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आवारा कुत्तों का आतंक: जबलपुर में मासूम बहनों पर हमला, इलाके में दहशत

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के पाटन तहसील अंतर्गत आगासौद गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक आवारा कुत्ते ने घर के बाहर खेल रही मासूम बच्ची पर हमला कर दिया और उसे बुरी तरह नोच डाला। यह घटना उस समय हुई जब तीन वर्षीय बच्ची प्राची घर के बाहर खेल रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बच्ची की चीख सुनकर उसकी मां सुलोचना बाहर दौड़ी और लाठी लेकर कुत्ते को भगाने की कोशिश की। जैसे ही मां ने बड़ी बेटी को किसी तरह बचाया, कुत्ता अचानक घर के अंदर घुस गया और वहां जमीन पर सो रही छह माह की दूसरी बच्ची पर झपट पड़ा। कुत्ते ने मासूम को जबड़े में दबोच लिया, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। मां की चीख-पुकार सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और किसी तरह कुत्ते को भगाकर दोनों बच्चियों को उसके चंगुल से छुड़ाया। इस हमले में दोनों बच्चियां गंभीर रूप से घायल हो गईं, जिनके चेहरे, हाथ और शरीर के अन्य हिस्सों पर गहरे घाव आए हैं। परिजन तुरंत दोनों को पाटन स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, जहां प्राथमिक उपचार के बाद हालत गंभीर होने पर उन्हें जबलपुर रेफर कर दिया गया। फिलहाल दोनों मासूमों का इलाज शहर के एक निजी अस्पताल में जारी है और डॉक्टरों की टीम उनकी हालत पर नजर बनाए हुए है। घटना के बाद गांव में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों ने आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नाराजगी जताते हुए प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में आवारा श्वानों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन नगर निगम की ओर से प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। कई इलाकों में लोग बच्चों को अकेले बाहर भेजने से डरने लगे हैं। इसी बीच स्वास्थ्य विभाग ने भी कुत्ते के काटने की स्थिति में तुरंत उपचार लेने की अपील की है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में समय पर रेबीज का टीका लगवाना बेहद जरूरी है, अन्यथा गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। यह घटना एक बार फिर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की समस्या और उसके समाधान पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सार्वजनिक सुरक्षा पर सख्ती: स्कूल, अस्पताल और स्टेशनों से हटेंगे आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली । देश में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों और डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस विषय में किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जा सकती। इसी क्रम में अदालत ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है जिनमें पहले दिए गए आदेश में बदलाव की मांग की गई थी, जिसमें सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश शामिल था। अदालत ने यह भी दोहराया कि डॉग बाइट जैसी घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि ये आम नागरिकों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि कई सार्वजनिक संस्थानों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। अदालत ने यह माना कि इन स्थानों पर सुरक्षा और स्वच्छता दोनों ही प्रभावित होते हैं और ऐसे माहौल में लोगों का आना-जाना जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण से पहले दिए गए निर्देशों को बनाए रखने पर जोर दिया गया है, जिसमें इन क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें दोबारा वहीं न छोड़े जाने की बात शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी टिप्पणी की कि देश में पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल का क्रियान्वयन कई जगहों पर असमान और कमजोर है। कहीं संसाधनों की कमी है तो कहीं व्यवस्था सही तरीके से लागू नहीं हो पा रही है। इस कारण आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा, जिसका सीधा असर सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ रहा है। अदालत ने राज्यों और संबंधित एजेंसियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि यदि समय रहते इन नियमों का प्रभावी पालन किया गया होता तो आज यह स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। कोर्ट ने यह भी माना कि समस्या केवल आदेश देने से हल नहीं होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्यान्वयन और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। इस फैसले के बाद सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए जाने की संभावना बढ़ गई है। स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अब प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत होगी ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। अदालत का यह रुख स्पष्ट संकेत देता है कि जन सुरक्षा से जुड़े मामलों में अब किसी भी प्रकार की लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जाएगा और व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर रहेगा।

