माता टेकरी में हादसे की आहट कुमार गंधर्व द्वार से टूटे पत्थर एक श्रद्धालु घायल प्रशासन पर लापरवाही के आरोप

देवास । देवास की आस्था का प्रमुख केंद्र माता टेकरी शनिवार सुबह उस समय अचानक चर्चा का विषय बन गया जब रपट मार्ग पर स्थित कुमार गंधर्व प्रवेश द्वार से पत्थर टूटकर नीचे गिर पड़े। इस अप्रत्याशित घटना में एक व्यक्ति घायल हो गया जबकि संयोग से बड़ा हादसा टल गया। जिस समय यह घटना हुई उस दौरान द्वार के आसपास श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी थी और कुछ लोग पास में खड़े होकर चाय पी रहे थे। यदि उस समय वहां अधिक भीड़ होती तो स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सुबह अचानक प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से से लाल पत्थरों के कई टुकड़े टूटकर नीचे आ गिरे। किसी को संभलने का मौका भी नहीं मिला और एक बड़ा पत्थर नीचे खड़े व्यक्ति के पैर पर गिर गया जिससे उसे चोट लग गई। आसपास मौजूद लोगों ने तत्काल घायल की मदद की और सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। घटना के बाद कुछ देर के लिए वहां अफरा तफरी का माहौल बन गया और श्रद्धालु भयभीत नजर आए। स्थानीय लोगों का कहना है कि माता टेकरी देवास का प्रमुख धार्मिक स्थल है जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष अवसरों और त्योहारों पर यहां हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। ऐसे में प्रवेश द्वार जैसी महत्वपूर्ण संरचना से पत्थर गिरना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस तरह की संरचनाओं की नियमित जांच और मरम्मत नहीं कराई गई तो भविष्य में बड़ा हादसा हो सकता है। घटना के बाद श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की कि पूरे प्रवेश द्वार और रपट मार्ग की तकनीकी जांच कराई जाए। साथ ही जिन स्थानों पर पत्थर ढीले हैं या संरचना कमजोर हो चुकी है वहां तत्काल मरम्मत कराई जाए ताकि किसी भी श्रद्धालु की जान जोखिम में न पड़े। लोगों ने यह भी कहा कि धार्मिक स्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। माता टेकरी न केवल देवास बल्कि आसपास के जिलों के लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। यहां प्रतिदिन दूर दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर परिणाम दे सकती है। फिलहाल इस घटना में केवल एक व्यक्ति घायल हुआ है लेकिन इसे चेतावनी के रूप में देखते हुए प्रशासन को तत्काल आवश्यक कदम उठाने की जरूरत महसूस की जा रही है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि संबंधित विभाग इस घटना को गंभीरता से लेते हुए प्रवेश द्वार की मजबूती की जांच कराएगा और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करेगा ताकि श्रद्धालु बिना किसी भय के माता टेकरी के दर्शन कर सकें।
ईरान के परमाणु ठिकानों पर फिर बढ़ी हलचल, नई सैटेलाइट तस्वीरों ने बढ़ाई वैश्विक चिंता, अमेरिका-ईरान समझौते के पालन पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच हालिया तनाव और युद्धविराम के बाद सामने आई नई सैटेलाइट तस्वीरों ने एक बार फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। संवेदनशील परमाणु परिसरों में निर्माण और मरम्मत संबंधी गतिविधियों के संकेत मिलने के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या ईरान हाल में हुए समझौते की शर्तों का पूरी तरह पालन कर रहा है। इन घटनाक्रमों ने वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों और कई देशों की चिंताओं को फिर बढ़ा दिया है। हालिया तस्वीरों के विश्लेषण में ईरान के पारचिन परमाणु परिसर में सबसे अधिक गतिविधियां दर्ज होने की बात सामने आई है। यह वही स्थान है, जिसे लंबे समय से परमाणु हथियारों से जुड़े संभावित परीक्षणों के संदर्भ में संवेदनशील माना जाता रहा है। तस्वीरों में क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत, निर्माण कार्य और सुरक्षा संरचनाओं को दोबारा मजबूत किए जाने जैसे संकेत दिखाई दिए हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि संबंधित परिसरों को फिर से सक्रिय स्थिति में लाने की प्रक्रिया चल रही हो सकती है। इसी तरह पिकऐक्स माउंटेन क्षेत्र में भी सुरंगों के आसपास वाहनों की आवाजाही और अन्य गतिविधियों के संकेत मिलने की जानकारी सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे स्थानों पर किसी भी प्रकार की असामान्य हलचल अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करती है, क्योंकि इन परिसरों को