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डॉ. रश्मि वर्मा आत्महत्या मामले में NHRC का नोटिस, एम्स और भोपाल पुलिस को 15 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश

भोपाल एम्स में महिला असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा की आत्महत्या का मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के संज्ञान में आया है आयोग ने एम्स भोपाल के संचालक और भोपाल पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर इस घटना की जांच करने और 15 दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है आयोग ने FIR और पॉश कमेटी की रिपोर्ट के साथ पीएम की रिपोर्ट भी दिल्ली तलब की है

मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग की प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, एम्स संचालक और पुलिस कमिश्नर को नोटिस भेजा है ताकि पूरी जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो सके

मामला 11 दिसंबर 2025 का है जब भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा ने आत्महत्या कर ली थी डॉ. रश्मि पर उनके विभाग के HOD डॉ. यूनुस द्वारा लगातार प्रताड़ना किए जाने के आरोप लगे थे इस घटना ने संस्थान में हड़कंप मचा दिया और उच्चस्तरीय जांच की मांग उठी

जानकारी के अनुसार, घटना वाले दिन डॉ. रश्मि ने अपनी ड्यूटी पूरी कर घर लौटने के बाद एनेस्थीसिया की उच्च मात्रा इंजेक्ट कर ली उनके दिल करीब 7 मिनट तक बंद रहे जिससे उनके मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचा MRI रिपोर्ट में ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन डैमेज की पुष्टि हुई डॉ. रश्मि का करीब तीन सप्ताह तक इलाज चलने के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए ट्रॉमा और इमरजेंसी विभाग के HOD डॉ. यूनुस को उनके पद से हटा दिया गया था इसके अलावा हाई लेवल कमेटी का गठन किया गया था ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो सके

NHRC ने निर्देश दिए हैं कि जांच में प्रताड़ना के सभी पहलुओं की समीक्षा की जाए और दोषियों के खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाए आयोग ने 15 दिन में रिपोर्ट सौंपने का समय तय किया है ताकि जल्द से जल्द इस मामले का निपटारा हो सके

यह मामला एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर उत्पीड़न की गंभीर समस्याओं को उजागर करता है विशेषज्ञों का मानना है कि संस्थानों में ऐसे मामलों की समय पर पहचान और कार्रवाई बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में किसी भी कर्मचारी की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके

भोपाल एम्स में हुई इस घटना ने पूरे चिकित्सा समुदाय को झकझोर दिया है और कार्यस्थल पर उत्पीड़न, मानसिक दबाव और प्रताड़ना के मामलों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता को रेखांकित किया है

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