लिपुलेख पर फिर गरमाया विवाद: कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल का कड़ा विरोध, भारत-चीन को भेजा प्रोटेस्ट नोट

नई दिल्ली। नेपाल ने एक बार फिर Lipulekh Pass को लेकर भारत और चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। काठमांडू ने 2026 की Kailash Mansarovar Yatra यात्रा को लिपुलेख मार्ग से कराने की योजना पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है। नेपाल का कहना है कि यह क्षेत्र उसके “अभिन्न भूभाग” का हिस्सा है और यहां किसी भी तरह की गतिविधि उसके बिना सहमति के स्वीकार नहीं की जाएगी। नेपाल का कड़ा संदेशनेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों को प्रोटेस्ट नोट भेजते हुए स्पष्ट किया है कि लिपुलेख क्षेत्र पर उसका ऐतिहासिक और कानूनी दावा है। काठमांडू का आरोप है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर उसे न तो जानकारी दी गई और न ही उसकी सहमति ली गई। भारत की यात्रा योजनाभारत सरकार ने घोषणा की है कि 2026 में कैलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी। इस दौरान यात्रियों के लिए दो मार्ग तय किए गए हैं—सिक्किम का नाथू ला और उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन भी शुरू हो चुका है। सीमा विवाद की पुरानी जड़ेंइस विवाद की जड़ें 1816 की Treaty of Sugauli से जुड़ी हैं। नेपाल का दावा है कि काली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से है, जिससे लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र उसके हिस्से में आते हैं।वहीं भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत पूर्व की ओर है और यह क्षेत्र भारतीय प्रशासन के अंतर्गत आता है। 1962 के युद्ध के बाद भारत ने इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत की थी। 2020 में बढ़ा तनावमई 2020 में भारत द्वारा धारचूला-लिपुलेख सड़क परियोजना के उद्घाटन के बाद नेपाल ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी और नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने हिस्से में दिखाया था। चीन भी बना अहम पक्षइस विवाद में चीन भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है। 2015 और 2025 में भारत-चीन के बीच इस दर्रे को व्यापार और यात्रा के लिए खोलने पर सहमति बनी थी, जिसमें नेपाल शामिल नहीं था। इसी वजह से काठमांडू की नाराजगी और बढ़ती जा रही है। नेपाल ने साफ किया है कि वह इस मुद्दे को कूटनीतिक स्तर पर लगातार उठाता रहेगा। हालांकि भारत और चीन की रणनीतिक प्राथमिकताओं को देखते हुए इस विवाद का समाधान फिलहाल आसान नजर नहीं आता। फिलहाल यह मुद्दा एक बार फिर हिमालयी राजनीति और दक्षिण एशिया के कूटनीतिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है।
कराची में ‘गर्मी का कहर’ या सिस्टम की नाकामी? 46°C महसूस तापमान ने खोली पानी-बिजली संकट की पोल, टैंकर माफिया पर उठे सवाल

नई दिल्ली। पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर Karachi इन दिनों भीषण गर्मी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। तापमान भले ही 40.9°C दर्ज हुआ हो, लेकिन नमी के कारण यह 46°C जैसा महसूस किया गया, जिससे हालात और ज्यादा गंभीर हो गए हैं। गर्मी ने बढ़ाई मुश्किलेंतेज गर्मी के बीच शहर में बिजली और पानी की भारी कमी ने लोगों की जिंदगी मुश्किल बना दी है। कई इलाकों में घंटों की लोडशेडिंग और पानी की सप्लाई में कटौती ने हालात को और खराब कर दिया है। पानी का संकट गहरायाKarachi Water and Sewerage Corporation के अनुसार शहर को रोजाना लगभग 650 मिलियन गैलन पानी की जरूरत है, लेकिन सप्लाई सिर्फ 610 मिलियन गैलन ही हो पा रही है। यानी हर दिन करीब 40 मिलियन गैलन की कमी बनी हुई है।