बगलामुखी मंदिर में चढ़ावा घोटाले की जांच शुरू, सरकारी समिति के रहते बनी निजी कमेटी, अफसरों की भूमिका पर सवाल

मध्यप्रदेश । अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले के बाद अब मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले स्थित प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर भी विवादों के केंद्र में आ गया है। मंदिर में श्रद्धालुओं से चढ़ावा लेने और उसे निजी बैंक खातों में जमा करने के आरोपों ने प्रशासन और मंदिर प्रबंधन दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायत मिलने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है और कलेक्टर प्रीति यादव ने पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति को सात दिन के भीतर यह बताने के निर्देश दिए गए हैं कि गड़बड़ी कहां हुई कितनी राशि का मामला है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार मंदिर के संचालन के लिए पहले से शासकीय प्रबंध समिति मौजूद है जिसके पदेन अध्यक्ष संबंधित एसडीएम होते हैं। इसके बावजूद वर्ष 2024 में नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति नाम से एक निजी समिति बनाई गई। आरोप है कि इस समिति के सदस्य मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं से नकद राशि और चांदी के रूप में दान लेने लगे तथा अपनी अलग रसीदें जारी करते रहे। बताया जा रहा है कि चांदी के अलावा मिलने वाली नकद राशि सरकारी खाते में जमा करने के बजाय निजी बैंक खातों में जमा की जाती रही। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी समिति के रहते निजी समिति आखिर कैसे बनाई गई और तीन वर्षों तक प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में उसका संचालन कैसे चलता रहा। शिकायतों के अनुसार तत्कालीन एसडीएम और बाद में पदस्थ अन्य अधिकारियों के कार्यकाल में भी इस व्यवस्था पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। यही वजह है कि अब जांच की आंच केवल समिति तक सीमित नहीं है बल्कि संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। मंदिर परिसर में लगे शिलालेखों में लगभग 170 श्रद्धालुओं द्वारा चांदी दान किए जाने का उल्लेख मिलता है लेकिन उसके बाद कितने लोगों ने दान दिया कितना चढ़ावा आया और उसका उपयोग किस प्रकार किया गया इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। आरोप है कि समिति का नियमित ऑडिट भी नहीं कराया गया जिससे वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। हालांकि समिति के सदस्यों का कहना है कि तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की जानकारी और सहमति से ही समिति का गठन किया गया था तथा उसका विधिवत पंजीयन भी कराया गया था। शिकायत के आधार पर गठित जांच समिति कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की पड़ताल कर रही है। इसमें गर्भगृह में लगाए गए चांदी के वास्तविक उपयोग की जांच के साथ यह भी देखा जाएगा कि कुल कितना चढ़ावा प्राप्त हुआ और उसे सरकारी खाते में जमा क्यों नहीं कराया गया। इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि सरकारी मंदिर में निजी समिति का गठन नियमों के अनुरूप था या नहीं। मां बगलामुखी मंदिर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन और विशेष अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में पहले से 27 सरकारी दान पेटियां और ऑनलाइन दान की व्यवस्था उपलब्ध है। ऐसे में समानांतर निजी व्यवस्था चलने से मंदिर प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल और गहरे हो गए हैं। मंदिर के पुजारियों और श्रद्धालुओं ने भी निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि मंदिर की प्रतिष्ठा और श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे। प्रशासन का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। अब सभी की नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी है जिससे यह स्पष्ट होगा कि यह मामला प्रशासनिक लापरवाही का है या फिर चढ़ावे के नाम पर बड़े वित्तीय घोटाले का।
नाबालिग रेप पीड़िता के स्वास्थ्य और हितों को प्राथमिकता, बॉम्बे हाईकोर्ट ने 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी मंजूरी