कबाड़ बाजार में हड़कंप: जबलपुर में आग ने मचाया तांडव, चार घंटे चला ऑपरेशन

नई दिल्ली।  मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में सोमवार देर रात एक बड़ा अग्निकांड सामने आया, जहां गुरंदी बाजार इलाके में स्थित कबाड़ की सात दुकानें भीषण आग की चपेट में आकर पूरी तरह जलकर खाक हो गईं। यह घटना रात करीब 2 बजे की बताई जा रही है, जिसने पूरे इलाके में अफरा-तफरी मचा दी। स्थानीय जानकारी के अनुसार, दुकानदार रात करीब 9 बजे अपनी दुकानें बंद कर घर चले गए थे। इसके कुछ घंटों बाद अचानक आग लगने की सूचना मिली, जिसके बाद देखते ही देखते आग ने विकराल रूप ले लिया और पूरी दुकानों में रखा कबाड़ तेजी से जलने लगा। आग की सूचना मिलते ही पुलिस और दमकल विभाग की टीम मौके पर पहुंची। आग पर काबू पाने के लिए 10 दमकल गाड़ियों को लगाया गया, लेकिन संकरी गलियों और घनी आबादी के कारण राहत और बचाव कार्य में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। दमकल वाहन घटनास्थल तक सीधे नहीं पहुंच पाए, जिसके चलते पानी की आपूर्ति में भी देरी हुई। करीब 4 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद आग पर नियंत्रण पाया जा सका, लेकिन तब तक दुकानों में रखा सारा सामान पूरी तरह नष्ट हो चुका था। आग लगने से लाखों रुपये के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट हो सकता है, हालांकि प्रशासन ने अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिलहाल फायर विभाग और पुलिस संयुक्त रूप से मामले की जांच कर रहे हैं। सीएसपी एमएल नागोतिया ने बताया कि सूचना मिलते ही टीम तुरंत मौके पर पहुंची और दमकल विभाग की मदद से आग बुझाने का प्रयास किया गया। आग लगने के कारणों की जांच जारी है। इस घटना के बाद एक बार फिर शहर के बीच स्थित कबाड़ गोदामों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इन गोदामों को हटाने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इससे पहले भी इस मुद्दे पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की जा चुकी है, जिसमें बड़े हादसे की आशंका जताई गई थी। यह हादसा न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत भी दर्शाता है।

अनुमति न मिलने से भड़का हिंदू महासभा: गोडसे की मूर्तियां लगाने की घोषणा

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में मंगलवार को नाथूराम गोडसे की 116वीं जयंती के मौके पर प्रस्तावित जुलूस को लेकर तनाव की स्थिति बनने से पहले ही प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और संभावित विवाद को देखते हुए यह फैसला लिया, जिसके बाद पूरा कार्यक्रम हिंदू महासभा के दौलतगंज स्थित कार्यालय परिसर में ही आयोजित किया गया। कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान हिंदू महासभा के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने नाथूराम गोडसे की तस्वीर पर माल्यार्पण और आरती की। हालांकि कार्यक्रम सीमित दायरे में हुआ, लेकिन इस दौरान दिए गए कुछ बयानों को लेकर फिर से विवाद की स्थिति बन गई। कुछ पदाधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भविष्य में गोडसे की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी और उन्हें लेकर संगठन की विचारधारा आगे भी जारी रहेगी। इन बयानों के बाद प्रशासन और पुलिस सतर्क हो गई और स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखी गई। कोतवाली थाना पुलिस पहले से ही कार्यक्रम स्थल के बाहर तैनात थी और पूरे आयोजन की वीडियोग्राफी भी कराई गई, ताकि किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न न हो। अतिरिक्त पुलिस बल भी मौके पर मौजूद रहा। प्रशासन की ओर से साफ किया गया है कि शहर में शांति और सौहार्द बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की भड़काऊ गतिविधि या बयान पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। गौरतलब है कि ग्वालियर में इससे पहले भी गोडसे को लेकर आयोजित कार्यक्रम विवादों में रहे हैं, जिसके चलते इस बार प्रशासन ने एहतियातन अनुमति देने से इनकार किया।

सार्वजनिक परिवहन बनाम वीआईपी संस्कृति: आशुतोष की अपील से फिर केंद्र में आए अरविंद केजरीवाल