ईरान के रणनीतिक परमाणु कार्यक्रम से जोड़कर देखा जाता रहा है। हालांकि इन गतिविधियों का वास्तविक उद्देश्य क्या है, इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। दूसरी ओर इस्फहान, फोरडो और नतांज जैसे प्रमुख परमाणु केंद्रों में फिलहाल बड़े स्तर पर नई गतिविधियों के स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। इसके बावजूद कुछ मिसाइल भंडारण केंद्रों पर मरम्मत और बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने का काम दिखाई देने से सुरक्षा विश्लेषकों की चिंता बढ़ी है। उनका कहना है कि यदि सैन्य और परमाणु ढांचे से जुड़े परिसरों में एक साथ गतिविधियां बढ़ती हैं तो क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। पिछले महीने हुए 14 सूत्रीय समझौते में ईरान ने दोहराया था कि वह परमाणु हथियार विकसित या प्राप्त नहीं करेगा तथा संवर्धित यूरेनियम से जुड़े मुद्दों के समाधान में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी का सहयोग करेगा। इस समझौते को दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था। हालांकि अब सामने आए घटनाक्रमों ने समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। निर्माण गतिविधियां नियमित मरम्मत, सुरक्षा सुधार या अन्य प्रशासनिक कारणों से भी हो सकती हैं। ऐसे में किसी भी दावे की पुष्टि के लिए स्वतंत्र निरीक्षण, तकनीकी विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल ईरान की इन गतिविधियों पर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यदि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण एजेंसियां अतिरिक्त जानकारी साझा करती हैं या संबंधित पक्षों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि हालिया गतिविधियां सामान्य रखरखाव का हिस्सा हैं या फिर वास्तव में परमाणु कार्यक्रम से जुड़े किसी बड़े घटनाक्रम का संकेत देती हैं।
'आज मोदी हमारा फोन भी नहीं उठाते', शहबाज शरीफ के सलाहकार का बड़ा बयान, भारत से रिश्तों पर पाकिस्तान की पुरानी नीति को ठहराया जिम्मेदार

नई दिल्ली । पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के विशेष सलाहकार राणा सनाउल्लाह खान के हालिया बयान ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि भारत के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर पाकिस्तान के पास था, लेकिन उस समय लिए गए राजनीतिक फैसलों और लगातार विरोध की नीति के कारण वह मौका हाथ से निकल गया। उन्होंने यह भी कहा कि आज यदि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान के नेताओं से संवाद के प्रति उत्सुक नहीं दिखाई देते हैं तो इसके लिए पाकिस्तान को आत्ममंथन करना चाहिए। राणा सनाउल्लाह ने बातचीत के दौरान वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा का अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की संभावना बनी थी। उनके अनुसार यदि उस दौर में सकारात्मक माहौल को आगे बढ़ाया जाता तो दक्षिण एशिया में स्थायी शांति और सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती थी। उन्होंने संकेत दिया कि उस अवसर का सही उपयोग नहीं किया गया और बाद की घटनाओं ने दोनों देशों के रिश्तों को और अधिक जटिल बना दिया। कार्यक्रम के दौरान जब उनसे भारत के साथ संपर्क और बैकडोर कूटनीति को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे संवाद की प्रक्रिया पूरी तरह कभी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने कहा कि संवेदनशील मुद्दों पर प्रत्यक्ष बातचीत भले सीमित रही हो, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर संपर्क बनाए रखने की कोशिशें समय-समय पर होती रही हैं। उनके अनुसार ऐसे संवाद क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं। राणा सनाउल्लाह ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपने अतीत से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उस समय संबंध सुधारने की दिशा में गंभीर प्रयास किए गए होते तो आज हालात अलग हो सकते थे। उनके मुताबिक राजनीतिक मतभेदों के कारण अवसरों को खोना दोनों देशों के हित में नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्रीय सहयोग मजबूत होने से आर्थिक चुनौतियों का सामना करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था और पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था। बयान के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि भारत के साथ टकराव की राजनीति ने पाकिस्तान