लांधी, बल्दिया टाउन और ओरंगी टाउन जैसे क्षेत्रों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है, जहां लोग मजबूरी में महंगे दामों पर टैंकर से पानी खरीदने को मजबूर हैं। टैंकर माफिया पर आरोपस्थानीय लोगों का आरोप है कि संकट का फायदा उठाकर टैंकर माफिया पानी की कीमतें बढ़ा रहा है। पानी की किल्लत के चलते आम जनता पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है। बिजली कटौती ने बढ़ाई परेशानीभीषण गर्मी के बावजूद कई इलाकों में लगातार बिजली कटौती हो रही है। इससे घरों में रहना मुश्किल हो गया है और अस्पतालों व छोटे व्यवसायों पर भी असर पड़ रहा है। सड़कों पर उतरा जनता का गुस्साहालात से परेशान लोगों ने कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन किया है। राजनीतिक दल Muttahida Qaumi Movement-Pakistan (MQM-P) ने भी सरकार पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है और प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है। विशेषज्ञों की चेतावनीविशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट केवल मौसम की वजह से नहीं, बल्कि खराब प्रशासन और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर का नतीजा है। अगर जल्द सुधार नहीं किया गया, तो कराची में स्थिति और ज्यादा बिगड़ सकती है। गर्मी, पानी की कमी और बिजली संकट ने कराची को एक बड़े मानवीय संकट की ओर धकेल दिया है। फिलहाल राहत की कोई स्पष्ट तस्वीर नजर नहीं आ रही है, जिससे लोगों की चिंता और बढ़ गई है।
पीएम मोदी का पुराना बयान फिर बना चर्चा का केंद्र, बंगाल चुनाव रुझानों ने बढ़ाया सियासी तनाव

नई दिल्ली।पश्चिम बंगाल में जारी विधानसभा चुनाव की मतगणना के बीच राजनीतिक माहौल लगातार बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। जैसे-जैसे शुरुआती रुझान सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं और नए विश्लेषणों का दौर शुरू हो गया है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पुराना बयान अचानक फिर से सुर्खियों में आ गया है, जिसने पूरे राजनीतिक वातावरण को और अधिक गर्म कर दिया है। यह बयान उस समय दिया गया था जब बिहार में भाजपा को बड़ी जीत मिली थी। उस अवसर पर प्रधानमंत्री ने राजनीतिक संकेतों के तौर पर कहा था कि बिहार की जीत का असर केवल उसी राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव आगे चलकर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है। उस समय इसे एक राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देखा गया था, लेकिन अब जब बंगाल में मतगणना के शुरुआती रुझान सामने आ रहे हैं, तो वही बयान फिर से चर्चा का विषय बन गया है। वर्तमान रुझानों में कई सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प स्थिति में पहुंच गया है। कुछ क्षेत्रों में एक दल मजबूत बढ़त बनाए हुए है, तो कुछ जगहों पर कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। इस स्थिति ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को और अधिक जटिल बना दिया है। हर राउंड की गिनती के साथ तस्वीर बदलती जा रही है, जिससे किसी भी नतीजे पर अभी अंतिम राय बनाना मुश्किल हो गया है। राज्य के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उम्मीदवारों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। मतदाताओं का रुझान अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग दिशा में जाता हुआ नजर आ रहा है, जिससे यह चुनाव और भी रोमांचक बन गया है। राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह चुनाव वास्तव में किसी बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है या फिर अंतिम परिणाम कुछ और ही तस्वीर पेश करेंगे। इसी बीच पीएम मोदी का पुराना बयान फिर से वायरल होने के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। समर्थक और विरोधी दोनों ही इसे अपने-अपने नजरिए से समझाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ लोग इसे पहले से दी गई राजनीतिक रणनीति का संकेत मान रहे हैं, तो कुछ इसे केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देख रहे हैं। लेकिन मौजूदा माहौल ने इस बयान को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। प्रशासन की ओर से भी मतगणना प्रक्रिया के दौरान पूरी सतर्कता बरती जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता या तनाव की स्थिति उत्पन्न न हो। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है और सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि परिणाम घोषित होने तक पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से पूरी हो। फिलहाल पूरे राज्य की निगाहें अंतिम परिणामों पर टिकी हुई हैं। जैसे-जैसे गिनती आगे बढ़ेगी, राजनीतिक तस्वीर और अधिक स्पष्ट होती जाएगी। लेकिन इतना तय है कि इस चुनाव ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जहां हर बयान और हर रुझान का अपना अलग राजनीतिक महत्व बन गया है।