नई दिल्ली । बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में 16 वर्षीय रेप पीड़िता को 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त कराने की अनुमति प्रदान की है। अदालत ने यह फैसला मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और पीड़िता की शारीरिक तथा मानसिक स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद सुनाया। न्यायालय ने माना कि इस मामले में पीड़िता के सर्वोत्तम हित, स्वास्थ्य और भविष्य को प्राथमिकता देना आवश्यक है। मामले के अनुसार नाबालिग लड़की यौन शोषण की शिकार हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। गर्भावस्था 27 सप्ताह तक पहुंच चुकी थी। गर्भावस्था की इस अवधि में चिकित्सकीय गर्भसमापन के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक होती है। इसी कारण पीड़िता की ओर से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, जहां पूरे मामले पर संवेदनशीलता के साथ सुनवाई की गई। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में पीड़िता की उम्र, स्वास्थ्य और गर्भावस्था जारी रहने से उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का उल्लेख किया गया। न्यायालय ने रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद माना कि इस परिस्थिति में गर्भावस्था को जारी रखना पीड़िता के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। इसी आधार पर अदालत ने चिकित्सकीय गर्भसमापन की अनुमति देने का निर्णय लिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संबंधित अस्पताल को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया निर्धारित नियमों और विशेषज्ञों की निगरानी में संपन्न हो। अदालत ने विशेष रूप से कहा कि उपचार के दौरान पीड़िता की सुरक्षा, गरिमा और गोपनीयता का पूर्ण संरक्षण किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि उसे आवश्यक चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। इस फैसले को नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़ितों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि पीड़िता के जीवन, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति का समग्र मूल्यांकन भी आवश्यक है। न्यायालय का उद्देश्य पीड़िता के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है ताकि उसे भविष्य में अनावश्यक शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों, चिकित्सकीय स्थिति और कानूनी प्रावधानों के आधार पर अलग-अलग निर्णय लेती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में कोई भी फैसला परिस्थितियों और उपलब्ध चिकित्सा साक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही लिया जाता है। इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद संबंधित अस्पताल अब न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी करेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़िता की पहचान और निजी जानकारी पूरी तरह गोपनीय रखी जाए। न्यायालय का यह निर्णय नाबालिग पीड़ितों के अधिकारों, स्वास्थ्य सुरक्षा और न्यायिक संवेदनशीलता के संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
सड़क पार करते समय मोबाइल देखना पड़ा भारी, विजयवाड़ा में बस की टक्कर से व्यक्ति की मौत, चालक हिरासत में

नई दिल्ली । आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में सड़क सुरक्षा से जुड़ा एक दर्दनाक हादसा सामने आया है, जिसने एक बार फिर सड़क पर लापरवाही के गंभीर परिणामों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। व्यस्त ट्रैफिक जंक्शन पर सड़क पार कर रहे एक व्यक्ति की बस की चपेट में आने से मौत हो गई। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हादसे के समय वह अपने मोबाइल फोन में व्यस्त था, जिसके कारण उसे पीछे से आ रहे वाहन का अंदाजा नहीं हो सका। घटना का सीसीटीवी वीडियो भी सामने आया है, जिसकी जांच पुलिस कर रही है। बताया गया कि व्यक्ति हाथ में थैला लिए सड़क पार कर रहा था। इसी दौरान उसने अपनी जेब से मोबाइल फोन निकाला और उसमें देखने लगा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उसका पूरा ध्यान मोबाइल पर था, जिससे वह आसपास के ट्रैफिक पर नजर नहीं रख सका। कुछ ही क्षण बाद पीछे से आ रही बस ने उसे टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई। इसके बाद पीछे से आ रही दूसरी बस ने सड़क पर पड़े व्यक्ति को बचाते हुए अपना रास्ता बदला, जिससे एक और बड़ी दुर्घटना टल गई। घटना के तुरंत बाद आसपास मौजूद लोगों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कार्रवाई शुरू की। बस चालक को हिरासत में लेकर उससे पूछताछ की जा रही है। साथ ही दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य साक्ष्यों की जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। प्रारंभिक जांच में