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा। भारतीय क्रिकेट का अनमोल सितारावीनू मांकड़ सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट की नींव रखने वाले महान हस्तियों में से एक थे। उनकी ऑलराउंड प्रतिभा, समर्पण और रिकॉर्ड उन्हें हमेशा खास बनाते हैं। वीनू मांकड़ भारत के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने 1 से 11 तक हर क्रम पर बल्लेबाजी की और देश की पहली टेस्ट जीत में अहम भूमिका निभाई।

IPL 2026: टॉस PBKS के नाम, SRH पहले करेगी बल्लेबाजी- जानें प्लेइंग इलेवन

नई दिल्ली। आईपीएल 2026 के 17वें मुकाबले में Punjab Kings और Sunrisers Hyderabad आमने-सामने हैं। न्यू पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम में खेले जा रहे इस मैच में पंजाब के कप्तान Shreyas Iyer ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया है। “विकेट को समझना जरूरी” – श्रेयस अय्यरटॉस के बाद श्रेयस अय्यर ने कहा कि यह दिन का मैच है और टीम पहले गेंदबाजी करके पिच का व्यवहार समझना चाहती है। उन्होंने बताया कि पिछले मैचों में भी यही रणनीति कारगर रही है। अय्यर ने टीम के युवाओं का समर्थन करने पर भी जोर दिया और कहा कि ज्यादा निर्देश देने से बेहतर है कि खिलाड़ी अपने प्राकृतिक खेल पर ध्यान दें। उन्होंने प्लेइंग इलेवन में एक बदलाव की जानकारी दी, जिसमें नेहाल की जगह प्रियांश को मौका मिला है। “पहले गेंदबाजी पसंद करते” – ईशान किशनवहीं Ishan Kishan ने कहा कि वे भी पहले गेंदबाजी करना चाहते थे, लेकिन अब टीम को पहली पारी में अच्छा स्कोर खड़ा करना होगा। उन्होंने माना कि कप्तान Pat Cummins की गैरमौजूदगी टीम के लिए बड़ा झटका है, लेकिन युवा गेंदबाजों से अच्छी उम्मीदें हैं। एसआरएच ने इस मैच में दो बदलाव किए हैं। पंजाब की जीत की लय बरकरार रखने की कोशिशपंजाब किंग्स इस सीजन शानदार फॉर्म में है। टीम अब तक अपराजेय रही है और 3 मैचों में 2 जीत व 1 रद्द मुकाबले के साथ 5 अंक लेकर अंकतालिका में दूसरे स्थान पर है। ऐसे में टीम की कोशिश इस मैच को जीतकर अपनी जीत की लय बनाए रखने की होगी। SRH की नजर वापसी परदूसरी ओर, सनराइजर्स हैदराबाद का प्रदर्शन अब तक उतार-चढ़ाव भरा रहा है। टीम 3 मैचों में 1 जीत और 2 हार के साथ छठे स्थान पर है। पिछले मैच में हार के बाद SRH इस मुकाबले में जीत हासिल कर वापसी करना चाहेगी। पंजाब किंग्स की प्लेइंग इलेवनप्रियांश आर्य, प्रभसिमरन सिंह (विकेटकीपर), कूपर कोनोली, श्रेयस अय्यर (कप्तान), शशांक सिंह, मार्कस स्टोइनिस, मार्को जेनसन, जेवियर बार्टलेट, विजयकुमार वैशाक, Arshdeep Singh, Yuzvendra Chahal। सनराइजर्स हैदराबाद की प्लेइंग इलेवनट्रेविस हेड, Abhishek Sharma, ईशान किशन (विकेटकीपर), हेनरिक क्लासेन, सलिल अरोड़ा, अनिकेत वर्मा, नीतीश कुमार रेड्डी, हर्ष दुबे, शिवांग कुमार, हर्षल पटेल, इशान मलिंगा। मुकाबला होगा दिलचस्पदोनों टीमों की मौजूदा फॉर्म और संतुलन को देखते हुए यह मुकाबला बेहद रोमांचक होने की उम्मीद है। जहां पंजाब अपनी जीत की लय जारी रखना चाहेगी, वहीं हैदराबाद वापसी कर अंकतालिका में ऊपर चढ़ने की कोशिश करेगी।

साउथ सिनेमा में पाइरेसी का बढ़ता खतरा बड़े बजट की फिल्मों के लिए बनी बड़ी चुनौती

नई दिल्ली।फिल्म निर्माण केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि एक बेहद जटिल और महंगा रचनात्मक कार्य है, जिसमें करोड़ों रुपये का निवेश, वर्षों की मेहनत और हजारों लोगों की भागीदारी शामिल होती है। किसी भी फिल्म के पीछे निर्माता की पूंजी के साथ-साथ कलाकारों, निर्देशकों और तकनीकी टीम के सपने और करियर भी जुड़े होते हैं। ऐसे में फिल्म का लीक होना केवल आर्थिक नुकसान नहीं बल्कि पूरी रचनात्मक प्रक्रिया पर गहरा आघात माना जाता है। दक्षिण भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों में पाइरेसी एक गंभीर चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई है। बड़े बजट की फिल्मों के रिलीज से पहले या रिलीज के तुरंत बाद लीक होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिससे पूरी फिल्म इंडस्ट्री में चिंता का माहौल बना हुआ है। हाल ही में एक बड़ी फिल्म को लेकर भी इसी तरह की स्थिति सामने आई, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था और सख्त करने की मांग तेज हो गई। इस तरह की समस्या केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रही है, बल्कि कई बड़ी और सफल फिल्मों को भी इसका सामना करना पड़ा है। Pushpa 2: The Rule जैसी चर्चित फिल्मों के रिलीज के बाद उनके कुछ हिस्से अवैध रूप से इंटरनेट पर फैल गए, जिससे निर्माताओं को बॉक्स ऑफिस पर असर झेलना पड़ा। इसी तरह KGF Chapter 2 के मामले में भी रिलीज के बाद पाइरेसी का प्रभाव देखने को मिला। फिल्म के कई सीन और क्लिप्स विभिन्न अनधिकृत प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से साझा किए गए, जिससे दर्शकों के थिएटर अनुभव और फिल्म की कमाई दोनों पर असर पड़ा। पाइरेसी की समस्या केवल रिलीज के बाद ही नहीं, बल्कि प्रमोशन चरण में भी सामने आती है। RRR जैसी बड़ी फिल्म के कुछ महत्वपूर्ण दृश्य और गाने रिलीज से पहले ही लीक हो गए थे, जिससे निर्माताओं की मार्केटिंग रणनीति प्रभावित हुई और उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने पड़े। इसी तरह भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक Baahubali 2: The Conclusion के दौरान भी लीक की घटनाएं सामने आई थीं। फिल्म के कुछ अहम दृश्य और क्लाइमेक्स से जुड़े हिस्सों के बाहर आने के बाद प्रोडक्शन टीम को सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ी थी ताकि आगे किसी तरह की जानकारी लीक न हो सके। फिल्म उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि पाइरेसी केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि यह पूरी टीम की मेहनत और रचनात्मक ऊर्जा को भी प्रभावित करती है। एक फिल्म को बनाने में वर्षों की योजना और भावनात्मक जुड़ाव होता है, और उसका असमय लीक होना पूरी प्रक्रिया को कमजोर कर देता है। डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ पाइरेसी की चुनौती और गंभीर होती जा रही है। अब कंटेंट को कुछ ही समय में कॉपी कर विभिन्न अनधिकृत प्लेटफॉर्म्स पर फैलाया जा सकता है, जिससे इसे रोकना और भी कठिन हो गया है। यही कारण है कि फिल्म निर्माता अब तकनीकी सुरक्षा, निगरानी और कानूनी उपायों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। साउथ सिनेमा सहित पूरे भारतीय फिल्म उद्योग के लिए पाइरेसी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है, जिसके समाधान के लिए तकनीक, कानून और दर्शकों की जागरूकता तीनों स्तर पर मजबूत प्रयासों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

-कैलाश चन्द्रभारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जितना विशाल है, उतना ही जटिल भी है। इस जटिलता के बीच आज हमारे सामने दो वास्तविकताएँ खड़ी हैं। पहली, भारत के ग्यारह करोड़ से अधिक घुमन्तु, अर्धघुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजाति समुदाय जिन्हें डीएनटी, एनटी और एसएनटी के रूप में भी जाना जाता है, जोकि आज भी पहचान, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों की बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी ओर एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय का मुद्दा है, जिसकी जनसंख्या लगभग पाँच से छह लाख मानी जाती है, किन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसकी उपस्थिति अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही है। एक ओर इतनी विशाल आबादी है जो अदृश्य बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर एक छोटा समुदाय वैश्विक एजेंडों और वित्तीय तंत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय बहस को प्रभावित कर रहा है। इस विरोधाभास ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हमारे राष्ट्रीय मुद्दों पर वैश्विक एजेंडों का कब्जा हो रहा है। भारत का जनजाति समाज गौरव, संघर्ष और उपेक्षा की एक लंबी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। भारत की जनजातियाँ, चाहे वे अनुसूचित जनजाति हों या घुमन्तु और अर्धघुमन्तु समुदाय, सदियों से भारतीय सभ्यता का अभिन्न अंग रही हैं। उनकी विवाह परम्पराएँ, कृषि-कौशल, वन-ज्ञान, संगीत और नृत्य की परम्परा, आत्मनिर्भर जीवन शैली और सांस्कृतिक स्वायत्तता, ये सभी भारतीय समाज के मूल स्वरूप से ही उत्पन्न हुए हैं, लेकिन औपनिवेशिक दौर में इनके परिचय को लेकर जान-बूझकर भ्रम पैदा किया गया। मैक्समूलर और मैकाले जैसे विद्वानों ने इंडीजिनस, एबोरिजिनल और ट्राइब जैसे विदेशी शब्दों को थोपकर भारतीय जनजाति समाज को मुख्यधारा से अलग दिखाने का प्रयास किया। ब्रिटिश शासन के लिए इसका उद्देश्य स्पष्ट था, वन-संपदा, खनिज और भूमि पर अपना अधिपत्य स्थापित करना। उद्योगों के विस्तार के नाम पर वन समुदायों के अधिकारों को कमजोर किया गया और क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871) जैसे कानूनों ने पूरे के पूरे समुदायों को अपराधी घोषित कर दिया। यह कलंक आज भी कई क्षेत्रों में सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बना हुआ है। स्वतंत्र भारत में भी यह उपेक्षा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। रेंके कमीशन (2008) और इडेट कमीशन (2018) की रिपोर्टों के अनुसार देश में आठ से ग्यारह करोड़ के बीच घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजातियाँ हैं, किंतु अब तक किसी भी जनगणना में इन्हें अलग श्रेणी के रूप में स्थान नहीं मिला है। सत्तर से अस्सी प्रतिशत लोगों के पास स्थायी पता, पहचान पत्र या आवास संबंधी दस्तावेज तक नहीं हैं। सरकारी योजनाएँ इन तक पहुँच ही नहीं पातीं, जिससे शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। रोजगार और आजीविका के अवसर भी इनके लिए बेहद सीमित हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब इतनी बड़ी आबादी अपनी बुनियादी पहचान तक से वंचित है, तब इसे राष्ट्रीय विमर्श में स्थान क्यों नहीं मिलता? इसके विपरीत एलजीबीटीक्यू प्लस विमर्श का वैश्विक स्तर पर तीव्र उत्थान देखा जा रहा है। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि इस समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की बुनियादी जिम्मेदारी है, किंतु जब हम तुलना के स्तर पर देखते हैं तो एक स्पष्ट असंतुलन सामने आता है। एक ओर पाँच से छह लाख की अनुमानित आबादी वाला समुदाय है, जिसे राष्ट्रीय विमर्श में अत्यधिक स्थान प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर आठ से ग्यारह करोड़ की घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजातियाँ हैं, जिन्हें लगभग नगण्य स्थान मिलता है। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? अब इसे गहराई से समझें तो इसका एक उत्तर वैश्विक फंडिंग नेटवर्क में दिखाई देता है। फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन्स, रॉकफेलर नेटवर्क, ह्यूमन राइट्स फंड, यूएनडीपी इन्क्लूजन फंड और वैश्विक कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व तंत्र जैसी संस्थाएँ भारतीय विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया मंचों, सांस्कृतिक आयोजनों और डिजिटल अभियानों में भारी निवेश कर रही हैं। यह निवेश मुख्य रूप से एलजीबीटीक्यू प्लस और जेंडर फ्लुइडिटी जैसे एजेंडों के विस्तार के लिए किया जा रहा है। आँकड़े बताते हैं कि पिछले पाँच वर्षों में ऐसे विषयों पर आधारित कार्यक्रमों और उत्सवों