नई दिल्ली । देश और दुनिया में बढ़ते ऊर्जा संकट और राजनीतिक सादगी की बहस के बीच एक बार फिर सार्वजनिक जीवनशैली और नेताओं की यात्रा शैली चर्चा के केंद्र में आ गई है। इसी संदर्भ में आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और वरिष्ठ पत्रकार Ashutosh ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal को लेकर एक ऐसी टिप्पणी की है जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। आशुतोष ने केजरीवाल से अपील की है कि वे एक बार फिर मेट्रो जैसे सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन की सादगी को दोहराएं। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर तनाव गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति से जुड़े मार्गों में आई बाधाओं के कारण कई देशों में ईंधन की कीमतों पर असर देखा जा रहा है, जिसका प्रभाव भारत में भी महसूस किया जाने लगा है। ऐसे माहौल में सार्वजनिक जीवन में ईंधन की खपत और वीआईपी काफिलों की लागत पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में आशुतोष का बयान और अधिक राजनीतिक महत्व रखता है। आशुतोष ने अपने बयान में उस पुराने क्षण को भी याद दिलाया जब अरविंद केजरीवाल ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दौरान मेट्रो से यात्रा की थी। उस समय इसे सादगी और जनता से जुड़ाव के प्रतीक के रूप में देखा गया था। अब आशुतोष का कहना है कि यदि वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक नेतृत्व सादगी का संदेश देता है, तो यह जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाएगा और ईंधन बचत जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर भी असर पड़ेगा। इस बीच देश के कई राज्यों में शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपने काफिलों और सरकारी वाहनों के उपयोग में कटौती के निर्णय भी सामने आए हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi की ओर से वीआईपी काफिलों के आकार को सीमित करने की अपील के बाद विभिन्न राज्यों में प्रशासनिक स्तर पर बदलाव देखे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने सरकारी वाहनों के उपयोग को अधिक नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं, जबकि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने अपने काफिले में वाहनों की संख्या में कटौती की है। इसी तरह अन्य राज्यों में भी प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर सादगी और संसाधन बचत को लेकर नए कदम उठाए जा रहे हैं। बिहार में उपमुख्यमंत्री स्तर के नेतृत्व ने भी अपने काफिले को सीमित करने की दिशा में निर्णय लिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सार्वजनिक जीवन में संयम और खर्च नियंत्रण को लेकर एक व्यापक संदेश उभर रहा है। आशुतोष की यह टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत अपील नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राजनीतिक प्रतीकवाद के रूप में भी देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का उपयोग नेताओं द्वारा किया जाना जनता के बीच एक मजबूत संदेश देता है कि शासन और नेतृत्व केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आम नागरिक के अनुभवों से भी जुड़ा है। हालांकि इस पूरे मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने की संभावना है, लेकिन इतना तय है कि सादगी, ऊर्जा संकट और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग को लेकर यह बहस आगे भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी रहेगी।

संदिग्ध हालात में मौत: पोस्टमॉर्टम पर पुलिस लेगी सेकंड ओपिनियन

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक 21 वर्षीय युवती पलक रजक की संदिग्ध मौत ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। पलक सोशल मीडिया पर रील्स बनाने के लिए जानी जाती थी और उसके हजारों फॉलोअर्स थे, लेकिन उसकी अचानक हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का आरोप है कि पलक की मौत आत्महत्या नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या है। मायके पक्ष के अनुसार, शादी के बाद से ही पलक को ससुराल में लगातार दहेज को लेकर प्रताड़ित किया जा रहा था। आरोप है कि सास और देवर कार की मांग को लेकर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करते थे, जबकि पति भी इस उत्पीड़न का विरोध नहीं करता था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मौत से लगभग 30 मिनट पहले पलक ने अपने भाई और पिता को फोन कर कहा था कि उसे तुरंत वहां से ले जाया जाए, नहीं तो ससुराल वाले उसे मार डालेंगे। इसके बाद जब परिवार अस्पताल पहुंचा तो पलक का शव स्ट्रेचर पर पड़ा मिला। परिजनों ने दावा किया है कि उसके शरीर पर गले और पैरों सहित कई जगह चोट के निशान मिले हैं, जिससे यह आशंका और मजबूत होती है कि मौत से पहले उसने संघर्ष किया था। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि शादी के समय दी गई एफडी भी ससुराल पक्ष ने जबरन तुड़वाकर अपने पास रख ली थी। पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि पलक पिछले कुछ दिनों से मानसिक तनाव में थी और उसने सोशल मीडिया पर कई पोस्ट और रील्स में अवसाद, घुटन और बेचैनी के संकेत दिए थे। कुछ रील्स में उसने सीधे तौर पर अपने मानसिक संघर्ष को भी व्यक्त किया था। मृत्यु से पहले पलक ने लगभग तीन दिनों तक भोजन नहीं किया था, यह बात भी जांच में सामने आई है। पुलिस अब उसके सोशल मीडिया अकाउंट, कॉल डिटेल और मेडिकल रिपोर्ट को गहराई से खंगाल रही है। फिलहाल पुलिस का शुरुआती अनुमान यह है कि मामला फांसी (हैंगिंग) का हो सकता है, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को लेकर सेकंड ओपिनियन लिया जाएगा, ताकि पूरी सच्चाई सामने आ सके। यह मामला अब दहेज प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी के पीछे छिपे तनाव जैसे गंभीर मुद्दों की ओर इशारा कर रहा है।