कियारा आडवाणी की नाराजगी ने बढ़ाई मेकर्स की चिंता, बोल्ड दृश्यों को लेकर अभिनेत्री ने लिया कड़ा स्टैंड।

नई दिल्ली। दक्षिण भारतीय सुपरस्टार यश की आगामी फिल्म ‘टॉक्सिक’ इन दिनों सिनेमा प्रेमियों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। इस फिल्म को लेकर फैंस के बीच जितना उत्साह है, उतनी ही चुनौतियां मेकर्स के सामने भी आती दिख रही हैं। हाल ही में फिल्म की स्टारकास्ट और इसके दृश्यों को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है जिसने पूरी इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींचा है। फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहीं बॉलीवुड अभिनेत्री कियारा आडवाणी ने कथित तौर पर फिल्म के कुछ विशेष दृश्यों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। यह पूरा मामला फिल्म के अंतिम संपादन यानी फाइनल आउटपुट के बाद शुरू हुआ है, जहां कियारा को लगता है कि कुछ बोल्ड और इंटिमेट सीन उनके कंफर्ट जोन से बाहर चले गए हैं और वे उन्हें फिल्म में रखने के पक्ष में नहीं हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कियारा आडवाणी ने फिल्म के कुछ रोमांटिक और बोल्ड सीन्स को देखने के बाद निर्देशक गीतू मोहनदास और सुपरस्टार यश से सीधे तौर पर बातचीत की है। अभिनेत्री का मानना है कि इन दृश्यों को फिल्म से हटा देना चाहिए क्योंकि वे कहानी के प्रवाह में आवश्यक नहीं लग रहे हैं। बताया जा रहा है कि शूटिंग के दौरान कियारा को यह आश्वासन दिया गया था कि इन दृश्यों को बहुत ही सलीके और मर्यादित तरीके से दिखाया जाएगा, लेकिन फाइनल कट देखने के बाद अभिनेत्री को लगा कि परिणाम वैसा नहीं है जैसा उन्होंने सोचा था। इस असहमति के चलते फिल्म के प्रोडक्शन हाउस के भीतर काफी हलचल मची हुई है, क्योंकि यश इस फिल्म के सह-निर्माता भी हैं और फिल्म पर उनका बहुत बड़ा दांव लगा हुआ है। फिल्म ‘टॉक्सिक’ के टीजर को लेकर भी पहले काफी चर्चा हुई थी, जिसमें एक बोल्ड सीक्वेंस को लेकर सोशल मीडिया पर काफी प्रतिक्रियाएं आई थीं। शायद इसी आलोचनात्मक रुख को देखते हुए कियारा अब अपनी ऑन-स्क्रीन इमेज को लेकर अधिक सतर्क हो गई हैं। यश की यह फिल्म न केवल दक्षिण भारत बल्कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी बहुत बड़े स्तर पर रिलीज होने वाली है, ऐसे में किसी भी प्रकार का विवाद फिल्म की रिलीज और उसकी सफलता पर असर डाल सकता है। फिलहाल फिल्म की रिलीज डेट को भी आगे बढ़ा दिया गया है, जिससे यह साफ होता है कि मेकर्स अभी फिल्म के कई तकनीकी और रचनात्मक पहलुओं पर दोबारा विचार कर रहे हैं। यश के करियर की बात करें तो वह एक तरफ ‘टॉक्सिक’ को विश्व स्तरीय फिल्म बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर वह नितेश तिवारी की ‘रामायण’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट का भी हिस्सा हैं। दूसरी तरफ कियारा आडवाणी बॉलीवुड की उन गिनी-चुनी अभिनेत्रियों में शामिल हैं जिनकी एक बड़ी फैन फॉलोइंग है और वह हमेशा अपनी फिल्मों के कंटेंट को लेकर सचेत रहती हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मेकर्स कियारा की मांग मानकर उन बोल्ड दृश्यों पर कैंची चलाएंगे या फिर अभिनेत्री को मनाने की कोशिश की जाएगी। इस विवाद ने ‘टॉक्सिक’ के प्रति दर्शकों की उत्सुकता को और अधिक बढ़ा दिया है और हर कोई अब फिल्म की नई रिलीज डेट और इसके अंतिम स्वरूप का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
चुनावी रुझानों के बीच नया माहौल, महिलाओं ने बदलाव की संभावना पर जताई सकारात्मक सोच

नई दिल्ली।पश्चिम बंगाल में चुनावी रुझानों के शुरुआती संकेतों के साथ ही राज्य का राजनीतिक माहौल तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। जैसे-जैसे आंकड़ों में एक खास रुझान सामने आने लगा है, वैसे-वैसे लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम में महिलाओं की ओर से आई प्रतिक्रियाओं ने विशेष ध्यान खींचा है, जहां उन्होंने मौजूदा स्थिति को लेकर संतोष और उम्मीद दोनों जाहिर की है। कई महिलाओं ने बातचीत के दौरान कहा कि वे लंबे समय से विकास और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर बेहतर स्थिति की उम्मीद कर रही थीं। उनके अनुसार, केंद्र सरकार