में दो सौ से चार सौ प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जिनमें साहित्यिक उत्सव, फिल्म समारोह, सामाजिक मीडिया संवाद और जेंडर आधारित चर्चाएँ प्रमुख हैं। इसके विपरीत यही समय अवधि ऐसी रही है, जिसमें घुमन्तु समाज पर राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा आयोजन देखने को नहीं मिला। ब्रांडिंग और वास्तविक मुद्दों के बीच यह अंतर भी इस असंतुलन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि एलजीबीटीक्यू प्लस विषय शहरी ब्रांडिंग के अनुकूल है, कॉरपोरेट प्रगतिशीलता के मॉडल से मेल खाता है। यह पश्चिमी राजनीतिक एजेंडों के अनुरूप है और मीडिया तथा एलीट वर्ग के लिए प्रतिष्ठा का विषय भी बन चुका है, इसलिए इसे वित्तीय सहयोग और मंच उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। इसके विपरीत घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजातियाँ न तो शहरी परिवेश का हिस्सा हैं, न ही उनके पास सामाजिक या डिजिटल प्रभाव है। वे बाजार या मीडिया के लिए तथाकथित रूप से आकर्षक नहीं मानी जातीं और न ही उनकी कहानी वैश्विक विमर्श के अनुरूप प्रस्तुत की जाती है। परिणामस्वरूप वे ब्रांड वैल्यू नहीं बन पातीं और विमर्श से बाहर रह जाती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी यह असंतुलन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख विश्वविद्यालयों ने जेंडर फ्लुइडिटी, क्वीयर स्टडीज और सेक्सुअलिटी करिकुलम जैसे विषयों को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। वहीं दूसरी ओर घुमन्तु जनजातियों का इतिहास, उनकी परम्पराएँ, उनकी कला, भाषा और संस्कृति, तथा औपनिवेशिक शोषण का उनका अनुभव, इन सभी विषयों पर राष्ट्रीय स्तर का कोई ठोस अकादमिक कार्यक्रम उपलब्ध नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत की शिक्षा प्रणाली भी कहीं न कहीं वैश्विक एजेंडों से प्रभावित हो रही है। अब यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या वास्तव में असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा रहा है? राष्ट्रीय विमर्श का यह असंतुलन केवल संयोग नहीं प्रतीत होता, बल्कि इसके पीछे कई कारक कार्य कर रहे हैं। पहला, कॉरपोरेट और वैश्विक एजेंडा, जिसके तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी ब्रांड छवि को प्रगतिशील दिखाने के लिए कुछ विशेष विषयों को प्राथमिकता देती हैं। दूसरा, विदेशी गैर-सरकारी संगठन तंत्र,

वैभव सूर्यवंशी का तूफान! बुमराह-हेजलवुड की धुनाई के बाद दिया बेबाक जवाब

नई दिल्ली। आईपीएल 2026 में Rajasthan Royals के युवा स्टार Vaibhav Suryavanshi ने अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से हर किसी को हैरान कर दिया है। बरसापारा क्रिकेट स्टेडियम में Royal Challengers Bengaluru के खिलाफ खेले गए मुकाबले में वैभव ने 26 गेंदों पर 78 रन की तूफानी पारी खेलकर टीम को शानदार जीत दिलाई और प्लेयर ऑफ द मैच बने। “बॉलर नहीं, सिर्फ गेंद पर रहता है फोकस”मैच के बाद वैभव सूर्यवंशी ने अपनी सफलता का राज बताते हुए बेहद दिलचस्प बयान दिया। उन्होंने कहा कि बल्लेबाजी करते समय वह गेंदबाज के नाम या कद से प्रभावित नहीं होते। उन्होंने साफ कहा, “मैं बल्लेबाजी के दौरान सिर्फ गेंद को देखता हूं, गेंदबाज को नहीं। चाहे सामने Jasprit Bumrah हों या Josh Hazlewood, मैं गेंद के हिसाब से ही शॉट खेलता हूं। उनकी यही बेखौफ सोच उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है और यही वजह है कि वह लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। आउट होने पर रहता है अफसोसवैभव ने अपनी बल्लेबाजी को लेकर एक और अहम बात कही। उन्होंने माना कि आउट होने के बाद उन्हें काफी निराशा होती है। उनके मुताबिक, “अगर मैं क्रीज पर टिका रहूं तो टीम के लिए 10-20 रन और जोड़ सकता हूं या लक्ष्य का