एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि गिरफ्तारी के आधार तैयार करने की प्रक्रिया में आवश्यक सावधानी नहीं बरती गई। अदालत के अनुसार, दस्तावेजों में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि आरोपी के खिलाफ वास्तविक आरोप क्या हैं और किन तथ्यों के आधार पर उसे गिरफ्तार किया गया। न्यायालय ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर कमी माना।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि गिरफ्तारी मेमो, औचित्य चेकलिस्ट, निरीक्षण मेमो और केस डायरी के कुछ हिस्सों सहित कई दस्तावेजों में हत्या से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के स्थान पर गलती से धारा 403(1) का उल्लेख किया गया था। अदालत ने कहा कि एक ही प्रकार की त्रुटि सभी दस्तावेजों में दोहराई गई है, इसलिए इसे केवल टाइपिंग या लिपिकीय गलती नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि किसी भी दस्तावेज में स्पष्ट रूप से यह दर्ज नहीं था कि आरोपी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। साथ ही गिरफ्तारी के समय कथित अपराध से जुड़े विशिष्ट तथ्यों की जानकारी भी आरोपी को उचित तरीके से नहीं दी गई। न्यायालय ने माना कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी कि दस्तावेजों में हुई गलती केवल टाइपिंग संबंधी त्रुटि थी, जिससे आरोपी को किसी प्रकार का वास्तविक नुकसान नहीं हुआ। सरकार का कहना था कि रिमांड आदेश, चार्जशीट और बाद की न्यायिक कार्यवाही में हत्या के आरोप का स्पष्ट उल्लेख मौजूद है, इसलिए केवल इस तकनीकी त्रुटि के आधार पर जमानत देना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
सरकार ने अपने पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी प्रक्रियागत कमियां, जिनसे आरोपी के अधिकारों पर वास्तविक असर न पड़े, बाद में सुधारी जा सकती हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों से सहमति नहीं जताई और कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में आवश्यक कानूनी मानकों का पालन किया जाना अनिवार्य है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने राज्य सरकार की जमानत रद्द करने संबंधी याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही सोनम रघुवंशी को निचली अदालत से मिली जमानत फिलहाल बरकरार रहेगी और वह आगे की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक जमानत पर बाहर रहेगी।