की नीतियों और योजनाओं ने लोगों के बीच एक नई सोच को जन्म दिया है, खासकर महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर। इसी कारण उन्हें भविष्य को लेकर सकारात्मक संकेत दिखाई दे रहे हैं। कुछ महिलाओं ने यह भी माना कि राज्य में बदलाव की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। उनका कहना है कि वे चाहती हैं कि महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक स्थिति को और मजबूत किया जाए। मौजूदा रुझानों को वे इसी बदलाव की दिशा में एक संकेत के रूप में देख रही हैं। राजनीतिक हलचल के बीच यह भी साफ दिख रहा है कि जनता अब केवल वादों से नहीं, बल्कि वास्तविक बदलाव और परिणामों से प्रभावित हो रही है। महिलाओं की प्रतिक्रियाओं में यह बात प्रमुख रूप से सामने आई कि वे ऐसे नेतृत्व को प्राथमिकता देती हैं जो विकास और सुरक्षा दोनों पर समान रूप से ध्यान दे। शुरुआती रुझानों ने जहां राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है, वहीं आम जनता की प्रतिक्रियाओं ने यह संकेत दिया है कि लोग अब अधिक जागरूक और अपेक्षाओं के साथ मतदान प्रक्रिया को देख रहे हैं। महिलाओं की उम्मीदें इस पूरे माहौल को और अधिक महत्वपूर्ण बना रही हैं, जिससे आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।
नेपाल में बड़ा प्रशासनिक झटका: 1500 से ज्यादा अधिकारियों की छुट्टी, बालेन सरकार के ‘राजनीतिक सफाई’ दावे से मचा सियासी तूफान

नई दिल्ली। नेपाल की नई राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा और विवादित फैसला सामने आया है। सरकार ने 1500 से अधिक सरकारी नियुक्तियों को रद्द कर प्रशासनिक ढांचे में भारी बदलाव कर दिया है। इस कदम को लेकर देश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति Ramchandra Paudel द्वारा जारी अध्यादेश के तहत 26 मार्च से पहले की गई सभी नियुक्तियों को अमान्य घोषित कर दिया गया है। सरकार का दावा है कि ये सभी “राजनीतिक नियुक्तियां” थीं, जिन्हें पारदर्शिता और प्रशासनिक सुधार के तहत हटाया गया है। 1594 अधिकारियों की छुट्टी, कई संस्थान प्रभावितइस फैसले के बाद कुल 1594 अधिकारियों को उनके पदों से हटाया गया है। इसका सीधा असर देश के कई प्रमुख संस्थानों पर पड़ा है, जिनमें Nepal Electricity Authority, Tribhuvan University, B.P. Koirala Institute of Health Sciences और Nepal Airlines जैसे संस्थान शामिल हैं।इन संस्थानों में शीर्ष पद खाली हो जाने से प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। सरकार का पक्ष: ‘सुधार जरूरी था’सरकार का कहना है कि यह कदम प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही बढ़ाने के लिए जरूरी था। अधिकारियों की नियुक्तियों में राजनीतिक प्रभाव को खत्म करना इसका मुख्य उद्देश्य बताया गया है। विपक्ष और विशेषज्ञों की चिंताहालांकि, विपक्ष और कई प्रशासनिक विशेषज्ञ इस फैसले को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अचानक इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों को हटाने से शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है। बालेन शाह सरकार पर नजरइस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में Balen Shah की सरकार का नाम भी चर्चा में है, जो पहले से ही “नई राजनीतिक व्यवस्था” और प्रशासनिक सुधार के एजेंडे को लेकर सक्रिय रही है। आलोचकों का मानना है कि यह कदम राजनीतिक नियंत्रण को मजबूत करने की रणनीति भी हो सकता है। नई नियुक्तियों को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया है, जिससे प्रशासनिक अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द स्थायी व्यवस्था नहीं बनी तो देश की संस्थागत कार्यप्रणाली पर असर और गहरा सकता है। फिलहाल नेपाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सुधार और अस्थिरता के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
West Bengal Election: ‘जय श्री राम’ के नारों से गूंजा BJP मुख्यालय, कोलकाता में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मनाया जश्न

