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आरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया पर विवाद तेज बैतूल में जयस ने दर्ज कराई आपत्ति


बैतूल । मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में राजस्व भूमि को आरक्षित वन घोषित किए जाने की प्रक्रिया को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है यह मामला अब प्रशासन और आदिवासी संगठनों के बीच टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है जय आदिवासी युवा शक्ति जिसे आमतौर पर जयस के नाम से जाना जाता है ने इस पूरे मामले में गंभीर आपत्तियां दर्ज कराते हुए राजस्व और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं

जयस का आरोप है कि जिले में बड़े पैमाने पर राजस्व भूमि को आरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया में वैधानिक नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जा रहा है संगठन का कहना है कि जिन जमीनों को आरक्षित वन में शामिल किया जा रहा है वे सार्वजनिक उपयोग की भूमि हैं और इन पर स्थानीय समुदायों विशेष रूप से आदिवासी समाज का पारंपरिक अधिकार रहा है ऐसे में बिना उचित प्रक्रिया और स्थानीय लोगों की सहमति के इन जमीनों को वन क्षेत्र में शामिल करना न्यायसंगत नहीं है

संगठन ने इस मामले को गंभीर मानते हुए महामहिम राज्यपाल के नाम कलेक्टर बैतूल को ज्ञापन सौंपा है जिसमें 456 वनखण्डों पर विधिक आपत्ति दर्ज कराई गई है ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि इस प्रक्रिया को तत्काल नहीं रोका गया तो इससे व्यापक स्तर पर सामाजिक और प्रशासनिक विवाद उत्पन्न हो सकता है

जयस के प्रतिनिधियों का कहना है कि वन अधिकार कानून और अन्य संबंधित प्रावधानों के तहत स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है लेकिन वर्तमान प्रक्रिया में इन अधिकारों की अनदेखी की जा रही है जिससे आदिवासी समाज में असंतोष बढ़ रहा है उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन द्वारा पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है और प्रभावित लोगों को पर्याप्त जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है

इस मुद्दे के सामने आने के बाद प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है हालांकि अभी तक संबंधित विभागों की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है लेकिन माना जा रहा है कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच या पुनर्विचार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाना बेहद जरूरी होता है क्योंकि यह सीधे तौर पर स्थानीय समुदायों के अधिकारों और आजीविका से जुड़ा होता है यदि प्रक्रिया में पारदर्शिता और सहभागिता सुनिश्चित नहीं की जाती है तो इससे विवाद और अधिक गहरा सकता है

कुल मिलाकर बैतूल में 456 वनखण्डों को लेकर उठा यह विवाद आने वाले समय में और तूल पकड़ सकता है यदि प्रशासन और संबंधित विभागों द्वारा समय रहते संतुलित और संवेदनशील समाधान नहीं निकाला गया तो यह मुद्दा व्यापक आंदोलन का रूप भी ले सकता है ऐसे में सभी पक्षों के बीच संवाद और कानूनी प्रक्रिया का पालन ही इस विवाद के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है

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