यहां प्रशांत महासागरीय प्लेट ऑस्ट्रेलियाई प्लेट के नीचे सबडक्शन प्रक्रिया से गुजर रही है। पानी से भरपूर तरल पदार्थ सबडक्टिंग प्लेट से निकलकर मेंटल में एंट्री करते हैं, जिससे मेंटल का पिघलने का तापमान कम हो जाता है। बार-बार पिघलने के कई चक्रों के बाद चाल्कोफाइल तत्वों जैसे सोना और तांबा मैग्मा में केंद्रित हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने समुद्र तल से एकत्रित ज्वालामुखी ग्लास के 66 सैंपल्स का विश्लेषण किया। इन नमूनों में सामान्य मिड-ओशन रिज की तुलना में सोने की मात्रा अधिक पाई गई, जो दर्शाता है कि गहरे मेंटल में ही सोना केंद्रित होता है।
रिसर्च में क्या निकलकर आया सामने
ज्वालामुखी ग्लास समुद्री पानी से लावा के तेजी से ठंडा होने पर बनता है, जो मैग्मा की मूल संरचना को बनाए रखता है। रिसर्च में पाया गया कि हाइड्रस यानी पानी-समृद्ध परिस्थितियों में ही कई चरणों वाले पिघलने से सोना पकता जाता है।
इससे पहले वैज्ञानिक इस बात को नहीं समझ पाए थे कि कुछ क्षेत्रों में सोना इतना अधिक क्यों जमा होता है। यह खोज भविष्य में समुद्री खनिज संसाधनों की खोज के लिए नया ब्लूप्रिंट पेश करती है। अब भूवैज्ञानिक विशाल समुद्री सल्फाइड डिपॉजिट्स का पता लगाने में सक्षम होंगे, जहां सोना और अन्य कीमती धातुएं प्रचुर मात्रा में हो सकती हैं। इससे पृथ्वी पर नोबल मेटल्स के जीवन चक्र की समझ बढ़ेगी, गहरे मेंटल से लेकर समुद्री वेंट्स तक।