HIGHLIGHTS: रुझानों में BJP 165+ सीटों पर आगे TMC करीब 80 सीटों पर सिमटी BJP मुख्यालय में जश्न और नारेबाजी मोदी-शाह को दिया गया श्रेय समिक भट्टाचार्य ने आसान जीत का दावा किया West Bengal Election: कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझानों में BJP ने मजबूत बढ़त बना ली है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पार्टी 140 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, जबकि TMC 75 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। इन रुझानों ने राज्य की सियासत में हलचल बढ़ा दी है और सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। त्यागराज जयंती पर विरासत बचाने का संकल्प, पवन कल्याण ने संगीत संरक्षण पर उठाए बड़े कदम BJP मुख्यालय में जश्न का माहौल कोलकाता स्थित BJP मुख्यालय में कार्यकर्ताओं के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। बता दें कि पार्टी समर्थक नरेंद्र मोदी की तस्वीरें हाथ में लेकर ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे हैं। साथ ही सुवेंदु अधिकारी के समर्थन में भी नारेबाजी की गई। कार्यकर्ताओं ने मिठाइयां बांटकर अपनी खुशी जाहिर की और राहगीरों को भी इसमें शामिल किया। दक्षिण भारत में सियासी भूचाल: तमिलनाडु में TVK का ऐतिहासिक उभार, केरल में कांग्रेस की वापसी, असम में BJP की सत्ता बरकरार; पुडुचेरी में भी NDA आगे नेताओं ने दिया जीत का श्रेय BJP नेताओं ने इस बढ़त का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया । उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर किए गए काम और मजबूत संगठन के कारण पार्टी को यह बढ़त मिलती नजर आ रही है। WEST BENGAL ELECTION: पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों ने TMC का साथ छोड़ा, मतगणना के बीच शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान ‘सपने सच होने वाले हैं’—समिक भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल BJP अध्यक्ष Sसमिक भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं के सपने अब सच होने वाले हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि BJP राज्य में आसानी से सरकार बनाएगी। उन्होंने कहा कि गंगोत्री से गंगासागर तक BJP की सरकार बनाने का सपना अब पूरा होता दिख रहा है, हालांकि अंतिम नतीजों का इंतजार अभी बाकी है। WEST BENGAL ELECTION: चुनाव में दिखा ‘झालमुड़ी फैक्टर, झाड़ग्राम में बीजेपी की मजबूत पकड़ बहुमत के आंकड़े से आगे BJP ताजा रुझानों के अनुसार BJP 165 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, जबकि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस करीब 80 सीटों पर सिमटती नज़र आ रही है। 294 सीटों वाले बंगाल में बहुमत का आंकड़ा 148 है, जिसे BJP पार करती दिख रही है। अगर यह रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो राज्य में बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है।
बांग्लादेश की नई विदेश नीति या चीन की गहरी चाल? तारिक रहमान की सरकार में बढ़ते बीजिंग दौरे से उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली। बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद चीन के साथ बढ़ती नजदीकियां अब अंतरराष्ट्रीय चर्चा का बड़ा विषय बन गई हैं। प्रधानमंत्री Tarique Rahman के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद बांग्लादेशी नेताओं के लगातार बीजिंग दौरे ने नई कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। सत्ता बदलते ही चीन की ओर झुकावअगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में बड़ा बदलाव देखा गया। नई सरकार बनने के कुछ ही महीनों में कई राजनीतिक दलों और सरकारी प्रतिनिधिमंडलों ने चीन का दौरा किया, जिससे यह सवाल उठने लगा कि क्या ढाका अब बीजिंग को अपना प्रमुख साझेदार बना रहा है। सरकार के कई प्रमुख नेताओं ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के निमंत्रण पर बीजिंग का दौरा किया और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की। लगातार बढ़ते चीन दौरेबीते महीनों में BNP, जमात-ए-इस्लामी और अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों ने चीन की यात्रा की। इनमें उच्च स्तरीय बैठकों से लेकर आर्थिक सहयोग और निवेश पर बातचीत तक शामिल रही। विशेष रूप से BNP महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर के नेतृत्व में हुए प्रतिनिधिमंडल ने चीन के उपराष्ट्रपति से मुलाकात कर “वन चाइना नीति” का समर्थन दोहराया, जिससे यह संकेत मिला