पीछा करते समय मैच जल्दी खत्म कर सकता हूं। गलत शॉट खेलकर आउट होना टीम को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए मुझे अफसोस होता है। यह सोच दिखाती है कि इतनी कम उम्र में भी वैभव टीम के लिए जिम्मेदारी को अच्छी तरह समझते हैं। परिवार और कोच का बड़ा योगदानइस युवा बल्लेबाज ने अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार और कोचिंग स्टाफ को दिया। उन्होंने बताया कि उनके पिता और कोच लगातार उन्हें गाइड करते रहते हैं। इसके अलावा टीम में मौजूद उनके गार्जियन रोमी सर भी उन्हें सही दिशा दिखाते हैं। वैभव के अनुसार, सभी उन्हें यही समझाते हैं कि क्रिकेट एक लंबा सफर है और ध्यान सिर्फ अपने खेल और प्रोसेस पर होना चाहिए। मैच का पूरा रोमांचमुकाबले में आरसीबी ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 201 रन का मजबूत स्कोर बनाया। कप्तान Rajat Patidar ने 63 रन, Virat Kohli ने 32 रन, वेंकटेश अय्यर ने 29 और रोमारियो शेफर्ड ने 22 रन का योगदान दिया। लक्ष्य का पीछा करने उतरी राजस्थान की शुरुआत अच्छी नहीं रही और Yashasvi Jaiswal जल्दी आउट हो गए। लेकिन इसके बाद वैभव सूर्यवंशी और Dhruv Jurel ने मैच का रुख पूरी तरह बदल दिया। दोनों के बीच दूसरे विकेट के लिए 37 गेंदों में 108 रन की साझेदारी हुई, जिसने आरसीबी को मुकाबले से बाहर कर दिया। वैभव के आउट होने के बाद जुरेल (81*) और Ravindra Jadeja (24*) ने नाबाद साझेदारी कर टीम को 2 ओवर पहले ही जीत दिला दी। ऑरेंज कैप पर भी कब्जाइस शानदार पारी के साथ वैभव सूर्यवंशी आईपीएल 2026 में ऑरेंज कैप होल्डर भी बन गए हैं। लगातार शानदार प्रदर्शन के चलते वह इस सीजन के सबसे बड़े उभरते सितारे बन चुके हैं। टीम के लिए गेम चेंजर बन रहे वैभवराजस्थान रॉयल्स के लिए वैभव सूर्यवंशी इस समय सबसे बड़े मैच विनर बनकर उभरे हैं। उनकी आक्रामक बल्लेबाजी और निडर सोच टीम को हर मैच में बढ़त दिला रही है। अगर उनका यही फॉर्म जारी रहता है, तो वह इस सीजन में कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम कर सकते हैं और टीम को खिताब दिलाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

वीआईपी दर्शन के बढ़ते चलन में आम श्रद्धालु कहाँ खड़ा है?

डॉ. सत्यवान सौरभ भारत जैसे देश में जहाँ धर्म और आस्था केवल व्यक्तिगत विश्वास का विषय नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं वहाँ मंदिरों और तीर्थ स्थलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। ये स्थान सदियों से समानता शांति और आध्यात्मिक संतुलन के प्रतीक माने जाते रहे हैं। भगवान के दरबार में सब बराबर हैं यह वाक्य केवल एक आदर्श नहीं बल्कि भारतीय समाज की गहरी मान्यता रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगते दिखाई दे रहे हैं। देश के कई प्रमुख मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर वीआईपी दर्शन विशेष पूजन अभिषेक और आरती के नाम पर भारी शुल्क वसूले जा रहे हैं। इन सेवाओं के बदले श्रद्धालुओं को लंबी कतारों से मुक्ति कम समय में दर्शन और अधिक सुविधाजनक अनुभव दिया जाता है। पहली नजर में यह व्यवस्था एक विकल्प के रूप में दिखाई देती है लेकिन जब इसका असर आम श्रद्धालुओं के अनुभव पर पड़ता है तब यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बन जाती है। आज स्थिति यह है कि एक ओर वे लोग हैं जो अतिरिक्त पैसे देकर कुछ ही मिनटों में आराम से दर्शन कर लेते हैं वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में आम लोग घंटों कभी कभी पूरे दिन कतारों में खड़े रहते हैं। इस दौरान उन्हें भीड़ धक्का मुक्की बदतमीजी और कई बार मारपीट जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह अनुभव केवल असुविधाजनक नहीं बल्कि अपमानजनक भी होता है विशेषकर तब जब व्यक्ति अपनी आस्था और श्रद्धा के साथ वहां पहुंचा हो। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आस्था भी अब एक प्रीमियम सेवा बनती जा रही है? क्या भगवान के दर्शन के लिए भी आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव होना चाहिए? यह स्थिति केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमारे समाज में बढ़ती असमानता का प्रतिबिंब भी है। राशन की दुकानों से लेकर गैस सिलेंडर की लाइन तक और अब मंदिरों तक मिडल क्लास और आम आदमी के हिस्से में अक्सर अव्यवस्था और संघर्ष ही आता है। वीआईपी संस्कृति के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि इससे मंदिरों को अतिरिक्त राजस्व मिलता है जिससे उनकी व्यवस्था और सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सकता है। यह तर्क कुछ हद तक सही भी है। बड़े मंदिरों में रोजाना लाखों श्रद्धालु आते हैं जिनकी व्यवस्था करना आसान नहीं होता। ऐसे में यदि कुछ लोग अतिरिक्त शुल्क देकर अलग व्यवस्था चाहते हैं तो उससे प्राप्त धन का उपयोग सार्वजनिक सुविधाओं में किया जा सकता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह व्यवस्था असंतुलित हो जाती है। जब वीआईपी सुविधाएं इतनी अधिक हो जाती हैं कि आम श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध संसाधन और समय कम पड़ने लगते हैं तब यह एक प्रकार का अन्याय बन जाता है। कई बार देखा गया है कि वीआईपी दर्शन के लिए सामान्य कतारों को रोका जाता है जिससे आम लोगों का इंतजार और बढ़ जाता है। इससे असंतोष और आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। इसके अलावा मंदिरों में कार्यरत कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई मामलों में आम श्रद्धालुओं के साथ कठोर और अपमानजनक व्यवहार किया जाता है जबकि वीआईपी लोगों के साथ अत्यधिक विनम्रता दिखाई जाती है। यह दोहरा व्यवहार समाज में पहले से मौजूद वर्ग विभाजन को और गहरा करता है। धार्मिक स्थलों की मूल भावना पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं होते बल्कि वे मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन के केंद्र होते हैं। जब वहां पहुंचने वाला व्यक्ति अव्यवस्था भीड़ और भेदभाव का सामना करता है तो उसकी आध्यात्मिक अनुभूति प्रभावित होती है। यह अनुभव उसे निराश और हताश कर सकता है। इस समस्या का समाधान आसान नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं। सबसे पहले मंदिर प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वीआईपी सेवाओं की संख्या और प्रभाव सीमित रहे। इन सेवाओं का उद्देश्य केवल अतिरिक्त सुविधा प्रदान करना होना चाहिए न कि आम श्रद्धालुओं के अधिकारों को कम करना। दूसरा भीड़ प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। ऑनलाइन बुकिंग टाइम स्लॉट सिस्टम और डिजिटल कतार प्रबंधन जैसे उपायों से भीड़ को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। इससे सभी श्रद्धालुओं को एक व्यवस्थित और सम्मानजनक अनुभव मिल सकता है। तीसरा कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों को संवेदनशीलता और शिष्टाचार का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। हर श्रद्धालु चाहे वह वीआईपी हो या आम व्यक्ति सम्मान का पात्र है। यह भावना केवल नीतियों में नहीं बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। चौथा सरकार और संबंधित ट्रस्टों को इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशा निर्देश बनाने चाहिए। धार्मिक स्थलों पर समानता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।