को अपेक्षित लाभ नहीं पहुंचाया। उनका मानना है कि पड़ोसी देशों के बीच संवाद और विश्वास बहाली का माहौल दोनों देशों के नागरिकों के हित में होता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में यदि अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं तो वार्ता और सहयोग के रास्ते फिर से तलाशे जा सकते हैं। राणा सनाउल्लाह के इस बयान को पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक बहस के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। उनके वक्तव्य ने यह संकेत दिया कि पाकिस्तान के भीतर भी भारत के साथ संबंधों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। हालांकि दोनों देशों के संबंध सुरक्षा, सीमा, आतंकवाद और कूटनीतिक मुद्दों सहित कई जटिल विषयों से जुड़े रहे हैं, लेकिन समय-समय पर संवाद बहाल करने की कोशिशें भी होती रही हैं। ऐसे में उनका यह बयान दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और भविष्य की संभावित कूटनीतिक दिशा को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है।
भाजपा में टिकट बदलने की परंपरा नहीं दतिया विवाद पर बोले कैलाश विजयवर्गीय नरोत्तम मिश्रा करेंगे संगठन का सम्मान

मध्य प्रदेश। दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी को लेकर सामने आए विवाद के बीच प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पार्टी की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि भारतीय जनता पार्टी में टिकट घोषित होने के बाद उसे बदलने की कोई परंपरा नहीं रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि संगठन सभी कार्यकर्ताओं से संवाद कर मतभेद समाप्त करेगा और भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी भारी मतों से चुनाव जीतेंगे। इंदौर में मीडिया से चर्चा करते हुए विजयवर्गीय ने कहा कि भाजपा एक लोकतांत्रिक संगठन है जहां प्रत्येक कार्यकर्ता को अपनी बात रखने का अधिकार है। किसी भी चुनाव में टिकट वितरण के बाद कुछ कार्यकर्ताओं की नाराजगी स्वाभाविक होती है लेकिन संगठन का निर्णय सभी के लिए सर्वोपरि होता है। उन्होंने कहा कि पार्टी हर फैसला लंबी चर्चा विचार विमर्श और तय प्रक्रिया के बाद करती है इसलिए घोषित प्रत्याशी को बदलने का कोई सवाल नहीं उठता। पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी पर प्रतिक्रिया देते हुए विजयवर्गीय ने कहा कि नरोत्तम मिश्रा भाजपा के वरिष्ठ और समर्पित नेता हैं। उन्होंने हमेशा संगठन की मर्यादा का पालन किया है और इस बार भी पार्टी के निर्णय का सम्मान करेंगे। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं नरोत्तम मिश्रा से संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन बातचीत नहीं हो सकी। इसके बावजूद उन्हें पूरा विश्वास है कि संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद के जरिए सभी मतभेद समाप्त हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों पर हजारों कार्यकर्ता चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं लेकिन टिकट केवल एक व्यक्ति को मिलता है। ऐसे में सभी को अवसर मिलना संभव नहीं होता। संगठन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही उम्मीदवार तय करता है और कार्यकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे पार्टी के फैसले के साथ खड़े रहें। विजयवर्गीय ने कहा कि आशुतोष तिवारी लंबे समय तक संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और वे मजबूत संगठनात्मक पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ता हैं इसलिए उन्हें चुनाव में व्यापक समर्थन मिलेगा। इस दौरान विजयवर्गीय ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई से जुड़े पुराने ड्रग्स मामले पर भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं को दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपने घर की परिस्थितियों पर भी नजर डालनी चाहिए। उनके अनुसार जब स्वयं परिवार के सदस्य अपनी पुरानी गलतियों को स्वीकार कर चुके हैं तब इस विषय पर अधिक टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने जीतू पटवारी की प्रस्तावित साइकिल यात्रा को लेकर भी तंज कसते हुए कहा कि केवल यात्राएं निकालने से राजनीतिक माहौल नहीं बदलता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इससे पहले कांग्रेस के बड़े नेताओं की यात्राओं का भी अपेक्षित राजनीतिक असर दिखाई नहीं दिया था इसलिए केवल यात्रा के भरोसे जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। दतिया उपचुनाव को लेकर भाजपा के भीतर उठे असंतोष के बीच कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान संगठन का स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि पार्टी अपने घोषित उम्मीदवार के साथ मजबूती से खड़ी है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि संगठन नाराज कार्यकर्ताओं को किस तरह साथ लेकर चुनावी मैदान में उतरता है और उपचुनाव का परिणाम किस दिशा में जाता है।