कि ढाका बीजिंग के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। चीन का बढ़ता आर्थिक प्रभावचीन पहले ही बांग्लादेश में 40 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की योजना या प्रतिबद्धता जता चुका है, जिसमें Belt and Road Initiative (BRI) के तहत बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल कूटनीतिक सहयोग नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की दीर्घकालिक योजना भी है। भारत और क्षेत्रीय संतुलन पर असरबांग्लादेश भले ही भारत के साथ संबंध सामान्य रखने की बात कर रहा हो, लेकिन चीन के साथ बढ़ती नजदीकी दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम पर भारत और अन्य पड़ोसी देश भी नजर बनाए हुए हैं। नई विदेश नीति या रणनीतिक चाल?कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश “मल्टी-एलाइमेंट” यानी कई देशों के साथ संतुलित रिश्ते रखने की नीति अपना रहा है। लेकिन लगातार बढ़ते चीन दौरे इस बात की ओर इशारा करते हैं कि बीजिंग अब ढाका की विदेश नीति का सबसे अहम केंद्र बनता जा रहा है।तारिक रहमान की सरकार के तहत बांग्लादेश की विदेश नीति एक नए मोड़ पर खड़ी है—जहां एक तरफ भारत के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश है, वहीं दूसरी तरफ चीन के साथ तेजी से गहराते रिश्ते एक नई रणनीतिक दिशा का संकेत दे रहे हैं।
सात सीटों में से अधिकांश पर भाजपा की बढ़त, कुछ जगह मुकाबला रोमांचक…

नई दिल्ली।देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों की मतगणना जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, राजनीतिक माहौल लगातार बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। शुरुआती रुझानों ने कई जगहों पर स्पष्ट बढ़त और कुछ स्थानों पर कड़े मुकाबले की तस्वीर पेश की है। कुल मिलाकर सात विधानसभा सीटों पर हुए इन उपचुनावों ने सियासी हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है, जहां हर अपडेट के साथ समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। महाराष्ट्र की बारामती सीट इस पूरे चुनावी परिदृश्य का सबसे अहम केंद्र बनी हुई है। यहां से सुनेत्रा पवार आगे चल रही हैं और मजबूत बढ़त बनाए हुए हैं। इस सीट पर मतदाताओं का रुझान शुरुआत से ही खास चर्चा में रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र राज्य की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता आया है। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार यहां मुकाबला एक तरफ झुकता हुआ दिखाई दे रहा है, जिससे राजनीतिक विश्लेषक भी इसके संभावित परिणामों पर नजर बनाए हुए हैं। इसी राज्य की राहुरी सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अक्षय कर्डिले ने बढ़त हासिल कर ली है। वे लगातार मजबूत स्थिति बनाए हुए हैं और उनके निकटतम प्रतिद्वंदी पीछे चलते नजर आ रहे हैं। इस सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान दोनों प्रमुख दलों ने पूरी ताकत लगाई थी, लेकिन शुरुआती रुझानों में भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। कर्नाटक की दावणगेरे साउथ सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार ने बढ़त बना रखी है, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार पीछे चल रहे हैं। वहीं इसी राज्य की बागलकोट सीट पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है, जहां कांग्रेस उम्मीदवार आगे चल रहे हैं और भाजपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर हैं। यह स्थिति कर्नाटक में चुनावी प्रतिस्पर्धा को और दिलचस्प बना रही है, क्योंकि दोनों दल अलग-अलग सीटों पर बढ़त और नुकसान का सामना कर रहे हैं। त्रिपुरा की धर्मनगर सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार आगे चल रहे हैं। यहां मतगणना के शुरुआती चरण से ही पार्टी को बढ़त मिलती दिख रही है। इसी तरह गुजरात की उमरेठ सीट पर भी भाजपा ने मजबूत पकड़ बनाई हुई है और उम्मीदवार ने बड़ी बढ़त दर्ज की है। नागालैंड की कोरिडांग सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार मामूली अंतर से आगे हैं, जिससे यहां मुकाबला अभी पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। इन सभी सीटों के शुरुआती रुझानों से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि कई