पिछले कुछ वर्षों में नियामक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान मानने पर जोर दिया गया है। इसी बदलाव के चलते बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों के इलाज को भी हेल्थ इंश्योरेंस में शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े हैं। इसके बावजूद अधिकांश पॉलिसियों में यह सुविधा मुख्य रूप से तभी उपलब्ध होती है जब मरीज को अस्पताल में भर्ती कर इलाज कराया जाए।
विशेषज्ञों के अनुसार कई बीमा योजनाओं में इन-पेशेंट ट्रीटमेंट यानी अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में ही खर्च का कवरेज दिया जाता है। इसमें डॉक्टर की फीस, दवाइयां, कमरे का किराया और अन्य चिकित्सा खर्च शामिल हो सकते हैं। हालांकि डे-केयर या सीमित अवधि के उपचार के लिए कवरेज कुछ चुनिंदा पॉलिसियों में ही मिलता है, जो पूरी तरह कंपनी की शर्तों पर निर्भर करता है।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई सामान्य उपचार जैसे काउंसलिंग, नियमित थेरेपी सेशन या मनोवैज्ञानिक से फॉलो-अप विजिट अक्सर अधिकांश पॉलिसियों में कवर नहीं होते। इससे उन लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक थेरेपी या मेंटल हेल्थ सपोर्ट की आवश्यकता होती है। इसके अलावा कई योजनाओं में क्लेम की अधिकतम सीमा और कमरे के किराए पर भी कैपिंग लागू होती है, जिससे कुल प्रतिपूर्ति राशि सीमित हो जाती है।
बीमा पॉलिसियों में कुछ विशेष परिस्थितियों को अपवाद के रूप में भी शामिल किया जाता है। नशे की लत से जुड़े इलाज या स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसी स्थितियों में कई कंपनियां कवरेज नहीं देतीं। इसके साथ ही मानसिक बीमारियों से जुड़े मामलों में वेटिंग पीरियड भी लागू किया जा सकता है, जिसके दौरान पॉलिसीधारक क्लेम नहीं कर सकता।
बाजार में उपलब्ध विभिन्न पॉलिसियों के बीच अंतर को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे बीमा खरीदने से पहले सभी नियमों और शर्तों को ध्यान से पढ़ें। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केवल कम प्रीमियम के आधार पर निर्णय लेना आगे चलकर आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की कठिनाइयों का कारण बन सकता है।
बदलते समय के साथ कई कंपनियां अब मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक व्यापक रूप से शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, जिसमें थेरेपी और रिकवरी सपोर्ट भी शामिल हो सकता है। ऐसे में पॉलिसीधारकों के लिए यह जरूरी है कि वे समय-समय पर अपनी पॉलिसी की समीक्षा करें और जरूरत के अनुसार बेहतर विकल्प चुनें, ताकि भविष्य में इलाज के दौरान आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।