यह संभावना जताई जा रही है कि मोबाइल फोन के उपयोग के कारण व्यक्ति का ध्यान सड़क और ट्रैफिक से हट गया था। हालांकि पुलिस का कहना है कि दुर्घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की जा रही है और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। वहीं बस चालक की भूमिका की भी विस्तार से जांच की जा रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दुर्घटना में किसी प्रकार की लापरवाही हुई थी या नहीं। इस घटना ने सड़क सुरक्षा नियमों के पालन की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क पार करते समय मोबाइल फोन का उपयोग, तेज आवाज में हेडफोन लगाना या ट्रैफिक पर ध्यान न देना गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है। पैदल यात्रियों को हमेशा निर्धारित स्थान से सड़क पार करनी चाहिए और दोनों ओर से आने वाले वाहनों की स्थिति सुनिश्चित करने के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में बढ़ते यातायात के बीच सड़क सुरक्षा केवल वाहन चालकों की ही नहीं, बल्कि पैदल यात्रियों की भी समान जिम्मेदारी है। सतर्कता, ट्रैफिक नियमों का पालन और मोबाइल जैसी चीजों से ध्यान हटाकर सड़क पर पूरी एकाग्रता बनाए रखना ऐसे हादसों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पुलिस ने भी नागरिकों से अपील की है कि सड़क पर चलते या पार करते समय पूरी सावधानी बरतें और किसी भी प्रकार के ध्यान भटकाने वाले व्यवहार से बचें, ताकि इस तरह की दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
बुजुर्ग दंपती की हत्या में सुपारी किलिंग का शक गहराया, बारिश का फायदा उठाकर फरार हुए आरोपी, CCTV बना बड़ा सुराग

भोपाल । भोपाल के ऐशबाग स्थित सुदामा नगर में बुजुर्ग दंपती हेमंत फिलेमोन और उनकी पत्नी शकुंतला बारीक की सनसनीखेज हत्या की गुत्थी अब और उलझती जा रही है। पुलिस की जांच में हर दिन नए तथ्य सामने आ रहे हैं लेकिन अब तक हत्यारों का कोई पुख्ता सुराग हाथ नहीं लग सका है। इस बीच घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज ने जांच को नई दिशा दी है। फुटेज में तेज बारिश के दौरान रेनकोट पहने दो संदिग्ध युवक वारदात के बाद इलाके से निकलते दिखाई दिए हैं। पुलिस का मानना है कि यही दोनों युवक इस दोहरे हत्याकांड में शामिल हो सकते हैं और इन्हें पकड़ने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जांच में सामने आया है कि दोनों संदिग्ध पहले एक साथ चलते दिखाई देते हैं लेकिन कुछ दूरी पर पहुंचकर अलग अलग रास्तों से आगे बढ़ जाते हैं। इसके बाद सुभाष नगर अंडरब्रिज के पास दोनों फिर एक स्थान पर मिलते हैं और वहां से आगे बढ़ने के बाद कैमरों की नजर से ओझल हो जाते हैं। पुलिस का मानना है कि आरोपियों ने बारिश और रेनकोट का सहारा लेकर अपनी पहचान छिपाने की पूरी योजना बनाई थी ताकि सीसीटीवी कैमरों में उनका चेहरा साफ दिखाई न दे। फुटेज में एक तीसरे संदिग्ध के भी नजर आने की जानकारी मिली है जिसकी भूमिका की भी जांच की जा रही है। तकनीकी जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो चुका है कि दंपती की हत्या 24 जून को ही कर दी गई थी जबकि उनके शव 27 जून को घर के अंदर मिले। यानी करीब तीन दिनों तक दोनों के शव घर में ही पड़े रहे और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शकुंतला बारीक को दो गोलियां मारी गई थीं जबकि हेमंत फिलेमोन के सिर में एक गोली दागी गई थी। जिस तरह से वारदात को अंजाम दिया गया उससे पुलिस को शुरुआत से ही पेशेवर शूटरों के शामिल होने का संदेह है। पुलिस की जांच अब सुपारी किलिंग के एंगल पर सबसे अधिक केंद्रित हो गई है। अधिकारियों का मानना है कि आरोपियों ने वारदात से पहले कई दिनों तक बुजुर्ग दंपती की गतिविधियों पर नजर रखी और पूरी योजना के साथ हत्या को अंजाम दिया। जिस सटीक तरीके से गोली मारी गई उससे यह आशंका और मजबूत हुई है कि वारदात में प्रशिक्षित अपराधियों का हाथ हो सकता है। जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। पुलिस को जानकारी मिली है कि दंपती अपना मकान लगभग एक करोड़ बीस लाख रुपए में बेचने की तैयारी कर रहे थे। मकान का सौदा लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुका था लेकिन रजिस्ट्री और भुगतान की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दोनों की हत्या हो गई। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस सौदे से किस व्यक्ति या समूह को आर्थिक नुकसान होने वाला था और कहीं इसी वजह से हत्या की साजिश तो नहीं रची गई। मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच साइबर सेल और विभिन्न थानों की करीब बीस टीमें लगातार काम कर रही हैं। पुलिस मोबाइल लोकेशन डिजिटल ट्रांजैक्शन बैंक खातों और सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांच कर रही है। मृतका की एक करीबी रिश्तेदार के बैंक खातों में कुछ संदिग्ध लेनदेन भी सामने आए हैं जिनकी गहन पड़ताल जारी है। पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने बताया कि जांच हर पहलू से आगे बढ़ रही है और किसी भी संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है। मामले में उपयोगी और पुख्ता जानकारी देने वाले व्यक्ति के लिए पचास हजार रुपए के इनाम की भी घोषणा की गई है। पुलिस को उम्मीद है कि तकनीकी साक्ष्यों और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जल्द ही इस बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड का खुलासा किया जा सकेगा।
बुजुर्ग माता-पिता की अनदेखी बच्चों पर पड़ सकती है भारी, देखभाल न होने पर संपत्ति वापस लेने का अधिकार बरकरार: हाई कोर्ट

नई दिल्ली । बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता ने अपनी संपत्ति इस शर्त पर बच्चों को हस्तांतरित की है कि वे उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन बाद में बच्चे इस जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करते, तो माता-पिता को वह संपत्ति वापस लेने का कानूनी अधिकार है। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना कानून का उद्देश्य है और इस अधिकार का लाभ केवल आर्थिक रूप से कमजोर माता-पिता तक सीमित नहीं है। यह मामला मुंबई के लोअर परेल स्थित एक फ्लैट से जुड़ा था, जहां एक बुजुर्ग दंपति और उनका बेटा एक ही घर में रहते थे। पिता ने कई वर्ष पहले अपनी कमाई से फ्लैट खरीदा था और बाद में विश्वास के आधार पर उसे उपहार स्वरूप अपने बेटे के नाम कर दिया। उपहार के साथ यह शर्त भी तय की गई थी कि बेटा अपने माता-पिता को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराएगा तथा उनके बुढ़ापे में उनकी उचित देखभाल करेगा। समय बीतने के साथ परिवार के संबंधों में तनाव बढ़ता गया। माता-पिता का आरोप था कि बेटे का व्यवहार बदल गया और उन्हें अपेक्षित सम्मान तथा देखभाल नहीं मिली। हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपना ही घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून के तहत संबंधित न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया और अपनी संपत्ति वापस दिलाने की मांग की। मामले की सुनवाई के बाद न्यायाधिकरण ने बेटे और उसके परिवार को निर्धारित अवधि के भीतर फ्लैट खाली कर उसका कब्जा माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया। बेटे ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अदालत में कहा कि उसके पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनका अपना व्यवसाय है और उनके पास अन्य संपत्तियां भी हैं। इसलिए उन्हें इस कानून के तहत राहत नहीं मिलनी चाहिए। हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से जुड़े कानून की धारा 23 स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करती है कि यदि संपत्ति का हस्तांतरण देखभाल और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसी शर्तों के साथ किया गया हो और प्राप्तकर्ता उन शर्तों का पालन न करे, तो संबंधित न्यायाधिकरण उस उपहार को निरस्त घोषित कर सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार का संबंध माता-पिता की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके साथ किए गए वादे और उसकी पूर्ति से है। अदालत ने माना कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान, देखभाल और सुरक्षित जीवन भी उनकी मूल आवश्यकताओं का हिस्सा हैं। यदि परिवार का कोई सदस्य संपत्ति प्राप्त करने के बाद अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटता है, तो कानून ऐसे बुजुर्गों को प्रभावी कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन अनेक वरिष्ठ नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जिन्होंने विश्वास के आधार पर अपनी संपत्ति बच्चों के नाम कर दी, लेकिन बाद में उपेक्षा या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। इससे यह संदेश भी जाता है कि संपत्ति का हस्तांतरण केवल अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी साथ लेकर आता है। यदि उस जिम्मेदारी का पालन नहीं किया जाता, तो कानून बुजुर्ग माता-पिता को न्याय दिलाने के लिए उनके पक्ष में खड़ा है।