कटारा हिल्स केस में बड़ा खुलासा: हनीमून से शुरू हुई प्रताड़ना की कहानी, पिता ने दामाद को बताया ‘भेड़ की खाल में भेड़िया’

मध्‍य प्रदेश  /भोपाल के कटारा हिल्स क्षेत्र में नवविवाहिता ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है और अब यह पारिवारिक विवाद से आगे बढ़कर गंभीर आपराधिक जांच के दायरे में आ गया है। घटना के बाद से परिजनों ने इसे आत्महत्या नहीं बल्कि सुनियोजित दहेज हत्या का मामला बताते हुए निष्पक्ष जांच और दोबारा पोस्टमार्टम की मांग तेज कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल बना दिया है, जहां एक ओर परिवार न्याय की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। मृतका के पिता ने आरोप लगाया है कि उनकी बेटी की शादी के बाद से ही उसे ससुराल में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था। उनका कहना है कि शुरुआत से ही व्यवहार में बदलाव दिखाई देने लगे थे और शादी के कुछ ही समय बाद तनावपूर्ण स्थिति बन गई थी। इस मामले में सबसे गंभीर आरोप उस समय सामने आए जब हनीमून के दौरान ही कथित रूप से विवाद और हिंसक व्यवहार की घटना का जिक्र किया गया, जिसे परिवार ने प्रताड़ना की शुरुआती चेतावनी बताया है। परिजनों का यह भी दावा है कि शादी के बाद ट्विशा को लगातार मानसिक दबाव में रखा गया और आर्थिक तथा सामाजिक कारणों को लेकर ताने दिए जाते रहे। नौकरी छूटने के बाद स्थिति और अधिक बिगड़ गई, जिसके बाद ससुराल पक्ष की ओर से कथित रूप से व्यवहार में और कठोरता आ गई। परिवार का कहना है कि उनकी बेटी बार-बार अपनी परेशानी साझा करती थी और वह मानसिक तनाव में रहने लगी थी। इस बीच, मोबाइल संदेशों और बातचीत के हवाले से यह दावा किया गया है कि ट्विशा ने अपने जीवन में बढ़ती परेशानियों का जिक्र करते हुए कई बार असहायता और मानसिक दबाव की बात कही थी। परिवार का आरोप है कि उसे इस स्थिति में लगातार अपमान और दबाव का सामना करना पड़ा, जिससे उसका मानसिक संतुलन प्रभावित हुआ। पिता ने अपने दामाद पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे कठोर और दोहरे व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बताया है। उनका कहना है कि बाहर से सामान्य दिखने वाला व्यवहार अंदर से पूरी तरह अलग था। परिवार ने यह भी दावा किया है कि पहले भी इसी परिवार में वैवाहिक विवाद की स्थिति सामने आ चुकी थी, जिससे उनके आरोप और मजबूत होते हैं। मामले में पुलिस ने प्रारंभिक जांच के आधार पर पति और सास के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया है। हालांकि, मुख्य आरोपी पति फिलहाल फरार बताया जा रहा है और उसकी तलाश में लगातार कार्रवाई जारी है। पुलिस का कहना है कि सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। दूसरी ओर, मृतका के पिता ने प्रशासनिक स्तर पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन किया है और दोबारा पोस्टमार्टम की मांग दोहराई है। उनका कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, वे अपना विरोध जारी रखेंगे। फिलहाल यह मामला सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां एक ओर परिवार न्याय की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियां साक्ष्यों के आधार पर सच तक पहुंचने की कोशिश में जुटी हैं। स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है और आगे की जांच पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

