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मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा के जीवन पर बनी फिल्म 'रंग रसिया' के विवादों की कहानी, बोल्ड कंटेंट के कारण छह साल तक थमा रहा था रिलीज का रास्ता

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई फिल्में रही हैं, जिन्हें अपनी अनूठी कहानी या बोल्ड कंटेंट के कारण भारी विवादों का सामना करना पड़ा है। इन्हीं में से एक बेहद चर्चित और विवादास्पद फिल्म ‘रंग रसिया’ थी, जिसे बनकर तैयार होने के बाद भी सिनेमाघरों तक पहुंचने में करीब छह साल का लंबा समय लग गया था। साल 2008 में पूरी तरह निर्मित हो चुकी इस फिल्म पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा उठाए गए कड़े एतराज के बाद एक तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। काफी कानूनी अड़चनों और विरोध प्रदर्शनों के दौर से गुजरने के बाद आखिरकार यह फिल्म नवंबर 2014 में दर्शकों के सामने आ सकी थी।

केतन मेहता के निर्देशन में बनी यह पीरियड ड्रामा फिल्म देश के महान और विख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा के जीवन और उनकी अद्भुत कलाकृतियों से प्रेरित थी। फिल्म में अभिनेता रणदीप हुड्डा ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जिनके अभिनय की काफी सराहना भी हुई। इस फिल्म को शुरू में हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ कई अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में डब करके एक साथ बड़े पैमाने पर रिलीज करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन सेंसरशिप के विवादों और कानूनी पचड़ों में फंसने के कारण मेकर्स की यह महत्वाकांक्षी योजना समय पर धरातल पर नहीं उतर सकी।

फिल्म के मुख्य विषय और उसकी कहानी पर गौर करें तो यह कला, जुनून और प्रेम की एक बेहद संवेदनशील दास्तान को दर्शाती है। राजा रवि वर्मा इतिहास के एक ऐसे दूरदर्शी कलाकार थे, जिन्होंने अपनी उत्कृष्ट पेंटिंग्स के माध्यम से देवी-देवताओं के स्वरूप को आम जनमानस और विशेष रूप से समाज के उस निचले तबके तक पहुंचाया, जिन्हें उस दौर में मंदिरों में प्रवेश करने या ईश्वर की छवि देखने तक की अनुमति नहीं थी। लेकिन विवाद की स्थिति तब पैदा हुई जब इस महान कलाकार ने अपनी कलात्मक स्वतंत्रता को समाज के तत्कालीन पारंपरिक नियमों और सीमाओं से ऊपर रखने का फैसला किया।

पटकथा के अनुसार, मुख्य चित्रकार ने जिस खूबसूरत महिला को अपनी कला की प्रेरणा बनाकर उसे देवी के रूप में कैनवास पर उतारा था, बाद में उसी मॉडल की अन्य पेंटिंग्स में अत्यधिक बोल्डनेस और अश्लीलता दर्शाने के आरोप लगने लगे। उन बोल्ड पेंटिंग्स को जब व्यावसायिक रूप से बाजारों में लाया जाने लगा, तो समाज का एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ खड़ा हो गया। मामला तब और गंभीर हो गया जब कहानी में उस कलाकार और उनकी मॉडल के बीच के व्यक्तिगत संबंधों को भी बेहद संजीदगी और बोल्ड अंदाज में पर्दे पर दिखाया गया। इस दृश्य के बाद समाज में उनके प्रति तीखा आक्रोश फैल गया और उन पर देश की संस्कृति व मर्यादा को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे, जिसके चलते उनकी प्रिंटिंग प्रेस तक को आग के हवाले कर दिया गया था।

फिल्म के कुछ विशिष्ट दृश्यों और प्रचार पोस्टरों पर हिंदू देवी-देवताओं के आपत्तिजनक चित्रण को लेकर देश के कई धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। मेकर्स पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाते हुए देश की विभिन्न अदालतों में मुकदमे दर्ज कराए गए और सिनेमाघरों के बाहर हिंसक प्रदर्शन भी हुए। सेंसर बोर्ड का मानना था कि फिल्म के कई इंटीमेट और बोल्ड सीन्स आम दर्शकों के देखने के लिहाज से बहुत ज्यादा संवेदनशील हैं, इसलिए इन्हें बिना कांट-छांट के पास नहीं किया जा सकता।

इस पूरे विवाद और फिल्म की लंबी देरी पर मुख्य अभिनेता रणदीप हुड्डा ने भी अपनी प्रतिक्रिया साझा की थी। उन्होंने एक बातचीत में स्वीकार किया था कि यह एक बेहद चुनौतीपूर्ण और विवादास्पद प्रोजेक्ट था, जिसे सेंसरशिप की वजह से बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। हालांकि, उनका मानना था कि कला से जुड़े ऐसे विषयों पर समाज में जितनी अधिक चर्चा और बहस होगी, वह फिल्म के संदर्भ को समझने में उतनी ही मददगार साबित होगी। कला प्रेमियों के लिए यह फिल्म आज भी सिनेमाई स्वतंत्रता और सामाजिक बंदिशों के बीच की एक बड़ी मिसाल मानी जाती है।

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