सीमावर्ती जिलों के पुलिस प्रमुखों के साथ अमित शाह की अहम बैठक आज, अवैध घुसपैठ और सीमा सुरक्षा पर तैयार होगी नई रणनीति

नई दिल्ली । देश की सीमा सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने तथा अवैध घुसपैठ की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने व्यापक रणनीति पर काम तेज कर दिया है। इसी क्रम में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह गुरुवार को नई दिल्ली में सीमावर्ती राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे। इस बैठक में सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षकों और सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की भागीदारी प्रस्तावित है। सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिहाज से इस बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में अवैध घुसपैठ, अवैध आप्रवासन, सीमा प्रबंधन, ड्रोन गतिविधियों से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियां, मादक पदार्थों की तस्करी तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। अधिकारियों से जमीनी स्तर की स्थिति, स्थानीय चुनौतियों और अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी भी ली जाएगी, ताकि आगे की रणनीति को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। इस सम्मेलन में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल तथा पूर्वोत्तर राज्यों सहित सभी प्रमुख सीमावर्ती क्षेत्रों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे। इन क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों, सीमा पार गतिविधियों और निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी। साथ ही विभिन्न राज्यों के अनुभवों के आधार पर साझा रणनीति तैयार करने पर भी विचार होगा। बैठक का एक महत्वपूर्ण विषय सीमा क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देना भी है। सीमाओं पर निगरानी मजबूत करने के लिए ड्रोन और अन्य तकनीकी संसाधनों के उपयोग पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करने, सीमा पर बाड़ लगाने के कार्य की प्रगति तथा निगरानी प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने पर भी विचार-विमर्श होने की संभावना है। केंद्र सरकार पहले भी सीमावर्ती जिलों में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करती रही है। हाल के महीनों में वरिष्ठ स्तर पर कई दौरे और समीक्षा बैठकें आयोजित की गई हैं, जिनमें स्थानीय प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को सीमावर्ती क्षेत्रों की गतिविधियों पर सतत निगरानी रखने तथा संदिग्ध मामलों में समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। इसी क्रम में विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। बैठक में सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने, सूचना साझा करने की व्यवस्था को मजबूत करने तथा कानून के दायरे में रहकर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जाएगा। अधिकारियों से यह भी अपेक्षा की जाएगी कि वे स्थानीय स्तर पर सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का नियमित आकलन करें और आवश्यकतानुसार समय पर रिपोर्ट उपलब्ध कराएं। सरकार का मानना है कि सीमा सुरक्षा केवल सीमाओं की निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें तस्करी, अवैध प्रवेश, संगठित अपराध और अन्य सुरक्षा चुनौतियों से समन्वित तरीके से निपटना भी शामिल है। ऐसे में इस उच्चस्तरीय बैठक से निकलने वाले निर्णय आने वाले समय में सीमा प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाने तथा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
हर दिन की बचत ने पूरा किया सपना, 10-10 रुपये के सिक्कों से बाइक खरीदने वाले परिवार की कहानी बनी मिसाल

नई दिल्ली । छोटी-छोटी बचत किस तरह बड़े सपनों को साकार कर सकती है, इसका प्रेरक उदाहरण तेलंगाना से सामने आया है। यहां एक परिवार ने कई वर्षों तक 10-10 रुपये के सिक्के जमा किए और आखिरकार उन्हीं सिक्कों के जरिए अपनी पसंद की नई मोटरसाइकिल खरीद ली। इस अनोखे भुगतान का वीडियो सामने आने के बाद यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई। यादाद्रि भुवनगिरि जिले के वेलिमिनेडु गांव के निवासी कोंडे रघुपति ने अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ मिलकर वर्ष 2017 से नियमित रूप से 10 रुपये के सिक्के बचाने शुरू किए थे। परिवार का उद्देश्य एक दिन अपनी मेहनत की बचत से नई बाइक खरीदना था। वर्षों तक लगातार जमा