अंततः यह भी जरूरी है कि समाज स्वयं इस मुद्दे पर जागरूक हो। जब तक लोग इस असमानता को सामान्य मानते रहेंगे तब तक इसमें बदलाव आना कठिन है। आस्था का अर्थ केवल पूजा पाठ नहीं बल्कि समानता करुणा और न्याय जैसे मूल्यों को अपनाना भी है। आज समय आ गया है कि हम यह सोचें कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ भगवान के दर्शन भी पैसे और पहुँच के आधार पर तय होंगे? या हम उस मूल भावना को बचाए रखेंगे जिसमें हर व्यक्ति को समान अधिकार और सम्मान प्राप्त हो? मंदिरों की पवित्रता केवल उनकी भव्यता या व्यवस्था से नहीं बल्कि वहां मिलने वाले अनुभव से तय होती है। यदि वह अनुभव भेदभाव और असमानता से भरा होगा तो आस्था की नींव कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए यह जरूरी है कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लें और मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाएं जहाँ हर श्रद्धालु को यह महसूस हो कि वह वास्तव में भगवान के दरबार में है जहाँ सब बराबर हैं।

IPL 2026: RR टॉप पर कायम, वैभव-बिश्नोई की चमक से टीम मजबूत

नई दिल्ली। आईपीएल 2026 में Rajasthan Royals का शानदार प्रदर्शन लगातार जारी है। गुवाहाटी के बरसापारा क्रिकेट स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में टीम ने Royal Challengers Bengaluru को 6 विकेट से हराकर न सिर्फ जीत का चौका लगाया, बल्कि अंकतालिका में भी अपनी बादशाहत कायम रखी। इस जीत के साथ राजस्थान 4 मैचों में 4 जीत और 8 अंकों के साथ टॉप पर मजबूती से काबिज है। वैभव सूर्यवंशी की तूफानी पारी ने बदला मैच का रुखइस मुकाबले में सबसे बड़ी भूमिका युवा बल्लेबाज Vaibhav Suryavanshi ने निभाई। उन्होंने सिर्फ 26 गेंदों पर 78 रनों की विस्फोटक पारी खेलकर मैच को एकतरफा बना दिया। उनकी इस पारी में 7 छक्के और 8 चौके शामिल रहे। वैभव ने शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया और आरसीबी के गेंदबाजों को संभलने का मौका नहीं दिया। उनका साथ Dhruv Jurel ने बखूबी निभाया, जिन्होंने 43 गेंदों पर 81 रन बनाकर टीम को जीत तक पहुंचाया। अंत में Ravindra Jadeja ने 24 रन बनाकर मैच को फिनिश किया। आरसीबी की मजबूत शुरुआत बेकार गईइससे पहले आरसीबी ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 201 रनों का मजबूत स्कोर खड़ा किया था। कप्तान Rajat Patidar ने 63 रन की शानदार पारी खेली, जबकि Virat Kohli ने 32 रन बनाए। इसके अलावा वेंकटेश अय्यर (29) और रोमारियो शेफर्ड (22) ने भी योगदान दिया। हालांकि, इतने बड़े स्कोर के बावजूद आरसीबी के गेंदबाज राजस्थान की आक्रामक बल्लेबाजी के सामने बेबस नजर आए। अंकतालिका में RR का दबदबाइस जीत के बाद राजस्थान रॉयल्स ने अंकतालिका में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। टीम 4 में से 4 मुकाबले जीतकर 8 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। दूसरे स्थान पर Punjab Kings 5 अंकों के साथ मौजूद है, जबकि आरसीबी और Delhi Capitals 4-4 अंकों के साथ क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। इसके अलावा Lucknow Super Giants पांचवें, Sunrisers Hyderabad छठे, Gujarat Titans सातवें, Mumbai Indians आठवें, Kolkata Knight Riders नौवें और Chennai Super Kings दसवें स्थान पर है। ऑरेंज और पर्पल कैप भी RR के नामइस सीजन में राजस्थान रॉयल्स का दबदबा सिर्फ टीम प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत उपलब्धियों में भी टीम आगे है। सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में वैभव सूर्यवंशी 4 मैचों में 200 रन बनाकर ऑरेंज कैप होल्डर बन गए हैं। वहीं गेंदबाजी में Ravi Bishnoi 4 मैचों में 9 विकेट लेकर पर्पल कैप अपने नाम किए हुए हैं। टीम वर्क बना जीत की असली ताकतराजस्थान रॉयल्स की इस सफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह टीम का सामूहिक प्रदर्शन है। बल्लेबाजी में जहां युवा खिलाड़ियों ने जिम्मेदारी उठाई, वहीं गेंदबाजों ने भी जरूरत के समय विकेट लेकर टीम को मैच में बनाए रखा। अगर टीम इसी तरह संतुलित प्रदर्शन करती रही, तो इस सीजन में उसे खिताब का प्रबल दावेदार माना जा सकता है।