यह जनहित याचिका मुंबई के चेम्बूर निवासी वन्यजीव प्रेमी और अधिवक्ता सुबित चक्रवर्ती द्वारा दायर की गई है। मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच में जस्टिस विवेक जैन और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी द्वारा की गई। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में ही मामले को गंभीर प्रकृति का मानते हुए सभी संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने अदालत को बताया कि 2 अप्रैल 2026 से अब तक कान्हा टाइगर रिजर्व में 10 बाघों की मौत कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) संक्रमण के कारण हुई है। इसके बावजूद संक्रमण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि NTCA की गाइडलाइंस के अनुसार एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए, जो इन मौतों की निष्पक्ष जांच करे। समिति को यह भी देखना होगा कि संक्रमण का वास्तविक कारण क्या है, रोग नियंत्रण के लिए क्या उपाय किए गए और क्या प्रशासनिक स्तर पर कोई लापरवाही हुई है या नहीं।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि वन विभाग ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए। साथ ही, पार्क के बफर जोन और आसपास के गांवों में आवारा कुत्तों के टीकाकरण की स्थिति पर भी कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमण का प्रमुख स्रोत यही हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कैनाइन डिस्टेंपर वायरस अत्यंत संक्रामक और घातक बीमारी है, जो बाघों और अन्य वन्यजीवों के श्वसन, तंत्रिका और पाचन तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। यदि इस संक्रमण को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर पूरे टाइगर लैंडस्केप पर पड़ सकता है।
याचिका में कुछ प्रमुख बाघों की मौतों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें बाघिन टी-122 (सुनैना), बाघिन टी-141 (अमाही) और उसके चार शावक तथा बाघ टी-220 (महावीर) शामिल हैं।
हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब सभी की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो जून के अंतिम सप्ताह में होगी। अदालत के रुख के बाद यह मामला वन्यजीव संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।