बिना ओपन हार्ट सर्जरी इलाज: इंदौर में डॉक्टरों ने बचाई किशोर की जान

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के इंदौर में चिकित्सा क्षेत्र से एक प्रेरणादायक और राहत भरी खबर सामने आई है, जहां डॉक्टरों ने एक 16 वर्षीय किशोर के दिल में मौजूद 27 एमएम के बड़े जन्मजात छेद का सफल इलाज कर उसे नई जिंदगी दी है। खास बात यह है कि यह पूरी जटिल प्रक्रिया बिना ओपन हार्ट सर्जरी के मात्र 20 मिनट में पूरी कर ली गई। यह मामला खंडवा जिले के एक ग्रामीण क्षेत्र के किसान परिवार से जुड़ा है, जहां रहने वाला किशोर पिछले कई महीनों से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा था। उसे लगातार थकान, सांस फूलना, घबराहट और कमजोरी की शिकायत थी। धीरे-धीरे उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि कई बार वह बेहोश भी हो जाता था, जिससे परिवार बेहद चिंतित हो गया था। कई जगह इलाज कराने के बावजूद जब स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो परिवार उसे इंदौर के इंडेक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल लेकर पहुंचा। यहां जांच में पता चला कि किशोर ‘एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट (ASD)’ नामक जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित है, जिसमें दिल के ऊपरी हिस्से के बीच एक बड़ा छेद होता है, जो रक्त संचार को प्रभावित करता है और समय पर इलाज न होने पर जानलेवा भी हो सकता है। पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. सुदीप वर्मा के अनुसार, इस केस में ओपन हार्ट सर्जरी की बजाय आधुनिक इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी तकनीक का उपयोग किया गया। इसमें मरीज के पैर की नस के जरिए कैथेटर डालकर दिल तक पहुंच बनाई गई और फिर विशेष डिवाइस लगाकर छेद को सफलतापूर्वक बंद कर दिया गया। डॉक्टरों का कहना है कि यह तकनीक मरीज के लिए बेहद सुरक्षित है क्योंकि इसमें बड़े चीरे की जरूरत नहीं होती, संक्रमण का खतरा कम होता है और रिकवरी भी तेजी से होती है। ऑपरेशन के बाद किशोर की हालत में तेजी से सुधार देखा जा रहा है और उसे जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिलने की संभावना है। इस पूरे इलाज का खर्च आयुष्मान भारत योजना के तहत वहन किया गया, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर किसान परिवार को बड़ी राहत मिली। परिजनों ने डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन का आभार जताते हुए कहा कि इस उपचार ने उनके बेटे को नया जीवन दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में दिल में छेद होने के शुरुआती लक्षणों में जल्दी थकान, सांस फूलना, कमजोरी, बार-बार बेहोश होना और शारीरिक गतिविधियों में परेशानी शामिल हैं। समय पर पहचान और इलाज से इस गंभीर बीमारी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। यह मामला न सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र की प्रगति को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाएं मिलकर कई जिंदगियां बचा सकती हैं।

महंगाई का नया वार: पेट्रोल-डीजल और दूध के बाद अब ब्रेड भी हुई महंगी, आम जनता की जेब पर बढ़ा दबाव

नई दिल्ली । देश में लगातार बढ़ती महंगाई ने एक बार फिर आम लोगों की जेब पर असर डाला है। पहले पेट्रोल-डीजल और दूध की कीमतों में बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं को परेशान किया था और अब रोजमर्रा की जरूरत मानी जाने वाली ब्रेड भी महंगी हो गई है। बाजार में ब्रेड की कीमतों में अचानक हुई इस बढ़ोतरी ने घरेलू बजट को और ज्यादा दबाव में ला दिया है। ताजा हालात में कई प्रमुख शहरों में ब्रेड के अलग-अलग वेरिएंट्स की कीमतों में इजाफा देखने को मिला है। 400 ग्राम सैंडविच ब्रेड के पैकेट की कीमत कुछ जगहों पर 40 रुपये से बढ़कर 45 रुपये तक पहुंच गई है। इसी तरह होल व्हीट ब्रेड और मल्टीग्रेन ब्रेड के दामों में भी 5 रुपये तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। छोटी ब्राउन और सफेद ब्रेड की कीमतों में भी हल्का लेकिन लगातार असर डालने वाला इजाफा देखा जा रहा है। बाजार विशेषज्ञों और कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार ब्रेड की कीमतों में इस बढ़ोतरी के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण उत्पादन लागत में हुआ इजाफा बताया जा रहा है। ब्रेड बनाने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल, पैकेजिंग सामग्री और परिवहन खर्च लगातार महंगे होते जा रहे हैं। खासतौर पर प्लास्टिक पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले आयातित उत्पादों की कीमतों में वृद्धि ने पूरी सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। इसके अलावा विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव के कारण आयात लागत भी बढ़ गई है, जिसका सीधा असर बाजार में दिख रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि केवल कच्चा माल ही नहीं बल्कि ईंधन और ट्रांसपोर्टेशन खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। डिलीवरी और सप्लाई से जुड़ी लागत बढ़ने के कारण बेकरी उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखना मुश्किल हो गया है। कई बेकरी संचालकों ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में अगर लागत में राहत नहीं मिली तो कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। स्थानीय बाजारों में उपभोक्ताओं ने इस बढ़ोतरी पर नाराजगी जताई है। आम लोगों का कहना है कि रोजमर्रा के उपयोग की चीजों के दाम लगातार बढ़ने से घर का मासिक बजट बिगड़ रहा है। पहले जहां छोटे-छोटे अंतर से कीमतों में बदलाव होता था, वहीं अब एक ही बार में 4 से 5 रुपये की बढ़ोतरी देखने को मिल रही है, जो सीधे तौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग को प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे माल, ईंधन और आयात से जुड़ी लागतों में स्थिरता नहीं आई तो आने वाले समय में अन्य खाद्य उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं। इससे महंगाई का दबाव और बढ़ेगा तथा आम उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता पर और असर पड़ेगा। वर्तमान स्थिति यह संकेत दे रही है कि आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है, जिससे बाजार में चिंता का माहौल बना हुआ है।