राज्यों में सत्तारूढ़ दल का प्रभाव अभी भी मजबूत बना हुआ है, जबकि कुछ स्थानों पर विपक्षी दलों ने भी कड़ा संघर्ष किया है। हालांकि अभी अंतिम परिणाम आना बाकी है, इसलिए कई सीटों पर स्थिति बदलने की संभावना भी बनी हुई है। कुल मिलाकर इन उपचुनावों ने राजनीतिक माहौल को और अधिक सक्रिय और रोचक बना दिया है। हर राउंड की गिनती के साथ बढ़त और हार का अंतर बदल रहा है, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि अंतिम नतीजे तक किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अब सभी की नजरें अंतिम परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि राजनीतिक समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ेंगे।
लिपुलेख विवाद फिर गरमाया: नेपाल का ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ या कूटनीतिक दबाव? बालेन शाह के बयान से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल रिश्तों पर नई चुनौती

नई दिल्ली। नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से चले आ रहे लिपुलेख सीमा विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर तनाव बढ़ा दिया है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से उठे नए बयान के बाद यह मुद्दा फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है। नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि Lipulekh Pass के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और चीन द्वारा किए जा रहे उपयोग पर उसे आपत्ति है। काठमांडू का दावा है कि यह क्षेत्र नेपाल की संप्रभु भूमि का हिस्सा है और किसी भी गतिविधि के लिए उसकी सहमति जरूरी है। नेपाल का सख्त रुखनेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों को औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति भेजते हुए कहा है कि लिपुलेख और उससे जुड़े क्षेत्र नेपाल की सीमाओं के भीतर आते हैं। सरकार ने यह भी साफ किया है कि वह इस मामले को कूटनीतिक तरीके से आगे बढ़ाएगी। नेपाल में इस मुद्दे को लेकर जनता की भावनाएं भी तेजी से जुड़ रही हैं, जिससे सरकार के लिए इसे राजनीतिक रूप से नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है। ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ की चर्चाइसी बीच काठमांडू के मेयर और युवा नेता Balen Shah (बालेन शाह) के बयानों ने इस विवाद को और हवा दे दी है। माना जा रहा है कि उन्होंने इस मुद्दे को “राष्ट्रवादी भावना” के तौर पर उठाकर घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। विवाद की ऐतिहासिक जड़ेंइस पूरे विवाद की जड़ें 1816 की Treaty of Sugauli से जुड़ी हैं, जिसमें भारत (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) और नेपाल के बीच सीमाएं तय हुई थीं। नेपाल का दावा है कि काली नदी का उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है, जिससे लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र नेपाल का हिस्सा बनते हैं।वहीं भारत का तर्क है कि वास्तविक उद्गम स्थल पूर्व की ओर है, और इस आधार पर यह क्षेत्र भारतीय प्रशासन के अंतर्गत आता है। भारत का पक्ष और रणनीतिक महत्वभारत इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानता है, क्योंकि यह चीन सीमा के करीब स्थित है और सैन्य दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से इस इलाके में भारतीय चौकियां मौजूद हैं। भारत ने हाल के वर्षों में यहां सड़क और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट भी विकसित किए हैं, जिससे कैलाश मानसरोवर यात्रा आसान हो सके और सीमा तक पहुंच मजबूत हो। 2020 का तनाव और नया नक्शा2020 में भारत द्वारा लिपुलेख रोड के उद्घाटन के बाद नेपाल ने कड़ा विरोध जताया था। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र में दिखाया था, जिसे संसद से भी मंजूरी मिली थी।विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद फिलहाल आसान समाधान की ओर नहीं बढ़ रहा है। भारत, नेपाल और चीन के रणनीतिक हित इस क्षेत्र में जुड़े होने के कारण यह मुद्दा लंबे समय तक कूटनीतिक तनाव का कारण बना रह सकता है। फिलहाल दोनों देश अपने-अपने रुख पर कायम हैं नेपाल कूटनीतिक बातचीत की बात कर रहा है, जबकि भारत इसे अपने प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है।