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ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका


नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे के बीच यूरोपीय संघ अब एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी में है। रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय देश होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए एक नया मिशन तैयार कर रहे हैं जिसमें अमेरिका की सीधी भागीदारी नहीं होगी। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से अधिक समय तक चला संघर्ष वैश्विक राजनीति और ट्रांस अटलांटिक संबंधों को नया रूप दे चुका है।

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रस्ताव का नेतृत्व ब्रिटेन और फ्रांस कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संघर्ष के बाद समुद्री व्यापार में भरोसा बहाल करना और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि यह मिशन पूरी तरह रक्षात्मक होगा और यूरोपीय नौसेना किसी अमेरिकी कमांड के तहत काम नहीं करेगी। इसका मकसद शिपिंग कंपनियों को यह भरोसा दिलाना है कि युद्ध के बाद क्षेत्र में व्यापार करना सुरक्षित रहेगा।

इस प्रस्ताव में कई अहम कदम शामिल हैं जैसे समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना नेवल एस्कॉर्ट्स तैनात करना और सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करना। खास बात यह है कि इस गठबंधन में अमेरिका इजरायल और ईरान जैसे सीधे संघर्ष में शामिल देशों को बाहर रखा जाएगा।

फ्रांस के विदेश मंत्री जीन नोएल बैरोट के अनुसार यह मिशन तभी शुरू होगा जब क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी। साथ ही ओमान और ईरान जैसे तटीय देशों के सहयोग की भी जरूरत होगी। इस मिशन में जर्मनी की भी अहम भूमिका मानी जा रही है जो जहाज और निगरानी संसाधन उपलब्ध करा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना तीन मुख्य उद्देश्यों पर आधारित है पहला फंसे हुए जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना दूसरा समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना और तीसरा सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करना।

होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम मार्ग है जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है जिसमें भारत जैसे बड़े आयातक देश भी शामिल हैं।

यह पहल इस बात का संकेत है कि यूरोपीय संघ अब वैश्विक सुरक्षा में अपनी स्वतंत्र भूमिका बढ़ाना चाहता है। साथ ही यह अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेदों को भी दर्शाता है जहां यूरोपीय देश अब अपनी रणनीति खुद तय करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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