इंदौर में फिर सुर्खियों में हनी ट्रैप केस: शराब कारोबारी को फंसाने का आरोप

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के इंदौर में एक बार फिर हनी ट्रैप गैंग का बड़ा खुलासा हुआ है, जिसने शहर में सनसनी फैला दी है। क्राइम ब्रांच की कार्रवाई में एक शराब कारोबारी को ब्लैकमेल कर करोड़ों रुपये की मांग करने वाले संगठित गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। इस पूरे मामले में 2019 के चर्चित हनी ट्रैप केस से जुड़ी आरोपी श्वेता विजय जैन की भी गिरफ्तारी ने जांच को और गंभीर बना दिया है। पुलिस के अनुसार, इंदौर के बाणगंगा क्षेत्र के रहने वाले शराब कारोबारी हितेंद्र सिंह चौहान ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्हें एक महिला और उसके साथियों द्वारा पहले जान-पहचान बढ़ाकर फंसाया गया और फिर निजी फोटो और वीडियो वायरल करने की धमकी देकर एक करोड़ रुपये की मांग की गई। जांच में सामने आया कि इस पूरे गिरोह की मास्टरमाइंड अलका दीक्षित है, जो पहले से ही कई आपराधिक मामलों में शामिल रही है और अवैध शराब व ड्रग नेटवर्क से जुड़ी बताई जा रही है। अलका ने कारोबारी को प्रॉपर्टी डीलिंग और पार्टनरशिप के बहाने जाल में फंसाया था, जिसके बाद दबाव बनाकर पैसे और हिस्सेदारी की मांग शुरू हो गई। गिरोह में शामिल अलका के बेटे जयदीप, प्रॉपर्टी कारोबारी लाखन चौधरी और अन्य साथियों ने कथित रूप से कारोबारी पर हमला भी किया और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। मामला तब और गंभीर हो गया जब जांच में एक पुलिसकर्मी का नाम सामने आया। इंटेलिजेंस शाखा में पदस्थ प्रधान आरक्षक विनोद शर्मा पर आरोप है कि वह इस पूरे नेटवर्क से जुड़ा था और पीड़ित के निजी वीडियो व फोटो साझा करने में भूमिका निभा रहा था। उसके मोबाइल और चैट रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में हैं। क्राइम ब्रांच ने गुप्त ऑपरेशन चलाकर एक साथ कई स्थानों पर दबिश दी और अलका, जयदीप, लाखन चौधरी समेत अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया। वहीं, भोपाल से श्वेता जैन को भी हिरासत में लेकर इंदौर लाया गया, जिससे पुराने हनी ट्रैप नेटवर्क की कड़ियां फिर से खुलने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस का कहना है कि यह एक संगठित गिरोह हो सकता है, जो लंबे समय से हनी ट्रैप और ब्लैकमेलिंग के जरिए लोगों से वसूली कर रहा था। फिलहाल सभी आरोपियों से पूछताछ जारी है और डिजिटल सबूतों की जांच की जा रही है। इस पूरे मामले ने न केवल इंदौर बल्कि पूरे प्रदेश में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।