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ईरान अमेरिका तनाव के बीच इजरायल लेबनान वार्ता क्या बदलने वाली है मध्य पूर्व की तस्वीर


नई दिल्ली । मध्य पूर्व में जारी भू राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है जहां इजरायल और लेबनान के बीच करीब 33 साल बाद सीधी बातचीत शुरू हुई है। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है।

इस पूरी बातचीत को एक बड़े कूटनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है जिसकी मध्यस्थता अमेरिका कर रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई।

दरअसल इजरायल और लेबनान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है जिसकी एक बड़ी वजह दक्षिणी लेबनान में सक्रिय संगठन हिजबुल्लाह है। यह संगठन ईरान का समर्थक माना जाता है और समय समय पर इजरायल पर हमले करता रहा है।

विशेष रूप से 7 अक्टूबर 2023 हमास हमला के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया था जब हमास के हमलों के साथ ही हिजबुल्लाह ने भी इजरायल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

हाल के घटनाक्रमों में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की स्थिति कुछ कमजोर मानी जा रही है। ऐसे में अमेरिका और इजरायल इस मौके का फायदा उठाकर क्षेत्रीय समीकरण बदलने की कोशिश में हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनान के साथ सीधी बातचीत का मकसद हिजबुल्लाह के प्रभाव को कम करना है। यदि लेबनानी सरकार इस दिशा में सख्त कदम उठाती है तो यह ईरान के लिए बड़ा झटका हो सकता है क्योंकि हिजबुल्लाह को उसका प्रमुख सहयोगी माना जाता है।

हाल ही में लेबनान सरकार ने गैर सरकारी हथियारों को हटाने के निर्देश दिए हैं जिसकी सराहना बेंजामिन नेतन्याहू ने भी की है। यह संकेत देता है कि लेबनान धीरे धीरे हिजबुल्लाह के प्रभाव को सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

इसके साथ ही अमेरिका और इजरायल अन्य मोर्चों पर भी ईरान को घेरने की रणनीति अपना रहे हैं जिसमें समुद्री मार्गों पर दबाव बनाना भी शामिल है।हालांकि इजरायल ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सीजफायर का असर लेबनान पर नहीं पड़ेगा यानी दक्षिणी लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रह सकती है।

कुल मिलाकर यह वार्ता केवल दो देशों के बीच संवाद नहीं बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा कदम है। अगर यह बातचीत सफल होती है तो इससे क्षेत्र में लंबे समय से जारी संघर्ष की दिशा बदल सकती है और हिजबुल्लाह के प्रभाव को कमजोर किया जा सकता है।

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