किए गए सिक्कों की बदौलत उन्होंने लगभग 1.10 लाख रुपये की राशि तैयार कर ली और उसी से नई हीरो स्प्लेंडर प्लस मोटरसाइकिल खरीदने का फैसला किया। जब रघुपति सिक्कों से भरे कई बैग लेकर मोटरसाइकिल शोरूम पहुंचे तो वहां मौजूद कर्मचारी पहले कुछ हैरान रह गए। इतनी बड़ी रकम पूरी तरह सिक्कों में मिलने की उम्मीद किसी को नहीं थी। हालांकि रघुपति ने पहले ही शोरूम प्रबंधन को अपनी योजना की जानकारी दे दी थी। उनकी लगन और वर्षों की मेहनत को देखते हुए शोरूम संचालक ने भुगतान स्वीकार करने का निर्णय लिया। इसके बाद शोरूम में सिक्कों की गिनती का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। कर्मचारियों ने सभी सिक्कों को फर्श पर फैलाकर उनकी गिनती और सत्यापन किया। करीब पांच कर्मचारियों ने लगभग चार घंटे तक लगातार मेहनत कर पूरी राशि की जांच की। गिनती पूरी होने के बाद भुगतान स्वीकार किया गया और खरीद प्रक्रिया पूरी कर रघुपति को उनकी नई मोटरसाइकिल सौंप दी गई। रघुपति का कहना है कि उन्होंने कभी 10 रुपये के सिक्कों को लेकर फैली अफवाहों पर ध्यान नहीं दिया। कई बार लोगों के बीच यह भ्रम फैलाया जाता रहा कि ऐसे सिक्के स्वीकार नहीं किए जाते, लेकिन उन्हें भरोसा था कि यह पूरी तरह वैध मुद्रा है और एक दिन उनकी बचत उनके सपने को पूरा करेगी। इसी विश्वास के साथ परिवार ने कई वर्षों तक नियमित बचत जारी रखी। यह घटना केवल एक बाइक खरीदने की कहानी नहीं बल्कि अनुशासित बचत और धैर्य का संदेश भी देती है। आर्थिक विशेषज्ञ भी लंबे समय से छोटी-छोटी नियमित बचत को भविष्य की बड़ी जरूरतों को पूरा करने का प्रभावी तरीका मानते रहे हैं। रघुपति के परिवार ने इसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारकर दिखाया कि सीमित आय के बावजूद नियमित बचत से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। इस अनोखी खरीदारी का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग परिवार की मेहनत, धैर्य और वित्तीय अनुशासन की जमकर सराहना कर रहे हैं। कई लोगों ने इसे बचत की आदत अपनाने की प्रेरणा बताया है। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि निरंतर प्रयास और छोटी-छोटी बचत समय के साथ बड़ी उपलब्धि का आधार बन सकती है।
मुख्यमंत्री राजा हरिश्चंद्र नहीं हैं, सच बताइए 7669 करोड़ कहां गए, सरदार सरोवर समझौते पर कांग्रेस का तीखा हमला

मध्यप्रदेश । सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े अंतरराज्यीय वित्तीय समझौते को लेकर मध्यप्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश के हितों से समझौता किया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जो कह दें वही अंतिम सत्य नहीं हो जाता। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि जब मध्यप्रदेश ने सरदार सरोवर परियोजना में हुए नुकसान के आधार पर 7669 करोड़ रुपए का दावा किया था तो आखिर वह दावा किस आधार पर छोड़ दिया गया। पटवारी ने पूरे समझौते पर श्वेत पत्र जारी करने और विधानसभा में विस्तृत चर्चा कराने की मांग भी की। भोपाल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जीतू पटवारी ने कहा कि नर्मदा नदी मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है और सरदार सरोवर परियोजना के कारण सबसे अधिक नुकसान भी प्रदेश को ही उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक कृषि भूमि वन क्षेत्र और आदिवासी गांव मध्यप्रदेश में डूब क्षेत्र में आए। हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ और पुनर्वास का सबसे बड़ा दायित्व भी प्रदेश ने निभाया। ऐसे में तत्कालीन आकलन के आधार पर मध्यप्रदेश ने 7669 करोड़ रुपए का दावा किया था। अब सरकार यह बताए कि वह दावा अचानक समाप्त कैसे हो गया। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार केवल यह प्रचार कर रही है कि गुजरात की लगभग 1500 करोड़ रुपए की देनदारी को कम कर 231 करोड़ रुपए में निपटा दिया गया और इसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है। लेकिन सरकार यह नहीं बता रही कि मध्यप्रदेश के हजारों करोड़ रुपए के दावे का क्या हुआ। उन्होंने कहा कि जनता को पूरे समझौते की सच्चाई जानने का अधिकार है और सरकार को सभी दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए। पटवारी ने सरकार से कई सीधे सवाल भी पूछे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बताएं यह फैसला किस कानूनी और वित्तीय आधार पर लिया गया। क्या इस विषय पर राज्य मंत्रिमंडल में चर्चा हुई थी। क्या विधानसभा को विश्वास में लिया गया था। क्या पर्यावरण विशेषज्ञों और परियोजना से जुड़े जानकारों की राय ली गई थी। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में हुई बैठक में शामिल होने जा रहे अधिकारियों से उनकी विमान यात्रा के दौरान बातचीत हुई थी और अधिकारियों ने बताया था कि मध्यप्रदेश अपने दावे को लेकर पूरी तैयारी के साथ बैठक में जा रहा है। ऐसे में समझौते के बाद दावा समाप्त होने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति को भी इस मुद्दे से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा। पटवारी ने कहा कि मध्यप्रदेश पर पांच लाख इकसठ हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज हो चुका है और सरकार लगातार नया कर्ज लेकर खर्च कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास की ठोस योजना के बजाय सरकार केवल प्रचार और आयोजनों पर ध्यान दे रही है। हाल ही में लिए गए नए कर्ज का उल्लेख करते हुए उन्होंने वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठाए। दरअसल नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध को लेकर मध्यप्रदेश गुजरात महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच कई वर्षों से वित्तीय विवाद चल रहा था। मध्यप्रदेश का कहना था कि परियोजना से सबसे अधिक भूमि और गांव उसके प्रभावित हुए हैं इसलिए उसे मुआवजा मिलना चाहिए जबकि गुजरात परियोजना की लागत में अन्य राज्यों की हिस्सेदारी की मांग कर रहा था। हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चारों राज्यों ने वन टाइम सेटलमेंट पर हस्ताक्षर कर वर्षों पुराने विवाद को समाप्त करने पर सहमति जताई। समझौते के तहत मध्यप्रदेश महाराष्ट्र और राजस्थान गुजरात को 550 550 करोड़ रुपए देंगे जबकि पुराने सभी वित्तीय दावों को समाप्त माना जाएगा। इसी समझौते को लेकर अब प्रदेश में सियासी घमासान तेज हो गया है और कांग्रेस सरकार से पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग कर रही है।
आयशर कॉलेज के पास जल उठा एथेनॉल टैंकर का केबिन, दमकल की तत्परता से बची बड़ी तबाही

भोपाल । राजधानी भोपाल में गुरुवार सुबह उस समय अफरा तफरी मच गई जब आयशर कॉलेज के पास एथेनॉल से भरे एक टैंकर के केबिन में अचानक आग भड़क उठी। घटना सुबह करीब सवा ग्यारह बजे की बताई जा रही है। आग की लपटें उठती देख आसपास मौजूद लोगों में दहशत फैल गई और तत्काल इसकी सूचना दमकल विभाग को दी गई। सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की टीम तेजी से मौके पर पहुंची और तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया। दमकल कर्मियों की मुस्तैदी के चलते आग पर कुछ ही देर में काबू पा लिया गया जिससे एक संभावित बड़ा हादसा टल गया। प्राथमिक जानकारी के अनुसार टैंकर पूरी तरह एथेनॉल से भरा हुआ था जिसकी पुष्टि संबंधित डिपो के अधिकारियों ने भी की है। एथेनॉल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ माना जाता है और यदि आग टैंकर के मुख्य हिस्से तक पहुंच जाती तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी। राहत की बात यह रही कि आग केवल चालक के केबिन तक सीमित रही और टैंकर में भरे एथेनॉल तक नहीं पहुंच सकी। इससे किसी बड़े विस्फोट और जनहानि की आशंका पूरी तरह टल गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार केबिन से अचानक धुआं और आग की लपटें निकलने लगीं जिसके बाद आसपास मौजूद लोगों ने सुरक्षित दूरी बना ली। कुछ ही देर में घटनास्थल पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। मौके पर पहुंचे दमकल कर्मियों ने बिना समय गंवाए आग बुझाने का अभियान शुरू किया और एक फायर ब्रिगेड वाहन की मदद से आग को पूरी तरह नियंत्रित कर लिया। अधिकारियों का कहना है कि यदि कुछ मिनट और देरी होती तो आग टैंकर तक पहुंच सकती थी जिससे बड़ा नुकसान हो सकता था। दमकल विभाग के अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल आग लगने के वास्तविक कारणों का पता नहीं चल पाया है। शुरुआती जांच में इसे अज्ञात कारणों से लगी आग माना जा रहा है। तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से यह जांच की जाएगी कि आग शॉर्ट सर्किट किसी तकनीकी खराबी या अन्य वजह से लगी थी। इसके साथ ही टैंकर की तकनीकी स्थिति और सुरक्षा मानकों की भी जांच की जाएगी। घटना के समय टैंकर चालक मौके पर मौजूद नहीं मिला। ऐसे में यह भी जांच का विषय बन गया है कि हादसे के दौरान चालक कहां था और आग लगने के समय परिस्थितियां क्या थीं। पुलिस चालक की तलाश करने के साथ उससे पूछताछ की तैयारी कर रही है ताकि पूरे घटनाक्रम की सटीक जानकारी सामने आ सके। अधिकारियों के अनुसार आग में टैंकर का केबिन पूरी तरह जलकर खाक हो गया है लेकिन टैंकर में भरा एथेनॉल सुरक्षित बचा हुआ है। यही वजह रही कि एक बड़ा औद्योगिक हादसा टल गया। घटना के दौरान किसी व्यक्ति के घायल होने या जनहानि की सूचना नहीं मिली है। फिलहाल पुलिस और संबंधित विभाग पूरे मामले की जांच कर रहे हैं तथा आग लगने के कारणों का पता लगाने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर ज्वलनशील पदार्थों के परिवहन के दौरान सुरक्षा मानकों के कड़ाई से पालन की आवश्यकता को उजागर कर दिया है।
मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन को नई रफ्तार, 40 रूटों पर दौड़ेंगी सरकारी बसें, हर 10 सेकेंड मिलेगी लोकेशन

मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को आधुनिक और अधिक भरोसेमंद बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने प्रदेश के 40 प्रमुख इंटरसिटी बस रूटों पर सरकारी बस सेवा शुरू करने की तैयारी पूरी कर ली है। परिवहन विभाग ने राज्य सड़क परिवहन योजना का प्रारूप जारी करते हुए इस पर आम लोगों और संबंधित पक्षों से तीस दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। तय प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन मार्गों पर सरकारी बसों का संचालन शुरू कर दिया जाएगा। नई व्यवस्था का उद्देश्य प्रदेश के यात्रियों को सुरक्षित समयबद्ध और तकनीक आधारित परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है। सरकार की इस नई योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि यात्रियों को पूरी तरह डिजिटल सुविधाएं मिलेंगी। बसों में इलेक्ट्रॉनिक टिकटिंग सिस्टम लागू किया जाएगा जिससे टिकट लेने की प्रक्रिया आसान और पारदर्शी होगी। इसके साथ ही हर बस में आधुनिक ट्रैकिंग डिवाइस लगाए जाएंगे जो हर दस सेकेंड में वाहन की लाइव लोकेशन अपडेट करेंगे। यात्री वेबसाइट के माध्यम से बस की वास्तविक स्थिति जान सकेंगे जिससे उन्हें बस के आने और पहुंचने का सही समय पता चल सकेगा और अनावश्यक इंतजार से राहत मिलेगी। परिवहन विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार इन बसों का संचालन मध्यप्रदेश यात्री बस परिवहन और इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के माध्यम से किया जाएगा। राज्य परिवहन उपक्रम के नाम पर परमिट जारी किए जाएंगे जबकि संचालन सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल के तहत निजी बस संचालकों के सहयोग से किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस मॉडल से बेहतर संसाधनों का उपयोग होगा और यात्रियों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी। योजना लागू होने के सात दिन के भीतर बसों का संचालन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। नई परिवहन नीति के तहत प्रदेश के कई महत्वपूर्ण शहर और जिले आपस में बेहतर तरीके से जुड़ेंगे। इसमें भोपाल इंदौर उज्जैन ग्वालियर जबलपुर रीवा सागर छिंदवाड़ा खंडवा खरगोन बड़वानी रतलाम धार नीमच मंदसौर शिवपुरी गुना शाजापुर देवास सीहोर नरसिंहपुर सहित अनेक जिलों को जोड़ने वाले 40 प्रमुख मार्ग शामिल किए गए हैं। इन मार्गों पर यात्रियों की संख्या और ट्रैफिक के अनुसार बसों की संख्या भी तय की जाएगी ताकि भीड़भाड़ वाले रूटों पर लोगों को अधिक सुविधा मिल सके। योजना में यात्रियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अलग अलग श्रेणी की बसों का संचालन किया जाएगा। सामान्य मार्गों पर 23 से 34 सीटों वाली मिडी बसें चलाई जाएंगी जिनमें साधारण सेमी डीलक्स और डीलक्स श्रेणी शामिल होगी। वहीं लंबे और व्यस्त इंटरसिटी मार्गों पर 35 से 70 सीटों वाली स्टैंडर्ड बसें संचालित होंगी जिनमें एसी डीलक्स एसी लग्जरी और एसी सुपर लग्जरी जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। इससे यात्रियों को उनकी जरूरत और बजट के अनुसार यात्रा का विकल्प मिलेगा। सरकार का मानना है कि नई परिवहन नीति लागू होने से प्रदेश में सार्वजनिक बस सेवा अधिक व्यवस्थित सुरक्षित और समयबद्ध बनेगी। साथ ही निजी और सरकारी भागीदारी के जरिए परिवहन व्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। डिजिटल टिकटिंग और लाइव ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं यात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाएंगी और सार्वजनिक परिवहन पर लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा। यदि योजना तय समय पर लागू होती है तो मध्यप्रदेश में बस यात्रा पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक और तकनीक आधारित हो जाएगी।