याचिकाकर्ता ट्रस्टियों का कहना है कि न्यास की भूमि पर लंबे समय से भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों का कब्जा बना हुआ है। इस संबंध में उन्होंने कई बार जिला प्रशासन, पुलिस और राजस्व अधिकारियों को लिखित शिकायतें दीं। शिकायतों में भूमि का सीमांकन कराने, अतिक्रमण हटाने और ट्रस्ट की संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। हालांकि उनका आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ट्रस्टियों ने दावा किया है कि संबंधित भूमि पर बिना सक्षम अनुमति के एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का निर्माण किया गया। उनका कहना है कि वर्ष 2012 में हाईकोर्ट ने ट्रस्ट की संपत्ति को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश जारी किया था। इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा, जो न्यायालय के आदेशों के प्रतिकूल माना जा रहा है। इसी आधार पर ट्रस्टियों ने प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग की है।
विवाद का एक अन्य पक्ष ट्रस्ट प्रबंधन से भी जुड़ा हुआ है। ट्रस्टियों का आरोप है कि पूर्व में प्रशासनिक स्तर पर ट्रस्ट रजिस्टर से चार ट्रस्टियों के नाम हटा दिए गए थे। बाद में इस कार्रवाई को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अवैध घोषित कर दिया था। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां भी संबंधित निर्णय को बरकरार रखा गया। इसके बावजूद ट्रस्टियों का कहना है कि जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
याचिका में सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल, देवरी एसडीएम मुनब्बर खान और संबंधित तहसीलदार के खिलाफ न्यायालय की अवमानना संबंधी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की मांग की गई है। ट्रस्टियों का आरोप है कि न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने में प्रशासन विफल रहा है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि मंदिर से जुड़े पुजारी और श्रद्धालुओं के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई, जबकि ट्रस्ट की भूमि पर कथित अतिक्रमण और निर्माण गतिविधियों को रोकने के लिए समान गंभीरता नहीं दिखाई गई। इससे प्रशासनिक कार्रवाई की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
इसके अतिरिक्त ट्रस्टियों ने सार्वजनिक न्यास से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी भी मांगी है। उन्होंने वर्ष 2001 से लेकर वित्तीय वर्ष 2025-26 तक ट्रस्ट की आय-व्यय और अन्य वित्तीय दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि ट्रस्ट की संपत्तियों और संसाधनों के उपयोग की पारदर्शी समीक्षा हो सके।
फिलहाल मामला हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। आगामी सुनवाई में न्यायालय प्रशासनिक अधिकारियों से जवाब मांग सकता है और यह स्पष्ट हो सकेगा कि न्यायालय के पूर्व आदेशों का पालन किस हद तक किया गया। इस मामले पर अब पूरे क्षेत्र की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका प्रभाव न केवल ट्रस्ट की संपत्ति बल्कि धार्मिक और सार्वजनिक न्यासों के प्रबंधन से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी पड़ सकता है।