चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार जब एक मिलीलीटर वीर्य में लगभग डेढ़ करोड़ से कम शुक्राणु पाए जाते हैं तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है। यदि वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल नहीं होते तो इसे एजूस्पर्मिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है लेकिन आधुनिक चिकित्सा के जरिए कई मामलों में इसका सफल उपचार संभव है।
लो स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि लंबे समय तक नियमित प्रयास के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता। कई पुरुषों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। हालांकि कुछ मामलों में यौन इच्छा में कमी इरेक्शन की समस्या अंडकोष में दर्द सूजन या गांठ जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि धूम्रपान और तंबाकू के अलावा मोटापा लगातार मानसिक तनाव अत्यधिक शराब का सेवन नशीले पदार्थों का उपयोग हार्मोन असंतुलन और अनियमित जीवनशैली भी शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा वैरिकोसील थायरॉयड विकार कुछ संक्रमण और लंबे समय तक कुछ दवाओं का सेवन भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
यदि कोई दंपती बिना गर्भनिरोधक के एक वर्ष तक नियमित संबंध बनाने के बाद भी संतान प्राप्ति में सफल नहीं हो पाता तो पुरुष और महिला दोनों की जांच कराना आवश्यक माना जाता है। जिन पुरुषों को पहले से अंडकोष प्रोस्टेट या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही हो उन्हें बिना देरी चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच से समस्या का कारण पता लगाया जा सकता है और उसके अनुसार इलाज शुरू किया जा सकता है।
अच्छी बात यह है कि हर लो स्पर्म काउंट का मामला स्थायी बांझपन नहीं होता। संतुलित आहार नियमित व्यायाम पर्याप्त नींद तनाव पर नियंत्रण और स्वस्थ वजन बनाए रखने से शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। धूम्रपान तंबाकू और शराब से दूरी बनाना भी बेहद जरूरी है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवाओं हार्मोन थेरेपी या आधुनिक फर्टिलिटी तकनीकों की मदद से इलाज की सलाह दे सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुषों को अपनी प्रजनन क्षमता को लेकर खुलकर बात करनी चाहिए और किसी भी समस्या को छिपाने के बजाय समय पर जांच करानी चाहिए। सही जीवनशैली नियमित स्वास्थ्य जांच और विशेषज्ञ की सलाह से अधिकांश मामलों में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। जागरूकता और समय पर उपचार ही स्वस्थ पितृत्व की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।