यह मामला दतिया वन परिक्षेत्र में कार्यरत साहब सिंह ठाकुर से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 1986 में चौकीदार के पद पर नियुक्त किया गया था। लगभग 31 वर्षों तक सेवा देने के बाद उन्हें वर्ष 2017 में नियमित कर दिया गया था। इसी दौरान उनकी वास्तविक उम्र को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
विभाग ने जब उनकी आयु निर्धारण के लिए जिला मेडिकल बोर्ड को अधिकृत किया, तो 7 अप्रैल 2017 को विशेषज्ञ डॉक्टरों के पैनल ने वैज्ञानिक जांच के आधार पर उनकी उम्र 50 वर्ष निर्धारित की। इस रिपोर्ट के अनुसार उनकी सेवानिवृत्ति वर्ष 2029 में होनी चाहिए थी।
हालांकि, इसके बावजूद वन विभाग ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए अपनी ओर से उनकी उम्र 60 वर्ष मान ली और उन्हें उसी वर्ष 2017 में ही रिटायर करने का आदेश जारी कर दिया। कर्मचारी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां अदालत ने प्रारंभिक रूप से उस पर रोक लगा दी।
लेकिन इसके बाद विभाग ने एक और विवादित कदम उठाते हुए 17 अप्रैल 2018 को दूसरा आदेश जारी कर दिया, जिसमें उनकी उम्र 62 वर्ष मानकर फिर से सेवा समाप्त करने का प्रयास किया गया। इस तरह कागजों पर एक ही कर्मचारी को दो बार रिटायर दिखा दिया गया।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने वन विभाग के रवैये पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब विभाग ने स्वयं मेडिकल बोर्ड से आयु निर्धारण कराया था, तो उसकी वैज्ञानिक रिपोर्ट को प्रशासनिक अधिकारी मनमाने तरीके से खारिज नहीं कर सकते।
अदालत ने यह भी कहा कि विभाग किसी भी प्रकार का वैकल्पिक जन्म प्रमाण पत्र या विरोधी मेडिकल रिपोर्ट पेश करने में विफल रहा, जिससे मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर संदेह किया जा सके।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट निर्देश दिया कि साहब सिंह ठाकुर को उनकी वास्तविक सेवा अवधि यानी अप्रैल 2029 तक सम्मानपूर्वक नौकरी पर रखा जाए। साथ ही उन्हें बकाया वेतन, एरियर और सभी सेवा लाभ भी तत्काल प्रभाव से दिए जाएं।
इस फैसले को प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जिसने सरकारी विभागों की मनमानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।