18 घंटे की मजदूरी से 8 घंटे की लड़ाई तक
19वीं सदी में संयुक्त राज्य अमेरिका समेत कई देशों में मजदूरों से 14 से 18 घंटे तक काम कराया जाता था। न कोई तय समय, न सुरक्षा, न अधिकार। महिलाएं और बच्चे भी शोषण का शिकार थे। विरोध करने वालों को पुलिस और निजी गुंडों से कुचल दिया जाता था।
इन्हीं हालातों के खिलाफ मजदूरों ने “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे अपने लिए” की मांग उठाई। 1886 आते-आते यह आंदोलन उग्र हो गया और इसका केंद्र बना शिकागो।
1 मई 1886: जब सड़कों पर उतरे लाखों मजदूर
1 मई 1886 को अमेरिका के करीब 3.8 लाख मजदूर हड़ताल पर उतर आए। 11 हजार से ज्यादा फैक्ट्रियां बंद हो गईं। शिकागो की सड़कों पर मजदूरों का सैलाब उमड़ पड़ा। उद्योगपतियों में खलबली मच गई और आंदोलन को “खतरा” बताकर दमन शुरू हो गया।
हेमार्केट कांड: जिसने बदल दिया इतिहास
4 मई 1886 को हेमार्केट कांड हुआ। जो मजदूर आंदोलन का टर्निंग पॉइंट बना। शांतिपूर्ण सभा के दौरान अचानक बम फेंका गया। इसके बाद पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें कई मजदूर मारे गए और सैकड़ों घायल हुए।
इस घटना के बाद 8 मजदूर नेताओं पर झूठा मुकदमा चलाया गया। Albert Parsons, August Spies सहित चार नेताओं को 11 नवंबर 1887 को फांसी दे दी गई। ये नेता फांसी के फंदे तक जाते हुए भी क्रांति के गीत गा रहे थे यह दृश्य इतिहास में अमर हो गया।
लाल झंडा बना संघर्ष का प्रतीक
हेमार्केट की घटना के बाद मजदूरों ने अपने खून से सने कपड़ों को ही झंडा बना लिया—जो आगे चलकर लाल झंडे के रूप में पूरी दुनिया में श्रमिक एकता का प्रतीक बन गया।
दुनिया ने माना मजदूरों का हक
1889 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में तय हुआ कि हर साल 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाएगा। तब से मजदूर दिवस दुनियाभर में श्रमिकों के अधिकार, सम्मान और एकजुटता का प्रतीक बन चुका है।
आज के दौर में भी प्रासंगिक
मजदूर दिवस हमें याद दिलाता है कि अधिकार कभी भीख में नहीं मिलते। उन्हें संघर्ष से हासिल करना पड़ता है। आज भी जब श्रमिक अधिकारों पर चुनौतियां बनी हुई हैं, यह दिन हमें एकजुट रहने और न्याय के लिए लड़ने का संदेश देता है।यह सिर्फ इतिहास नहीं एक चेतावनी भी है कि अगर आवाज दबाई गई, तो संघर्ष फिर जन्म लेगा।
-बाबूलाल नागा