ट्रंप की ईरान को दोटूक चेतावनी, हत्या की साजिश पर 'अभूतपूर्व सैन्य जवाब' का दावा, बातचीत की सहमति के बीच फिर बढ़ा मध्य-पूर्व का तनाव

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर बेहद सख्त बयान देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की हत्या की साजिश सफल होती है तो अमेरिका ऐसा सैन्य जवाब देगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच हाल के दिनों में सैन्य गतिविधियां और कूटनीतिक बयानबाजी लगातार बढ़ रही है। ट्रंप ने कहा कि ईरान से जुड़ा खतरा कोई नया विषय नहीं है, बल्कि कई वर्षों से इस प्रकार की आशंकाएं सामने आती रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल ऐसी कोई नई खुफिया जानकारी उपलब्ध नहीं है जो उनकी हत्या की किसी ताजा साजिश की पुष्टि करती हो, लेकिन संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही की गुंजाइश नहीं होती और अमेरिका हर परिस्थिति के लिए तैयार है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत आगे बढ़ाने की इच्छा जताई है और इस पर सहमति भी बनी है। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि पहले जैसा युद्धविराम अब प्रभावी नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार हालात बदल चुके हैं और आगे की बातचीत पूरी तरह परिस्थितियों तथा ईरान के व्यवहार पर निर्भर करेगी। इस बयान ने संकेत दिया है कि कूटनीतिक संवाद और सैन्य तैयारी दोनों समानांतर रूप से आगे बढ़ सकते हैं। हालिया घटनाओं ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया है। क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक गतिविधियों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के आसपास हुई घटनाओं के बाद अमेरिका ने ईरान से जुड़े कई रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई की, जिसके बाद क्षेत्रीय स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई। इसके जवाब में ईरान की ओर से भी अमेरिकी हितों को निशाना बनाने के आरोप लगाए गए, जिससे पूरे मध्य-पूर्व में अस्थिरता की आशंकाएं बढ़ गई हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान पर समुद्री गतिविधियों को प्रभावित करने और हालिया समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों या समुद्री यातायात को बाधित करने का प्रयास किया गया तो अमेरिका पहले से अधिक कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि रणनीतिक संकेत भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों को लेकर किसी भी स्तर तक जाने की नीति पर कायम है। दूसरी ओर ईरान के साथ संभावित वार्ता की संभावना यह भी दर्शाती है कि दोनों पक्ष तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते। आने वाले दिनों में दोनों देशों की गतिविधियां केवल मध्य-पूर्व ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व राजनीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में दुनिया की निगाहें अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी रहेंगी।
ट्रंप के सख्त रुख के बाद ईरान का बड़ा संदेश, समझौता टूटा तो पूरी ताकत से होगा जवाब, युद्ध की तैयारी का दावा

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच हालिया कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद दोनों देशों के संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण दौर में पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनके देश को अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं है और यदि किसी भी समझौते का उल्लंघन किया गया या दबाव बनाने की कोशिश हुई तो ईरान अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके इस बयान ने पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक परिस्थितियों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। गालिबाफ ने कहा कि ईरान ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा तैयारियों में कभी ढील नहीं दी है। उनका कहना था कि किसी भी देश के साथ वार्ता तभी प्रभावी हो सकती है, जब वह अपनी सुरक्षा के प्रति पूरी तरह सक्षम और आत्मनिर्भर हो। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका भविष्य में किसी समझौते से पीछे हटता है या अपने वादों का पालन नहीं करता है, तो ईरान मजबूती के साथ उसका जवाब देने की क्षमता रखता है। उनके अनुसार, देश की सुरक्षा और जनता के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। ईरानी संसद अध्यक्ष ने यह भी बताया कि हालिया वार्ता के दौरान उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व के सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी थी। उन्होंने कहा कि ईरान का अनुभव बताता है कि केवल आश्वासनों के आधार पर भरोसा नहीं किया जा सकता और किसी भी बातचीत के साथ रक्षा तैयारियों को समान महत्व देना आवश्यक है। उनका मानना है कि कूटनीति तभी सफल हो सकती है जब राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता न किया जाए। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को लेकर अपना रुख सख्त बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच पहले लागू युद्धविराम की स्थिति अब प्रभावी नहीं रही है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बातचीत के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन किसी भी आगे की प्रक्रिया में अमेरिका अपने हितों और सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताओं को सर्वोपरि रखेगा। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच भविष्य की वार्ताओं को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है। इसी बीच क्षेत्रीय स्तर पर तनाव कम करने की कोशिशें भी जारी हैं। कतर की ओर से मध्यस्थता के प्रयास तेज किए गए हैं और दोनों देशों के बीच संवाद बहाल कराने के लिए कूटनीतिक संपर्क बनाए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि यह पहल सफल होती है तो पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम करने की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। हालांकि फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता अविश्वास केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में होने वाली वार्ताएं और दोनों देशों के राजनीतिक संकेत वैश्विक समुदाय की नजर में महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो तनाव कम होने की संभावना बनेगी, लेकिन आक्रामक बयानबाजी जारी रहने पर क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ सकती है।
सरदार सरोवर वन टाइम सेटलमेंट बना सियासी मुद्दा क्या मध्य प्रदेश ने घाटे का सौदा किया या बचाए 1268 करोड़

मध्य प्रदेश। करीब तीन दशक से लंबित सरदार सरोवर डैम विवाद पर आखिरकार वन टाइम सेटलमेंट हो गया लेकिन इस समझौते ने मध्य प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जिस राज्य ने अपनी हजारों हेक्टेयर जमीन डूबने और सैकड़ों गांवों के विस्थापन के बदले गुजरात से 7669 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा था उसे अब यह दावा पूरी तरह छोड़ना पड़ा है। इतना ही नहीं राज्य सरकार को गुजरात को 231 करोड़ 80 लाख रुपए का भुगतान भी करना होगा। यही वजह है कि इस समझौते को लेकर सरकार और विपक्ष आमने सामने हैं। सरदार सरोवर परियोजना नर्मदा नदी पर गुजरात में बनाई गई थी लेकिन इसके बैकवाटर का सबसे बड़ा असर मध्य प्रदेश पर पड़ा। डैम की ऊंचाई बढ़ने के बाद प्रदेश के 192 गांव और करीब 21 हजार हेक्टेयर भूमि स्थायी रूप से डूब क्षेत्र में आ गई। इसके बाद नए भूमि अधिग्रहण कानून के आधार पर मध्य प्रदेश ने गुजरात से 7669 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग की थी। दूसरी ओर गुजरात पुराने दावों के आधार पर सीमित भुगतान की बात करता रहा और निर्माण लागत में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी का मुद्दा उठाता रहा। इसी विवाद के कारण मामला वर्षों तक अटका रहा। दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चार राज्यों के बीच हुए समझौते में पुरानी फाइल को हमेशा के लिए बंद करने पर सहमति बनी। इसके तहत मध्य प्रदेश ने अपना पूरा मुआवजा दावा वापस ले लिया जबकि गुजरात की ओर से निर्माण लागत में प्रदेश की करीब 1500 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी घटाकर केवल 231.80 करोड़ रुपए तय कर दी गई। यही फैसला अब राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने प्रदेश के किसानों आदिवासियों और विस्थापित परिवारों के हितों से समझौता किया है। विपक्ष का कहना है कि हजारों करोड़ रुपए के दावे को छोड़ना प्रदेश के अधिकारों का नुकसान है और सरकार को इस पूरे समझौते पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। वहीं मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और सरकार इस समझौते को प्रदेश के हित में लिया गया व्यावहारिक फैसला बता रहे हैं। उनका कहना है कि गुजरात किसी भी स्थिति में 7669 करोड़ रुपए देने को तैयार नहीं था। ऐसे में लंबे कानूनी विवाद को समाप्त करते हुए राज्य ने 1500 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी को घटाकर केवल 231.80 करोड़ रुपए में निपटा लिया जिससे सरकारी खजाने पर बड़ा वित्तीय बोझ टल गया। सरकार यह भी तर्क दे रही है कि सरदार सरोवर परियोजना से मध्य प्रदेश को दीर्घकालिक लाभ लगातार मिल रहे हैं। परियोजना से बनने वाली जल विद्युत का सबसे बड़ा हिस्सा प्रदेश को मिलता है। साथ ही लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई और कई बड़े शहरों की पेयजल आपूर्ति भी इसी परियोजना पर निर्भर है। इसलिए सरकार इस समझौते को भविष्य के हितों और व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रही है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल अब उन विस्थापित परिवारों को लेकर है जिनके पुनर्वास और मुआवजे की जिम्मेदारी अब पूरी तरह मध्य प्रदेश सरकार पर आ गई है। चूंकि गुजरात से कोई मुआवजा राशि नहीं मिलेगी इसलिए राज्य सरकार को ही अपने संसाधनों से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और भुगतान की व्यवस्था करनी होगी। ऐसे में यह समझौता कानूनी विवाद का अंत जरूर है लेकिन इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बने रहेंगे।
40 साल बाद भारतीय प्रधानमंत्री का ऐतिहासिक न्यूजीलैंड दौरा, पीएम मोदी और क्रिस्टोफर लक्सन की मुलाकात से द्विपक्षीय संबंधों को मिली नई रफ्तार

नई दिल्ली । चार दशक से अधिक समय बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूजीलैंड यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को नई ऊर्जा देने का अवसर प्रदान किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय राजकीय दौरे पर न्यूजीलैंड पहुंचे, जहां उनका प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने गर्मजोशी से स्वागत किया। यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत और न्यूजीलैंड के बीच राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ऑकलैंड पहुंचने पर दोनों नेताओं की मुलाकात की तस्वीरें और वीडियो व्यापक रूप से चर्चा में रहे। स्वागत के दौरान दोनों नेताओं ने आत्मीयता के साथ एक-दूसरे का अभिवादन किया, जिससे दोनों देशों के मजबूत होते संबंधों का स्पष्ट संदेश भी गया। इस अवसर पर न्यूजीलैंड के शीर्ष नेतृत्व ने भारत के साथ दीर्घकालिक सहयोग को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए स्वागत संदेश पर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने भी भारत और न्यूजीलैंड की मित्रता तथा प्रगति के लिए शुभकामनाएं व्यक्त कीं। राष्ट्रपति के इस संदेश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जवाब दिया और कहा कि मित्र देशों की ओर से मिलने वाले ऐसे विचारपूर्ण संदेश हमेशा विशेष महत्व रखते हैं। इस संवाद को क्षेत्रीय सहयोग और आपसी विश्वास का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने सहयोगी देशों के साथ संबंधों को लगातार मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रहा है। भारत की एक्ट ईस्ट नीति और समुद्री क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की रणनीति के तहत न्यूजीलैंड का महत्व लगातार बढ़ा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, शिक्षा, कृषि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी का दायरा बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को नई गति देने के लिए विभिन्न संभावनाओं पर विचार होने की उम्मीद है। निवेश बढ़ाने, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने, नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा प्रस्तावित है। इसके अलावा क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री सहयोग और मुक्त तथा समावेशी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साझा दृष्टिकोण पर भी दोनों नेताओं के बीच विस्तृत बातचीत होने की संभावना