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देश के बड़े जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से गिर रहा है, और अधिकांश नदी घाटियाँ गंभीर जल संकट की स्थिति के करीब पहुँचती जा रही हैं।

भीषण गर्मी और लू की वजह से पूरे भारत में जल आपूर्ति की समस्या तेजी से बढ़ रही है। उत्तर भारत के कई शहरों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना हुआ है और रात में भी तापमान लगातार ऊंचा रहने से पानी तथा बिजली की मांग बढ़ रही है। सुपर अल नीनो के कारण बारिश में व्यवधान की आशंका से समस्या और गंभीर हो सकती है। केंद्रीय जल आयोग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जिन 166 जलाशयों पर नजर रखी जा रही है, उनमें 30 अप्रैल को मौजूद 71.08 अरब घन मीटर पानी 14 मई तक घटकर 63.23 अरब घन मीटर ही रह गया है। यानी सिर्फ दो हफ्तों में लगभग 8 अरब घन मीटर की गिरावट आई है। तेरह प्रमुख जलाशयों में जल स्तर अपने सामान्य भंडारण स्तर के आधे से भी कम रह गया है।

यह समस्या तब आ रही है, जब भारत में पानी का बहुत अधिक इस्तेमाल करने वाले क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ी हैं। इनमें एथनॉल मिश्रण, डेटा सेंटर, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का ढांचा और विनिर्माण शामिल हैं। इनमें से कई निवेश पानी के संकट वाले क्षेत्रों में हो रहे हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक बार-बार सूखे और भूजल स्तर में गिरावट की समस्या से जूझते रहे हैं मगर गन्ने की खेती और एथनॉल उत्पादन बढ़ता जा रहा है, जबकि गन्ने की खेती में पानी की सबसे ज्यादा खपत होती है।

इसी तरह अक्सर शहरी जल संकट से जूझने वाले महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक डेटा सेंटर के बड़े अड्डे बनते जा रहे हैं। हाइपरस्केल डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।

मुद्दा यह नहीं है कि इन क्षेत्रों का विस्तार होना चाहिए या नहीं, मुद्दा यह है कि औद्योगिक और ऊर्जा नीतियां जल विज्ञान संबंधी हकीकत के मुताबिक हैं या नहीं। औद्योगिक स्थलों के चयन, शहरी नियोजन और कृषि प्रोत्साहन में जल की उपलब्धता प्रमुख मानदंड होना चाहिए।

इस व्यापक संकट के परिणाम भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के बाड़मेर जिले में एक लिफ्ट नहर के बंद होने से कई गांव इकलौते हैंडपंप पर निर्भर हो गए हैं। दिल्ली में यमुना में पानी कम होने और प्रदूषण बढ़ने से जल शोधन क्षमता कम हो गई है, जबकि गर्मियों के महीनों में पानी की मांग बढ़ जाती है, इसलिए शहर को पड़ोसी राज्यों से मदद मांगनी पड़ रही है। वर्ष 2024 के बेंगलूरु जल संकट ने यह दिखाया कि भूजल भंडार कम होने, झीलों पर अतिक्रमण होने और वर्षा जल संचयन नियमों का ठीक से पालन न होने पर शहरी जल व्यवस्था कितनी तेजी से चरमरा सकती है।

यह संकट अब केवल वर्षा की कमी तक सीमित नहीं है। तापमान बढ़ने से ज्यादा पानी भाप बनकर उड़ रहा है और भूजल स्तर गिरता जा रहा है। भारत लगभग 251 अरब घन मीटर सालाना भूजल दोहन पहले से करता आ रहा है, जो विश्व में कुल दोहन का लगभग एक चौथाई है। 1950 में यहां हर व्यक्ति के लिए लगभग 5,000 घन मीटर पानी उपलब्ध था, जो 2021 में घटकर 1,486 घन मीटर रह गई है, जिसमें और भी कमी आने का अनुमान है।

ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद के शोध से पता चलता है कि भारत के 15 प्रमुख नदी बेसिनों में से 11 गंभीर जल संकट के कगार पर हैं। जल की कमी और संकट के व्यापक आर्थिक परिणाम भी हो सकते हैं। खाद्य उत्पादन पर इसका असर पड़ा तो महंगाई तेजी से बढ़ सकती है, जिसके व्यापक नीतिगत प्रभाव हो सकते हैं।

दुर्भाग्यवश स्थानीय निकाय पेयजल संबंधी आपात स्थितियों से निपटने के लिए ठीक से तैयार नहीं हैं। तेजी से शहरीकरण होने के बाद भी अधिकतर शहरों में अभी व्यापक जल सुरक्षा योजनाएं नहीं हैं। नगरपालिकाएं भूजल दोहन, आपात स्थितियों के दौरान टैंकरों द्वारा आपूर्ति और संकट में अस्थायी प्रतिक्रियाओं पर ज्यादा निर्भर हैं।

संपादकीय

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