हाल ही में भोपाल की ट्विशा शर्मा की मौत ने एक बार फिर इस गंभीर समस्या को उजागर कर दिया है। शादी के मात्र छह महीने बाद हुई इस संदिग्ध मौत के बाद परिवार और ससुराल पक्ष के अलग-अलग आरोपों ने मामले को और उलझा दिया है। परिजन न्याय की मांग पर अड़े हैं और अंतिम संस्कार तक रोक दिया गया है, जबकि जांच अभी कोर्ट में विचाराधीन है।
इसी तरह ग्वालियर की पलक रजक का मामला भी सामने आया, जिसकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। मायके पक्ष ने हत्या का आरोप लगाया है, जबकि ससुराल पक्ष ने इसे आत्महत्या बताया है। पलक की आखिरी कॉल और सोशल मीडिया पोस्ट्स ने उसके मानसिक तनाव की ओर इशारा किया, जिसने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया।
गुना और राजगढ़ जिलों से भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां नवविवाहित महिलाओं को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और मानसिक दबाव डालने के आरोप लगे हैं। कहीं जहरीला पदार्थ खाने से मौत हुई तो कहीं आत्महत्या के लिए उकसाने की घटनाएं दर्ज हुईं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau) की ‘क्राइम इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में दहेज हत्या के 450 मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से 232 मामले IPC और 218 मामले नए BNS कानून के तहत दर्ज हुए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य देश में दहेज हत्या के मामलों में तीसरे स्थान पर है।
इस सूची में उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद मध्यप्रदेश का नाम आता है, जहां लगातार ऐसे मामलों में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में पति या ससुराल पक्ष द्वारा क्रूरता के 7514 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि आत्महत्या के लिए उकसाने के 210 मामले सामने आए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दहेज प्रताड़ना अब केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रही, बल्कि मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक दबाव के रूप में भी सामने आ रही है। कई मामलों में लव मैरिज के बाद भी दहेज के कारण विवाद और उत्पीड़न की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं।
राज्य महिला आयोग ने भी इन बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है और कहा है कि कई मामलों में पुलिस की जांच में देरी और लापरवाही सामने आ रही है। आयोग अब ऐसे मामलों की निगरानी और जांच प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए विशेष कमेटी बनाने पर विचार कर रहा है।
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर हालात गंभीर संकेत दे रहे हैं। लगातार सामने आ रहे दहेज प्रताड़ना और संदिग्ध मौतों के मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि समाज और व्यवस्था दोनों स्तरों पर गहन सुधार की जरूरत है, ताकि हर ‘ट्विशा’ को न्याय और सुरक्षा मिल सके।