है। प्रधानमंत्री मोदी अपने प्रवास के दौरान न्यूजीलैंड के उद्योग जगत, व्यापारिक समुदाय और खेल क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेंगे। साथ ही वहां रहने वाले भारतीय समुदाय को संबोधित कर भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच संबंधों को और मजबूत करने का संदेश देंगे। न्यूजीलैंड में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती भागीदारी दोनों देशों के सामाजिक और आर्थिक रिश्तों का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है। न्यूजीलैंड प्रधानमंत्री मोदी की तीन देशों की विदेश यात्रा का अंतिम पड़ाव है। इससे पहले वह इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर चुके हैं। लगातार तीन महत्वपूर्ण देशों की इस यात्रा को भारत की सक्रिय विदेश नीति और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती भूमिका के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस ऐतिहासिक यात्रा से भारत और न्यूजीलैंड के बीच सहयोग के नए अवसर खुलेंगे तथा दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत होगी।
आईएनएस महेंद्रगिरी से बढ़ी भारत की समुद्री ताकत, राजनाथ सिंह बोले- आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य क्षमता का संतुलन ही भविष्य की जीत तय करेगा

नई दिल्ली । भारतीय नौसेना के युद्धक बेड़े में स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस महेंद्रगिरी के शामिल होने के साथ भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को एक महत्वपूर्ण मजबूती मिली है। इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत अब केवल समुद्र के माध्यम से अपनी रणनीतिक दिशा तय करने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में समुद्री क्षेत्र की दिशा निर्धारित करने की क्षमता भी विकसित कर रहा है। उन्होंने इसे भारत की बढ़ती सामरिक शक्ति, आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण और वैश्विक समुद्री उपस्थिति का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया। विशाखापट्टनम में आयोजित कमीशनिंग समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरी एक आधुनिक ब्लू-वाटर स्टील्थ फ्रिगेट है, जो तटीय क्षेत्रों तक सीमित न रहकर गहरे समुद्री क्षेत्रों में लंबे समय तक अभियान संचालित करने में सक्षम है। यह युद्धपोत समुद्री सीमाओं की सुरक्षा, रणनीतिक निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना लगातार आधुनिक तकनीक और स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के जरिए अपनी परिचालन क्षमता का विस्तार कर रही है। आईएनएस महेंद्रगिरी प्रोजेक्ट 17ए के तहत निर्मित छठा और अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट है। यह परियोजना भारत के स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। युद्धपोत को आधुनिक हथियार प्रणालियों, लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता, अत्याधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, पनडुब्बी रोधी हथियारों और उन्नत रक्षा उपकरणों से लैस किया गया है। इसके कारण यह समुद्र, आकाश और पानी के भीतर मौजूद संभावित खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में सक्षम माना जाता है। रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में युद्ध का स्वरूप लगातार बदल रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों का महत्व तेजी से बढ़ा है, लेकिन पारंपरिक सैन्य शक्ति की आवश्यकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण बनी हुई है। उन्होंने कहा कि भविष्य के संघर्षों में आधुनिक तकनीक निर्णायक भूमिका निभाएगी, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके प्रशिक्षित सैनिकों, मजबूत सैन्य ढांचे और विश्वसनीय रक्षा क्षमता से ही तय होगी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत भविष्य की तकनीकों में निवेश के साथ-साथ अपनी पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को भी लगातार मजबूत बना रहा है। उनके अनुसार आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य प्लेटफॉर्म एक-दूसरे के विकल्प नहीं बल्कि पूरक हैं। इतिहास यह प्रमाणित करता है कि जिन देशों ने नई तकनीकों के आकर्षण में अपनी पारंपरिक सैन्य शक्ति की उपेक्षा की, उन्हें गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसलिए संतुलित रक्षा रणनीति ही राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे