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Energy Crisis : परमाणु ऊर्जा की नई सुबह: भारत ने ईंधन खत्म होने के डर को दी चुनौती

निशान्त

Energy Crisis :
तमिलनाडु के कल्पक्कम में समुद्र के किनारे खड़ा एक रिएक्टर बाहर से देखने पर किसी और पावर प्लांट जैसा ही लगता है। लेकिन 6 अप्रैल 2026 को यहां कुछ ऐसा हुआ जिसने भारत की ऊर्जा कहानी को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया। Prototype Fast Breeder Reactor ने पहली क्रिटिकलिटी हासिल की। आसान भाषा में कहें तो इसके भीतर पहली बार नियंत्रित परमाणु श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हुई। यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह उस सोच की शुरुआत है जिसमें ऊर्जा सिर्फ खपत नहीं होती बनाई भी जाती है।

इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा। आज भारत की ऊर्जा व्यवस्था तीन बड़े दबावों के बीच खड़ी है। एक तरफ तेजी से बढ़ती मांग दूसरी तरफ आयातित ईंधन पर निर्भरता और तीसरी तरफ जलवायु परिवर्तन का दबाव। कोयला अभी भी सबसे बड़ा स्रोत है लेकिन उसी कोयले से सबसे ज्यादा एमिशन भी निकलते हैं। सोलर और विंड तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन वे हर वक्त उपलब्ध नहीं रहते। ऐसे में सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा रास्ता है जो लगातार बिजली भी दे एमिशन भी कम करे और ईंधन की चिंता भी कम करे। यहीं से Prototype Fast Breeder Reactor की कहानी शुरू होती है।

आम रिएक्टरों में यूरेनियम का इस्तेमाल होता है और समय के साथ वह ईंधन खत्म हो जाता है। लेकिन यह फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अलग है। यह यूरेनियम और प्लूटोनियम के मिश्रण से चलता है और साथ ही आसपास मौजूद यूरेनियम-238 को बदलकर नया प्लूटोनियम पैदा करता है। यानी यह जितना ईंधन जलाता है उससे ज्यादा बना भी सकता है। ऊर्जा की दुनिया में यह वैसा ही है जैसे कोई इंजन पेट्रोल जलाते हुए खुद पेट्रोल भी बनाना शुरू कर दे।

इस तकनीक की जड़ें उस विजन में हैं जिसे Homi J. Bhabha ने दशकों पहले रखा था। भारत के पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम बहुत ज्यादा है। इसलिए एक तीन-चरणीय कार्यक्रम बनाया गया। पहले चरण में यूरेनियम से बिजली और प्लूटोनियम बनता है। दूसरे चरण में जिसमें यह रिएक्टर आता है प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके और ज्यादा ईंधन तैयार किया जाता है। और तीसरे चरण में उसी ईंधन की मदद से थोरियम को उपयोग में लाया जाएगा। यानी यह रिएक्टर सिर्फ बिजली नहीं बना रहा यह भविष्य के लिए रास्ता तैयार कर रहा है।

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अब इस पूरे विकास को जलवायु के नजरिए से देखें। दुनिया आज एक अजीब स्थिति में है। एक तरफ हमें फॉसिल फ्यूल से बाहर निकलना है दूसरी तरफ हमें हर वक्त बिजली भी चाहिए। सोलर और विंड इस दिशा में अहम हैं लेकिन वे इंटरमिटेंट हैं। यानी उनकी उपलब्धता मौसम पर निर्भर है। यहां परमाणु ऊर्जा एक बेसलोड विकल्प देती है। 24 घंटे स्थिर और कम एमिशन वाली बिजली।

Prototype Fast Breeder Reactor इस मॉडल को और आगे ले जाता है। क्योंकि यह सिर्फ आज की बिजली नहीं आने वाले दशकों की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करता है। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर कामयाब होती है तो भारत को ईंधन के लिए बार-बार वैश्विक बाजार की तरफ देखने की जरूरत कम हो सकती है।

यह बात आज के भू-राजनीतिक माहौल में और अहम हो जाती है। तेल और गैस की कीमतें युद्ध और संकट के साथ ऊपर-नीचे होती रहती हैं। ऐसे में घरेलू दीर्घकालिक और कम-एमिशन वाली ऊर्जा व्यवस्था एक रणनीतिक मजबूती बन जाती है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है जो उतना ही महत्वपूर्ण है।

यह तकनीक आसान नहीं है। यह रिएक्टर पानी की जगह तरल सोडियम का इस्तेमाल करता है जो बहुत उच्च तापमान पर काम करता है। इससे दक्षता बढ़ती है लेकिन जोखिम भी बढ़ते हैं। इसलिए क्रिटिकलिटी हासिल करना सिर्फ शुरुआत है। अब अगले कुछ महीनों में इसे धीरे-धीरे पूरी क्षमता तक ले जाया जाएगा।

हर चरण में परीक्षण होगा हर सिस्टम को परखा जाएगा। अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह 500 मेगावाट की पूरी क्षमता से बिजली देना शुरू कर सकता है। इसके बाद ही यह साफ होगा कि यह तकनीक बड़े पैमाने पर कितनी जल्दी और कितनी सुरक्षित तरीके से फैल सकती है।

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भारत की योजना यहीं रुकने की नहीं है। इस अनुभव के आधार पर 600 मेगावाट के और बड़े फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित करने की योजना है ताकि इस तकनीक को प्रोटोटाइप से निकालकर स्टैंडर्ड मॉडल बनाया जा सके। अगर यह सफल होता है तो भारत का परमाणु कार्यक्रम एक नए स्तर पर पहुंच सकता है जहां थोरियम आधारित ऊर्जा व्यवस्था भी हकीकत बन सकती है। लेकिन शायद इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा तकनीक नहीं सोच है।

ऊर्जा के बारे में हमारी आम समझ यह रही है कि संसाधन सीमित हैं और एक दिन खत्म हो जाएंगे। लेकिन Prototype Fast Breeder Reactor इस सोच को चुनौती देता है। यह दिखाता है कि अगर तकनीक और नीति साथ आएं तो हम संसाधनों का इस्तेमाल सिर्फ उपभोग के लिए नहीं विस्तार के लिए भी कर सकते हैं।

कल्पक्कम का यह रिएक्टर अभी शांत खड़ा है। इसके भीतर प्रतिक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं लेकिन इसका असली असर आने वाले वर्षों में दिखेगा। जब भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करेगा जब क्लाइमेट के दबाव और तेज होंगे और जब दुनिया ईंधन की अस्थिरता से जूझेगी तब शायद यह रिएक्टर एक जवाब की तरह सामने आए। एक ऐसा जवाब जो धीरे चलता है जटिल है लेकिन लंबी दूरी तय करने की क्षमता रखता है।

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