मृतक किशोरी की पहचान लक्ष्मी आदिवासी के रूप में हुई है। घटना बुधवार सुबह करीब 4:30 बजे की बताई जा रही है। लक्ष्मी अपने माता-पिता के साथ घर में जमीन पर सो रही थी। इसी दौरान अचानक एक जहरीले सांप ने उसके पैर में काट लिया। तेज दर्द महसूस होते ही किशोरी जोर-जोर से चीखने लगी। बेटी की आवाज सुनकर माता-पिता घबराकर उठे तो वहां सांप दिखाई दिया। घटना के बाद परिवार और आसपास के ग्रामीणों में अफरा-तफरी मच गई।
ग्रामीणों ने परिजनों को तुरंत अस्पताल ले जाने की सलाह देने के बजाय बच्ची को स्थानीय देव स्थान ले जाने की बात कही। इसके बाद परिवार लक्ष्मी को अस्पताल पहुंचाने के बजाय झाड़-फूंक कराने ले गया। वहां काफी देर तक कथित उपचार चलता रहा। ग्रामीण मान्यताओं और अंधविश्वास के कारण समय लगातार बीतता गया, जबकि किशोरी की हालत बिगड़ती चली गई।
जब काफी देर बाद भी बच्ची की तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ और उसकी हालत गंभीर होने लगी, तब परिजनों को अस्पताल ले जाने की जरूरत महसूस हुई। आनन-फानन में उसे जिला अस्पताल के लिए रवाना किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल पहुंचने तक किशोरी की सांसें लगभग थम चुकी थीं। डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।
घटना के बाद अस्पताल में परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। अस्पताल प्रबंधन ने आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए शव का पोस्टमार्टम कराया और बाद में शव परिजनों को सौंप दिया गया।
यह घटना एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में फैले अंधविश्वास और जागरूकता की कमी को उजागर करती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सांप काटने की स्थिति में मरीज को बिना समय गंवाए तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए, क्योंकि शुरुआती इलाज और एंटी-वेनम इंजेक्शन ही जान बचाने का सबसे प्रभावी तरीका होता है। लेकिन कई ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग झाड़-फूंक और टोने-टोटके पर भरोसा कर इलाज में देरी कर देते हैं, जिसका परिणाम कई बार जानलेवा साबित होता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि गांवों में स्वास्थ्य जागरूकता अभियान की बेहद जरूरत है, ताकि लोग अंधविश्वास छोड़कर समय पर चिकित्सा सुविधा का सहारा लें और ऐसी दुखद घटनाओं को रोका जा सके।