प्रभावी आधार बन सकती है। रक्षा मंत्री ने हाल के सुरक्षा अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों ने समय-समय पर यह साबित किया है कि देश की आधुनिक और पारंपरिक दोनों प्रकार की सैन्य क्षमताएं मिलकर प्रभावी परिणाम देने में सक्षम हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाएगी। आईएनएस महेंद्रगिरी का नौसेना में शामिल होना आत्मनिर्भर भारत अभियान, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और समुद्री रणनीतिक क्षमता को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। भारत लगातार अपने रक्षा ढांचे को आधुनिक बनाते हुए ऐसी सैन्य क्षमताओं का विकास कर रहा है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक समुद्री संतुलन में भी उसकी भूमिका को और अधिक सशक्त बनाएंगी।
मध्य प्रदेश के युवाओं का महाकुंभ इंदौर में आज जुटेंगे 5 हजार युवा मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव देंगे विकास का मंत्र

मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश के युवाओं की ऊर्जा, नवाचार और नेतृत्व क्षमता को नई दिशा देने के उद्देश्य से 11 जुलाई को इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में माय यूथ माय प्राइड कॉन्क्लेव-2026 का आयोजन किया जा रहा है। वन स्टेट वन जनरेशन वन संकल्प थीम पर आधारित इस कॉन्क्लेव में प्रदेश के विभिन्न जिलों से लगभग पांच हजार युवा शामिल होंगे। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव विशेष रूप से उपस्थित रहकर युवाओं को संबोधित करेंगे और विकसित, आत्मनिर्भर तथा समृद्ध मध्य प्रदेश के निर्माण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करेंगे। सुबह 10 बजे से शुरू होने वाले इस कॉन्क्लेव में युवाओं को प्रदेश के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार और सुझाव रखने का अवसर मिलेगा। मुख्यमंत्री दोपहर 12 बजे कार्यक्रम में पहुंचकर युवाओं से संवाद करेंगे और उन्हें प्रदेश की विकास यात्रा में सहभागी बनने का संदेश देंगे। आयोजन का उद्देश्य युवाओं को केवल प्रेरित करना नहीं, बल्कि उन्हें विकास के वास्तविक एजेंडा से जोड़ना है। कॉन्क्लेव में शिक्षा, कौशल विकास, खेल, स्टार्टअप, एमएसएमई, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण, संस्कृति, पर्यटन और जनभागीदारी जैसे प्रमुख क्षेत्रों से जुड़े युवा भाग लेंगे। विभिन्न संवाद सत्रों और कार्यशालाओं के माध्यम से प्रतिभागी अपने क्षेत्रों की चुनौतियों, संभावनाओं और समाधान पर चर्चा करेंगे। इससे युवाओं को नीति निर्माण और विकास योजनाओं में अपनी भूमिका समझने का अवसर मिलेगा। कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता पांच समानांतर विषयगत कार्यशालाएं होंगी। इन कार्यशालाओं में युवा समूहों में बैठकर व्यवहारिक और क्रियान्वयन योग्य सुझाव तैयार करेंगे। इन सुझावों को संकलित कर प्रदेश के युवाओं का सामूहिक युवा संकल्प तैयार किया जाएगा, जो मध्य प्रदेश के भविष्य के विकास का विजन प्रस्तुत करेगा। आयोजकों के अनुसार यह संकल्प केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि युवाओं की आकांक्षाओं और जिम्मेदारियों का साझा घोषणापत्र बनेगा। कॉन्क्लेव को युवाओं के लिए आकर्षक और प्रेरक बनाने के लिए कई विशेष गतिविधियां भी आयोजित की जाएंगी। इसमें मोटर साइकिल और साइकिल रैली, प्रेरणादायी उद्बोधन, युवा उपलब्धि सम्मान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, संवादात्मक सत्र, म्यूजिक स्टेज, इंदौरी फूड स्ट्रीट और सामूहिक युवा संकल्प कार्यक्रम शामिल हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य युवाओं में उत्साह, रचनात्मकता और सहभागिता की भावना को बढ़ाना है। कार्यक्रम के अंत में पांच हजार युवा एक साथ विकसित मध्य प्रदेश के निर्माण का संकल्प लेंगे। आयोजकों का मानना है कि यह कॉन्क्लेव प्रदेश के युवाओं को एक साझा मंच प्रदान करेगा जहां वे अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को राज्य के विकास से जोड़ सकेंगे। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की उपस्थिति इस आयोजन को और अधिक महत्वपूर्ण बना रही है क्योंकि उनके मार्गदर्शन में युवाओं को प्रदेश की विकास यात्रा में सक्रिय भूमिका निभाने का संदेश मिलेगा। इंदौर में आयोजित होने वाला यह कॉन्क्लेव केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के युवाओं की सामूहिक शक्ति, संकल्प और भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है।